ए.असफल की कहानी - मनुष्य

SHARE:

पढ़ते-पढ़ते गीता के एक श्‍लोक ने मेरी नींद हराम कर दी थी- ‘य स्‍याहं अनुगृह्यामि हरिष्‍ये तद्‌धनं शनैः।' पुस्‍तक मैंने बंद कर के रख दी...

Image015 (Custom)

पढ़ते-पढ़ते गीता के एक श्‍लोक ने मेरी नींद हराम कर दी थी- ‘य स्‍याहं अनुगृह्यामि हरिष्‍ये तद्‌धनं शनैः।' पुस्‍तक मैंने बंद कर के रख दी और अपने गुरु को मोबाइल लगाया। जवाब मिलाः

‘‘अर्थ वही है, मास्‍टर! जो तुम समझ रहे हो...''

‘‘यानी जिस पर वह कृपा करेगा, धीरे-धीरे उसका धन हर लेगा...?''

‘‘अवश्‍य!''

‘‘धन के मानी, क्‍या; स्‍त्री-पुत्र, यश-कीर्ति इत्‍यादि भी...?''

‘‘इतना ही नहीं मास्‍टर, देह भी; वह भी तो धन ही है...''

‘‘फिर तो यह बहुत खराब कृपा है,'' मैं घबरा गया, ‘‘यह कृपा नहीं कोप है!''

वे चुप रह गये। कोई जवाब नहीं दिया। मैंने हैलो-हैलो किया तो धीरे से इतना ही कहा, ‘‘ईश्‍वर का नाम लेकर सो जाओ, मास्‍टर!''

नींद कहां थी?

आगे पढ़ने लगा। धीरे-धीरे समझ में आया कि- जब हर प्रकार का धन हर जाएगा, तभी तो मायाजाल से छुटकारा मिलेगा।... अपना जब कुछ नहीं बचेगा, अपना जब कोई नहीं दिखेगा, तभी तो उसकी ओर जा सकेगा जीव...।

तीन-चार दिन यों ही बीत गये। मन उखड़ा-उखड़ा सा था। शायद, पहले सब कुछ ठीक था, जब नास्‍तिक था। अपनी मेहनत, लगन, बुद्धि-बल पर बड़ा भरोसा था। अखण्‍ड आत्‍मविश्‍वास से लबरेज, जो चाहता कर लेता था। मगर जब से धर्म और गुरु की शरण में आया भीरु हो गया। पहले पुत्र और फिर नौकरी चली गई। यह कृपा थी कि कोप, पता नहीं चल रहा था।... बेचैनी के आलम में एक रात मैंने फिर मोबाइल लगा कर पूछा, ‘‘क्‍या इसीलिए, उसने मेरा पुत्र और आजीविका हर ली?''

लगा, वे कुछ अस्‍वस्‍थ थे। सांस को काबू में कर धीरे-धीरे बोले, ‘‘संसार केले का खंभा है, मास्‍टर! पत्‍ते छीलते जाओ... अंत में कोई आधार नहीं मिलेगा।''

फोन काट दिया।

दुबारा लगाया तो चेले ने अटेण्‍ड कर कहा, ‘‘महाराज जी की तबियत खराब है, मास्‍साब!''

‘‘क्‍या बीमारी है...?''

‘‘पता नहीं, नई है कि पुरानी उखड़ पड़ी है। सांस से बेहाल रहते हैं।''

‘‘वहां ठण्‍ड भी तो बहुत है। इस बार तो वैसे भी टेम्‍परेचर शून्‍य से नीचे चला गया... तिस पर तालाब के किनारे बगिया में कुटिया। तपा दिया करो जरा ढंग से।''

