विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका -  नाका संपर्क : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी यहाँ [लिंक] देखें.
रचनाएँ अथवा रचनाकार खोजें -

पिछले अंक

दिनेश पाठक 'शशि' का व्यंग्य - जाही विधि राखे राम...

साझा करें:

‘‘जाही विधि राखे राम, ताही विधि रहिए’’ वाक्य को तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में जिस सन्दर्भ में कहा है उसमें प्राणी मात्र की एक निरीहता ही ...

‘‘जाही विधि राखे राम, ताही विधि रहिए’’ वाक्य को तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में जिस सन्दर्भ में कहा है उसमें प्राणी मात्र की एक निरीहता ही प्रकट होती है किन्तु यदि इसकी गहराई में उतरा जाए तो सभी प्राणी हजार झंझटों से सहज ही बच सकते हैं।

जाही विधि राखे राम,राम यानि आपका संरक्षक, आपका रोजगार दाता, आपका पड़ोसी या फिर आपका एक्स वाई जेड...

ये एक ऐसी पंक्ति है जो आपको कदम-कदम पर संरक्षा प्रदान करेगी,आपके अशाान्त मन को शीतलता प्रदान करेगी और आपको अनेक झंझटों से मुक्ति दिला देगी। इस बात के एक नहीं अनेक उदाहरण आपके आस-पास ही नहीं चहुँ ओर बिखरे पड़े हैं।

अब देखिए, आपने अपने घर के बाहर दीवार के सहारे बार-बार उग आने वाली घास एवं गंदगी से निजात पाने के लिए अपने घर के सामने पक्का फर्स बनवा दिया। ‘‘वाह क्या बात है, बहुत सुन्दर लग रहा है अब तो घर के सामने’’, देखने वालों ने प्रशंसा की तो आपकी आत्मा भी बाग-बाग हो उठी। कुछ दिन बाद आपने अपने घर के सामने पक्के बनवाए फर्स पर अपनी मोटर साईकिल खड़ी करने का आनंद भी उठाना शुरु कर दिया। मगर आपकी आत्मा में एक चीत्कार तब उठने लगी जब आपके पड़ोसी श्री लट्ठछाप चौधरी साहब ने अपना कीच में सना बदबूदार ट्रैक्टर आपके सामने के फर्स पर खड़ा करना शुरु कर दिया। ट्रैक्टर खड़ा होने पर इतनी जगह भी नहीं बची कि आपकी मोटर साईकिल भी खड़ी हो सके। साथ ही घर के आगे गंदगी का साम्राज्य स्थापित हुआ सो अलग से।

अब आप क्या करेंगे यदि पड़ोसी समझदार हुए तो आपकी बात रखने के लिए आगे से ट्रैक्टर वहाँ नहीं खड़ा करेंगे और यदि पड़ोसी को पंचायत का फैसला सिर माथे पै पर ‘‘पनारों वही गिरैगौ’’ वाली कहावत पसंद हो तो....तो फिर आप अपना संतुलन खोना शुरु कर देंगे। अपने मुखारबिन्द से यदि गालियाँ उच्चारित करेंगे तो पड़ोसी धर्म की और अधिक हानि होगी और फिर पड़ोसी को छींक आने या जुकाम होने पर भी आपका ही हाथ नजर आएगा। यदि आप पड़ोसी की तुलना में धन-बल में 19 हुए तो पड़ोसी आपको अनेक बहानों से सताने में कोई कसर बाकी नहीं रखेगा। फिर आपका रक्तचाप उच्च हो जाएगा। आप समय कुसमय डाक्टर, वैद्यों के चक्कर लगाना शुरु कर देंगे और फिर किसी दिन अचानक ही ऊपर वारे को प्यारे हो जाऐंगे। तो भई, ऐसे में सारी विषमताओं से बचने का एक ही सीधा सा सरल सा उपाय है- मन में तसल्ली कि‘‘ जाही विधि राखे पड़ोसी, ताहि विधि रहिए’’ , इस वाक्य के सोचते ही देखिए दिल को कैसी शीतलता एवं शान्ति प्राप्त होती है। और यदि ना भी हो तो आप पड़ोसी का कौन सा ट्रैक्टर उखाड़ लेंगे।

