प्रमोद भार्गव का आलेख - रक्ष संस्‍कृति का नायक था रावण

SHARE:

राम प्रत्‍येक भारतीय के आराध्‍य देव हैं और वे भारत के कण-कण में रमे हैं। वे आदर्श पुरूष हैं, मर्यादा पुरूषोत्तम हैं। उनकी तुलना में रावण क...

pramod bhargav

राम प्रत्‍येक भारतीय के आराध्‍य देव हैं और वे भारत के कण-कण में रमे हैं। वे आदर्श पुरूष हैं, मर्यादा पुरूषोत्तम हैं। उनकी तुलना में रावण को राक्षस, कुरूप, अत्‍याचारी, अतिकाई, आतताई आदि विकृति के विभिन्‍न प्रतीक रूपों में प्रस्‍तुत किया जाता है। लेकिन क्‍या यह संभव है कि समृद्ध, वैभवपूर्ण विशाल राष्‍ट्र का अधिनायक केवल दुर्गुणों से भरा हो ? वह भी ऐसा सम्राट जिसे राज्‍य सत्ता उत्तराधिकार में न मिली हो, बल्‍कि अपने कौशल, दुस्‍साहस और अनवरत संघर्ष से जिसने अपने समकालीन राजाओं को अपदस्‍थ कर सत्ता हासिल कर उसकी सीमाओं का लगातार विस्‍तार किया हो, ऐसा नरेश सिर्फ दुराचारी ओर अविवेकशील नहीं हो सकता ? ऐसे सम्राट की राजनैतिक व कूटनीतिक चतुराई को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

संस्‍कृत साहित्‍य के आदि कवि वाल्मीकि ने निष्‍पक्ष भाव से 'रामायण' में रावण चरित्र के उदात्त मानवीय गुणों को सम्‍यक और विस्‍तृत रूप से उभारा है, लेकिन रामायण से ही रावण-चरित्र के गुणों में विरोधाभास होने के कारण रावण के अच्‍छे गुण हाशिए पर पहुंच गए और दुर्गुण आम चर्चा का विषय बन गए हैं। इस जन मान्‍यता ने रावण को कुरूप राक्षस का दर्जा दे दिया। जबकि सच में रावण ऐसा था नहीं। धारा के विपरीत अनुसंधान कर लिखे प्राचीन और आधुनिक भारतीय साहित्‍य का हम पूर्वाग्रही मानसिकता से परे अध्‍ययन करें तो यह सहज ही साफ हो जाता है कि रावण भी राम की तरह ऐतिहासिक महापुरूष था। एक महान जाति और संपन्‍न राष्‍ट्र का शासक था। प्रणेता था।

रावण का शरीर आर्य और अनार्य रक्‍त से निर्मित है। ब्रह्मा कुल में जन्‍मे महर्षि पुलस्‍त्‍य का नाती होने के कारण वह आर्य ब्राह्मण है और दैत्‍यवंशी कैकसी-पुत्र होने से वह दैत्‍य है। लंका रावण के अधिकार में आने से पहले दैत्‍यों की थी। माली, सुमाली और माल्‍यवान नाम के तीन भाईयों ने अपने तेज, शौर्य और पराक्रम से त्रिकुट-सुबेल पर्वत पर लंकापुरी बसाई। इन तीनों का विवाह नर्मदा नाम की गंधर्वी ने अपनी तीन पुत्रियों से किया। इससे दैत्‍यवंश की वृद्धि हुई। इन तीनों ने लगातार लड़ाईयां जारी रख आसपास के द्धीपों पर भी कब्‍जा कर लिया और लंका में स्‍वर्ण, रत्‍न, मणि, माणिक्‍य का विशाल भंडार इकट्‌ठा कर लिया। काश्‍यप सागर के किनारे बसे द्वीप में स्‍थित सोने की खानों पर आधिपत्‍य को लेकर देवासुर संग्राम हुआ। इस भयंकर युद्ध में ये तीनों भाई भी शामिल हुए। इसमें माली मारा गया और दैत्‍यों की हार हुई। देवताओं के आतंक से भयभीत होकर सुमाली और माल्‍यवान अपने परिवारों के साथ पाताल लोक भाग गए। इसके बाद लंका का वैश्रवा आर्य और देवों की सहमति से कुबेर लंका नरेश बना।

