प्रियंका गुप्ता की कहानी - इंतहा

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सुबह की गुनगुनी धूप ने हौले से अनु का माथा चूमा तो एक भरपूर अंगड़ाई ले वह उठ बैठी। कुछ पल आलस भरी निश्छलता के बाद उसने कमरे की खिड़की खोली तो...

सुबह की गुनगुनी धूप ने हौले से अनु का माथा चूमा तो एक भरपूर अंगड़ाई ले वह उठ बैठी। कुछ पल आलस भरी निश्छलता के बाद उसने कमरे की खिड़की खोली तो बाहर भली सी धूप मुस्करा रही थी , पर अनु के मन के आसमान पर पता नहीं क्यों घटाओं का साम्राज्य था। बदली तो खूब ज़ोर से घुमड़-घुमड़ कर बरस जाना चाहती थी , पर बूँदें सोखने को ज़मीन का कोई टुकड़ा भी तो मिले...। मन को किसी तरह परे करके वह रोजमर्रा के कामों में जुट तो गई पर मन था कि एक बार पूरी शिद्दत से बरस जाने को व्याकुल था। आशू ने भी पता नहीं इस बात को लक्ष्य किया था या उसे जरूरत से ज्यादा चुप देख कर चाय पीते-पीते यूँ ही पूछ बैठा था ," क्या बात है ? तबियत ठीक नहीं है क्या ? कोई दवा ले लो न , दो मिनट में ठीक हो जाओगी...।"

 

आशू को यूँ धाराप्रवाह बोलते देख वह प्रकटतः मुस्करा दी ," ऊँ-हूँ...कुछ नहीं है...बस यूँ ही...।" पर आशू तो सुना-अनसुना कर अपनी ही रौ में बोलता गया ," खाया होगा कुछ अंट-शंट...शौकीन भी तो बहुत हो...अब कर ली तबियत खराब...। फिर भुगतो...।"

 

कहा-अनकहा सब एक झटके में खत्म कर आशू वापस अखबार की ख़बरों में डूब गया तो एक निःश्वास भर अनु ने चाय का बर्तन उठाया और अंदर चली गई। सब्जी छौंक कर अनु ने फ़्रिज खोल कर देखा , कल का गुँथा आटा आज के लिए भी काफ़ी था। और कुछ करने की इच्छा नहीं हुई तो अनु वापस कमरे में आकर आँखें बंद करके पलंग पर लेट गई।

 

अक्सर तनाव के क्षणों में कुछ पल को यूँ आँखें बन्द करके लेटना अनु को बहुत सकून पहुँचाता है। ऐसे में वह मानो झील हो जाना चाहती है ,शान्त...गतिहीन...। पर ऐसा हो कहाँ पाता है...। अचानक ही एक हाथ कहीं से आकर उस झील में एक कंकड़ फेंक देता है और न चाहते हुए भी कड़वाहट की एक लहर उसके पूरे वजूद को झिंझोड़ जाती है।

 

" अनुऽऽऽ, ए अनु , अरे कहाँ हो भाई...?" उसे ढूँढते आशू की झल्लाहट भरी आवाज़ से अनु की तन्द्रा टूटी , " न तो नहाने का पानी गर्म किया , न मेरे कपड़े निकाले...। कर क्या रही हो इतनी देर से...? आज आफ़िस जाऊँ या काम-धन्धा छोड़ कर घर-गृहस्थी सम्भालना शुरू कर दूँ...?"

 

" कपड़े अलमारी में टँगे हैं और गीज़र खुद आन कर लीजिएगा तो कुछ घट नहीं जाएगा...।" हमेशा आशू की हर इच्छा तुरन्त पूरी कर देने वाली अनु न जाने उस वक़्त कैसे चिड़चिड़ा गई। आशू भी शायद उसके इस बदले रूप से हकबका गया था , तभी तो आगे कुछ और कहने की बजाए उस ने अलमारी से अपने कपड़े निकाले और चला गया।

" अरे...नाश्ता...," परांठे सेंकती अनु ने आशू को तैयार होकर बाहर जाते देखा तो गैस धीमी करके उसके पीछे दौड़ी ," नाश्ता तो कर लीजिए...इतनी जल्दी कहाँ जा रहे हैं...?"