पड़ोसी धर्म पर बात चली तो बताता चलूँ कि इस पृथ्वी लोक पर पड़ोसियों की जितनी वैरायटी प्रभु ने पैदा करके भेजी हैं उतनी तो शायद ही किसी की हों। भाँति-भाँति के पड़ोसी भाँति-भाँति की सोच।

अब देखिए अपने शर्मा जी को ही देखिए। बेचारे इतने भोले और इतने भले हैं कि बस पूछो ही मत....हर समय अपने अड़ोसी-पड़ोसी कुठारसिंह और फावड़ासिंह का ख्याल रखते हैं और इसलिए अपने किचिन-गार्डन में उगी साग-सब्जियाँ तोड़-तोड़ कर पड़ोसियों को बांटते रहते हैं । कभी लौकी, कभी तोरई तो कभी पालक और मैथी। लेकिन कुठारसिंह और फावड़ासिंह की मेहरबानी देखिए कि कुछ दिन तक शर्मा जी ने इनके यहाँ ये सब चीजें नहीं पहुँचाईं तो उनकी पत्नियों ने एक दिन शर्मा जी के किचिन गार्डन में घुसकर लौकी-तोरई आदि की सारी बेल ही उखाड़ फैंकी कहते हुए कि ‘‘इनपें जब फल ही नाँय आय रहे तो काहे कूँ जगह घेर रखी है बेकार।’’

शाम को शर्मा जी ने अपने बच्चों की चिल्ल पौं और किचिन गार्डन की सफाई देखी तो उफन पड़े पर पड़ोसी कुठार सिंह व फावड़ा सिंह के कुठार और फावड़े के स्मरण ने उन्हें सद्बुद्धि प्रदान की और वे ये सोचकर तसल्ली कर गए कि चलो देर सबेर किचिन गार्डन की सफाई तो करनी ही थी। पड़ोसियों ने ही हाथ बंटा दिया। कितने अच्छे पड़ोसी है और फिर मनुष्य की क्या चलती है। जाही विधि राखे....

सेठ मुलायम के पड़ोसी कठोरसिंह ने अपने घर के सामने, घर निर्माण के दौरान बचे अध्दा-रोड़ा और कूड़े- कचरे को इकट्ठा करके सेठ मुलायम के घर के सामने डलवा दिया। देखकर सेठ मुलायम व उनके बीवी बच्चे पहले तो खूब तिलमिलाए पर कठोर सिंह के बन्दूकछाप व्यवहार को स्मरण कर उनकी झुरझुरी छूटने लगी तो उन्होंने अपने मन और बच्चों को समझा दिया- ‘‘अरे, क्यों शोर करते हो, देखो घर के आगे अब इतना ऊँचा हो गया है कि अपनी गाड़ी जिसे घर ऊँचा होने के कारण बाहर असुरक्षित तरीके से रखना पड़ता था अब घर के अन्दर पोर्च में खड़ी हो जाया करेगी।’’

खुद गिट्टी मिट्टी डलवाते तो बेकार में ही पैसा खर्च करना पड़ता। वाह! ऊपर वारे तेरी बड़ी मेहरबानी। जाही विधि राखे.... सोचते ही मुलायम सेठ के सीने में पिपरमेंट जैसी ठण्डक पड़ गई।

