जी. रिजवाना बेगम का आलेख - अलका सरावगी के उपन्यासों में उत्तर-आधुनिकता

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हिं दी साहित्य के इतिहास का अध्ययन करने के पश्चात्  यह बात स्पष्ट हो जाता है कि आज जो बहुप्रचलित तथा लोकप्रिय विधा 'उपन्यास' है वह आ...

हिंदी साहित्य के इतिहास का अध्ययन करने के पश्चात्  यह बात स्पष्ट हो जाता है कि आज जो बहुप्रचलित तथा लोकप्रिय विधा 'उपन्यास' है वह आधुनिक काल में ही आरम्भ हुई. हिंदी उपन्यास का प्रारंभिक युग सामान्य जन जीवन से दूर रहा. इस तथ्य को कभी भी अस्वीकार नहीं किया जा सकता. जासूसी, तिलस्मी, मनोरंजन प्रधान उपन्यास  प्रराम्ब में ज़रूर लिखे गए परन्तु साहित्य का उद्देश्य केवल मनोरंजन करना नहीं है. इसलिए आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी ने लिखा  है "केवल मनोरंजन  न कवि का कर्म  होना चाहिए, उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए"

इस तथ्य को प्रेमचंद जी ने स्वीकार किया. उपन्यास साहित्य को उन्होंने तिलस्मी, जासूसी, मनोरंजन कि रंग-रंगीली संकरी गलियों से उठा कर जनसामान्य  के राजमार्ग पर लाकर खड़ा कर दिया.पहली बार उपन्यास साहित्य में जन-सामान्य की आहें-कराहें गूंजने लगी. सामाजिक, राजनितिक, सांस्कृतिक, इतिहासिक, व्यक्तिगत, समूहगत, जातिगत, वर्गगत, परिवर्तनगामी, नारी-मुक्ति, बेकारी, अन्याय, अत्याचार, भ्रष्टाचार, अनाचार आदि कई विषयों को लेकर उपन्यास लिखे जाने लगे. स्वातंत्र्य पूर्वकालीन उपन्यासों में स्वतंत्रता की दुहाई देते-देते उपन्यासकारों ने अपने स्वर्णिम इतिहास का गुणगान किया तो स्वातान्त्रयोत्तर कालीन उपन्यासों में आज़ादी के बाद उनके सपनों के टूट जाने के तथ्य एवं अपने ही लोगों द्वारा किये गए उपन्यासों को सहने के विवशता का चित्रण किया.

अलका सरावगी का यों तो पूरा कथा-साहित्य ही आज़ादी के बाद के भारतीय मध्यमवर्गों के सबसे संचरणशील हिस्सों के गतिविज्ञान को समझने का प्रिज्म है.किन्तु सं १९९८ ई में प्रकाशित उनका उपन्यास 'कलि-कथा : वाया बाइपास' संभवतः हिंदी का सबसे ठेठ उत्तर-आधुनिक उपन्यास है. अलका सरावगी के उपन्यास पाठक को बाहर की दुनिया में सीधे नहीं ले जाते (हालांकि पाठक की पाठ से बाहर अवस्थिति के कारण वह इससे बच नहीं सकता) बल्कि कथा की अपनी दुनिया की ओर खींचते है. इन उपन्यासों की अंतर्वस्तु इस प्रकार नियोजित है की वह अपनी किसी भी विशेषता (सत्यता, वैधता, रोचकता, मूल्यवंता आदि) के लिए यथार्थ के सदृश्य पर निर्भर नहीं है. कथा की संरचना ही उसकी अंतर्वस्तु है. यह संरचना ही पाठक को लगातार अपनी ओर खींचे  रहती है और वह कथा के स्थापत्य में ही खो जाता है.