" जहन्नुम में..." आशू ने पलट कर भौंह सिकोड़े हुए कहा ,"शायद महारानी जी अपनी आरामतलबी में ये भूल चुकी हैं कि इस नाचीज़ को रोज आफ़िस जाकर सुबह से शाम तक खटना पड़ता है , तब जहीं जाकर आपका यह ग़ुलाम हर महीने कुछ रुपए लाकर आपके क़दमों में डाल पाता है...।"

 

" बहुत गुस्से में हो...?" आशू को यूँ झल्लाया देख उसे शान्त करने के लिए हमेशा की तरह अनु ने आज भी मुस्कराहट का सहारा लिया।

 

" जी नहीं...कहाँ से गुस्सा लग रहा हूँ आप को...? वो तो देर हो जाने पर घर की तरह आफ़िस में भी जूते न पड़ जाएँ , इस लिए जल्दी कर रहा हूँ...। तुम्हें क्या तकलीफ़ है...? तुम अपना नाश्ता करो और आराम से तान कर सो जाओ...। मैं गुस्सा-वुस्सा कुछ नहीं हूँ...।"

 

" अच्छा बाबा , सारी...। अब गुस्सा थूकिए और चल कर नाश्ता करिए...।" अपने चौदह महीनों के अनुभव से अनु यह समझने लगी थी कि टेढ़ी भृकुटि लिए गुस्से से इंकार करता आशू वास्तव में बहुत तेज़ गुस्से में रहता है , पर अपना मूड ज्यादा न बिगड़े , इस लिए उतना ही रिएक्ट करता है , जितना चाहता है। सो हर बार की तरह अनु ने इस बार भी हथियार डाल दिए ," नाश्ता ठण्डा हो जाएगा तो आप खाएँगे नहीं...इस लिए ठण्डे दिमाग के साथ गर्मागर्म नाश्ता कर लीजिए...।"

 

" भाड़ में जाओ तुम और तुम्हारा नाश्ता..." कहता हुआ आशू अपना ब्रीफ़केस उठा कर तेज़ी से बाहर निकल गया तो काफ़ी देर से जबरन मुस्कराहट के पीछे रोके गए अनु के आँसुओं ने औए देर तक उसकी बात मानने से इंकार कर दिया। वह वहीं बैठ कर फूट-फूट कर रोने लगी।

 

ऐसे में अनु को अम्मा की बहुत याद आती है। यहाँ वह अकेली है और उधर अम्मा...। शादी के पहले तो अनु जब भी उदास होती , छुपाना चाह कर भी अम्मा से छुपा नहीं पाती थी। पता नहीं अम्मा कैसे जान जाती कि कुछ अनचाहा हुआ है और फिर उनकी पूरी कोशिश बस उसकी उदासी दूर करने की होती। पर यहाँ...आशू ने कभी नहीं चाहा कि उसके मन के अंदर झाँके...वह तो बस्स...।

 

जी भर कर रो लेने के बाद अनु ने उठकर मुँह पर छींटे मारे , अच्छी तरह हाथ-पैर धोकर कपड़े बदले और एक कप काफ़ी लेकर बैठ गई। सुबह-सवेरे परेशान होने पर यही तरीका था उसका...। न खाने का मन करता है , न नहाने का ...। बस एक कप काफ़ी लेकर चुपचाप किनारे बैठ जाना...। ऐसे में अम्मा अक्सर उसे छेड़ती ," ससुराल में ऐसा म्लेच्क्षपना करेगी तो सास चोटी पकड़ कर बाहर कर देगी..." और बस्स , चोटी वाली बात पर अनु को हँसी आ जाती ," इस ब्यायकट बाल को कैसे पकड़ेगी सास...?" और फिर बात-बात पर बेवजह खिलखिला पड़ने वाली वही अनु लौट आती।

 

पर अब तो किसी बात पर अनु को खिलखिला कर हँसी नहीं आती। सास तो अनु की थी नहीं जो चोटी खींचे , हाँ आशू कब किस बात पर काट खाने दौड़े , कोई भरोसा नहीं...। हालांकि आशू का ऐसा स्वभाव बताने पर अम्मा ने उसे ही समझाया था ," जी छोटा न कर अनु...। मर्दों को पचास झंझट होते हैं...झल्ला जाता होगा...। शाम को उसके आने से पहले खूब अच्छे से तैयार हो जाया करो और जल्दी से खाली होकर कहीं घूम आया करो...। सजी-सँवरी पत्नी देख कर पति की आधी थकान वैसे ही दूर हो जाती है। पति-पत्नी जितना ज्यादा वक्त एक साथ गुज़ारते हैं , उनमें उतना ही प्यार बढ़ता है...।"

 

