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प्रमोद भार्गव का आलेख : विकीलीक्‍स - मुखौटे उतारने का माध्‍यम

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  विकीलीक्‍स एक ऐसी मजबूत तकनीक के रुप में उभर रही है, जो बिना कोई अर्जी लगाए ‘सूचना के अधिकार' का दायित्‍व निर्वहन करती नजर आने लगी ...

 

विकीलीक्‍स एक ऐसी मजबूत तकनीक के रुप में उभर रही है, जो बिना कोई अर्जी लगाए ‘सूचना के अधिकार' का दायित्‍व निर्वहन करती नजर आने लगी है। जब किसी देश या संस्‍था में तकनीकी नेतृत्‍व प्रभावी हो जाता है तो वह कठपुतली नेतृत्‍व कहलाता है। उसके संचालन के सूत्र अदृश्‍य हाथों में होते हैं। ऐसा नेतृत्‍व न संवेदनशील होता है और न ही बहुसंख्‍यक आबादी के हितों की दृष्‍टि से जवाबदेह। यह राजनीतिक नेतृत्‍व तब और खतरनाक साबित होने लगता है जब यह विदेशी शक्‍तियों का सूत्रवाहक बन पूंजीवादी मूल्‍यों को देश की अवाम पर थोपने लगता है। इसी कारण भारत के आंतरिक मामलों में न केवल अमेरिकी दखल साफ दिखाई देने लगा है, बल्‍कि वह सरकारी नीतियों को बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों के हितार्थ ढालने भी लग गया है। यह स्‍थिति ईस्‍ट इंडिया कंपनी और ब्रितानी हुकूमत की उन दिनों की याद ताजा करती है, जब इन्‍होंने भोग-विलासी भारतीय सामंतों और राजे-रजवाड़ों के जरिये न केवल भारत-भूमि पर पैर जमाए बल्‍कि आम भारतीय को गुलाम बनाने और उसे प्राकृतिक संपदा, भू-अधिकार तथा जंगलों से बेदखल करने के लिए अमानवीय कानूनों की एक पूरी संहिता ही रच दी। इस मैले को हम आज भी ढोते हुए गौरवान्‍वित हैं। ऐसे में जब अन्‍य लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍थाएं विधि-विधान की तकनीकी ओट में भ्रष्‍ट होकर राष्‍ट्रघाती हो जाएं तो उनके चेहरों से मुखौटे उतारने का काम विकीलीक्‍स जैसी कोई निर्भय तकनीक ही कर सकती है। क्‍योंकि संवेदना शून्‍य तकनीक कोई स्‍व-अस्‍मिता नहीं होती इसलिए वह लाभ, हानि से निर्लिप्‍त और भय से मुक्‍त होती है। लिहाजा लोहे से लोहा काटने के यथार्थ की तरह तकनीकी नेतृत्‍व को तकनीक से ही काटा जा सकता है।
विकीलीक्‍स के खुलासे अब कांग्रेस और कांग्रेस के रहनुमाओं तक ही सीमित नहीं रह गए हैं। भाजपा नेताओं के गले की फांस भी वे बन रहे हैं। यह स्‍थिति विकीलीक्‍स की निष्‍पक्षता जाहिर करती है। लालकृष्‍ण आडवाणी परमाणु समझौते के पक्षधर थे। संसद में उनका विरोध हाथी के दिखने वाले दांतों की तरह था। विकीलीक्‍स द्वारा इस खुलासे के बाद आडवाणी के करीबी और राज्‍यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली अब विकीलीक्‍स की तंरगीय लपेटे में है। अमेरिकी दूतावास के राजनयिक रॉबर्ट ब्‍लैक के एक दस्‍तावेजी साक्ष्‍य को उजागर करते हुए दावा किया गया है कि जेटली ने परस्‍पर बातचीत में कहा था कि हिन्‍दू राष्‍ट्रवाद उनके दल के लिए महज एक अवसरवादी मुद्‌दा है। चूँकि भारत के पूर्वोत्‍तर में हिन्‍दुत्‍व का मुद्‌दा खूब चलता है। वहां बांग्‍लादेश से आकर बसने वाले मुस्‍लिमों को लेकर स्‍थानीय आबादी अपने वजूद को खतरे में पड़ा देख रही है। ब्‍लैक ने अपने संदेश में आगे कहा हालांकि हिन्‍दू राष्‍ट्रवाद का असर अब कम हो गया है लेकिन सीमा पार से एक और आतंकी हमला होने पर हालात फिर से भाजपा के अनुकूल हो सकते हैं।
