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कहानी संग्रह - आदमखोर - 2 : डॉ. ऊषा यादव की कहानी - आदमखोर

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कहानी संग्रह आदमखोर (दहेज विषयक कहानियाँ) संपादक डॉ0 दिनेश पाठक ‘शशि’ प्रथम संस्करण : 2008 मूल्य : 150 प्रकाशन : जाह्नवी प्रकाशन व...

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कहानी संग्रह

आदमखोर

(दहेज विषयक कहानियाँ)

संपादक

डॉ0 दिनेश पाठक ‘शशि’

प्रथम संस्करण : 2008

मूल्य : 150

प्रकाशन : जाह्नवी प्रकाशन

विवेक विहार,

शाहदरा दिल्ली-32

शब्द संयोजन : सागर कम्प्यूटर्स, मथुरा

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कहानी

आदमखोर

डॉ. उषा यादव

 

‘‘सर यह कागज उस घर की बहू ने आप के पास भिजवाया है।’’ मैकेनिक जैसा दिखाई देने वाले आदमी ने एक मुड़ा-तुड़ा कागज आगे बढ़ाते हुए कहा।

संदीप ने अबूझ दृष्टि से उस पुरजे को देखा जरूर, पर पकड़ने के लिए हाथ नहीं बढ़ाया। चकित कंठ से बोला, ‘‘मैं कुछ समझा नहीं।’’

‘‘देखिए, आप के बगल वाला पीला मकान है न, मैं उन के यहाँ टेलीफोन ठीक करने गया था। आज के जमाने में भी काला-सफेद टी.वी.। कहते हैं, अभी सैकेंड हैंड खरीदा है, पर लगता है किसी कबाड़ी की दुकान से मिट्टी के मोल उठा लाए हैं। खस्ता हाल, एकदम घिसे हुए पुरजे। लेकिन चाहते हैं कि मैंकेनिक अपना करिश्मा दिखा कर उसे नए को मात करने वाला बना दे। तस्वीर और आवाज में कोई नुक्स न रहे। आप ही बताइए, ऐसा संभव है क्या? मैं तो फिर भी कामचलाऊ हाल में ले आया, दूसरा कोई होता तो........।’’

टेलीवीजन दास्तान को बीच में ही विराम देते हुए संदीप ने मूल विषय को पकड़ा, ‘‘लेकिन इस पीले मकान वालों से तो मेरा कोई परिचय नहीं है। आप को पूरा यकीन है कि यह चिट मेरे लिए ही भेजी गई है?’’

‘‘श्योर सर!’’ मैकेनिक ने दाँत दिखा दिए, ‘‘काम के बीच में मैंने एक गिलास पानी माँगा था। उसे ही देने के लिए आई थी वह। गिलास के साथ-साथ यह फटा पुरजा बढ़ाते हुए फुसफुसाई थी कि जाते समय मैं इसे बगल वाले मकान में यानी आप के यहाँ पहुँचाता जाऊँ और उस की मदद करने की बात जरूर कह दूँ।’’

‘‘ओह!’’

‘‘मैं उन आँखों की कातरता नहीं भूल पा रहा हूँ सर! चारों ओर से शिकारियों से घिरी हिरनी की तरह सहमी हुई थी वह। मुँह से कम, करुणा-भी आँखों से ज्यादा बोली थी। उस की भयभीत हालत देख कर ही मैं ने बगैर कुछ पूछे यह कागज ले कर अपनी जेब में रख लिया था। आप इसे संभालिए तो मैं अपनी जिम्मेदारी से मुक्त होऊँ।’’

अब भी पुरजा थामने में हिचक रहा था संदीप। पर एक मामूली मैकेनिक के सामने किन्हीं भीत नयनों की गुहार को अनसुना करने की हृदयहीनता नहीं दिखा सका वह। किंचित बेमन से ही उस ने आगे बढ़ा कागज पकड़ लिया।

‘‘थैंक यू सर’’, कहते हुए मैंकेनिक पलटा और मुँह से सीटी बजाता हुआ अपने खटारा स्कूटर की तरफ बढ़ गया।

थोथरी पेंसिल से घसीटामार लिखाई में लिखे उस कागज को एक-दो पल देखने के बाद संदीप ने अपनी कमीज की जेब में रख लिया। पता उसे अब तक कंठस्थ हो चुका था-श्रीमती सावित्री देवी, गाँव बिसहर, जमुनापार, आगरा।

संदेश-वाहिका के काल्पनिक रूप की एक-एक सूक्ष्म रेखा भी उस के मानस में मूर्त हो उठी-कंकालप्राय देह। बुझी हुई आँखें। शरीर पर चोट के अनगिन निशान। विक्षिप्तों जैसी हालत।

अपने आँगन की दीवार के उस पार साक्षात् नरक में जीवन-यापन करने वाली परदानशीं से वह मिला चाहे कभी न हो, पर परिचित बखूबी था। सास, पति और तीन देवरों के भरे-पूरे परिवार में शायद वह नववधू सब के लात-घूँसे खाने के लिए ही ब्याह कर लाई गई थी। मर्दाने हाथों के बजनी मुक्के-घूँसे खा कर उस की बिलबिला उठने की आर्त्त-ध्वनियाँ आँगन की दीवार के उस पार से इस पार इतनी साफ सुनाई देती थीं कि कई बार हाथ का उठा कौर मुँह तक पहुँचाए बिना वापिस थाली में रख देना पड़ता था।