अब अम्मा को अनु क्या समझाये...। ज्यादा दुःख कहेगी तो बेकार में उसके बारे में सोच-सोच कर परेशान ही होंगी। सो अनु चाह कर भी नहीं बता पाई कि आशू को सबसे ज्यादा उसके सजने-सँवरने से ही चिढ़ है। कंचन को जब यह बात पता चली थी तो वह झट से बोल उठी थी ," तू बुरा माने या भला अनु , आशू के अंदर हीनभावना है। तू है गोरी-चिट्टी और सुन्दर...और वह है काला...। तेरे सजने-सँवरने पर लोग कह देते होंगे- हूर के गले में लंगूर...।" कह कर कंचन तो हँस दी थी पर अनु सचमुच बुरा मान गई थी ," ऐसा नहीं है कंचन...साँवले हैं तो क्या हुआ , उनके फ़ीचर्स तो अच्छे हैं...। वैसे भी मर्दों को टाल , डार्क एण्ड हैंडसम ही अच्छा माना गया है...।"

 

" तो फिर तेरे सजने-सँवरने पर तुझसे चिढ़ कर तुझे खरी-खोटी क्यों सुनाता है ?" कंचन के इस सवाल का जवाब अगर उसके पास होता तो वह कंचन के पास आती...?

हाँलाकि अनु को आश्चर्य इस बात पर होता कि उसके अच्छे लगने पर बिदक जाने वाला आशू अपनी भाभी की हर अदा पर कैसे बलिहारी हो उठता ? वो कैसे चलती है , कैसे मुँह तिरछा कर के हँसती है , कैसे लिपिस्टिक लगाती है , वगैरह , वगैरह...। अनु जानती है कि उसे अपनी जेठानी से ईर्ष्या नहीं है पर क्या देवर के सामने बार-बार आँचल गिरा देने की अदा ही उनके नैन-नक्श के सारे ऐब छुपा देती है ? आखिर क्यों देवर-भाभी के रिश्तों की दुहाई देकर भाभी की गोद में सिर रख कर उनकी कमर में हाथ लपेट लेने वाला आशू उसके साथ-आठ साल छोटे चचेरे देवर के साथ उसका सहज हास्य भी बर्दाश्त नहीं कर पाता ?

 

अनु का सिर फिर भारी होने लगा तो वह तेज़ी से उठ खड़ी हुई। अम्मा को फोन कर लेगी तो इधर-उधर की बातें करके हल्की हो लेगी। पता नहीं अम्मा अकेले कैसे रह लेती हैं। भैया-भाभी विदेश क्या जा बसे , परदेशी ही हो गए। हालांकि वे लोग अम्मा को कई बार बुला चुके हैं अपने पास , पर स्वाभिमानी अम्मा हर बार प्यार से मना कर देती...। अनु जानती है , अम्मा कितना भी कष्ट सह लेंगी , पर पराश्रित होकर कभी नहीं रह सकती। अम्मा तन और मन दोनो से ही अकेली हो गई हैं उसकी शादी के बाद...।

 

अनु को अच्छी तरह याद है , जब उसकी शादी की तैयारियाँ चल रही थी , अम्मा की आवाज़ अक्सर रुँध जाती थी , पर अनु दुःखी न हो , इस लिए ऊपर से वह भरसक सामान्य और कठोर बनी रहती।

 

अम्मा को दुःखी देख अनु का भी जी भर आता। कैसे कटेगी अम्मा की ज़िन्दगी उसके बिना...। कभी-कभी लगता , शायद शादी करके वह ठीक नहीं कर रही। वह तैयार भी कहाँ होती थी शादी के लिए , पर अम्मा के आगे वह जीत भी नहीं पाई थी ," मेरे कारण तू अपनी ज़िन्दगी बर्बाद न कर अनु...आज तू है जो मेरे अकेलेपन के कारण शादी करने से हिचकिचा रही है , तो तू क्या सोचती है , तेरे अकेलेपन की चिन्ता क्या मुझे नहीं है ? एक वक्त ऐसा आएगा जब मेरे न रहने पर तू अकेली रह जाएगी , तब...? उस वक्त तेरा क्या होगा , सोचा है कभी ? और अगर मैं भी न सोचूँ इस बारे में तो लानत है मुझ पर , फिर काहे की माँ हूँ...?"