‘‘संन्‍यासी को अग्‍नि वर्जित है...'' उसने कहा और फोन काट दिया।

मुझे चिंता होने लगी। बाबा का सुदर्शन स्‍वरूप मेरी आंखों में छाकर रह गया। गजब के खूबसूरत हैं। दैहिक सौष्‍ठव से उम्र का पता नहीं चलता। भारती पंरपरा के संन्‍यासी होने से दाढ़ी-मूंछ और सिर के बाल सदैव घुटाकर रखते, सो काले-सफेद बालों के अनुपात का अनुमान नहीं लगता। गाल भरे हुए, ललाट पर कोई शिकन नहीं। न कानों की लोरियां हिलतीं, न आंखों के नीचे झांइयां। बांहें लंबी और सुडौल। त्‍वचा चिकनी चमकदार और गुलाबी आभा लिए हुए। अक्‍सर उघारे बदन रहते, सो चौड़ी छाती, पतला पेट और पतली कमर पर बंधा केसरिया पटका बड़ा आकर्षक लगता। अर्ध पद्‌मासन में विराजमान होते तो गुलाबी पंजे, अंगूठों के चमकीले नख और लाल तलबे मन को मोह लेते।

तीन-चार दिन बाद मैंने फिर फोन लगाया, पूछा, ‘‘तबियत कैसी है-अब?''

‘‘तबियत, क्‍या बताएं, ठीक ही है, मास्‍टर!''

‘‘आप आ जाते तो किसी अच्‍छे डॉक्‍टर को दिखला देते...''

‘‘कहां?''

‘‘यहां, ग्‍वालियर में।...''

‘‘हम तो तीन-चार दिनों से ग्‍वालियर में ही हैं।''

‘‘अरे! बताया नहीं... दिखलाया किसी को? कहां पर ठहरे हैं? मैं आ रहा हूं...''

‘‘आने को आ-जाओ, हम तो अब जा रहे हैं...'' कहकर पता बता दिया।

कितने निष्‍ठुर हैं, आप! मैं कटकर रह गया। मगर बाइक उठाकर तुरंत पहुंच गया। बाबा एक शिष्‍य के तलघर में तख्‍त पर लेटे थे। वे नजदीक ही कहीं स्‍टेशन मास्‍टर थे। उस वक्‍त ड्‌यूटी से नहीं लौटे थे। पर उनका परिवार बाबा की सेवा में तत्‍पर था। लड़कियां, लड़के, पत्‍नी। मैंने कदमों पे सिर झुकाया तो वे उठ कर बैठ गये। चेहरा मुरझाया हुआ था।

‘‘क्‍या हो गया है, आपको?'' मैंने दुखी स्‍वर में पूछा।

‘‘परमात्‍मा की कृपा है...'' उन्‍होंने मंद स्‍वर में कहा। फिर खंखार कर थूक घोंटा।

सामने सोफे पर गांव का ही एक लड़का बैठा था जो यहां वकालत करता है। मैं उसे इशारे से उठाकर बाहर ले गया। धीमे स्‍वर में पूछा, ‘‘कोई गंभीर बीमारी तो नहीं है, इन्‍हें?''

‘‘नहीं...''

‘‘जांच करा ली?''

‘‘डाइबिटीज है...''

‘‘और...?''

‘‘बीपी भी बढ़ा हुआ है...''

‘‘और...?''

‘‘सदी-जुखाम, बस!''

‘‘किसको दिखाया...?''

‘‘पुराने एमडी हैं, पहले जेएएच में थे, अब रिटायर्ड हैं, सहारा हॉस्‍पीटल के बगल में क्‍लीनिक है उनका।''

‘‘चलो।'' मैं उसे लेकर वापस तलघर में आ गया। बाबा को देख-देख कर मन बड़ा आहत हो रहा था। मैंने कहा, ‘‘आप तो जड़ी-बूटियां भी जानते हैं, इसमें करेले का जूस बड़ा फायदा करता है...''

उन्‍होंने फिर गला साफ किया, थूक घोंटा और बोले, ‘‘एक बीमारी हो तो साधन बने, मास्‍टर! ये करो तो वो बढ़ जाती है वो करो तो ये... हृदयरोग भी तो है।''

‘‘बापरे!'' मेरे मुंह से निकला, ‘‘कभी बताया भी नहीं...?''

