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संजय दानी की ग़ज़ल - समन्दर से मुझको मुहब्बत है दानी, किनारों का तुम रास्ता पूछ लेना।

सितारों से मेरी ख़ता पूछ लेना,
अंधेरों  से मेरा पता पूछ लेना।


तेरे हुस्न को देखकर, मेरे हमदम,
ख़ुदाओं का सर क्यूं  झुका पूछ लेना।


मैं तेरे लिये जान दे सकता भी हूं ,
मगर दिल में, मेरी जगह पूछ लेना।


ज़मीं जाह ज़र की इनायत है लेकिन ,
सुकूं मुझसे क्यूं है खफ़ा पूछ लेना।


अदावत,बग़ावत, खयानत,सियासत ,
से इंसानों को क्या मिला पूछ लेना।


चराग़ों की तहज़ीब भाती है मुझको ,
हवाओं का तुम फ़ैसला पूछ लेना।


अभी न्याय की बस्ती मे मेरा घर है ,
ग़ुनाहों का दिल क्यूं दुखा पूछ लेना।


फ़लक को झुकाने की कोशिश थी मेरी
फ़लक खुद ही क्यूं झुक गया पूछ लेना।


समन्दर से मुझको मुहब्बत है दानी,
किनारों का तुम रास्ता पूछ लेना।

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फ़लक=गगन, जाह=सम्मान, ज़र=धन,अदावत=दुशमनी,।

3 टिप्पणियाँ

  1. adabi salhiyat dil khol kar yoon 1
    kyon kee khuda ne ata pooch lena 11

    जवाब देंहटाएं
  2. shweta dubey7:06 pm

    abhi to muskarana hi sabab hai jindagi ka
    ki kyo machalti hai darde juba poonch lena...


    bahut sahi likha hai sanjay ji... all the veri best.

    जवाब देंहटाएं

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