संवेदनशील छवि जाने कितनी बार आँसुओं से रुँधे गले से कह चुकी थी, ‘‘तुम कुछ करते क्यों नहीं हो संदीप? न हो तो पुलिस चौकी में इन पापियों के अत्याचारों की रिपोर्ट लिखा आओ या फिर मुहल्ले के चार भद्रजनों को इकट्ठा करके इन के खिलाफ कोई मुहिम छेड़ो और कुछ नहीं तो अभागी के पीहर का कहीं से अता-पता लगा कर वहाँ खबर ही पहुँचा दो।

संदीप को ये सब बातें निरी बकवास लगतीं। बिल्ली के गले में घंटी बाँधने की जुरअत वह क्यों करे? लगभग दो-ढाई महीने बगल के पीले मकान में किराएदार की हैसियत से आ बसने वाले मुस्टंडों के दो-दो हाथ करने की सामर्थ्य किसी अशरीरी प्रेतात्मा में ही हो सकती थी। फिर अपने घर की बहू के साथ वे लोग चाहे जैसा सलूक करें, किसी को बींच में पड़ने का क्या अधिकार था! उन के नितांत निजी और घरेलू मामले में हस्तक्षेप करके अपना जबड़ा तुड़वाने के लिए वह कदापि तैयार न था। बल्कि पड़ोस की अदेखी बहू के प्रति छवि की करुणा से पसीजने की लिजलिजी भावुकता भी उसे कभी-कभी काफी अखर जाती थी।

इस वक्त भी टेलीविजन मैकेनिक द्वारा दिए गए पुरजे को जेब में रख कर वह दुविधाग्रस्त था कि पत्नी को इस सम्बन्ध में कुछ बताए या नहीं। अंततः छवि को एक चटपटा किस्सा सुनाने का लोभ-संवरण उस से न हो सका।

रसोईघर के दरवाजे पर जा कर बोला, ‘‘सुनती हो, पास वाले घर की बहू ने एक आदमी के हाथों शायद अपने पीहर का पता भिजवाया है।’’

‘‘सच?’’ छवि की आँखें चमक उठीं, ‘‘लगातार शेर-भालुओं के बीच रहने वाली उस निरीह औरत से इतनी बहादुरी की मुझे उम्मीद नहीं थी। पूरी बात बताओ, क्या हुआ?’’

‘‘कुछ खास नहीं। टेलीवीजन ठीक करने के लिए उन के घर एक कारीगर आया था। मौका निकाल कर वह उसे एक पता लिखा कागज पकड़ा गई। बोली कि इसे हमारे यहाँ दे दें और उस की मदद करने के लिए कह दे।’’

‘‘गनीमत है बेचारी कुछ तो कर सकी।’’ छवि ने राहत की साँस ली।

‘‘लेकिन इस से होगा क्या’’ संदीप के मुँह से अचानक निकल पड़ा तो छवि की आँखों में आग और हिकारत एक साथ लहक उठी, ‘‘क्यों? तुम उस के दिए पते पर खबर करने नहीं जाओगे?’’

‘‘फालतू कामों के लिए फुरसत किस के पास है।’’ संदीप ने लापरवाही से कंधे उचका दिए।

‘‘ऐसा मत कहो संदीप!’’ छवि आहत कंठ से बोली, ‘‘अपने हजारों जरुरी-गैर-जरुरी काम करते हो। एक छोटा-सा काम परोपकार का ही सही। पुण्य मिलेगा।’’

‘‘बुढ़ापे में पुण्य भी कमा लेंगे यार! अभी पैसा कमाने में ही सारे करम हो जाते हैं।’’

पति की इस परिहासात्मक मुद्रा को छवि पचा नहीं पाई। उस के भीतर एक लावा-सा खौल उठा। क्या इतनी बड़ी बात इतने हल्के ढंग से उड़ा देने की चीज थी?

निकटतम पड़ोसी होने के नाते कम-से-कम वे लोग तो आँगन की दीवार के उस पार धड़कते जीवन की व्यथा-कथा से परिचित थे ही। कोई और जाने या न जाने, उन्हें तो मालूम ही था कि बिल्कुल बगल में किस तरह शख्सियत तिल-तिल करके मिटाई जा रही है, नेस्तनाबूत की जा रही है और जीती-जागती हस्ती से शून्य में तब्दील की जा रही है तथापि उसे लेकर संदीप का इतना संवेदना-रहित होना छवि के लिए हैरत की कम, दुख की बात अधिक थी।

यों इस मामले को लेकर सुगबुगाहट पूरे मुहल्ले में थी। अपने आप को तेज-तर्रार समझने वाली कई महिलाएँ उस पीले मकान की बहू से सम्पर्क साधने की नाकाम कोशिशें कर चुकी थीं। किसी-न-किसी बहाने उस घर में घुसतीं, पर पठान-मार्का सास उन्हें बैठक से ही बैरंग लौटा देती।

‘‘आज तो बहू के हाथ की चाय पी कर ही जाएँगे’’, कह कर इतमिनान से कुर्सी पर धँस जाने वाली श्रीमती लाल को तो बुढ़िया ने एक लंबा उपदेश दिया था, ‘‘बहनजी, आप के यहाँ कोई काम-धंधा नहीं है क्या, जो एक प्याला चाय के लिए दो घंटा धरना दिए बैठी रहेंगी? अपना घर क्या काटता है आप को? मोरी पर मक्खियाँ भिनकती रहें, बच्चे नाक बहाते घूमते रहें, आदमी चौका-चूल्हा सँभालता रहे, पर मेमसाहब एक प्याला चाय के लिए दूसरे के दरवाजे जमी रहें, ऐसी फूहड़ता और निकम्मापन भले घर की बहू-बेटियों को शोभा देता है क्या?’’