‘‘क्‍या हो जाता बता के, संसार केले का खंभा है...'' कहते सांस बढ़ गई।

मैंने व्‍यथित हो अपना हृदय थाम लिया।

कार आने में देर हो रही थी, शायद! वकील को उन्‍होंने इशारा किया तो उसने फिर फोन लगाया, बताया, ‘‘पंद्रह-बीस मिनट और लगेंगे अभी।''

शाम घिर रही थी। सर्दी बढ़ रही थी। शनैः शनैः उनका श्‍वास भी तेज होता हुआ। मैंने अपनी धारणा के मुताबिक कहा, ‘‘सर्दी बहुत है, वहां! कुछ दिन यहीं क्‍यों नहीं रह जाते आप! मेरे घर। अच्‍छी धूप मिल जाती है, बरामदे में।...''

‘‘घरों में विधि बनती नहीं है, मास्‍टर!''

‘‘मगर सर्दी ने तो आपका दम फुला रखा है...'' मैंने अपनी पीड़ा का उलाहना दिया।

‘‘सर्दी कारण नहीं है, मास्‍टर!'' गोया, वे मेरी अक्‍ल पर या अपने मन की न समझा पाने को लेकर घिघियाते-पछताते से बोले।

फिर क्‍या वजह है, सिर झुकाकर मैं अपने मौन में सोच उठा। कोई साधना, कोई व्‍याधि! किसमें उलझे हैं, आप!' मैंने चेहरा उठाकर देखा।

वे मुझी को देख रहे थे। ऐसी आंखों से कि मैं डर गया। चेहरा झुका लिया। फिर थोड़ी देर बाद विषयांतर कर बोला, ‘‘कितने ताज्‍जुब की बात है कि संसार का सर्वश्रेष्‍ठ धनुर्धर अपने भाई से कहता हैः घन घमंड नभ गरजत घोरा, प्रिया हीन डरपत मन मोरा!'' कहकर मैंने नजरें उठाईं तो बाबा ने आंखें फेर लीं।

मैंने अपना माथा पीट लिया कि- मैंने बिना सोचे-समझे यह क्‍या कह दिया!

बाहर से लड़के ने आकर कहा, ‘‘कार आ गई।''

बाबा बोले, ‘‘हमारा झोला ले आओ।''

अंदर से कपड़े का झोला आ गया उनका। उसमें एक पजामी, एक सूती चादरा और एक तौलिया था। तीनों केसरिया रंग में रंगे हुए। बाबा ने पजामी निकाल कर पहनने के लिए तख्‍त के नीचे दोनों पांव लटका लिये। मैंने मदद करके पजामी उन्‍हें पहनवा दी। चादरा उन्‍होंने ओढ़ लिया तो तौलिया मैंने उनके कंधों पर डाल दिया।

श्‍वास अब अच्‍छी तरह खुल चुका था। आंखें निकली पड़ रही थीं। खड़े होते ही लड़खड़ा गये। तब मैं चेता और उन्‍हें सहारा दे कार तक ले चला। जीभ मानी नहीं, बोला, ‘‘कितना हृष्‍टपुष्‍ट था ये शरीर।...''

‘‘शरीर तो हम एक बार फिर वैसा ही कर लेंगे... 18-20 रोज से कुछ खाया नहीं है... एक महीने से सोए नहीं...''