हकीकत तो यही है कि हमारी बहुदलीय राजनीति अब दो चेहरों वाली, दो मुंही राजनीति में तेजी से तब्‍दील होती जा रही है। इस नजरिये से भारत में पीवी नरसिंह राव सरकार में वित्‍त मंत्री रहते हुए मनमोहन सिंह ने अमेरिकी परस्‍त जिन पूंजीवादी मूल्‍यों का बारास्‍ता वैश्‍विक उदारवाद के बहाने बीजारोपण किया था, उनका पोषण और संवर्द्धन अटलबिहारी वाजपेयी सरकार में भी खूब हुआ। इस मुफीद माहौल मे अमेरिका मत चूको चौहान की भूमिका में आ गया। उसके मंसूबों की बुनियाद मजबूत हो, इस दृष्‍टि से अमेरिका ने भारत के मामलों में न खुद दिलचस्‍पी बढ़ाई बल्‍कि अपने मित्रों देशों को भी दिलचस्‍पी लेने के लिए उत्‍साहित किया। नतीजतन अमेरिका और ब्रिटेन के राजनयिक तथा संयुक्‍त राष्‍ट्रसंघ, विश्‍व बैंक और अंतरराष्‍ट्रीय मुद्रा कोष के मुखियाओं ने भी भारतीय राजनीति में दखल की हद तक रुचि लेना शुरु कर दी। इनके दूत राजनीतिक दलों की भोज पार्टियों के माध्‍यम से असरदार नेताओं और राजनीतिक प्रबंधकों के जीवंत संपर्क में आने लगे। मनमोहन सिंह सरकार में तो यह अंतरंगता इतनी बढ़ गई कि राष्‍ट्र हितों को ताक पर रख कर नीतियां अमेरिकी हित-पूर्ति के लिए बनाई जाने लगीं। परमाणु समझौता इसका सबसे सटीक उदाहरण है। परमाणु के ही हो-हल्‍ले में आनुवंशिक बीजों को प्रचलन में लाकर खेती-किसानी को बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों के बही-खातों में गिरवी रख देने का समझौता बिना किसी बहस-मुबाहिसे के कर लिया गया।
मनमोहन सरकार कितनी अमेरिकी परस्‍त है, यह इस बात से जाहिर होता है कि अमेरिकी हितों की अनदेखी करने वाले तत्‍कालीन पेट्रोलियम और रसायन मंत्री मणिशंकर अय्यर को इसलिए मंत्री मण्‍डल से निकाल दिया गया था क्‍योंकि वे ईरान से भारत तक बिछाई जाने वाली तेल पाइप लाइन में भारतीय हित देख रहे थे। अमेरिकी दबाव के चलते ही मनमोहन सिंह सरकार ने अंतरराष्‍ट्रीय परमाणु उर्जा एजेंसी में भारत ने ईरान के विरुद्ध मतदान किया। वह भी दो मर्तबा। सितंबर 2005 में और फिर फरवरी 2006 में। जबकि नरसिंहराव और अटल बिहारी वाजपेयी सरकारों के दौरान ईरान भारत का प्रबल पक्षधर था। लेकिन अमेरिकी हितों के लिए धृतराष्‍ट्र की तरह आंख मींचकर काम करने वाले मनमोहन सिंह ने बेवजह ईरान को भारत विरोधी बना दिया।