बाद में लंका पर दैत्‍यों के राज्‍य की पुर्नस्‍थापना करने की लालसा से सुमाली अपने ग्‍यारह पुत्रों और रूपवती कन्‍या कैकसी के साथ पाताल लोक में आंध्रालय आया। उसने पुलस्‍त्‍य पुत्र विश्रवा के आश्रम में शरण ली। सुमाली ने कैकसी को विश्रवा की सेवा में अर्पित कर दिया। विश्रवा कैकसी पर मोहित हो गए । उनके संसर्ग से कैकसी ने तीन पुत्रों, रावण, कुंभकरण, विभीषण और एक पुत्री शूर्पनखा को जन्‍म दिया। इन संततियों ने यहीं वेदों का अध्‍ययन और युद्धाभ्‍यास किया। मसलन रावण सुंदर, शील, तेजस्‍वी और तपस्‍वी माता-पिता की वर्णसंकर संतान था। पांडित्‍य गुणों का समावेश उसके चरित्र में बाल्‍यकाल से ही हो गया था।

एक दिन कुबेर अपने पिता विश्रवा से मिलने पुष्‍पक विमान से आया। कैकसी ने रावण का परिचय कुबेर से कराया। रावण कुबेर से प्रभावित तो हुआ लेकिन उसके ऐश्‍वर्य से रावण को ईर्ष्‍या भी हुई। यहीं से रावण में प्रतिस्‍पर्धा करने और महत्‍वाकांक्षी होने की भावनाएं बलवती हुईं और उसने कुबेर से बड़ा व्‍यक्‍ति बनने का व्रत लिया।

बाद में सुमाली ने ही रावण को बताया कि लंका मेरी और मेरे सहोदरों की थी। सुमाली ने यहीं से रावण को लंका पर कब्‍जा कर लेने के लिए प्रोत्‍साहित करना शुरू कर दिया। रावण ने कई द्वीपों पर विजय पताका फहराते हुए बाली और सुंबा द्वीपों पर रक्ष संस्‍कृति की स्‍थापना का झंडा फहरा दिया। सुंबा में ही रावण का परिचय दनु पुत्र मय और उसकी सुंदर पुत्री मंदोदरी से हुआ। मय ने रावण को अपनी आपबीती बताते हुए कहा कि देवों ने उसका नगर 'उरपुर' और उसकी पत्‍नी हेमा को छीन लिया है। यहीं मय ने रावण के पराक्रम को स्‍वीकारते हुए मंदोदरी से विवाह कर लेने का प्रस्‍ताव रावण के सामने रखा। रावण ने धर्मपूर्वक अग्‍नि को साक्षी मानकर वैदिक पद्धति से मंदोदरी के साथ विवाह किया।

लंका को लेकर रावण और कुबेर में विवाद शुरू हुआ। रावण लंका में 'रक्ष' संस्‍कृति की स्‍थापना के लिए अटल था। जबकि कुबेर विष्‍णु का प्रतिनिधि होने के कारण 'यक्ष' संस्‍कृति ही अपनाए रखना चाहता था। बाद में पिता विश्रवा के आदेश पर कुबेर ने लंका छोड़ी और रावण लंका का एकछत्र अधिपति बन गया। इस तरह रावण ने अपने शौर्य और साहस के बल पर पार्श्‍ववर्ती द्वीप समूहों को जीत कर देव, दैत्‍य, असुर, दानव, नाग और यक्षों को अपने अधीन कर लिया। और इन्‍हें संगठित कर 'राक्षस' नाम देकर 'रक्ष' संस्‍कृति की स्‍थापना की। जिसकी विचारधारा के मूल में आर्य (देव) विरोध का लक्ष्‍य था। इस तरह रावण कई जातियों और उप जातियों का संगठक भी था।

वाल्‍मीकि ने 'रामायण' में रावण को 'महात्‍मा' बताया है। सुबह के समय लंका नगरी में पूजा, अर्चना, शंख और वेद ध्‍वनियों से गुंजायमान होने वाले वातावरण का भी अलौकिक चित्रण है।

भेरीमृदंगभिरूतं शंख, घोष विनादितम्‌, नित्‍यार्चित पर्वसुतं पूजितं राक्षसै सदा।

समुद्रमिव गंभीरं समुद्रसमनिः स्‍वनम्‌, महात्‍मनो महद्‌ वेरम्‌ महारत्‍नम्‌ परिछदम्‌॥

वाल्मीकि का रावण जो अपने उदात्‍त गुणों के कारण महात्‍मा तक है वह तुलसीदास की रचना का पात्र बनते ही विकृत गुणों वाला विकराल राक्षस बन जाता है।