‘‘अरे!'' आश्‍चर्य से मूर्खों की तरह मेरा मुंह खुला रह गया।

जो लोग लेने आये थे, वे भी शिष्‍यगण ही थे। कार के दरवाजे खोले खड़े थे।... उस रात वे उनके साथ चले गये। उनके साथ, मगर अपने आश्रम पर ही। ताल के किनारे बगिया स्‍थित कुटिया में। जिद की इंतहा थी यह। मुझे सोने से पहले तक बेचैनी बनी रही, फिर भूल गया। अगले दिन दोस्‍त की बेटी की शादी में गंजबासोदा जाना था। पंजाब मेल पकड़ कर मैं वहां चला गया। दूसरे दिन शाम को लौटा। थकान और जगार के कारण बिस्‍तर में घुसते ही सो गया। रात में साढ़े तीन बजे मोबाइल की घंटी बजी तो मैंने उसे नींद की बेहोशी में काट दिया। मगर घंटी थोड़ी देर बाद रिपीट हुई। आंखें खोलकर मैंने देखा तो बाबा का नाम ‘मन मोहन भारती' चमक रहा था। अंगूठे से बटन दबाकर, मोबाइल कान से लगाकर मैंने, ‘महाराज जी, प्रणाम... कहा'। जवाब में, ‘मास्‍साब, महाराज जी तो खतम हो गये...' कहकर कोई रो पड़ा।

‘‘कब?'' मैं एकदम घबरा गया।

‘‘तीन-सवा तीन बजे...''

‘‘एऽ अब मैं क्‍या करूं...'' मेरे सीने में तेज दर्द उठ खड़ा हुआ।...

फोन कट गया। कोई जवाब नहीं मिला।

पहली मुलाकात याद हो आई और तमाम बेतरतीब बातें...

-मास्‍टर, तुमने वो कौन सा वैज्ञानिक बताया था जिसने ईश्‍वर की जगह गुरुत्‍वाकर्षण को ब्रह्माण्‍ड का जनक ठहरा दिया है?

-स्‍टीफन हॉकिंग।

-तो सुनो, मास्‍टर! मैं ये दावे से कहता हूं कि परमात्‍मा है और...

-हां, महाराज जी... जी, महाराज जी, अवश्‍य है!' मैंने जैसे-तैसे फोन बंद कराया, रात का डेढ़ बज रहा था।

ऐसे ही एक बार और...

-मास्‍टर, कल आश्रम पे नईं आये तुम, गुरुपूनों थी!

-कल...' मैं रो पड़ा, ‘बेटा खतम हो गया, महाराज जी!'

-कैसे?

-एक्‍सीडेंट से...

-अरे, बुरा हुआ। ...पर तुम शोक नहीं करो। आप तो बुद्धिमान हैं। ना जाने वो कितनी बार आपका पिता बना होगा, कितनी बार पुत्र। संयोग-संस्‍कार होगा तो आगे भी मिलेगा। मृत्‍यु अंत नहीं है, मास्‍टर!

फिर मैंने नौकरी छोड़ दी और उन्‍हें बताया तो बोले...

-ठीक ही किया, अब रूखी-सूखी में गुजर कर ईश्‍वर का भजन करो। संसार में इस जीव को स्‍वप्‍न में भी विश्राम नहीं मिलता, मास्‍टर! कल्‍याण भजन के सिवा और किसी बात में है नहीं...।

कितनी मुश्‍किल से सबेरा हुआ, मैं बता नहीं सकता। बीच में उचटती-सी नींद भी आई तो स्‍वप्‍न में कुटिया पर जा पहुंचा। शोकाकुल लोगों की भीड़ लगी हुई थी। मैं जार-जार रो रहा था। तभी राख से बदन वाले बाबा आ गये। राख की आंखें, राख के नख, राख के दांत और राख के ही रोमों वाले! मैंने पूछा- आप तो मर गये थे, क्‍या फीनिक्‍स की तरह अपनी राख से उठ खड़े हुए हैं?

-हां! शरीर असमय चला गया। समय जब तक पूरा नहीं होगा, यहीं रहूंगा। तुम सबके भीतर। जब चाहोगे, महसूस कर लोगे। जब चाहोगे, पा लोगे।...

-अरे, आपने तो मौत को भी ठेंगा दिखा दिया... मैं बेकार रो रहा था!

-बेकार ही... बिल्‍कुल बेकार! मृत्‍यु किसी काल में दुख का हेतु ही नहीं! मृत्‍यु शरीर की होती है... जिसे विश्‍वास न हो, मरकर देख ले!

