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रामदीन की कविता – अर्ध सत्य

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‘‘अर्ध सत्‍य''

स्‍वामी हैं सन्‍यासी हैं,

सच्‍चे सन्‍त साधुओं का मैं अभिनन्‍दन करता हूं

छूकर उनकी चरण पादुका खुद को धन्‍य समझता हूँ,

करते हैं कुछ धन्‍धा इनमें स्‍वामी हैं सन्‍यासी हैं,

तीन-तीन शादी कर बैठे स्‍वामी हैं सन्‍यासी हैं,

आधा दर्जन बच्‍चे इनके स्‍वामी हैं सन्‍यासी हैं,

कोई कर्म नहीं छूटा है स्‍वामी हैं सन्‍यासी है,

नकली काले बाल किये हैं स्‍वामी हैं सन्‍यासी हैं,

पकड़े जाते रंगे हाथ हैं स्‍वामी हैं, सन्‍यासी हैं,

शर्म नहीं इनको है आती स्‍वामी हैं सन्‍यासी हैं,

जान के दुश्‍मन गैलिलियों1 के स्‍वामी हैं सन्‍यासी हैं,

बौद्धों को भी खूब सताया स्‍वामी हैं सन्‍यासी हैं,

तर्क नहीं इनको है भाता स्‍वामी हैं सन्‍यासी हैं,

भीड़े जुटाते अन्‍ध भक्‍ति से स्‍वामी हैं सन्‍यासी हैं,

सन्‍त कबीर को नहीं मानते स्‍वामी हैं सन्‍यासी हैं,

सच्‍चे सन्‍त साधुओं का मैं फिर अभिनन्‍दन करता हूँ,

छूकर उनकी चरण पादुका खुद को धन्‍य समझता हूँ।

--

1. तत्‍कालीन वैज्ञानिक जिन्‍होंने पृथ्‍वी के घूमने की खोज की थी।

-रामदीन

जे-431, इन्‍द्रलोक कालोनी,

कृष्‍णा नगर, लखनऊ

3 टिप्पणियाँ

  1. सच्‍चे सन्‍त साधुओं का मैं फिर अभिनन्‍दन करता हूँ,

    छूकर उनकी चरण पादुका खुद को धन्‍य समझता हूँ।

    बहुत मुश्किल काम है सच्चे सन्यासी को पहचानना ...अच्छी कविता

    जवाब देंहटाएं
  2. बेनामी10:03 am

    कविता खूबसूरत और भावमयी प्रस्तुति हैं भीड़ से अलग बधाई ।
    पंकज शर्मा

    जवाब देंहटाएं

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