संदीप का यह रुख न तब छवि को सुहाया था और न भेजे गए पुरजे के प्रति उस की तटस्थता इस वक्त उसे सुहाई पर बात को बिगड़ने से बचाने के लिए वह शांत कंठ से बोली, ‘‘देखो संदीप, पैसा भी आखिर तुम अपने परिवार को सुख देने के लिए ही कमाते हो न! अगर मैं कहूँ कि मुझे कमरे में ए.सी. लगवाने से ज्यादा खुशी पड़ोस की बहू को बचाने में होगी, तब भी क्या तुम इस मामले में दिलचस्पी नहीं लोगे?’’

‘‘नहीं।’’ संदीप कठोरता से बोला, ‘‘तुम समझती क्यों नहीं, यह उन का व्यक्तिगत मामला है। महज तमाशबीन की तरह वहाँ ताक-झाँक करने वाली औरतों की बात छोड़ दो, कोई जिम्मेदार आदमी तुम्हें इस मामले में संजीदा दिखाई देता है? किसी शख्स को तुम ने कुछ बोलते देखा है?’’

‘‘इसीलिए हम भी चुप रहें, यह तो कोई बात नहीं हुई। अंधे-बहरों के इस शहर में हम भी अपने आँख-कान फोड़ लें, यह तर्क मेरी समझ में तो आता नहीं।’’ छवि उत्तेजित हो उठी।

‘‘यानी तुम उस घर की बहू के नाम पर मुझ से झगड़ना चाहती हो, क्यों?’’ संदीप भी आवेश में तमतमा उठा।

बात अब लड़ाई-झगड़े की हद तक पहुँच चुकी थी। छवि ने सप्रयास अपने आप को सँभाला, ‘‘किस्सा खत्म करो। पुरजा दिखाओ। देखूँ जरा, उस में क्या लिखा है?’’

‘‘कुछ खास नहीं। जमुना पार के बिसहर गाँव की सावित्री देवी का नाम भर है, बस!’’ संदीप रुष्ट कंठ से बोला। छवि ने पति के इस ताव को अनदेखा कर दिया। वह चुपचाप वहाँ से हट गई। रसोई की खटर-पटर में लग गई। किन्तु रायता तैयार करते हुए भी उस का दिमाग उसी पुरजे में अटका रहा-जरूर किसी विधवा की बेटी है अभागी। अगर बाप-भाई होते तो पते में उन का नाम न लिखती? तभी पूरे निःशंक भाव से वे राक्षस उस के खात्में में जुटे हुए हैं। प्रतिकार का कहीं से डर जो नहीं है।

पर सर पर बाप-भाई का साया न होने की स्थिति में इन नर-पशुओं की कलर टी.वी. और मोटरसाइकिल की माँग कैसे पूरी कर सकेगी हतभागी? जरूर किसी दिन..............

‘‘देखना, बहुत जल्द इसे मार कर ये लोग अपने बेटे का दूसरा ब्याह रचा लेंगे।’’ छवि जैसे स्वगत कथन करते हुए सिहर-सी उठी।

रसोई के दरवाजे से अभी हटा नहीं था संदीप। एक जिद के तहत अपने व्यवहार के औचित्य को सिद्ध करने के लिए वह अब भी आतुर था। व्यंग्य से हँस कर बोला, ‘‘दूसरा ब्याह कोई हँसी-खेल समझ रखा है क्या? हथकड़ियाँ पड़ जाएंगी हाथों में।’’

‘‘कुछ नहीं होगा।’’ छवि पीड़ित कंठ से कह उठी, ‘‘उल्टे मूँछों पर ताव देते हुए घूमेंगे। अभी ही रात-दिन इतनी पशुता दिखाते हैं, कौन विरोध करता है? ऐसे ही किसी दिन उसे मार कर, सिर पर मौर धर कर ब्याहने चल देंगे, कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा।’’

संदीप ने हँस कर वातावरण हल्का करना चाहा, ‘‘तुम नाहक सीरियस हो उठी हो। अरे, झाड़ो-बुहारो, छुट्टी करो। सोचने के लिए अपनी ही चिन्ताएँ कौन कम हैं जो पराया दर्द छाती पर लादती हो।’’

‘‘चलो, खाना तैयार है।’’ निरुपाय छवि को विषयान्तर करना पड़ा और भोजन-शयन जैसे रोजमर्रा के जरूरी कामों की श्रंखला में वह गैर-जरूरी पुरजा कहाँ गुम हो गया, कोई नहीं जान सका।

अजीब बात थी कि आँगन की दीवार के उस पार होने वाली मारपीट से कलर टी.वी. और मोटरसाइकिल का नाम किसी जादुई करिश्मे से गायब हो चुका था। क्यों गायब हुआ, इसे भी कोई नहीं जान सका।

छवि हैरत में थी कि बजती वीणा का तार अकस्मात विच्छिन्न कैसे हो गया? रंगीन टेलीविजन और मोटरसाइकिल की माँग ही जैसे उस यातना-संगीत को पूर्ण बनाती थी। उस के अभाव में गर्जन-तर्जन करके स्वर लात-घूँसों की बौछार और रुदन की मर्मभेदी ध्वनियाँ कुछ अधूरी, अटपटी और बेमानी-सी लगने लगी थीं।