हिम्‍मत बांधकर मैं उठा। बाइक उठाई। पत्‍नी को लेकर कुटिया पर आ गया। ठंडी हवा से राह भर हम थर-थर कांपते रहे। सड़क से आश्रम के लिये साधन नहीं मिलता, इसलिये! नहीं तो जनवरी के पहले हप्‍ते की सुबह सचमुच भयानक होती है। मगर ऐसी ठंडी में भी आश्रम पर लोगों का तांता लगा हुआ था। गांव के लोग ही नहीं, बाहर के भी तमाम लोग अपनी बाइकों से आ चुके थे। बाहर एक कार भी खड़ी थी। पता चला- गुरुमाता, उनका पुत्र तथा पुत्रवधु भी आ चुके थे। बाबा का विमान बैंडबाजे के साथ गांव में दर्शनार्थ ले जाया गया था। बगिया में समाधि की तैयारी चल रही थी। शिव मंदिर के सामने ही कबरखुद्दू जो कि एक मुसलमान था, फांबड़े से गड्‌डा खोद रहा था। ताल के उस पार पूरब दिशा में नारंगी सूरज आसमान पर काफी ऊंचा चढ़ आया था। आज से पहले, प्राची में वह जब अपनी गुलाबी आभा में फूट रहा होता, बाबा इसी ठौर पर सूर्याभिमुख हो, नेत्र मूंद, हाथ जोड़ कर खड़े हो जाते। बाल रवि की आभा से उनका उघारा बदन गुलाब-सा दमकता।...

भूमि पर कुछ औरते गुरुमाता और उनकी पुत्रवधु को घेरे बैठी थीं। सभी की आंखें आंसुओं से नम और चेहरे विषादयुक्‍त थे। बाबा का गृहस्‍थ जीवन अति अल्‍प था। मात्र चार वर्षीय। पुत्र को गर्भ में छोड़ आये थे। फिर कभी पलट कर नहीं देखा। संन्‍यास ले लिया तो ले लिया। माता, पिता, पत्‍नी और रिश्‍तेदार लेने भी आये, पर लौटे नहीं।

और अब चोला भी छोड़ गये।

देह पर मुग्‍ध हो, मैं कभी-कभार पूछ बैठता- शरीर से आपकी आयु का पता नहीं चलता... कितने के होंगे?

-अरे, मास्‍टर! तुम भी पत्रकारों जैसे सवाल करते हो। पता है, उनकी तनखा और साधु की जाति-आयु नहीं पूछी जाती।

-पर जाति तो आपकी खुल गई...

-खुल गई तो खुल गई, वे मौज में कहते- लगाओ अंदाज, कितने के होंगे हम!

-पता नहीं... पर ये तो है कि मैं आपसे पहले जाऊंगा।

-ये कोई नहीं कह सकता... वे पंजा हिलाकर दृढ़ता से कहते।

बैंड की ध्‍वनि करीब आ गई। मतलब, उनका विमान लौट आया था। देखने के लिये मैं उठकर बगिया के बाहर आ गया। गुरुपूर्णिमा पर जैसा उनका श्रृंगार कर, हार-फूल पहना तख्‍त पर बिठाया जाता, वैसा ही सजाकर ट्रेक्‍टर पर बिठाया गया था, उन्‍हें। मगर आज उनकी गर्दन पकड़े होने के बावजूद ढुलकी पड़ रही थी। ओठ पपड़ा गये थे। कंचों से चमकते रहने वाले गुलाबी नेत्र मुंदे हुए थे। जैसे, कहीं गहरा गोता लगा गए हों... ध्‍यान टूटने का नाम ही नहीं ले रहा था।

रात को एक बार फोन पर कहा था, उन्‍होंने, ‘‘मास्‍टर, हमारी गणना हो रही है...''

‘‘कैसे जाना महाराज?'' सुनकर मैं चक्‍कर में पड़ गया।

‘‘ऐसे कि- अब विघ्‍न पड़ रहे हैं।''

‘‘अरे!''

‘‘हां! विघ्‍न बढ़िया होते हैं। परमात्‍मा परीक्षा लेने लगे तो समझो गिनती में आ गये तुम।...''