 

अम्मा पल भर को चुप हो उसका मुँह ताकती और फिर शुरू हो जाती ," माँ तो बच्चों के लिए सैकड़ों त्याग करती है। अपना स्वार्थ नहीं देखती। अगर अपना स्वार्थ ही देखना होता तो अपने अकेले बेटा-बहू को यूँ अपने से दूर होने देती ? और वो भी तब जब तेरे पापा नहीं रहे और मैं एकदम अकेली पड़ गई..." अम्मा पता नहीं पापा की याद में या भैया-भाभी के दूर होने के ग़म में उदास हो कहीं दूर देखने लगती तो अनु उठ कर उनके कंधे पर झूल जाती ," अच्छा बाबा , ढूँढो कोई लड़का...। मैं तैयार हूँ , अब तो खुश...?" और अम्मा भी हँस कर उसके गाल थपथपा देती।

 

अम्मा की यादों में खो सी गई अनु सहसा उठ कर तेज़ी से फोन की ओर बढ़ गई। बार-बार फोन करने की सोच कर विचारों में गुम हो जाती है , अजीब है वो भी। उसे अपने पर झुंझलाहट हो आई।

कई बार फोन ट्राई करने पर भी जब फोन नहीं उठा तो अनु व्याकुल हो गई। ये फोन क्यों नहीं उठ रहा...? अम्मा कहीं गई तो होंगी नहीं क्योंकि उसके घबराने वाले स्वभाव के कारण ही कहीं जाने से पहले अम्मा उसे सूचित जरूर करती थी। फिर...?

 

कितनी बार अम्मा से कह चुकी है , एक मोबाइल ले लें , पर नहीं...। उनका वही एक राग...मुझसे नहीं संभलने वाला तुम्हारा ये मोबाइल-फोबाइल...। अब बुढ़ापे में मुझसे नहीं सीखी जाएगी तुम्हारी ये नई टेक्नोलाजियाँ...और अनु चुप हो जाती। सही बात है...अम्मा का मन वैसे भी इन चीजों में नहीं लगता , और फिर अनु की भी आदत कहाँ है , अपना मोबाइल लेकर घूमने की...। अक्सर ही घर पर भूल जाती थी , सो एक दिन चिढ़ कर आशू ने उससे मोबाइल जो लिया , तो आज तक वापस नहीं दिया।

 

सहसा अनु को पिछली रात अम्मा के लिए देखा गया भयानक ख़्वाब याद आ गया। दो दिनो से ठण्ड कुछ ज्यादा ही बढ़ गई थी और अधिक सर्दी-गर्मी , दोनो में ही अम्मा का ब्लडप्रेशर गड़बड़ा जाता था। अपने आप दवाई खाने में तो शुरू से लापरवाह थी अम्मा।

 

अनु ने रुक-रुक कर कई बार फोन लगाया पर वही ढाक के तीन पात...। उसका मन किसी काम में नहीं लग पा रहा था। जब और नहीं रुका गया तो बेचैन अनु ने फटाफट आशू के लिए एक नोट लिख कर मेज पर रखा , पर्स उठाया और जल्दी से अम्मा के घर के लिए रिक्शा कर लिया। चाहती तो वह आशू को फोन कर लेती पर जानती थी , जरूरत पड़ने पर आशू उल्टी ही बात करेगा और कई मामलों में तो पता नहीं क्यों सिर्फ़ अम्मा के लिए संवेदनाहीन हो उठता है।

 

कई बार घण्टी बजाने पर भी जब दरवाज़ा नहीं खुला तो घबराई अनु ने दरवाज़ा पीटना शुरू कर दिया। तभी एक झटके से दरवाज़ा खुला और सामने गीले बालों में तौलिया लपेटे उससे भी ज्यादा घबराई भीगी-भागी सी अम्मा खड़ी थी।

 

" कहाँ रहती हो...? न फोन उठाती हो , न दरवाज़ा खोलती हो...।" इतनी देर से उमड़-घुमड़ रहे बादल जब पूरे वेग से बरसने लगे तो अम्मा पल भर में सारा माजरा समझ गई ," हाय रे भगवान , तू है...। मैं भी सोचूँ , कौन आ गया। अरे पगली , अभी फोन उठाया तो देखा "डेड" है। सोचा जल्दी से नहा-धो लूँ तो पी.सी.ओ से तुझे फोन कर लूँगी...। तब तक तूफ़ान की तरह आकर तुमने बिन बदली बरसात कर दी...। छतरी भी मैने पता नहीं कहाँ रख दी...।"

 

अम्मा की बातों मे चुहल का आभास पा अनु शर्मा गई। अम्मा जानती थी कि उनके मामले में अनु बहुत संवेदनशील है। अब उसे सामान्य होते देख अम्मा तैयार होने अन्दर चली गई। सब कुछ ठीक देख अनु भी बहुत हल्का महसूस कर रही थी सो टी.वी आन करके बैठ गई।

 

कुछ ही देर बीती थी कि सामने भाप उगलती पत्तागोभी-टमाटर की सब्जी और परतदार पराँठे देख कर अनु खुशी से चहक उठी ," मेरी फ़ेवरेट...क्या टैलीपैथी हो गई थी कि मैं आऊँगी...?"