विकीलीक्‍स तार संदेश क्रमांक 206688 दि 13 मई 2009 के जरिये यह भी खुलासा हुआ है कि अफजल गुरु की फांसी इसलिए टाली जा रही है जिससे मुस्‍लिम मतदाता प्रभावित न हों। सप्रंग सरकार ने डॉ अब्‍दुल कलाम आजाद को दूसरी बार राष्‍ट्रपति बनने का अवसर इसलिए नहीं दिया, क्‍योंकि मत भिन्‍नताओं के चलते उनकी सोनिया गांधी से पटरी मेल नहीं खा रही थी। डॉ कलाम का व्‍यक्‍तित्‍व कांग्रेस अथवा सोनिया के ‘नुमाइंदे' के रुप में भी शरणागत होने का तैयार नहीं था। मणिशंकर अय्यर की तरह वे अमेरिकी सरपरस्‍तगी के अंधानुकरण के भी खिलाफ थे। दरअसल व्‍यक्‍तिगत हितों को कुर्बान करने की भावना रखने वाले ही राष्‍ट्रीय हितों और मूल्‍यों को सर्वोपरि रखने का दुस्‍साहस दिखा सकते हैं, वरना सोनिया गांधी तो लोकतांत्रिक संस्‍थाओं पर ऐसे लोगों को नामांकित करने के काम में लगी हैं जिनका न कोई नागरिक बोध है और न राष्‍ट्रीय स्‍वाभिमान। परस्‍पर स्‍वार्थपूर्तियों को साधने वाले ऐसे तकनीकी नेतृत्‍वों में न विपरीत मत प्रकट करने का न दक्षता - कौशल होता है और न ही मत भिन्‍नता को टकराहट की चरम स्‍थिति तक पहुंचाने का इच्‍छा बल ? लिहाजा मनमोहनसिंह अमेरिकी उद्योगपति संतवाल को अकाली सांसदों की खरीद-फरोख्‍त में लगा देते हैं और नाकाम होने पर भी पद्‌मभूषण जैसे सम्‍मान से नवाज देते हैं। लेकिन इस मुद्‌दे पर न कोई राजनीतिक दल सवाल उठाता है और न ही देश की प्रथम नागरिक महामहिम प्रतिभा देवी पाटिल संतवाल देश के लिए किस उपलब्‍धि के कारक रहे हैं, इस दृष्‍टि से प्रश्‍न चिन्‍ह लगा पाती हैं ? ऐसा नेतृत्‍व आतंकवादी और नक्‍सलवादियों की बात तो छोड़िए देश को घात लगा रहे राष्‍ट्रघातियों और भ्रष्‍टाचारियों से लड़ने की सार्म्‍थ्‍य नहीं रखता। बहरहाल भारतीय तकनीकी नेतृत्‍व कितना ईमानदार और पारदर्शी है इसका खुलासा विपक्ष तो नहीं कर पाया लेकिन विकीलीक्‍स जैसा समाचार का नया माध्‍यम जरुर नेतृत्‍व की गड़बड़ियों पर पैनी नजर रखे हुए है, यह एक लोकतांत्रिक देश के लिए अच्‍छी बात है। तकनीक द्वारा हुए खुलासों ने यह जाहिर कर दिया है कि आज के युग में अब सूचनाओं को गोपनीय बनाकर तो रखा ही नही जा सकता बल्‍कि सत्‍ता विरोधी माहौल बनाने में भी तकनीक अहम भूमिका का निर्वाह करने में सक्षम है।
प्रमोद भार्गव
शब्‍दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी
शिवपुरी म․प्र․
मो․ 09425488224
फोन 07492-232007, 233882
लेखक प्रिंट और इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्‍ठ पत्रकार है ।

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टिप्पणियाँ

ब्लॉगर: 2
  1. विकीलीक्स-असांजे ने पत्रकारिता क्या होती है, दिखा दिया. एक ओर असांजे और दूसरी ओर हमारे टेलीविजन-अखबार वाले!

    उत्तर देंहटाएं
  2. विकीलीक्स ने सचमुच पूरी दुनिया को आइना दिखा कर चेतावनी दे दी है ...असान्जे ने अपना कर्तव्य करदिया ...अब बारी हमारी है ...हमें आगे की रणनीति तय करनी होगी

    उत्तर देंहटाएं
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रचनाकार: प्रमोद भार्गव का आलेख : विकीलीक्‍स - मुखौटे उतारने का माध्‍यम
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