एक और किस्सा आपको सुनाता हूँ, कुछ विभागों में जितने चतुर-चालाक होते हैं अधिकारी, उनसे भी अधिक चंट- चालाक हो जाते हैं उनके मातहत। रामलखनवा जब दूर-दराज के अपने इलाके से इस विभाग में नौकरी करने आया तो बेचारा बहुत ही सीधा-सादा प्राणी था। किसी के भी छल को समझता ही नहीं था। उसके सरल व्यवहार को देखकर उसके बॉस मल्होत्रा जी ने उसे अपने घर पर काम करने के लिए रख लिया। अजी वेतन पर थोड़े ही, वैसे ही, वैसे ही याने वैसे ही, विभागीय साहब का विभागीय घरेलू कर्मचारी।

अब रामलखनवा सुबह ही पाँच बजे साहब के बंगला पर बाँग देने लगा और सिंक में पड़े रातभर के उनके जूठे बर्तनों को धो-पौंछ कर रखने के बाद पूरे बंगले में झाड़ू-पौछा भी लगाने लगा। फिर मेमसाब द्वारा बनाऐ खाने को टिफिन में सजा कर साहब के साथ साइट पर पहुँच जाता। कभी-कभार दोपहर में साब के बीबी- बच्चों के कपड़े भी धोने लगा। साब इसके एवज में उसको खूब यात्रा-भत्ता आदि दिलवाते।

मल्होत्रा साहब ही नहीं उनकी बीबी व बच्चे भी रामलखनवा की सेवा से आनंदित थे। ये बात रामलखनवा को भी महसूस हो गई थी सो वह भी खूब दबा कर भत्ता भरता। साब का दौरा जहाँ-जहाँ भी होता, रामलखनवा जाए या ना जाए उसका भी भत्ता जरूर भरा जाता और इस तरह रामलखनवा और साब दोनों ने मिलकर विभाग की खूब ही सेवा की। इतना ही नहीं साइट पर दिन-रात रगड़े जा रहे कर्मचारियों के प्रशंसनीय कार्य को देखने व समझने के लिए तो साब को अन्य मातहतों, बाबू आदि की आँखों का च़श्मा पहनना पड़ता, पर रामलखनवा के प्रशंसात्मक कार्य के लिए उन्होंने विभाग से अनेक बार पुरस्कार दिलवाए।

धीरे-धीरे रामलखनवा साब और मेमसाब की संगति में और भी बहुत सी चतुराइयाँ सीख गया था। सो उसने होली पर अपने गांव घर जाने की योजना बनाई लेकिन रामलखनवा इतना भी जान गया था कि साब, मेमसाब और बच्चे, उसकी बैसाखियों पर इतने निर्भर हो गए हैं कि वे उसे दो दिन की छुट्टी भी मु़श्किल से देंगे।

फिर क्या किया जाए

रामलखनवा का दिमाग अब लोटपोट के चाचा चौधरी की तरह चलने लगा था। सो उसने एक तरीका खोज ही लिया उसने दो दिन के लिए काम करने हेतु अपने सहकर्मी रामखिलावनवा को पटाया और मेमसाब के पास ले गया। रोनी सी सूरत बनाई और मेमसाब से दो दिन की छुट्टी लेने की बात कही।

‘‘क्यों, क्यों लखनवा, दो दिन की छुट्टी का क्या करोगे’- मेमसाब को जैसे 440 वोल्ट का झटका लगा हो। उनकी आँखो के सामने घर के वे तमाम काम जिन्हें रामलखनवा करता है, की सोचते ही अंधेरा छाने लगा। मेमसाब के मन की द़शा अन्दर ही अन्दर समझते हुए रामलखनवा ने अपनी मजबूरी बताई-

‘‘बात जि है न मेमसाब् कें घरवारी बीमार चलि रही है। अब आप जानौ हो मेमसाब के गांमुन में वैद्य, डाक्टर तो होवे नांय या तें मैं आपतें छुट्टी लें के जि गयौ और घरवारी कूं लैं के जि आयौ। हियां देखभाल हूँ ठीक है जावेगी घरवारी की। और ठीक है कें मेमसाब आपके औरु कामनु में हूँ हाथ बटाय दौ करैगी।