पर टूटी वीणा का तार जल्दी ही जोड़ दिया गया। एक पड़ोसिन के मुँह से छवि को सुनने को मिला, ‘‘दरअसल बहू काली, कुरुप और विक्षिप्त है। लड़की वालों ने पढ़ी-लिखी गोरी-सुंदर लड़की दिखाने के बावजूद यह काली पगलिया गले बाँध दी। अब जिस के साथ धोखाधड़ी होगी, वह तिलमिलाएगा ही।’’

‘‘तुम्हें कैसे पता?’’ छवि ने अचम्भित हो कर पूछा।

‘‘सभी कहते हैं।’’ पड़ोसिन ने परम इतमीनान से जवाब दिया। यह नया आरोप छवि को और घृणित लगा। वह समझ गई कि दहेज के लिए ससुरालीजनों द्वारा बहू को तंग किए जाने की खबर पूरे मुहल्ले में फैल चुकी थी। इसीलिए चीकट, बदबूदार तकिए का खोल बदल कर अब वे लोग अपने आप को पाक-साफ दिखाने की चेष्ठा कर रहे हैं। शराब वही है, सिर्फ उसे नई डिजाइन की बोतल में पेश करके उपभोक्ताओं को बेवकूफ बनाने का यह कामयाब अंजाम एक साजिश है।

छवि तिलमिला उठी। उस ने सोचा-औरत को जलील करना इतना आसान क्यों है? या तो दहेज लाए, नहीं तो पगलिया कहलाए। हो सकता है, उस के बाद बाँझ होने का आरोप भी झेलना पड़े। यानी असंतुष्ट ससुरालीजनों की बेहूदगी को औचित्य प्रदान करने के लिए किसी-न-किसी आरोप की स्वीकृति देनी ही पड़ेगी।

वही भेड़िए और मेमने की कहानी वाला चिरंतन सच। तुमने नहीं तो तेरी माँ ने नदी का पानी गंदा किया होगा और चल मर! हो गई अभागे की छुट्टी!!

शाम को संदीप के दफ्तर से लौटने पर उस ने अपने चित्त का विक्षोभ प्रकट किया, ‘‘इन बदमाशों की यह नई शरारत देखते हो। अपने आप को दूध का धोया साबित करने के लिए बहू बेचारी पर बदसूरती और पागलपन का आरोप लगा रहे हैं।’’

‘‘क्या किया जा सकता है।’’ संदीप हमेशा की तरह निर्विकार बना रहा।

‘‘अगर ये लोग उसे नहीं झेल पा रहे हैं तो छोड़ क्यों नहीं देते?’’

‘‘सात फेरों की ब्याहता से पीछा छुड़ाना इतना आसान नहीं होता है देवीजी! जाति-बिरादरी मुँह पर थूकेगी। कचहरी-कानून के बवाल में फँस गए तो गुजारा भत्ता देना पड़ जाएगा। समझदार आदमी हैं, क्यों फालतू सिरदर्द लें?’’

‘‘और मारपीट कर बहू को खत्म करने में कोई परेशानी नहीं है?’’

‘‘मेरी समझ में तो नहीं है। फटाफट लाश का दाह-संस्कार करो, मृत्यु प्रमाण-पत्र लो और बात खत्म। जिन्दा औरत मुँह खोल कर हजार परेशानियों में डाल सकती है, मुरदा देह से किसी किस्म का खतरा नहीं है।’’

‘‘जब तुम इस सच्चाई से वाकिफ हो तो उस के पीहर में खबर क्यों नहीं कर देते? सोचो जरा, कितनी आस-उम्मीद से वह तुम्हारी मदद का इंतजार कर रही होगी।’’ छवि रुआँसी हो कर बोली।

‘लेकिन अब तो वह पता ही खो चुका है।’’ संदीप ने मुँह लटका कर जवाब दिया।

‘‘मुझे याद है।’’ छवि उत्साहित हो उठी, ‘‘तुम ने जमुना पार बिसहर गाँव की सावित्री का नाम बताया था।’’ ‘‘ठीक है भाई! तुम कहती हो तो फुरसत पाने पर यह काम भी कर दूँगा।’’ संदीप चिढ़ कर बोला।

फुरसत के पल?

छवि के होठों पर विद्रूप भरी मुस्कान दौड़ गई। आज की भागमभाग जिन्दगी में फुरसत के पल हैं कहा? दफ्तर और घर-गृहस्थी के नाना पचड़ों के बाद केवल टी.वी. का सिर पर चढ़ कर बोलने वाला जादू! एक-से-एक रोचक-रोमांचक कार्यक्रमों की दुनिया छोड़ कर हजरत गाँव की पगडंडियों के सुख का लोभ संवरण कर सकेंगे?

छवि ने संदीप की ओर से किसी कदम के उठाए जाने की सारी उम्मीदें त्याग दीं। पर अपने मन को यह पत्थर नहीं बना सकी। न चाहते हुए भी उस का ध्यान और कान उधर ही लगे रहे। एक दिन उसे आँगन के उस पार से आने वाली ध्वनियाँ रोज से कुछ अलग लगीं।

वह चौंक उठी-क्या यह किसी की कराह है? सिर्फ कराह कहना उस ध्वनि का पूरा परिचय नहीं था। यह तो किसी दर्द के भँवर में पड़े हुए पीड़ा की लहरों द्वारा उठाए-पटके जाते हुए और वेदना के ज्वार में अवश भाव से बहते हुए जीव के निस्संग भाव से अचेतन लोक की गहराई में जा गिरने से उपजे रव की क्षीणकाय प्रतिध्वनियाँ थीं।