 

" पता नहीं...पर मेरा मन किया कि आज यही बनाऊँ...।" उसे चटखारे लेकर खाते देख अम्मा संतुष्ट हो बाकी काम निपटाने के लिए उठ खड़ी हुई ," थोड़ी देर बाद बढ़िया सी काफ़ी बना देना , बहुत दिन हुए तुम्हारे हाथ की काफ़ी पिए...।"

 

अम्मा की पीठ उसकी तरफ़ थी इसलिए उसने सहसा ही छलक आए अपने आँसुओं को तेज़ी से पोंछ लिया। उसे अम्मा की बनाई यह सब्ज़ी बहुत पसन्द थी तो उन्हें उसके हाथों की काफ़ी...। अब तो बमुश्किल ही नसीब हो पाता है यह सब...। जब अम्मा के साथ अकेली होती है तभी , वरना आशू को उसकी कई चीज़ों की तरह ये दोनो पसन्द भी नापसन्द हैं...।

 

उसे अच्छी तरह याद है , शादी के बाद जब पहली बार बड़े शौक से उसने यह सब्जी बनाई थी तो आशू ने बिना चखे ही सब्ज़ी का कटोरा उठा कर नाली में पलट दिया था ," बिल्कुल ही बेअक़्ल , बेवकूफ़ हो क्या ? कभी पत्तागोभी रसेदार बनती है क्या ? ज़रा भी शऊर नहीं है इसे...।" वह आशू के व्यवहार या कटूक्ति से उतनी आहत नहीं हुई थी , जितनी उसके इस प्रकार अपमानित होने पर वहाँ आई जेठानी को होंठ तिरछे करके मुस्कराते देख कर हुई थी।

 

उसके बाद धीरे-धीरे उसने अपने अन्दर की अनु को मार कर "आशू की अनु " बनने का भरसक प्रयत्न किया , पर न जाने कब-कहाँ-क्या गड़बड़ी हो जाती , उसकी हर चहकन , हर खुशी के पल को आशू यूँ ही चुटकियों में चूर-चूर कर देता।

 

कई बार अनु आशू के व्यवहार को ढँके-छुपे शब्दों में अम्मा से बयान कर अफ़सोस जाहिर करती तो अम्मा बड़े प्यार से उसे ही समझाने लग जाती ," बेटा , शादी चाहे लव मैरिज हो या अरेन्ज , एक समझौता ही होती है...। मर्द की फ़ितरत कभी नहीं बदलती...। वह हमेशा औरत से ही समझौतावादी प्रवृति की उम्मीद रखता है। इस लिए कई मसलों पर कम्प्रोमाइज़ तो तुम्हें ही करना होगा...।"

 

अनु ऐसे में ढिठाई के साथ अम्मा से बहस करने पर उतर आती ," कर दी न टिपिकल इण्डियन वूमेन वाली बात...। औरत ही क्यों दबे हर बार...?"

पर अम्मा भी कम चालाक न थी। बड़ी सफ़ाई से बात घुमा देती ," बात दबने या दबाने की नहीं है रे...। रिश्तों में एक-दूसरे की परवाह करने की है। जब हम कोई नया रिश्ता बनाते हैं तो वह जीवनपर्यन्त हमारे साथ रहे , इसलिए अपना स्वाभिमान बचाते हुए झुक जाने को दबना नहीं कहते...और फिर औरत तो तन और मन दोनो से ही ज्यादा लचीली होती है न , तो स्वाभाविक है कि झुकने की अपेक्षा उसी से ज्यादा होगी...।"

 

" कहाँ खो गई मेरी बबली गर्ल...?" बात-बेबात खिलखिलाने की उसकी आदत के कारण अम्मा प्यार से उसे " बबली गर्ल " कहा करती थी। अनु का मन चाहा कहे , तुम्हारी बबली गर्ल वास्तव में ही कहीं खो गई है , पर कहा नहीं। बेकार में अम्मा को टेंशन देने से क्या फ़ायदा...?