‘‘हां, सो तो है।'' मैं लोहा मान गया।

ट्रेक्‍टर से जब उन्‍हें उतारा जा रहा था, बाहर से एक कार आकर रुकी। कार से दो-तीन पुरुष और एक वृद्धा उतरी, 80-90 बरस कीं। वे इतनी बेहाल हो रही थीं कि देखते नहीं बन रहा था। बाल बिखर गये थे। पल्‍लू गिर गया था। शायद, राह भर रोते रहने के कारण उनका गला रुंध गया था। बाबा के पास आकर उनके शव पर, अचेत हो वे गिर पड़ीं।

जानकार बताने लगे कि वे उनकी मां हैं।

बगिया में उनके शव के आते ही भूमि पर बैठी औरतें सिसक उठीं। पुत्रवधु की गोद में उसका दो-ढाई साल का बालक था, बाबा का नाती। उसे छोड़ सब की आंखें भीग रही थीं।

बाबा ने एक बार कहा था कि- मोह ही सारी विपत्तियों का मूल है। अज्ञान के कारण मनुष्‍य के हृदय में ही इसने अपना वास-स्‍थान बना लिया है।' वे ठीक कहते होंगे, मैंने उनके चोटी काट शिष्‍यों को निर्लिप्‍त भाव से उन्‍हें समाधि दिलाते देखा। पुत्र और परिजनों को यह हक नहीं था। वे साधु थे और साधु की भांति ही शिष्‍यों द्वारा उन्‍हें अभिषेक उपरांत जमींदोज किया जा रहा था, पुत्र द्वारा दाहकर्म नहीं।...

गुरुमाता यानी उनकी पत्‍नी से कहा गया कि आप अपना सुहाग उतार के उनके चरणों में रख दो। कदाचित बदहवास-सी वे उठीं। लुढ़कती-सी गड्‌डे में उतरीं। गोया, नीम बेहोशी में अपने सुहाग चिह्न उतारे। बेखुदी में उनके चरणों में रखे। और नींद में चलती-सी लौट आईं। आंखें पथराई हुई थीं। आंसू 32 साल पहले सूख गये थे।

मेरे पुत्र के देहांत पर बाबा ने कहा था कि- जीवात्‍मा अकेला ही आता-जाता है। रिष्‍ते-नाते यहीं जुड़ते हैं, यहीं धरे रह जाते हैं। ज्ञानी जन परिगमन का शोक नहीं करते।'

पर मैं, और समूची भीड़ देख रही थी कि एक औरत, अत्‍यंत करुण विलाप करती चली आ रही थी... उसके चीत्‍कार और रुदन से सब के दिल दहल रहे थे...। वह इसी गांव की औरत थी जो कल जेल में अपने बेटे से मिलने गई थी। पुलिस ने उसे एक झूठे कत्‍ल केस में फंसा कर उम्र कैद की सजा करा दी थी।

वह प्रोढ़ा बाबा के सहारे अपनी जिंदगी काट रही थी, दोनों वक्‍त उनके लिये खाने का टिफिन भेजकर।... यही उसकी दिनचर्या थी। यही घर-संसार। और एक आस भी कि उसकी इस सेवा से दयालु ईश्‍वर एक न एक दिन उसके बेटे की सजा माफ करा देगा।...

अनाथ की तरह रोती-रोती वह औरत, समाधि के लिए खुदे गड्‌डे से निकली मिट्‌टी के ढेर पर गिर कर अचेत हो गई।

दृश्‍य देखे नहीं जा रहे थे। वे न जाने कितनों की आस तोड़ गए थे, कितनों को अनाथ कर गए थे।... मैंने इशारे से पत्‍नी को बुलाया और बाइक उठा कर लौट आया।

शाम को उनके एक गृहस्‍थ शिष्‍य ने फोन किया कि- परसों बैठक में आ जाना, मास्‍साब! चबूतरा, मूर्ति, संत भण्‍डारे का कैसे-क्‍या होगा, इस पर चर्चा कर लेंगे।''

‘‘उस रात तुम्‍हीं उनके पास थे?'' मुझे भारी जिज्ञासा थी, मैंने पूछ लिया।

‘‘हां! शाम को महाराज जी ने फोन करके हमें ही बुला लिया था। कोई साधन नहीं मिला रात में... सड़क से आश्रम तक पैदल ही आये।''

‘‘रात ज्‍यादा हो गई थी?''