छवि का हृदय विदीर्ण हो उठा।

कोठरी में भरे कबाड़ से वह एक मोटी कील ढूँढ लाई और धीरे-धीरे अपने आँगन की दीवार में छेद करने लगी। चूँकि यह दीवार ईंटों से बनी थी और उस पर सीमेंट का प्लास्टर नहीं हुआ था, इसलिए उसे अपने उद्देश्य में सफलता मिली। उस छोटी-सी झिरी में निगाह टिका कर अब वह बगल के पीले मकान के आँगन का हाल देख सकती थी।

छवि के माथे पर पसीना झिलमिला उठा।

जो कुछ उस की आँखें देख रही थीं, क्या वह सच था? उस ओर के हिस्से के आँगन में एक चारपाई बिछी थी। भूधराकार सास अपने सामने पानदान खोले हुए पूरे इतमीनान से चारपाई पर बैठी हुई थी। पान के पत्ते पर कत्था-चूना, सुपारी के साथ ही ‘आह-ऊह’ की ध्वनियों को भी जैसे वह उसे सुस्वादु बनाने वाले पान मसाले की भाँति बुरकती जा रही थी।

बुढ़िया निर्लिप्त थी। उस की बहू एक निर्जीव गठरी की तरह जमीन पर पड़ी थी। समूची देह साड़ी से दबी, सिर्फ एक हथेली चारपाई के चौड़े पाये के नीचे दबी-कुचली नजर आ रही थी।

छवि के होठों से चीख निकलते-निकलते रह गई। धड़कते हृदय को लिए हुए उस ने दुबारा देखा। घूँघट में ढका होने की वजह से बहू का चेहरा तो न दिखाई दिया, पर पाये के नीचे दबी हथेली अपने पृष्ठ भाग में भी सफेद-मक्खनी नजर आई।

छवि के लिए यह दूसरा धक्का था। यानी वास्तव में बहू के रूप-रंग को लेकर लगाए गए आरोप निराधार थे।

जब यह दूधिया वर्ण ‘काला’ कहा जा सकता था, तो सही दिमाग इंसान को ’पगलिया’ करार करने में क्या दिक्कत थी? मामला साफ था कि पूरे सुनियोजित तरीके से दहेज से असंतुष्ट ससुरालीजन उसे मिटाने पर तुले हुए हैं। छवि को धक्का जरूर लगा, पर अचंभा नहीं हुआ। इन सब सच्चाइयों से तो वह पहले ही वाकिफ थी, तभी आए दिन संदीप से इन नर-पशुओं के खिलाफ कुछ करने के लिए गिड़गिड़ाती रही थी।

अचानक बिजली का करंट-सा लगा। छवि के हृदय ने उसे लताड़ा कि पढ़ी-लिखी, समझदार युवती होने पर भी वह इस प्रसंग में संदीप पर ही सगूल आश्रित क्यों रही? क्या पूछताछ करते हुए वह खुद पुलिस चौकी तक नहीं जा सकती थी? संदीप की निष्क्रियता को विवश भव से सहन करके उस ने भी तो कम अपराध नहीं किया है। हजरत के इरादे को भाँपने के बाद उसे खुद इस मामलें में पहल नहीं करनी चाहिए थी?

शायद अभी भी कुछ किया जा सकता है, यह विचार आते ही छवि ने अपनी रगों में एक नई स्फूर्ति दौड़ती महसूस की। वह आँगन से हट कर अपने कमरे में आई।

कपड़े बदल कर पाँवों में चप्पल डाल कर उस ने अपना पर्स उठाया ही था कि एक चकित-विस्मित आवाज कानों में पड़ी, ‘‘कहाँ की तैयारी है मैडम?’’

हाँ, आने वाला संदीप ही था। ऑफिस से लौट कर आने पर चौंकते हुए पूछ रहा था।

‘‘पुलिस चौकी जा कर पड़ोसियों की शिकायत लिखवानी है।’’ छवि ने शांत-संयत कंठ से उत्तर दिया।

‘‘दिमाग तो नहीं खराब हो गया है तुम्हारा?’’ संदीप झुँझला पड़ा, ‘‘इस किस्म की तेजी दिखाने से पहले मुझ से एक बार पूछ तो लेतीं।’’

‘‘कहने-सुनने में ही इतना वक्त निकल गया संदीप!’’ छवि उदास आवाज में बोली, ‘‘अब पानी सिर से ऊपर हो चुका है। मुझे अभी, इसी वक्त कुछ करना है।’’

‘‘कहाँ जाओगी? किस से बात करोगी? कौन तुम्हारी बात को गंभीरता से सुनेगा? उस पर एक्शन होगा? कुछ जानती-बूझती भी हो या यों ही मुँह उठाया और चल दीं।’’

‘‘नहीं जानती तो जान जाऊँगी। कुछ बेवकूफियाँ करूँगी, दुनिया हँस लेगी। इस के बाद गलतियाँ सुधार लूँगी। घर में हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने से और छोटे-मोटे काम के लिए दूसरे का मुँह जोहते रहने से भी तो काम नहीं चलता।’’ छवि ठंडी आवाज में बोली।

‘‘दूसरा कौन? मैं’’ संदीप ने पास आ कर छवि के कंधे पर हाथ रखा और आवाज में कोमलता लाते हुए बोला, ‘‘देखो छवि, मैं तुम्हारा पति हूँ, शुभचिंतक हूँ, मुझ पर ही अविश्वास करोगी तो कैसे काम चलेगा?’’