लोक जगत में यह भ्रम फैला हुआ है कि रावण का शरीर दैत्‍याकार व कुरूप था। उसके दस मुख बीस भुजायें थीं। इसका रंग ताबाई था। बाल चमकीले थे। एक सिर गधे का भी था। वस्‍तुतः रावण आंतिकाय व विरूप नहीं था वह साधारण पुरूषों की ही भांति था। वाल्मीकि ने रावण की रूपाकृति को रूपवान बताते हुए उसे एक मुख, दो हाथ, स्‍वस्‍थ्‍य और सुंदर शरीर वाला, शरीर का श्रृंगार करने वाला और इच्‍छानुसार रूप रख लेने वाला बताया है। वाल्मीकि ने हनुमान जब रावण को लंका में पहली बार देखते हैं तो उसके सौन्‍दर्य को देखकर किंकर्तव्‍यविमूढ़ रह जाते हैं।

अहो रूपमहो धैर्यमहो सत्‍वमहो द्युतिः।

अहो राक्षस राजस्‍व सर्व लक्षण युक्‍तता॥

डॉ. रांगेय राघव ने रावण के दस मुख, बीस भुजाओं का भ्रम एक बिल्‍कुल नये तरीके से दूर किया है।मां कैकसी ने रावण को नौ मणियों वाला हार गले में पहनाया। पिता विश्रवा को इस हार में रावण के दस मुख दिखे जिसमें एक वास्‍तविक और नौ प्रतिबिंब थे इस कारण विश्रवा ने रावण को ‘‘दशानन'' कहना शुरू कर दिया। लेकिन देव भक्‍त कवियों ने इस सच्‍चाई को झुठलाकर रावण के विकृत स्‍वरूप की कपोल कल्‍पना कर दस मुख, बीस भुजाओं का चित्रण कर डाला।

रावण का गुण अतुल था इसी कारण वह बहु विधाओं और विद्याओं का मर्मज्ञ था। वह एक सफल राष्‍ट्र नायक, सेनानायक, नीति विशेषज्ञ तो था ही, साथ ही वह अपने युग का सफल साहित्‍यकार, संपादक, चिकित्‍सा शास्‍त्री और संगीत प्रेमी भी था।

वेदों की यत्र-तत्र फैली ऋचाओं को इकट्‌ठी कर उन्‍हें सिलसिलेवार लगातार रावण ने संपादकीय कार्य किया। संस्‍कृत हस्‍तलिपियों की सूची में रावण द्वारा रचित निम्‍न पुस्‍तकेंं मानी जाती हैं-अंक प्रकाश (वेद), कुमारतंत्र, इंद्रजाल प्राकृत कामधेनु, प्राकृत लंकेश्‍वर, ऋग्‍वेद भाष्‍य, रावण भेंट, रावणीयम्‌ (संगीत), नाड़ी परीक्षा, अर्कप्रकाश, उड्‌डीशतंत्र, कामचाण्‍डाली कल्‍प आदि। इस तरह रावण साहित्‍य और संगीत का उपासक ही नहीं रचियता भी था। हरदयालु सिंह द्वारा लिखे प्रबंध काव्‍य ‘‘रावण'' में रावण को वास्‍तुकला प्रेमी और महान नीतिज्ञ भी बताया गया है। वह लंका में माली स्‍मारक, मेघनाथ भवन, अशोक वाटिका समेत भविय भवन और बाग बनवाता है। साथ ही आवागमन की सुविधाओं के लिए नदियों पर कई पुल भी बनवाया है। रावण का नीतिवान होना उसके चरित्र की सबसे बड़ी उपलब्‍धि है। सीताहरण से पहले रावण नीति पालक होने के कारण ही राम से सीधे युद्ध नहीं करता। क्‍योंकि राम वनवासी होने के साथ जंगल में असहाय भी हैं-