 

सिर को हल्के से झटक अनु ने स्वयं को सामान्य कर लिया। आज इतने दिनो बाद अम्मा के पास आई है तो क्यों फालतू में अतीत का बोझ ढोए या भविष्य की चिन्ता में मरे ? वर्तमान को एन्जाय न करे...।

 

वापस अम्मा की बबली गर्ल बन कर चटर-पटर करते दिन कब बीत गया , पता ही नहीं चला। होश आया तो कालबेल की बेतहाशा चीखती आवाज़ से...। चिंहुक कर अनु ने घड़ी की ओर देखा तो घबरा गई ," अरे बाप रे, छः बज गए...। अब तक तो आशू भी घर पहुँच गए होंगे...और ये दरवाज़े पर कौन बेहूदा है ?" अनजाने आगन्तुक की हरकत पर झल्लाती अनु ने लगभग दौड़ते हुए दरवाज़ा खोला तो सामने आशू को देख हड़बड़ा गई। पर इससे पहले कि वह कुछ कह सके , आशू पूरी ताकत से उस पर बरस पड़ा ," बेवकूफ़ औरत , बिना बताए चली आई ? फोन करके पूछ नहीं सकती थी कि मैं जाऊँ कि नहीं ? कौन सा आसमान टूट पड़ा था जो शाम तक मेरे आने का इंतज़ार नहीं कर सकती थी ?"

 

घबराहट और अपमान से अनु रो पड़ी तो शोर-शराबा सुन कर बाहर आ चुकी अम्मा उसे चुप कराती हुई आशू को शान्त करने , मनाने का प्रयत्न करने लगी। पहले तो आशू ने उनकी बातों का कोई प्रत्युत्तर दिए बिना अपना प्रलाप जारी रखा , पर फिर मानो वह पूरा बेशर्म हो गया ," आप चुप ही रहिए तो अच्छा होगा। यह हम पति-पत्नी के आपस का मामला है। वैसे भी अब आप अपनी बेटी की शादी कर चुकी हैं , सो उस पर अब सिर्फ़ मेरा अधिकार है...। आप कौन होती हैं बीच में बोलने वाली...?"

 

पल भर को मानो अम्मा और अनु , दोनो को ही साँप सूँघ गया हो। अपमान से लाल हुआ अम्मा का चेहरा देख कर अनु पलट कर आशू को कुछ कहने चली पर तभी जैसे सब कुछ भाँप कर अम्मा ने कस कर उसका हाथ दबा दिया। अम्मा कितनी स्वाभिमानी हैं , अनु यह बात जानती थी , पर शायद सिर्फ़ उसका मुँह देख कर वे अपमान का घूँट पी गई थी।

 

सहज होने की भरसक कोशिश करते हुए उन्होंने हौले से अनु का कन्धा थपथपा दिया ," जाओ बेटा , जल्दी से तैयार हो जाओ , तब तक मैं तुम दोनो का खाना पैक कर देती हुँ , घर जाकर कहाँ बनाओगी...।"

 

" ये सब के लिए टाइम नहीं है मेरे पास...। भाभी का फोन आया था , उनकी तबियत ठीक नहीं है...। इसे घर छोड़ कर उनके यहाँ जाऊँगा , डाक्टर को दिखाना है उनको...।"

" क्यों , आप क्यों जाएँगे...? भैया कहाँ हैं...?" कन्ट्रोल करते-करते भी अनु की आवाज़ तल्ख़ हो उठी थी। जरूर पिछले महीने की तरह ही तबियत खराब होगी। अनु को हैरानी हुई थी , देवर ही सही , पर था तो ग़ैर मर्द ही...। भैया को दौलत और काम का नशा था और यहाँ उनकी पत्नी ने उनके भाई को किसी और नशे में डुबो रखा था।

" अब तुम मुझे बताओगी कि मैं कहाँ जाऊँ और कहाँ नहीं...? रोकोगी मुझे...?"

 

इससे पहले कि अनु के कुछ कहने से स्थिति विस्फोटक होती , अम्मा फिर रेफ़री बन गई ," असल में बेटा इस की तबियत आज कुछ ठीक नहीं है , इसी से तुम्हारे साथ रहना चाहती है। और बेटा अनु , चलो देर हो जाएगी...तैयार हो जाओ...।" बात को तेज़ी से दूसरी ओर पलट अम्मा अनु को लगभग धकेलती सी अन्दर ले गई।

 

अगले दो-तीन दिन दोनो के बीच तलवारें तो खिंची रही पर युद्ध की नौबत नहीं आई। ज़िन्दगी लगभग रुटीन ही चल रही थी कि अचानक घर से अम्मा की महरी का घबराया हुआ फोन आया। अम्मा गश खाकर गिर पड़ी थी , पता नहीं कब से बेहोश थी जब रज्जो काम करने आई। पड़ोस के डाक्टर को वह बुला तो लाई थी , पर अनु को भी जल्दी से आने को कह उसने फोन काट दिया।

 

आशू को आफ़िस में सूचित कर अनु तुरन्त निकल पड़ी। वहाँ पहुँचने पर डाक्टर से पता चला , अम्मा का ब्लडप्रेशर और पल्स रेट दोनो बहुत "लो" हो गए थे , जिससे संभवतः वे चक्कर खाकर बेहोश हो गई थी। एनीमिक तो वह थी ही , दवा के साथ उनको भरपूर आराम की भी जरूरत थी।