‘‘अरे वाह! तू तो बहुत ही चतुर हो गया है रे रामलखनवा’’

मेमसाब के मुख से अपनी प्रशंसा सुनकर रामलखनवा मन ही मन प्रमुदित हुआ।

पर मेमसाब को अचानक बिच्छू ने डंक मारा हो, वो चीख पड़ी-‘‘वो तो सब ठीक है, पर इन दो दिनों में घर का सारा काम काज कौन करेगा’

रामलखनवा इसके लिए पहले से ही तैयार होकर गया था सो उसने साथ लेकर आए रामखिलावन की ओर इशारा कर दिया-

मेमसाब हम आपकी परेशानी जानै है याहीं तें जा रामखिलावन कूं अपने संग लात रहे। द्वै दिन जि आपके सब काम करेगौ।’’

अंधे को क्या चाहिए, दो आँखे, मेमसाब ने रामलखनवा की छुट्टी की स्वीकृति पर अपनी मोहर लगा दी पर साथ में हिदायत भी दे दी कि साब को जरूर बता देना।

वैसे तो होम मिनिस्टर के अप्रूवल के बाद अच्छे-अच्छे अफसरों की हिम्मत नहीं होती कि वे उसे नकार दें ये बात रामलखनवा इतने दिन में खूब जान गया था। फिर भी उसने साब से भी दो दिन की छुट्टी की बात बता दी। साब ने छुट्टी अप्रूव्ड करने से पूर्व रामलखनवा को एक बार फिर से चेताया कि उसने मेमसाब से पूछ तो लिया है नहीं तो घर में महाभारत करा दे कहीं।

साब के अन्दर ही अन्दर डर रहे दिल की कल्पना कर रामलखनवा मुस्कराया-

‘‘जी साब, आप कौनू चिन्ता ना करी। हम मेमसाब तें पैले ही पूछि कें आवत रहे।’’

छुट्टी स्वीकृत होते ही मन में मुदित होता रामलखनवा अपने गांव चला गया। इधर रामखिलावनवा ने साब और मेमसाब की नाक में दम कर दिया। कभी साहब लोगों के घर पर उसने काम किया तो था नहीं सो घर व दफ्तर का कोई भी काम वह ठीक से नहीं कर पाया। दो दिन में ही साब और मेमसाब ने तौबा कर ली। मेमसाब होममिनिस्टर की हैसियत से साब पर बिगड़ी, साब ने भी छुट्टी पर उनके अप्रूवल की उन्हें याद दिलाई।

खैर किसी तरह दो दिन बीत गए और तीसरा दिन आते ही साब और मेमसाब ने रामलखनवा के आने का इन्तजार करना शुरू कर दिया और इसी तरह तीसरा दिन भी बीत गया पर रामलखनवा नहीं लौटा तो नहीं लौटा। अब तो साब और मेमसाब दोनों को झुंझलाहट शुरु हुई ,पर कर भी क्या सकते थे। चौथे दिन भी रामलखनवा के आने के इन्तजार में बीत गया पाँचवा भी और ऐसे करते-करते पूरे 30 दिन तक रामलखनवा नहीं लौटा। न कोई सूचना ही दी। न ही छुट्टी ही भर कर भेजी।

अब तो मेमसाब को घर के काम करने में दौरे पड़ने लगे। साब का रक्तचाप भी बढ़ गया और उन्होने रामलखनवा के आते ही उसे नौकरी से निकाल बाहर करने का ऐलान कर दिया।

इकत्तींसवे दिन रामलखनवा अपने गांव से अकेला ही लौटा और सीधा अपनी कुटिया में गया। तसल्ली से सारा सामान कुटिया में रखा और बेफिक्र हो सो रहा। दूसरे दिन दैनिक क्रियाओं से निवृत हो रामलखनवा सीधा मच्छी फाटक पहुँच गया। वहाँ से उसने तीस अंडे रखने के लिए एक सुन्दर सी टोकरी खरीदी और फिर उसमें द़ेसी मुर्गी के तीस अण्डे लगवा लिए और बस जैसे ही साब घर से दफ्तर को निकले रामलखनवा टोकरी को हाथ में लटकाए सीधा पहुँचा मेमसाब के पास।

