रामवृक्ष सिंह का व्यंग्य - चलो थोड़ा भ्रष्ट हो जाएँ

SHARE:

व्यंग्य-लेख चलो थोड़ा भ्रष्ट हो जाएँ डॉ. रामवृक्ष सिंह आजकल पत्नी हमारी बड़ी मनुहार कर रही हैं। उठते-बैठते, खाते-पीते, जागते-सोते उनक...

व्यंग्य-लेख

चलो थोड़ा भ्रष्ट हो जाएँ

डॉ. रामवृक्ष सिंह

chalo bhrasta ho jayen

आजकल पत्नी हमारी बड़ी मनुहार कर रही हैं। उठते-बैठते, खाते-पीते, जागते-सोते उनकी बस एक ही रट है- ‘ए जी, आप भी क्यों नहीं भ्रष्ट हो जाते! देखिए न आसपास का सब लोग झार के भ्रष्ट हो गया है। नेता-अभिनेता, मंत्री-यंत्री, साहब-बाबू, ठेकेदार-थानेदार, जिसे देखो भ्रष्टाचार के झंडे गाड़ रहा है। और एक आप हैं कि टस से मस तक नहीं हो रहे। देखिए, ऊ का है कि अगर आप अब भी भ्रष्ट नहीं होंगे तो हम आपसे एकदम्मै नाराज हो जाएँगे, हाँ..’। कांता कामिनी के इस उपदेश का थोड़ा-थोड़ा असर अब हम पर होने लगा है। फिर इधर परिवार के बाकी सब लोग भी हमसे नाराज चल रहे हैं। बात-बात पर झल्ला जाते हैं। कारण यह है कि अपनी ईमानदारी की झख के चलते मोहल्ले में हम ही सबसे खस्ताहाल हैं। बीवी को महँगी साड़ी हमने कब दिलवाई, अब कुछ याद नहीं। गहने तो शादी के समय जो मिले थे, बस वही चल रहे हैं। बेटे बड़े हो गए। कॉलेज जाते हैं। लेकिन मोटरसाइकिल एक ही है। कभी एक लपक ले जाता है तो कभी दूसरा। उनकी कोई बंधी हुई पॉकेट मनी नहीं है। जरूरत पड़ती है तो माँ से माँगते हैं, जो सौ रुपये माँगने पर पचास देती है। हमसे माँग नहीं सकते, क्योंकि हमारी जेब में बस दो चीजें रहती हैं, एक बस का मासिक सीजन टिकट और दूसरा क्रेडिट कार्ड। चवन्नी-अठन्नी चाहे निकल आए, पर रुपयों की उम्मीद करना यहाँ बेकार है।

हमसे कोई मिलने भी नहीं आता। उन्हें मालूम है, इस ईमानदार मरदुए के पास चाय पिलाने के पैसे भी नहीं होंगे। घड़ी-घड़ी चाय-नाश्ता और पान-तंबाकू नहीं मँगाते, इसलिए चपरासी भी हमें घास नहीं डालता। जाहिर है उसके हाथों हमें पानी मिलना भी मुश्किल है। लोग वहीं जाते हैं, जहाँ तर माल काटने को मिले। मिसिल मशहूर है- यार दोस्त किसके, खाया-पिया खिसके। बड़ी मुश्किल है, ईमानदारी ने हमें कहीं का नहीं छोड़ा। हमारे पास बहुत सी पुरानी चीजों का संग्रह है, जिनमें कुछ चालू हालत में तो बाकी बेकार होकर भी बस इसलिए हमारे पास रह गई हैं कि और कोई उनको पूछेगा नहीं, कबाड़ी खरीदेगा नहीं। चरित्र और ईमानदारी भी ऐसी ही ऐंटीक वस्तुएं हैं, जिन्हें हम गरीब की आबरू की तरह बचाए-बचाए फिरते हैं। बस इसी सरमाए पर किसी तरह जिन्दगी घसीट रहे हैं। हमारी हालत सड़क के बीच, डिवाइडर पर खड़े उस विक्षिप्त की तरह है जो पुरानी-धुरानी बेकार चीजों को डंडे पर बाँधे खड़ा रहता है और हर आता-जाता उसे कौतूहल की नजर से देखकर आगे बढ़ जाता है।

पर परिवार का क्या करें? यों उनकी बुनियादी जरूरतें तो ईमान की कमाई से भी पूरी हो जाती हैं, लेकिन अगल-बगल के लोग जिस ठाठ से जीते हैं, उसे देखकर उन्हें जो कुढ़न होती है उससे उनको कैसे बचाएँ?