छवि ने इस बात का कोई जवाब नहीं दिया। साड़ी के छोर को तर्जनी पर लपेटती-खोलती खड़ी रही।

‘‘ऑफिस से थका आया हूँ। एक प्याला गरमागरम चाय पिलाओगी?’’ संदीप उसी कोमलता से कहता चला गया, ‘‘चाय-वाय पी कर थोड़ा फ्रेश हो लूँ, मैं खुद तुम्हारे साथ चलूँगा।’’

छवि अब भी चुप रही। शायद समझ नहीं पा रही थी कि क्या करे?

संदीप ने उस की दुविधा भाँप ली। समझाते हुए बोला, ‘‘हमारे समाज की मानसिकता जानती हो न? अकेली औरत और वह भी युवा। पुलिस वाले बात की गंभीरता देखने के बजाय उसे ही देखने में लग जाएँगे। यकीन मानो, तुम्हें वहाँ जाकर और ज्यादा कोफ्त होगी।’’

‘‘ठीक है। मैं चाय लाती हूँ। पर हमेशा की तरह बात को टालना मत। जानते हो, आज उन्होंने क्या किया है! चारपाई के पाए के नीचे अपनी बहू की हथेली दबा कर बुढ़िया मुस्टंडी ऊपर लदी बैठी है।’’

‘‘ऐ!’’

‘‘वही तो। मैं ने अत्याचारों की सीमा टूटती देख कर ही घर से निकलने का मन बनाया था।’’

‘‘खैर चाय लाओ।’’ संदीप ने गंभीर कंठ से बात खत्म कर दी।

कुछ देर बात जब छवि दो प्याले चाय के साथ एक तश्तरी में चार-पाँच बिस्कुट ले कर आई तो संदीप ने उलाहना दिया, ‘‘इस पड़ोस-पुराण से तो मैं सचमुच आजिज आ गया। इन लोगों को यहाँ आए तीन महीने से ज्यादा हो रहे होंगे। तब से एक दिन भी हमारे घर ताजा नाश्ता नहीं बना। क्यों छवि, शादी के बाद पहली बार पकौड़ियों में इतना लंबा गैप पड़ा होगा?’’

‘‘शायद।’’

छवि अभी भी चारपाई के पाये के नीचे दबी हथेली के गोरे पृष्ठ भाग को भुला नहीं पाई थी। अचानक वह चिहुँक उठी, ‘‘देखो, मैं कहती थी न कि सारी यातनाएँ दहेज के लिए हैं। काली पगलिया वाली बात बिल्कुल निराधार निकली।’’

‘‘तुम्हें कैसे पता!’’

‘‘मैं ने चारपाई के पाए के नीचे दबी हुई उसकी हथेली देखी थी न! पिछली तरफ से खासी गोरी-चिट्टी थी।’’

‘‘कमाल है यार!’’ संदीप खिन्न कंठ से बोला, ‘‘तुम यह सब जासूसी कब से सीख गईं? एकदम कुएँ जैसे इन मकानों में दूसरे के घर का हालचाल जानने की कला मुझे आज तक नहीं आई है।’’

‘‘गुस्सा मत होना। आज मैं ने आँगन की दीवार में मोटी कील से छेद करके उधर झाँका था।’’

‘‘तुम्हारी यही हरकतें मुझे खिझा देती हैं छवि।’’ संदीप ने झिड़की दी तो छवि खिसिया गई। खाली प्याला नीचे रखती हुई बोली, ‘‘तुम ने पुलिस चौकी चलने के लिए कहा था न, कब चलोगे?’’

‘‘भेजा मत चाटो।’’ संदीप के स्वर की उग्रता बढ़ गई, ‘‘तुम औरतें वाकई बड़ी स्वार्थी किस्म की जीव होती हो। अपनी ही दुनिया में डूबी रहने के बजाय कभी बेचारे पति की उलझन-परेशानियों पर भी निगाह डाल लिया करो।’’

‘‘क्यों, क्या हुआ?’’ छवि कुछ और लज्जित हुई।

‘‘बड़े बाबू ने लम्बा खर्रा थमा दिया है। उस का जवाब आज तैयार करना है। दस-पाँच मिनट शांति से बैठ कर दम ले लूँ, तब उस में उलझूँ।’’

‘‘सब्जी नहीं है घर में। खाना क्या बनेगा?’’ पुलिस चौकी की बात को फूँक मार कर उड़ाया जाता देख कर छवि का स्वर भी कड़वा-कसैला हो उठा।

‘‘एक बात कहूँ, बुरा तो न मानोगी।’’ संदीप उसी तीखे अंदाज में कहता चला गया, ‘‘दिन भर में कम-से-कम पच्चीस सब्जी वाले तो दरवाजे के सामने से निकलते हैं। दूसरों के घर-आँगन का तमाशा देखने के बजाय मेहरबानी करके उन से साग-सब्जी ले लिया करो। जो भी हो, अब इस वक्त तो हाथ में थैला ले कर इस ड्यूटी पर निकलूँगा नहीं, दाल-रोटी बना कर छूट्टी करो।’’

छवि प्रत्युत्तर दिए बगैर रसोईघर में घुस गई। दाल-रोटी बनाने में कम, पलंग मार्का भारी-भरकम चारपाई के पाए के नीचे दबे-कुचले हाथ में उस का ज्यादा ध्यान लगा रहा।