मेमसाब के सामने पहॅुचकर एक अच्छा सा सलूट मारा फिर अण्डों की टोकरी को सामने डायनिंग टेबल पर जाकर रख दिया।

पहले तो मेमसाब को बहुत गुस्सा आया पर टोकरी की ओर देखकर उन्होंने रामलखनवा की ओर देखा। रामलखनवा उनकी आँखों के भाव को पढ़ते हुए बोल पड़ा-‘‘मेमसाब इसमें देसी मुर्गी के 30 अण्डे रहे।’’

अण्डे की टोकरी डायनिंग टेबल पर सजा कर रामलखनवा अपनी कुटिया में जाकर बेफिक्री से फिर से सो गया।

शाम को साब दफ्तर से लौटे तो डायनिंग टेबल पर बड़ी सी टोकरी में अण्डे देखकर आ़श्चर्य चकित रह गए-

‘‘अरे, आप तो शापिंग भी कर आई आज। बड़ी जल्दी।’’

‘‘मैं नहीं ये अण्डे रामलखनवा लाया है’’-मेमसाब ने रहस्य पर से पर्दा हटाया तो साब एकसाथ आ़चर्य से उछल पड़े- अच्छा! रामलखन आ गया और साब ने पिछले तीस दिनों में होम मिनिस्टर की जलालत भरी बातों का स्मरण व उसका अन्त हुआ जान राहत की सांस ली। उन्होंने रामलखनवा को उसके घर से बुलवाया।

रामलखनवा भी इसी इन्तजार में था सो दौड़ा-दौड़ा साब के सामने प़ेा हुआ।

आमना-सामना होते ही साब ने रामलखनवा को इतने दिन तक गोल हो जाने के लिए लताड़ना शुरु किया तो चतुर रामलखनवा ने बताया कि साब बात जि भई कि बूं अपना भाई है न, उसका गांव में मुर्गी फार्मवा है। हमने सोची कें अब आए हैं तो साब कूं कम से कम देसी मुर्गी के 30 अण्डे तौ लैत ही चले। अब आप ही बताओ साब, द़ेाी मुर्गी एक दिना में दैवे हू तो एक ही अण्डा है न, याही तैं हमकूं देर है गई साब।

देसी मुर्गी के अण्डों ने रामलखनवा की सारी गल्तियां माफ करा दीं। और साब ने बाबू से कहकर रामलखनवा की पिछले 30 दिन की हाजिरी सही करने का आदेश कर दिया। रामलखनवा भी अब पिछले 30 दिन में साब के दौरा नोट करने में जुट गया ताकि अपना भत्ता भर सकै।

जाही विधि राखै बॉस.......

----

डॉ. दिनेश पाठक शशि

28,सारंग विहार,

मथुरा-281006

वेब साइट - www.drdineshpathakshashi.blogspot.com

drdinesh57@gmail.com

dr_dinesh_pathak@yahoo.com

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर: 2
  1. वाह डाक्टर साहब, आपने बहुत ही उत्तम उपचार बताया तमाम प्रकार के सामाजिक रोगों से बचने का, "जाही विधि राखें पड़ोसी,ताही विधि रहिये" व्यंग पढ़ कर मजा आ गया, मै भी तुलसीदास जी की इस चौपाई पर अमल करने की सोंचने लगा हूँ.......