 

" डोन्ट वरी...शी विल बी आल राइट..." कह कर डाक्टर तो चला गया पर अनु परेशान कैसे न होती ? अगर आज रज्जो न आई होती तो...? अम्मा अब पूरी तरह होश में थी। उनको दिलासा देने की कौन कहे , उल्टे वो अनु को दिलासा दे रही थी।

 

आशू ने दिन में तो आने की जहमत नहीं उठाई पर शाम को भी कुछ तना-तना सा ही आया।

 

" घर नहीं चलना क्या...?" उसे अस्त-व्यस्त देख आशू ने आते ही सवाल दाग दिया ," यह क्या रोज़-रोज़ का नाटक बना लिया है तुमने ? अभी कुछ दिन पहले बिना बताए भाग आई और आज सीधे एक फोन करके कह दिया - जा रही हूँ...। ऐसा कब तक चलेगा...बोलो...? इस वक़्त घर नहीं चलना क्या...?" आशू घूम-फिर कर मुर्गे की डेढ़ टाँग पर आ गया।

 

इन्कार में सिर हिलाती अनु ने अपने को भरसक सामान्य-शान्त रखा था। अम्मा दवा के प्रभाव में सकून से सो रही थी और वह बेमतलब आशू से तनाव बढ़ा कर उनके चैन में ख़लल नहीं डालना चाहती थी।

 

" ज़रा मैं भी तो सुनूँ कि अबकी बार कौन सा नया ड्रामा खेला जा रहा है ?" अनु को इन्कार करते देख आशू की आवाज़ फिर सातवें सुर तक जा पहुँची थी।

" धीरे बोलिए , अम्मा सो रही हैं ," अनु ने आशू को शान्त करने के लिए घबरा कर उसका हाथ पकड़ लिया , पर आशू ने इतनी तेज़ी से उसे झटका कि वह बगल के सोफ़े पर जा गिरी।

" तू पहले मेरी बात का जवाब दे...?" आशू का स्वर अभी भी उतना ही ऊँचा था।

 

" प्लीज़ , शान्त रहिए...अम्मा की तबियत काफ़ी खराब हो गई थी...। अभी भी बहुत ठीक नहीं है। डाक्टर ने कहा है , टेंशन से उनकी तबियत फिर बिगड़ सकती है। दो-चार दिनो की ही बात है , आय प्रामिस , अम्मा की तबियत ठीक होते ही मैं चली चलूँगी...। तब तक आप भी रात को यहीं रुक जाइए...।" रुआँसी हो अनु अपनी ज़िन्दगी में पहली बर किसी के आगे हाथ जोड़ रही थी।

" भाड़ में जाए तू और तेरी अम्मा...मैने तेरी माँ का ठेका ले रखा है क्या...?"

 

" बस्स...," अनु की दहाड़ती आवाज़ और जुड़े हुए हाथ की बजाय अपनी ओर उठी उँगली ने एक झटके से आशू की चीखती आवाज़ पर विराम लगा दिया ," बस , बहुत बक चुके ..." अनु बिफ़री हुई शेरनी की तरह उसके सामने तन कर खड़ी हो गई थी ," ठेका लो तुम अपनी भौजाई का...। मेरी माँ को तुम जैसे इन्सान के सहारे की कोई जरूरत नहीं...और हाँ...," अनु की तनी हुई उँगली मानो युद्ध की दुदुंभी बजाती कोई तुरही हो ," आइन्दा तमीज़ से बात करना मुझसे...। न तो मैं और न ही मेरी माँ तुम्हारी नौकरानी हैं...," गुस्से से लाल हुई अनु शब्दों को चबा-चबा कर जुगाली करती सी बोल रही थी ," पहली बात तो यह अच्छी तरह समझ लो और दूसरी बात भी कान खोल कर सुन लो...बीवी समझ कर प्यार और इज़्ज़त से पेश आओगे तो खुशी से जूते भी साफ़ करूँगी , लेकिन अगर अपना ग़ुलाम समझने की भूल की तो..." आवेश से थरथराती अनु आगे के शब्द सप्रयास ही पी गई।

 

सवा साल से आशू की दी हर चोट पर आँसू बहाने या फिर उसके हर वार को हँस कर झेलने वाली अनु का यह फुँफकारता नया रूप पल भर को शायद आशू को भी सहमा गया। थोड़ी देर अनु को खा जाने वाली नज़रों से घूरता आशू पता नहीं क्या सोच कर बिना बात आगे बढ़ाए तेज़ी से बाहर निकल गया।