अजीब बात थी, किसी नौसिखिया हाथों की रसोई हो जैसे, इस तरह दाल जल गई, आटे में पानी ज्यादा पड़ गया और दाल छौकते समय गरम घी के छींटे कलाई पर पड़ने से वह बिलबिला उठी।

ऐसा तो शादी के शुरू-शुरू में ही हुआ करता था। गरम घी-तेल के छींटों से अक्सर उस का हाथ जल जाता था। कभी भाग कर मलहम लगाने दौड़ती थी, कभी ठंडे पानी के बरतन में जलन कम होने तक हाथ डुबोए रहती थी। अब तो अनुभवी और पाक-कला-प्रवीण होने पर ऐसी जलन-तपन सपने जेसी बातें हो गई थीं।

पुराने दिन दुहरे जरूर, पर आधे-अधूरे ही। भाग कर उन लाल चकत्तों पर न तो मरहम लगाया उसने और न ठंडे पानी में डुबो कर प्रदाह कम करने की चेष्टा की। अश्रु-प्लावित नेत्रों से देखती भर रही।

‘‘सिर्फ दाल-रोटी?’’

मुँह से कह देना और बात थी, पर खाते समय संदीप की नाक-भौं सिकोड़ने की आदत तो अच्छी तरह जानती थी छवि।

फ्रिज टटोलने पर हरी धनिया, मिर्च और दो छोटे-छोटे टमाटर मिल गए तो चटनी बनाने के लिए निकाल लाई वह। सोचा, किसी का फालतू ताव झेलने से बेहतर है कि मिक्सी से झटपट चटनी तैयार कर ले पर अभी हरी धनिया की पत्तियों को साफ करके रख भर पाई थी कि दूर से आती ‘बचाओ-बचाओ’ की मर्मभेदी चीखें उस के कानों में पड़ीं।

छवि दौड़ी ; सड़क की ओर खुलने वाली कमरे की खिड़की के पास जा पहुँची।

पलंग पर लेट कर आराम करता संदीप भी चौंक कर उठ बैठा था और उसके पीछे आ कर खड़ा हो गया था। बाहर सड़क पर निगाह पड़ते ही उनके दिल दहल उठे-पीले मकान की असूर्यम्पश्या बहू एकदम नंगी हालत में अपने घर के बाहर, सड़क के बीचों-बींच खड़ी थी।

उस की देह की लाज को ढकने के लिए आग की लपटें ही जैसे आवरण बन गईं थी। वे लपलपाती हुई नारंगी लपटें किसी उन्मादी प्रियतम की भाँति हर पल और-और लहक कर कभी उस की देह से लिपटतीं, कभी उसे चूमती-चाटती, कभी बाहुपाश में बाँधती प्रतीत हो रही थीं।

छवि भय और आतंक से सिहर उठी, ‘‘देखो, तुम ने मुझे पुलिस चौकी नहीं जाने दिया। उन्होंने उसे मार डाला न!’’

संदीप ने झपट कर छवि के काँपते अधरों पर अपनी अकंपित हथेली रख दी। भिंचे कंठ से बोला, ‘‘चुप! वे लोग सुन लेंगे।’’

‘‘वह मर जाएगी।’’ पति की हथेली बलपूर्वक हटाते हुए छवि तड़प उठी।

‘‘मर जाने दो।’’ संदीप का कंठ कुछ और भिंच गया।

पूरा मुहल्ला अपने घरों की खुली खिड़कियों व बंद खिड़कियों की संधियों अथवा अधखुले दरवाजों से यह तमाशा स्तब्ध हो कर देख रहा था।

जाने कितनी आँखें संभ्रमित ही नहीं, विमुग्ध भी थीं-क्या सानुपातिक देह है! क्या अंगों की गठन है!! क्या संगमरमरी काया है!!!

अपनी देहयष्टि की समस्त कलुषित प्रक्रियाओं से परे वह युवती ‘बचाओ, बचाओ’ की गुहार लगाए जा रही थी।

वह जलती रही।

पल-पल और अधिक तड़पती रही।

साक्षी जनसमूह संयोग से हस्तगत हुए इन दुर्लभ क्षणों का स्वाद लेता रहा।

छिछोरे माने जाने वाले चंद लौंडे टाइप नमूने ही नहीं, नारी की अस्मिता जैसे भारी-भरकम शब्दों को ले कर मंचों से आंदोलन उठाने वाले अनेक विचारशील पुरुष भी इन नयन-सुख संप्रदाय में शामिल थे। पीले मकान की जलती हुई बहू इन के लिए नारी नहीं, सिर्फ एक ‘देह’ थी। मांसल और गुदाज देह, जिसे आँखों से देखा नहीं, खाया भी जा सकता था, चिंचोड़ा भी जा सकता था और फिर तश्तरी में पड़ी हड्डी की तरह डाइनिंग टेबिल पर छोड़ कर उठा भी जा सकता था।

संदीप की स्थिति भी आम आदमियों से अलग न थी।

छवि को अपने तन पर असंख्य चीटियों के रेंगने का अहसास हुआ। उस के मन के भीतर एक अजीब किस्म की रिक्तता व्याप्त हो गई, जब उस ने संदीप की आँखों को जलती हुई नारी देह के खम और उभारों पर चिपका हुआ पाया। उसे लगा, जैसे पीले मकान की बहू नहीं, वह खुद निरावरण हालत में खड़ी है और बेगाने आदमियों की गंदी निगाहें उसे लगातार बेधे जा रही हैं।