    जवाब देंहटाएं
  2. रचना पसंद करने के लिए धन्यवाद अवस्थी जी,

    जवाब देंहटाएं
रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

---प्रायोजक---

---***---

---प्रायोजक---

---***---

|नई रचनाएँ_$type=list$au=0$label=1$count=5$page=1$com=0$va=0$rm=1$h=100

प्रायोजक

--***--

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

~ विधा/विषय पर क्लिक/टच कर पढ़ें : ~

|* कहानी * || * उपन्यास *|| * हास्य-व्यंग्य * || * कविता  *|| * आलेख * || * लोककथा * || * लघुकथा * || * ग़ज़ल  *|| * संस्मरण * || * साहित्य समाचार * || * कला जगत  *|| * पाक कला * || * हास-परिहास * || * नाटक * || * बाल कथा * || * विज्ञान कथा * |* समीक्षा * |

---***---



---प्रायोजक---

---***---

|आपको ये रचनाएँ भी पसंद आएंगी-_$type=three$count=6$src=random$page=1$va=0$au=0$h=110$d=0

प्रायोजक

----****----

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4086,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,341,ईबुक,196,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,262,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,112,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3040,कहानी,2274,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,542,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,130,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,31,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,104,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,1,बाल कथा,346,बाल कलम,25,बाल दिवस,4,बालकथा,68,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,16,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,29,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,245,लघुकथा,1267,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,19,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,327,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,68,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2011,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,712,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,801,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,18,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,89,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,209,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,77,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: दिनेश पाठक 'शशि' का व्यंग्य - जाही विधि राखे राम...
दिनेश पाठक 'शशि' का व्यंग्य - जाही विधि राखे राम...
http://2.bp.blogspot.com/-WscT-l_orGY/TdxINWN1hYI/AAAAAAAAAmw/fkDXOLhN7_Q/s1600/%25E0%25A4%25A6%25E0%25A4%25BF%25E0%25A4%25A8%25E0%25A5%2587%25E0%25A4%25B6+%25E0%25A4%25AA%25E0%25A4%25BE%25E0%25A4%25A0%25E0%25A4%2595.jpeg
http://2.bp.blogspot.com/-WscT-l_orGY/TdxINWN1hYI/AAAAAAAAAmw/fkDXOLhN7_Q/s72-c/%25E0%25A4%25A6%25E0%25A4%25BF%25E0%25A4%25A8%25E0%25A5%2587%25E0%25A4%25B6+%25E0%25A4%25AA%25E0%25A4%25BE%25E0%25A4%25A0%25E0%25A4%2595.jpeg
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2011/08/blog-post_8349.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2011/08/blog-post_8349.html
true
15182217
UTF-8
सभी पोस्ट लोड किया गया कोई पोस्ट नहीं मिला सभी देखें आगे पढ़ें जवाब दें जवाब रद्द करें मिटाएँ द्वारा मुखपृष्ठ पृष्ठ पोस्ट सभी देखें आपके लिए और रचनाएँ विषय ग्रंथालय SEARCH सभी पोस्ट आपके निवेदन से संबंधित कोई पोस्ट नहीं मिला मुख पृष्ठ पर वापस रविवार सोमवार मंगलवार बुधवार गुरूवार शुक्रवार शनिवार रवि सो मं बु गु शु शनि जनवरी फरवरी मार्च अप्रैल मई जून जुलाई अगस्त सितंबर अक्तूबर नवंबर दिसंबर जन फर मार्च अप्रैल मई जून जुला अग सितं अक्तू नवं दिसं अभी अभी 1 मिनट पहले $$1$$ minutes ago 1 घंटा पहले $$1$$ hours ago कल $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago 5 सप्ताह से भी पहले फॉलोअर फॉलो करें यह प्रीमियम सामग्री तालाबंद है STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network सभी कोड कॉपी करें सभी कोड चुनें सभी कोड आपके क्लिपबोर्ड में कॉपी हैं कोड / टैक्स्ट कॉपी नहीं किया जा सका. कॉपी करने के लिए [CTRL]+[C] (या Mac पर CMD+C ) कुंजियाँ दबाएँ