जपु करि जिन बल प्रयोगगहि लेहु तिनको जीति, कहेगो संसार मैंने करी अमित अनीति।

वीर को नहिं उचित जूझैः बालकनि सौ जाय, करत है वनवास तिनको है न कोउ सहाय॥

राम-रावण युद्ध आर्य और अनार्य संस्‍कृतियों की स्‍थापना और वर्चस्‍व की लड़ाई तो था ही, राम और रावण के वंशों का परंपरागत वैर भी था। आरंभ में रावण का आर्यों से कोई बैर नहीं है। लेकिन रावण को जब नाना और दादा पुलस्‍त्‍य आर्यों द्वारा राक्षसों पर किये गये अत्‍याचार की आपबीती सुनाते हैं तो रावण आक्रोश में आ जाता है और आर्यों से प्रतिशोध लेने का मन बना लेता है। राम रावण रंजिश की क्रूर शुरूआत ‘शंबूक हत्‍या' से होती है। शंबूक शूर्पनखा का तेजस्‍वी, वीर और वैज्ञानिक पुत्र है। मदनमोहन शर्मा ‘‘शाही'' के उपन्‍यास ‘‘लंकेश्‍वर'' के अनुसार शंबूक जंगल में स्‍थित अपनी अनुसंधान शाला में ‘सूर्यहास खंग' नाम के एक अस्‍त्र का संधान कर रहा है। इस अस्‍त्र की मारक क्षमता व्‍यापक है। राम इस नये अस्‍त्र की खोज की खबर सुनकर बैचेन हो जाते हैं और लक्ष्‍मण को भेजकर अनुसंधित्‍सु शंबूक की हत्‍या करा देते हैं। प्रतिशोध के लिए सूर्पनखा राम-लक्ष्‍मण के सामने प्रस्‍ताव रखती है और दूसरी तरफ रावण और खरदूषण को शंबूक की हत्‍या का समाचार भी पहुंचाती है। लेकिन लक्ष्‍मण सूर्पनखा के नाक, कान काटकर उसका अपमान करते हैं। सूर्पनखा यहीं लक्ष्‍मण वध का संकल्‍प लेती है रावण इसे राम द्वारा दी गई युद्ध के लिए खुली चुनौती मानता है और रावण विशुद्ध राजनीतिज्ञ कारणों से सीता का हरण कर लेता है। जिससे जन समाज में राम अपमानित व लज्‍जित हैं। सीता आर्य संस्‍कृति की प्रतीक भी है।

रावण को अपनी जाति, अपनी संस्‍कृति और अपने राष्‍ट्र से कितना प्रेम था और वह कितना स्‍वाभिमानी था इसी बात से सिद्ध हो जाता है कि राम के वंशानुगत शत्रुता को वह कभी नहीं भुला पाता और अंतिम क्षणों न तो राम के सामने किसी संधि वार्ता का प्रस्‍ताव रखता है और न ही पराजय स्‍वीकार करता है। रावण को लंका की जनता और परिवार के सदस्‍य कितना चाहते थे यह इन तथ्‍यों से सिद्ध होता है कि विभीषण के लंकाधीश बनने के बाद मंदोदरी उसकी पटरानी बनने को तैयार नहीं होती। बल्‍कि कुछ समय बाद ही विभीषण अत्‍याचारी और जन विरोधी शासक सिद्ध होता है। फलस्‍वरूप प्रजा विद्रोह कर देती है अनुकूल अवसर का लाभ उठाकर रावण पुत्र ‘‘अरिमर्दन;; लंका पहुंचकर युद्ध का उद्‌घोष कर देता है। भीरू और कायर विभीषण सन्‍यास लेने के बहाने लंका छोड़ देता है। अरिमर्दन लंका का नया नरेश बनता है और रावण द्वारा बनाये नियम व नीतियों की पुनः स्‍थापना कर फिर से लंका में प्रजातंत्र की शुरूआत करता है। वस्‍तुतः रावण प्राचीन युग का महत्‍वपूर्ण इतिहास पुरूष, विशाल राज्‍य का शक्‍तिशाली सम्राट और महान राष्‍ट्रभक्‍त था। अपने उदात्‍त चरित्रिक गुणों के कारण ही वह रक्ष संस्‍कृति को प्रतिष्‍ठित करने में सफल हुआ।

रावण के आर्य और राम के अनार्य विरोधी होने के कारण ही वह कवियों ने रावण चरित्र और उसकी उपलब्‍धियों को तोड़ मरोड़कर प्रस्‍तुत किया। हालांकि प्राचीन भारतीय ग्रंथों में वाल्मीकि रामायण में रावण का मानवीय और ऐतिहासिक रूप सबसे ज्‍यादा सुरक्षित है। इधर आधुनिक साहित्‍य में मदन मोहन शर्मा ‘‘शाही'' द्वारा लिखे वृहद उपन्‍यास ‘‘लंकेश्‍वर'' में रावण चरित्र और विराट व महान स्‍वरूप में सामने आया है। जो निसंदेह सराहनीय है।

----

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: प्रमोद भार्गव का आलेख - रक्ष संस्‍कृति का नायक था रावण
प्रमोद भार्गव का आलेख - रक्ष संस्‍कृति का नायक था रावण
http://lh5.ggpht.com/_t-eJZb6SGWU/TLkzrKevNXI/AAAAAAAAJKc/M5H93cAKyEU/pramod%20bhargav%5B2%5D.jpg?imgmax=800
http://lh5.ggpht.com/_t-eJZb6SGWU/TLkzrKevNXI/AAAAAAAAJKc/M5H93cAKyEU/s72-c/pramod%20bhargav%5B2%5D.jpg?imgmax=800
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2010/10/blog-post_3718.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2010/10/blog-post_3718.html
true
15182217
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content