तड़प कर चीख उठी वह, ‘‘तुम्हें शर्म नहीं आती संदीप? आदमी हो तो जा कर उसे बचाओ, अस्पताल पहुँचाओ। नामर्द हो तो खुली खिड़की के समने से हट जाओ। मुझे और ज्यादा अपमानित मत करो।’’

छवि की प्रताड़ना को सुन कर भी आग की लपटों में झुलसती उस सोने की मूरत पर से आँखें हटाना संदीप के लिए कदाचित नामुमकिन होता, यदि उसी पल बिजली की-सी तेजी से युवती की सास घर से निकलकर उस के पास न आती। अपने हाथ के काले कंबल को उस की जलती देह पर डालकर, बगैर इधर-उधर देखे, वह भूधरा उसे खीचती हुई घर के अंदर ले गई।

अगले ही पल दरवाजे के पल्ले खटाक से बंद हो गए।

पता नहीं, यह सच्चाई थी या छवि का भ्रम, पर उसे लगा कि ठीक इसी पल संदीप ने अपने सतृष्ण अधरों पर जवान फेरी है। पानी से लबालब भरी नदी जिन आँखों की दृश्य-सीमा से जबरन हटा दी गई हो, उन तृषित नयनों के साथ हुए अन्याय की बात सोच कर छवि के होठों पर एक विद्रूप-भरी मुस्कान दौड़ गई। तीन सालों की वैवाहिक जिन्दगी में उसे पहली बार अहसास हुआ-इस आदमी के साथ शादी करके क्या वाकई वह छली नहीं गई है?

एक संदीप ही क्या, कमोबेश यही हालत आस-पास के अन्यान्य घरों की खिड़कियों से चिपकी आँखों की भी थी। अपवाद हर जगह होते हैं। यहाँ भी होंगे। छवि ने सोचा, पर मन उसी तरह बोझिल बना रहा।

जलती हुई युवती की ‘बचाओ-बचाओ’ की गुहार जैसे उस सिहरते परिवेश में अभी भी प्रतिध्वनित हो रही थी। पर ध्वनि को ही समूल रूप से नकारने वाले बधिर कान प्रतिध्वनि के सूक्ष्म संकेतों को भला कैसे पकड़ सकते थे? खिड़कियों-दरवाजों के पट पटापट बंद होने लगे। ‘तमाशा’ जो खत्म हो चुका था! कुछ उत्साही जीव अभी भी मंत्रबिद्ध अवस्था में खिड़कियों से चिपके खड़े थे-शायद उन की नजरों को

बंद दरवाजा खुलने और नजारा दिख जाने की उम्मीद थी।

दरवाजा खुला भी। करीब आध-पौन घंटे बाद। पर इस बार युवती का पति बाहर निकला और तेजी से एक ओर चला गया। कुछ देर बाद एक बग्घीनुमा गाड़ी लेकर वह लौटा और उस के थाप देते ही दरवाजा खोल कर उसे अंदर घुसा लिया गया।

क्षण इस वक्त अपनी काल-सीमा त्याग कर युग बन चुके थे। कई जोड़ा जिज्ञासु नेत्र अब भी खिड़कियों से चिपके हुए थे। भवितव्यता को लेकर उन की उत्कंठा का ओर-छोर न था।

दरवाजा एक बार फिर खुला और एक-एक करके घरवाले बाहर निकल कर उस बग्घी में बैठते चले गए। सब से अंत में निकलने वाली भूधरा ने एक बड़ा-सा ताला दरवाजे पर जड़ दिया। उसी काले कंबल में लिपटी, सिर से पाँव तक ढँकी युवती की जली देह भी उन्होंने साथ ले ली थी। जिन्दा थी या मुरदा, कौन जाने?

निश्चय ही युवती मरी नहीं थी। मिट्टी के तेल की भरी कट्टी और दियासलाई की जलती तीली की मदद से सरेआम मार दी जाने वाली वह सेाने की मूरत जैसी असंख्य छवियाँ धारण कर पश्चिम के आकाश में अपना अद्भुत लास्य बिखेरती जी उठी थी। कम-से-कम छवि को तो उस पल ऐसा ही लगा।

पर आदमखोर पशुओं के नख-पंजों से नुच-चिबड़ कर पड़ोस की अभागी युवती को अपनी आँखों के सामने दम तोड़ते देखा था उस ने। शत-प्रतिशत जली अवस्था के बाद भी वह मरी न होगी, ऐसा सोचना हास्यास्पद था।

छवि की आँखों में आँसू उमड़ उठे। हाल ही में चोला छोड़ने वाली युवती के लिए यह उस का जल-दान था, तर्पण था। पर सिर्फ काया का भक्षण ही तो सब कुछ नहीं होता। दूसरे की आत्मा और अंतर्निहित भावनाओं को नोच-खसोट कर लील जाना भी तो.........और अँधेरे कमरे में बैठी छवि भय और आतंक से सिहर उठी। क्या कोई आदमखोर उस के इर्द-गिर्द भी था? यदि नहीं तो उस की जहरीली साँसों की इतनी स्पष्टता से कैसे महसूस कर रही थी वह? थरथराती छवि ने गर्दन मोड़ी।

संदीप पास खड़ा कह रहा था, ‘‘आज खाना-वाना देने का इरादा नहीं है क्या?’’ ’’’

संपर्क:

73, नार्थ ईदगाह, आगरा-10

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रचनाकार: कहानी संग्रह - आदमखोर - 2 : डॉ. ऊषा यादव की कहानी - आदमखोर
कहानी संग्रह - आदमखोर - 2 : डॉ. ऊषा यादव की कहानी - आदमखोर
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