अखिलेश श्रीवास्‍तव "छत्तीसगढ़िया" की रचनाएँ

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  शुभ दीवाली धन , वैभव , सम्‍मान मिले , भण्‍डार रहे ना खाली । सद्‌भाव , प्रेम , आनंद बढ़े , सौ बरस रहे खुशहाली ॥   स्‍वस्‍थ रहें , दीर्घा...

 

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शुभ दीवाली

धन , वैभव , सम्‍मान मिले , भण्‍डार रहे ना खाली ।

सद्‌भाव , प्रेम , आनंद बढ़े , सौ बरस रहे खुशहाली ॥

 

स्‍वस्‍थ रहें , दीर्घायु बनें , परिवार सुखी ,सम्‍पन्न रहे ।

सुन्‍दर सब के विचार बनें , ऐसी हो शुभ दीवाली ॥

 

देश प्रेम का अलख जगायें , स्‍वाभिमान भारत का जगे ।

तन-मन के सब रोग मिटे , जब योग करें रखवाली ॥

 

घर-घर योग की ज्‍योति जले , हर घर को मेरी बधाई ।

हर दिन होली की खुशियाँ , हर रात लगे दीवाली ॥

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हे कृष्‍ण

जब महाभारत युद्ध हुआ था, धर्म का तुमने साथ दिया।

अब भारतमाता रोती है, टुकड़ों में हमने बांट दिया॥

 

गीता के श्‍लोक तुम्‍हारे, बार-बार हम दुहराते हैं।

पर अपने मतलब के खातिर, हम अनर्थ कर जाते हैं॥

 

माता पिता दोनों कातिल हैं, गर्भ में कन्‍या मारी जाती।

घर की वधू जल जाती हैं, और गौमाता काटी जाती॥

 

अत्‍याचार ऊँचाई पर है, धर्म रो रहा धरती पर।

भ्रष्‍टाचार सिंहासन पर है, सदाचार हुआ देश बदर॥

 

गंगा यमुना हर नदियाँ, हर साँस हमारी दूषित है।

अर्द्ध नग्‍न रहती हैं नारियां, वातावरण प्रदूषित है॥

 

पहले ही अंधेर कर दिए, बोलो क्‍या मजबूरी है।

अब न लगाओ देर कन्‍हाई, आना बहुत जरूरी है॥

 

त्रेता में भक्‍तों को तारे, और द्वापर में अधर्मी मारे।

जितने भ्रष्‍ट दिखें कलियुग में, मार देना सारे के सारे॥

 

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चवन्‍नी बदनाम हुई - महंगाई तेरे कारण

सिक्‍के में सरकार का ठेंगा , देख लो एक रुपैया में ।

ठेंगा माने कुछ न मिले , महंगाई में एक रुपैया में॥

 

एक रुपये की इतनी गिरावट, कद्र कोई अब करता नहीं ।

एक किलो घी मिलता था, अब एक प्‍याज भी मिलता नहीं॥

 

महंगाई कम करती नहीं , सरकार हमारी रुलाती है ।

उस पर ठेंगा दिखलाती , जीवन को मज़ाक ब़़नाती है॥

 

चवन्‍नी अठन्‍नी कौड़ी हुईं , बाज़ार में कोई चलाता नहीं ।

रस्‍ते में कहीं दिख जाये , मुंह फेर ले कोई उठाता नहीं॥

 

एक अठन्‍नी भीख में दी तो, दूर ही रहना भिखारी से ।

तुम पर ही कहीं फेंक न दे, और स्‍वागत कर दे गाली से॥

 

अगर चवन्‍नी भीख में दे दी, बच के रहना भिखारी से।

मार - मार अधमरा न कर दे , घूंसा , लात , बैसाखी से॥

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निंदा, घोर निंदा और घनघोर निंदा

आतंकवादी घटनाएं भारत में होती रहती हैं।

छोटे मंत्री, बड़े मंत्री, और महामंत्री के उद्‌गार कुछ इस प्रकार होते हैं :-

आतंकवादियों की कायराना हरकतें बर्दाश्‍त नहीं करेंगे, हम इसकी निंदा करते हैं,

दूसरा :- हम तीव्र निंदा करते हैं,

तीसरा :- हम घोर निंदा करते हैं,

चौथा :- हम दिल से निंदा करते हैं।

अंत में महामंत्री :- पक्ष विपक्ष और जनता को एकजुट होकर मुकाबला करना चाहिए।

किसी ने पूछा एकजुट होकर कब और कहाँ जायें, किससे मुकाबला करें ? और कहीं वहीं पर धमाका हो गया तो ?

बड़े मंत्री :- आतंकी बख्‍श्‍ो नहीं जायेंगे, (भैया पहले पकड़ो तो)। और जिसे पकड़े हैं उसे रोज बिरियानी खिलाते हैं, उसकी सुरक्षा में करोड़ों खर्च होता है।

कभी मंत्रीगण एक स्‍वर में बोलते हैं :- इस घटना पर जब सामूहिक बैठक होगी तो आतंकवादियों की इतनी घनघोर निंदा करेंगे की उनकी रूह कांप जाएगी।''

यही सब सुनते जनता के कान पक गए, मोबाइल से ज़्‍यादा खतरनाक रेडिएशन देश के कर्णधारों की बातों में होता है।

कुछ महीनों बाद फिर एक धमाका और फिर वही बातें।

अंत में स्‍कैच बनाने वाले को धन्‍यवाद, बेचारा कुछ घंटों के प्रयास में दो-चार दाढ़ी और बगैर दाढ़ी वाले स्‍कैच तो बना ही देता है।

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भारत में आर्ट ऑफ लिविंग

कुत्ते तुम दर-दर जाते हो।

तब जाकर रोटी पाते हो।

हाय तुम्‍हारा क्‍या जीवन।

जीवन भर पूंछ हिलाते हो।

हे मानव हम पर हँसते हो।

पर कला हमारी सीखते हो।

मन ही मन पूंछ हिलाते हो।

और चापलूसी जब करते हो।

तब ऊँची कुर्सी पाते हो।

दौलत वाले बन जाते हो।

ये कुत्तागिरी क्‍यों करते हो।

क्‍यों हमें ही कुत्ता कहते हो ?