‘‘साढ़े नौ-पौने दस बज गये होंगे। मंदिर पे आरती तक नहीं हुई थी। सब उदास बैठे थे। हमने करवाई। फिर बाबा ने सबको विदा कर दिया...।

‘‘महाराज जी ने गुफा में प्राण त्‍यागे?''

‘‘नहीं, गुफा के अंदर तो वे दो-ढाई महीने से नहीं गये थे।... ऊपर ही। तख्‍त पर। हमसे कहते रहे, सबेरे तुम्‍हारे साथ चलेंगे। अच्‍छे डॉक्‍टर को दिखवा देना। इलाज लेना पड़ेगा-अब तो!''

‘‘फिर...?'' मेरी सांस अटक रही थी।

‘‘सांस धौंकनी की तरह चल रही थी। बैठे थे। पीठ में दर्द बता रहे थे। हम हाथ फेर रहे थे। अचानक रात तीन बजे के लगभग हमारी गोद में आ गये! अरे- महाराज जी, ये क्‍या कर रहे?!' हम आश्‍चर्य-चकित रह गये। तभी उनके दांतों की आवाज आई, एक हिचकी और प्राण निकल गए।''

फोन काट दिया मैंने। राम का भयभीत चेहरा आकार ले उठा, जो किष्‍किंधा पर बादलों की गर्जना सुन सहम गया था।

000

20, ज्‍वालामाता गली, गढ़ैया, भिण्‍ड (मप्र)

 

email- a.asphal@gmail.com

---

(चित्र - नीरज की कलाकृति)

COMMENTS

BLOGGER: 6
  1. ए असफल ......... श्याद ये लेखक का नाम है....

    पर मैं नहीं जानता...... आज पहली कहानी पढ़ी है... एक बार तो मूक कर दिया....


    गुरु - इस जीवन में अनिवार्य है. या नहीं.

    हृदय में कई उतार चढ़ाव को जन्म दे गयी ये कहानी.

    जवाब देंहटाएं
  2. राजा, राणा, छत्रपति, हाथिन के असवार,
    मरना सबको एकदिन, अपनी अपनी बार,
    विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

    जवाब देंहटाएं
  3. रोचक कहानी!


    लिकं हैhttp://sarapyar.blogspot.com/


    अगर आपको love everbody का यह प्रयास पसंद आया हो, तो कृपया फॉलोअर बन कर हमारा उत्साह अवश्य बढ़ाएँ।

    जवाब देंहटाएं
  4. मुझे शायद ये पता नहीं है की आप किसी मिशन, संस्था या गुरु- शिष्य के रिश्ते से जुड़े हुए हैं , लेकिन जो कहानी है उस का मर्म बहुत ही विचलित करने वाला है / मेरे कहने का मतलब उतार चढाव से परिपूर्ण एक ह्रदय को झंकृत करने वाली कहानी

    जवाब देंहटाएं
रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4289,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2360,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,1,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: ए.असफल की कहानी - मनुष्य
ए.असफल की कहानी - मनुष्य
http://lh4.ggpht.com/-KsIC3mRmr9M/TiwBVaQKIbI/AAAAAAAAKcA/87JZzQIkQqk/Image015-Custom2.jpg?imgmax=800
http://lh4.ggpht.com/-KsIC3mRmr9M/TiwBVaQKIbI/AAAAAAAAKcA/87JZzQIkQqk/s72-c/Image015-Custom2.jpg?imgmax=800
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2011/07/blog-post_2119.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2011/07/blog-post_2119.html
true
15182217
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content