'एक ब्रेक के बाद' (२००८) जैसे उपन्यास में उत्तर-संरचनावाद और उत्तर-आधुनिकता दोनों की अर्थ मीमांसा  में आधार,भित्ति  या सारतत्व का अंतर्हीन विखंडन होता है. सुनिश्चित, अर्थ या विमर्श के बाहर किसी स्थिर यथार्थ की यहाँ कोई गुंजाइशकी नहीं है. अर्थ-प्रक्रिया की अनिश्चयता का उत्सव है उनके उपन्यास में. लेखिका अच्छी तरह जानती हैं कि किसी भी ज्ञान-सिद्धांत के प्रति सजगता पाठक को उस अर्थ की अनिश्चितता और हैरानी से महरूप कर देगी जो की उपन्यास का कथ्य और शिल्प दोनों ही हैं. अलका सरावगी की उपन्यासों में वह विशेषता प्रकट होती है जिसे  "सेल्फ-रेफ्लेक्सिविटी"  कहते हैं. अलका जी उपन्यास के भीतर ही पाठक की रणनीतियाँ बताती चलती हैं,कुछ-कुछ वैसे ही जैसे शतरंज के पुराने खिलाड़ी प्रतिद्वंदी को पुरे आत्मविश्वास के साथ अपनी अगली चाल के प्रति आगाह करते चलते हैं. वह शुरू से ही लेखन की सोद्देश्यता के खिलाफ हैं. मूल्य के स्तर पर ही नहीं बल्कि तकनीक के स्तर पर भी उनके उपन्यासों में किसी उद्देश की ओर बढ़ती तर्क श्रृंखला में घटनाओं का विन्यास नहीं मिलता. घटनाये, पात्र और परिवेश किसी एक रेखा में नहीं बल्कि अनेक दिशाओं  में बढ़ते जाते हैं. इनका बढ़ना भी किसी खास गति-लय में नहीं होता. सकेंद्रक वृत्तों की श्रृंखला या आवृत्ति लय उनके पात्रों, घटनाओं और परिवेश की गतिकी का मॉडल नहीं हैं. देश-काल उनके उपन्यासों में समतल नहीं है. बहुधा उनके उपन्यासों में घटनाये  और पात्र देश-काल के अलग-अलग संस्तरो पर सक्रिय रहते हैं किन्तु वर्णन उन्हें समकालिक बना देता है. अलका जी कैरिकेचर  खिंचाई करने में माहिर हैं. ये वो युक्ति है जिनसे वे जीवन की तुच्छता, निरुद्देश्यता और बिखराव को किसी तर्क सम्मत और सोद्देश ढाँचे में बंधने नहीं देते. पवित्रता की सारी धारणओं और मानकों को ध्वस्त करना अलका जैसे कथाकार के लिए किसी कार्यभार की तरह है.

टट्टी, पेशाब, खून, बलगम या दुर्गन्ध का वर्णन कुछ भी उनके लिए त्याज्य नहीं है. सेक्स के मामले में विक्टोरियाई पाखंड, जीवन की हज़ारों नीचताओं और तुच्छताओं को निरावेग और अनायास ढ़ंग से प्रस्तुत हुआ हैं. इस प्रस्तुति में न कोई महत उद्देश है और न आदर्श की आड़. जीवन की अधमता, वह कितना नीचे गिर सकता है, इसके बयान में वे बेजोड़ हैं. 'शेष कादम्बरी'(२००१) उपन्यास 'स्त्री विमर्श' उपन्यास होने के साथ-साथ मानवीय अधमता का रूपक है.

अतः अलका सरावगी उत्तराधुनिक भाव संरचनाओं  और उसके सामाजिक विस्थापन की बड़ी कथाकार है.  दुसरे शब्दों में कहे तो इनके उपन्यास उत्तरआधुनिकता के प्रतिबिम्ब है जो आगे चलकर पल्लवित हो रहे लेखकों को मार्गदर्शन प्रदर्शित करेंगे.

                                                                                                                                                                             जी. रिजवाना बेगम
पीएच.डी शोधार्थी
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास

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रचनाकार: जी. रिजवाना बेगम का आलेख - अलका सरावगी के उपन्यासों में उत्तर-आधुनिकता
जी. रिजवाना बेगम का आलेख - अलका सरावगी के उपन्यासों में उत्तर-आधुनिकता
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