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अब काले धन की बारी है

जनलोकपाल बिल आएगा, अब काले धन की बारी है।

सरकार कदम क्‍यों उठाती नहीं, जाने कैसी लाचारी है॥

दुनिया में कुछ देश हैं ऐसे , काले धन का बैंक जहाँ ।

भारत के कुछ बेइर्मानों का , काला धन है जमा वहाँ ॥

भारत सरकार बनायें सूची , कौन वहाँ आता जाता ।

पिछले पचास बरस में देखे , कितनों ने खोला खाता ॥

जहाँ न माता पिता न पूर्वज , देव, गुरू, तीरथ न धाम ।

कुछ काले धन वालों का है , वही देश अब चारों धाम ॥

भ्रष्‍टाचार के बीसों तरीके , ‘ऊँचे लोग' इर्ज़ाद किये ।

घोटाले पर किया घोटाला , भारत को बर्बाद किये ॥

भ्रष्‍टाचार के ओलम्‍पिक में , सभी पदक हम लायेंगे ।

एक से दस तक हम ही रहेंगे , सीना तान के आयेंगे ॥

नीयत खोटी , मन है काला , तो धन भी होगा काला ।

बेशर्म कहो , गद्‌दार कहो , इन्‍हें फर्क नहीं पड़ने वाला ॥

ये बात नहीं है करोड़ों की , ये बात है अरबों खरबों की ।

ये बात नहीं है शरीफों की , ये बात है भ्रष्‍ट लुटेरों की ॥

बहुत दिनों तक छुपते रहे , अब सामने लाना जरुरी है ।

काले धन के मतवालों का , नकाब उठाना जरुरी है ॥

जिस दिन धन भारत आयेगा,चारों ओर खुशहाली होगी ।

होगा विकास हर गांव नगर का , हर दिन दीवाली होगी ॥

दोहे ---

 

( 1 )

 भारत में लाखों असली रावण, पर मरता है नकली रावण।

लाखों रावण मुस्‍काते हैं, जब जलता है नकली रावण॥

( 2 )

दो अक्‍टूबर को न मिले, उस चीज का नाम बतायें।

जुगाड़ कहीं से हो जाए , तो गाँधी जयंती मनायें॥

( 3 )

संसद के रक्षक मारे गए, अपराध बड़ा नहीं कहलाता।

एक भी सांसद मर जाता, तो अफजल फाँसी चढ़़ जाता।

( 4 )

पश्‍चिमी सभ्‍यता संस्‍कृति के प्रेमी , कलंकित न करो त्‍योहारों को।

गरबा को पब, डिस्‍को न समझो , बख्‍श दो पावन त्‍योहारों को॥

( 5 )

तारीख पे तारीख मिलती है, महंगाई, भ्रष्‍टाचार मिटाने की।

अंतिम तारीख अब जनता देगी, सत्ता से हट जाने की।

( 6 )

खूनी बलत्‍कारी आतंकवादी, बड़े जेलों से हटाए जाएंगे।

लाखों भ्रष्‍ट अफसर नेता, सब यहीं तो डाले जाएंगे॥

( 7 )

अन्‍ना हजारे ने विरोध किया, कांग्रेस की किस्‍मत फूट गई।

हिसार में जमानत जब्‍त हुआ, महाराष्‍ट्र में लुटिया डूब गई॥

 

नकल न करो-अकल लगाओ

हेलो का कोई अर्थ नहीं, फिर भी कहते हो हेलो-हेलो।

फोन मोबाइल में बातें हो, सब राधे - राधे बोलो॥

अगर नहीं कह सकते राधे, नाम किसी भगवान का लो। हे

लो आज से नहीं कहेंगे, हर कोई संकल्‍प करो॥

उत्तर भारत में कहते हैं, राधे-राधे श्‍याम मिला दे।

कृष्‍ण को पाना बहुत सरल है,कहते रहो हर दिन राधे॥

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हर पल को जियें भरपूर

कितने अपने छोड़ चले हैं , कितने छोड़ के जायेंगे।

जीवन का कटु सत्‍य यही है , आये हैं सो जायेंगे॥

 

जन्‍म-मरन तो बस में नहीं,हर पल को जियें संदेश यही।

जिस पल को जिया नहीं हमने, वो लौट कभी न आयेंगे॥

 

सुबह सुहानी , शाम सुरमई , रात चांदनी बिखरी हुई।

प्रकृति की ऐसी सुन्‍दरता को , नैनों में अपने बसायेंगे॥

 

बिखरा दें हम बीज खुशी के , अपने घर के आंगन में।

जितना बांटो , बढ़ती जाये , ऐसी फसल उगायेंगे॥

 

औरों के दुख दर्द से जब , दो नैन हमारें भर आयें।

जीवन तब सार्थक होगा , आँसू मोती बन जायेंगे॥

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विवेकानंद मार्ग-3 धमतरी (छत्‍तीसगढ़)

सम्‍पर्क-07722-232233 / 9406016503

नाम

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तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड 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रचनाकार: अखिलेश श्रीवास्‍तव "छत्तीसगढ़िया" की रचनाएँ
अखिलेश श्रीवास्‍तव "छत्तीसगढ़िया" की रचनाएँ
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