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मनोज अग्रवाल की कविता


subah ka sooraj             
सबेरे जब निकलता हूं,

रोकती है,

टोकती है मुझे भीड़-

‘सुन ऐ कृष्ण!’

हमें विरासत में मिला तुम्हारा चक्र

अब जर्जर हुआ जाता है।

 

कुछ ही दशाब्दियां

गाड़ी खींचने के बाद

(क्योंकि अब धर्मयुद्धों की संभावना नहीं)

उसके कील-कांटे हो गए हैं ढीले

स्वर्णिम आभा अब नहीं

वरन,

निकलती है उसमें से

चूं...चर्र....मर्र....की आवाज।

 

गति उसकी मंद हुई,

भंग हुई।

अब मैं द्विविधाओं से घिरा

किस-किस को स्पष्ट करूं;

मेरा सुदर्शन चक्र-

‘गाड़ी खींचने का पहिया नहीं’

 

मान्यताओं,

आस्थाओं की दृढ़ धुरी पर टिका

द्रुत वेग से घूमने वाला,

शाश्वत,

जीवन की गति है।

 

इससे न लो गाड़ी खींचने का काम।

फिर देखो स्वर्णिम आभा।

उसकी नहीं,

गति तुम्हारी मंद है।

 

चल नहीं सके तुम उसके साथ।

यह गति है युग की।

दौड़ो!

साथ होने की करो कोशिश।

--

 

मनोज अग्रवाल

मुंगेली, जिला-बिलासपुर

छत्तीसगढ़

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