 

अब की बार आँखों में दुःख की बजाय एक अजीब से सन्तोष के आँसू लिए अनु ने धीरे से , बेआवाज़ दरवाज़ा बन्द किया और शान्तिपूर्वक काफ़ी बनाने रसोई की तरफ़ मुड़ गई।

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आत्म-परिचय

नाम- प्रियंका गुप्ता

जन्म- ३१ अक्टूबर, (कानपुर)

शिक्षा- बी.काम

लेख़न यात्रा- आठ वर्ष की उम्र से लिख़ना शुरू किया,

देश की लगभग सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित

विधा- बचपन से लेखन आरम्भ करने के कारण मूलतः बालकथा बड़ी संख्या में लिखी-छपी,

परन्तु बडी कहानियां, हाइकु, कविता और ग़ज़लें भी लिखी और प्रकाशित

कृतियां- १) नयन देश की राजकुमारी ( बालकथा संग्रह)

२) सिर्फ़ एक गुलाब (बालकथा संग्रह)

३) फुलझडियां (बालकथा संग्रह)

४) नानी की कहानियां (लोककथा संग्रह)

५) ज़िन्दगी बाकी है (बड़ी कहानियों का एकल संग्रह)

पुरस्कार- 1) "नयन देश ..." उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा "सूर अनुशंसा" पुरस्कार प्राप्त

2) "सिर्फ़ एक गुलाब" प्रियम्वदा दुबे स्मृति पुरस्कार-राजस्थान

3) कादम्बिनी साहित्य महोत्सव-९४ में कहानी "घर" के लिए तत्कालीन राज्यपाल(उ.प्र.)

श्री मोतीलाल वोहरा द्वारा अनुशंसा पुरस्कार प्राप्त

ई- मेल : priyanka.gupta.knpr@gmail.com

Blog : www.priyankakedastavez.blogspot.com

Mobile no: 09919025046

COMMENTS

BLOGGER: 16
  1. बहुत अच्छी कहानी .....शुभकामनाये

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  2. पूरी कहानी एक साँस में पढ़ गया . औरत की व्यथा और संघर्ष को धार देती मनोवैज्ञानिक कहानी । बहुत प्रभावी !

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  3. kahani padhte padhte saare raaste main sochti rahi kahi kaash ant mein Ashu ka dil pighal jaye aur wah ek achchhe jeevan saathi hone ika parichay de.
    par ant wahi hua jo aksar hota hai
    par Anu ki dahaad ne andar tak bahut sukoon pahuchaya
    atyachaar ke khilaaf awaz uthana nari dharm hai

    bahut achchhi lagi aapki kahani

    aap bhi aaiye

    Naaz

    जवाब देंहटाएं
  4. कल 13/07/2011 को आपकी एक पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

    जवाब देंहटाएं
  5. kya baat hai aapki kahanim ek bar shuru ki to pura padh kar hi uthi uthi bhi kanhan aapka dhnyavad likhne baeth gai ki aapne itni sunder kahai padhai hai.
    bahut bahut badhai
    rachana

    जवाब देंहटाएं
  6. कहानी में पाठक को अपनी गिरफ़्त में लेने की शक्ति है…एक जबरदस्त प्रवाह है… स्त्री की व्यथा को और उसकी सहनशक्ति को रेखांकित करती एक खूबसूरत कहानी !

    जवाब देंहटाएं
  7. औरत की व्यथा और संघर्ष की मनोवैज्ञानिक कहानी

    जवाब देंहटाएं
  8. बहुत प्रभावशाली कहानी, आभार!

    जवाब देंहटाएं
  9. जब सारी हदें पार हो जाती हैं तो यही करना पड़ता है ..कब तक नारी लचीली बनी रहे .. अच्छी और प्रभावशाली कहानी

    जवाब देंहटाएं
  10. स्त्री की सहनशक्ति को रेखांकित करती एक प्रभावशाली कहानी !
    आभार!

    जवाब देंहटाएं
  11. आप सभी की उत्साहवर्धक टिप्पणियों के लिए बहुत आभारी हूँ...।

    प्रियंका

    जवाब देंहटाएं
  12. बेनामी3:22 am

    सभी ने सही कहा है की आप में कलम से सब को अपनी तरफ खीचने की कला है सुभकामनाये मेरी तरफ से

    जवाब देंहटाएं
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नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4289,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2360,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद 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पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ 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रचनाकार: प्रियंका गुप्ता की कहानी - इंतहा
प्रियंका गुप्ता की कहानी - इंतहा
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