मसलन, पार्क के उस कोने में एक सज्जन की आलीशान कोठी है। वे सचिवालय में सेक्शन अफसर हैं। सचिवालय की हनक में प्राधिकरण की ढेरों जमीन दबा ली है। मकान बनवाया तो सब कुछ लगभग मुफ्त में मिल गया, गिट्टी-मौरंग-बालू सब खदानों से बस ट्रक भाड़े के दाम उठवा लाए। ठेकेदार-सप्लायर की गर्दन दबाई और सीमेंट-सरिया, मार्बल भी औने-पौने पा गए। उनके मकान जैसा झक सफेद चमचमाता मार्बल इधर किसी के घर में नहीं है। पत्नी चाहती हैं कि हम उनसे होड़ करें। समझती नहीं कि सचिवालय में नौकरी करने के क्या मायने होते हैं। दो घर छोड़ के एक डॉक्टर साहब रहते हैं। मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसर हैं। नॉन प्रैक्टिसिंग भत्ता लेते हैं, किन्तु घर पर मरीजों की भीड़ लगी रहती है। एक मरीज को देखने के चार सौ रुपये वसूल लेते हैं। दूसरी ओर के दो घर छोड़कर एक इंजीनियर रहते हैं। बिना कमीशन लिए किसी ठेकेदार का बिल नहीं पास करते। दफ्तर की जीप घर पर ही खड़ी रहती है। कभी बीवी को ब्यूटी पार्लर ले जाती है तो कभी बच्चों को कोचिंग। जीप का ड्राइवर, ड्राइवर का काम कम और घरेलू नौकर का काम ज्यादा करता है। पीछे के बड़े मकानों में एक प्रशासनिक अधिकारी रहते हैं। उनके पास कई विभागों का चार्ज है। सुना है जेल भी उन्हीं के अधीन है। छत पर खड़े होकर देखते हैं तो जेल की ट्रक से कभी बोरा भर चीनी उतर रही होती है, कभी फिनाइल की बोतलों का पूरा कार्टन। घर में निजी नौकर एक भी नहीं हैं। चाहे घास काटना हो, कुत्ते को घुमाना हो, घर के बर्तन माँजना हो या झाड़ू-पोंछा। सब काम जेल के कैदी करते हैं। लेकिन ऐसा तो दशकों से चलता चला आ रहा है। अब किसी को यह लगता ही नहीं कि यह सब भ्रष्टाचार के दायरे में आता है।

इधर भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े रिकॉर्ड बनाए जा रहे हैं। सुना है कॉमन वेल्थ गेम्स से जुड़े निर्माण कार्यों, खेल-सामग्री की खरीद और ठेकों के आवंटन में करोड़ों रुपये के वारे-न्यारे हुए। फिर 2जी के आवंटन में अरबों रुपये इधर से उधर कर दिए गए। इससे पहले क्रिकेट के खेल में खूब खेल हुआ। रोज एक नया काण्ड उजागर होता है। अगर अखबार में किसी दिन किसी बड़े घोटाले की खबर नहीं छपती तो दिल बड़ा बेचैन हो उठता है। लगता है कि हम जला-वतन हो गए। अपना देश अपना नहीं लगता। लगता है कि नाली के कीड़े को उठाकर गुलाब जल में रख दिया गया है, जहाँ उसकी जान निकली जा रही है। हम भ्रष्टाचार की नाली में जीने के अभ्यस्त हो चले हैं। अब यदि वहाँ स्वच्छता दिख जाती है तो मन बड़ा अकुलाने लगता है।

भ्रष्टाचार के ऐसे सुन्दर माहौल में हमें भी हद दर्जे का भ्रष्ट हुआ देखने की हमारी पत्नी और बच्चों की उत्कट आकांक्षा सर्वथा स्वाभाविक और काफी हद तक श्लाघनीय है। यह बिलकुल ऐसे ही है, जैसे पड़ोसी के घर में एसी कार के आने पर अपने घर में उससे भी बड़ी और शानदार एसी कार खरीदने की इच्छा, जैसे किसी रिश्तेदार के बेटे को दस लाख रुपये नकद दहेज मिलने पर अपने बेटे के लिए पंद्रह लाख रुपये दहेज के रूप में पाने की इच्छा। यानी यदि आस-पास के लोग, परिचित और रिश्तेदार हजार रुपये का घोटाला करते हैं तो हम लाख रुपये का करें, यदि वे लाख का करते हैं तो हम करोड़ का करें। बस किसी तरह घोटाला कर दें। किसी तरह अपनी संस्था, विभाग, मंत्रालय और देश को करोड़ों-अरबों का चूना लगाकर हम रातों-रात अमीर हो जाएँ। उसके बाद मुँह पर कालिख पोतकर गधे पर उल्टे बैठाए जाएं, सारे शहर में जूतों का हार पहने-पहने घूमें, जेल जाएँ और सीबीआई वाले हमारा नार्को टेस्ट करें तो किया करें। यही तो स्वातंत्र्योत्तर भारत में मिलने वाला सबसे अच्छा और श्लाघ्य मान-सम्मान है। पहले लोग स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लेने पर जेल जाते थे। महिलाएं पिकेटिंग करती थीं तो जेल जाती थीं। आजादी के बाद बहुत से मजदूर नेता अपने साथियों के हकों की लड़ाई लड़ते हुए जेल गए। इमरजेंसी में बड़े-बड़े नेताओं को सरकार की दुर्नीतियों का विरोध करने पर जेल भेज दिया गया। यानी वे सब उस जमाने के बड़े कारनामे करने पर जेल भेजे गए। आज का बड़ा कारनामा है भ्रष्ट होना। भ्रष्टाचार करके जेल जाना तो शान की बात है।

लिहाजा हुआ ये है कि हमने पत्नी और बच्चों की उत्कट इच्छा के आगे हथियार डाल दिए हैं और अपनी ऐंटीक हो चुकी आयडियोलॉजी त्यागकर बिलकुल नई-नवेली, इन-थिंग यानी इस भ्रष्टाचार वाली जीवन-पद्धति को अपनाने का मन बना लिया है। दिक्कत ये है कि इस नई-नई राह पर चलने में हमें बड़ी कठिनाई हो रही है। समझ ही नहीं आता कि भ्रष्ट होने की शुरुआत कहाँ से करें। काश कोई हमें सिखा देता, कहीं से भ्रष्टाचार की डिग्री-डिप्लोमा करा देता। न हो तो सर्टिफिकेट कोर्स ही सही।

बच्चे हमारी पशो-पेश देखकर हम पर तरस खाते हैं। उन्हें हम पर हँसी आती है कि लो ये भी कमाल के जीव हैं। इत्ते बड़े हो गए और भ्रष्टाचार का ककहरा भी नहीं जानते। उन्हें हैरत होती है कि ऐसा नॉन-करप्ट इन्सान लगभग आधी सदी की जिन्दगी, वह भी इस महाभ्रष्ट भरतभूमि में कैसे गुजार आया। भ्रष्टाचार के मामले में हमारी पतली हालत देखकर दोनों लड़कों ने अपनी पढ़ाई-लिखाई की योग्यता में एक और इजाफा करने का मन बना लिया है। अब वे इस जुगत में हैं कि कहीं कोई ऐसा विश्वविद्यालय मिल जाए, जहाँ से वे एमओबी यानी मास्टर ऑफ भ्रष्टाचार की डिग्री ले सकें। भारत में सफलतापूर्वक जीवन यापन के लिए आपके पास अन्यान्य योग्यताओं के साथ-साथ, इस योग्यता का होना भी बेहद जरूरी है। हमें पूरा यकीन है कि यदि विश्वविद्यालयों में पढ़ाई शुरू हुई तो इस विधा के सैकड़ों सिद्धहस्त प्रोफेसर हमें मिल जाएंगे, जो थ्योरी और प्रैक्टिस, दोनों में हमारे बच्चों को पारंगत कर दें। फिर जैसे हर गली-हर कूचे में बीटेक और एमबीए की दुकानें खुल गई हैं, वैसे ही शीघ्र ही अपने देश में हर दूसरी इमारत में बीओबी यानी बैचलर ऑफ भ्रष्टाचार तथा एमओबी यानी मास्टर ऑफ भ्रष्टाचार की पढ़ाई कराने वाले विश्वविद्यालय खुल जाएँगे। एमओबी में प्रवेश के लिए बीओबी पास होना जरूरी होगा। लेकिन जो लोग भ्रष्टाचार में लिप्त होने के दोषी सिद्ध होकर जेल की सजा काट चुके होंगे उनको एमओबी में लैटरल एंट्री मिल जाएगी।

दिक्कत ये है कि हमारे बच्चों को इस विषय की डिग्री लेकर देश को लूटने और अपना घर भरने की बड़ी जल्दी है। वे विश्वविद्यालय में इस विधा की पढ़ाई शुरू होने तक इंतजार नहीं करना चाहते और देश के करोड़ों दूसरे भ्रष्टभ्यर्थियों की भाँति रातों-रात अमीर होना चाहते हैं। इसलिए हमने उनसे कह दिया है कि तुम लोग दिल्ली चले जाओ। वहाँ इस कला के सैकड़ों उस्ताद रहते हैं। उन्हीं में से किसी से गंडा बंधवा कर प्राइवेट भ्रष्टाभ्यास करो। वहीं रहकर खूब रियाज करो। यदि उस्ताद का दिल जीत सके तो उनसे भ्रष्टाचार के अच्छे से अच्छे गुर सीखकर खूब तरक्की करना और अपने साथ-साथ अपने गुरु और इस नाकाम बाप का भी नाम रोशन करना, जो ऐंटीक नैतिक मूल्यों से भरी हुई ऐसी नाव में सवार है, जो लाख कोशिशों के बाद भी भ्रष्टाचार के दलदल की ओर बढ़ना ही नहीं चाहती।

बच्चे चलने लगे तो हमने उन्हें आशीर्वाद दिया- ‘खूब भ्रष्ट होओ। दिन दूना, रात चौगुना भ्रष्टाचार करो। देश को जल्द से जल्द बेच डालो। भ्रष्टाचार की दुनिया में खूब नाम कमाओ। हम जो नहीं कर सके, तुम वह सब कुछ कर के दिखाओ। भ्रष्टाचार का नोबल पुरस्कार जीत कर लाओ।’

---

समाचार कतरन चित्र - साभार दैनिक भास्कर

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: रामवृक्ष सिंह का व्यंग्य - चलो थोड़ा भ्रष्ट हो जाएँ
रामवृक्ष सिंह का व्यंग्य - चलो थोड़ा भ्रष्ट हो जाएँ
http://lh3.ggpht.com/_t-eJZb6SGWU/TTP8vPInRNI/AAAAAAAAJaQ/MNS_bLrHQFc/chalo%20bhrasta%20ho%20jayen%5B2%5D.jpg?imgmax=800
http://lh3.ggpht.com/_t-eJZb6SGWU/TTP8vPInRNI/AAAAAAAAJaQ/MNS_bLrHQFc/s72-c/chalo%20bhrasta%20ho%20jayen%5B2%5D.jpg?imgmax=800
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2011/01/blog-post_2533.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2011/01/blog-post_2533.html
true
15182217
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content