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शंकर लाल कुमावत की नववर्ष कविता -प्रण करें नव नूतन वर्ष के आँगन का हर साज नया हो

प्रण करें नव नूतन वर्ष के

आँगन का हर साज नया हो

ना रहे अब धूप दु:खों की

खुशियों का आगाज नया हो

प्रण करे नव नूतन वर्ष के

आँगन का हर साज नया हो |

 

छोड़े बैर का भान पुराना

प्यार का एक नाम नया हो

नहीं पुराना राग अलापे

अब सुरों का संसार नया हो

प्रण करे नव नूतन वर्ष के

आँगन का हर साज नया हो |

 

छोड़े कुटिल चाल चलाना

अब रिश्तों का संवाद नया हो

भूल गए थे जो मर्यादा

अब उसका सम्मान नया हो

प्रण करे नव नूतन वर्ष के

आँगन का हर साज नया हो |

 

सूख गया जो, सपनों का सागर

उसमें अब बरसातों का, दौर नया हो

रो रही जो बंजर भूमि

हरयाली से उसका अब श्रृंगार नया हो

प्रण करे नव नूतन वर्ष के

आँगन का हर साज नया हो |

 

छोड़े भूलों के बाण चलाना

अब यादों का ताज नया हो

नहीं रहे कोई हीन् भावना

इस प्रण में अब प्राण नया हो

प्रण करे नव नूतन वर्ष के

आँगन का हर साज नया हो |

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नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें

शंकर लाल

इंदौर-मध्यप्रदेश

Email: Shankar_kumawat@rediffmail.com

3 टिप्पणियाँ

  1. Behad sundar rachana!
    Naye saal kee dheron shubh kamnayen!

    जवाब देंहटाएं
  2. छोड़े भूलों के बाण चलाना

    अब यादों का ताज नया हो

    नहीं रहे कोई हीन् भावना

    इस प्रण में अब प्राण नया हो

    प्रण करे नव नूतन वर्ष के

    आँगन का हर साज नया हो |

    अति सुन्दर

    नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें
    vikram7: आ,साथी नव वर्ष मनालें......

    जवाब देंहटाएं
  3. kabilay tareef likha hai, aap ko bahut-bahut mubarak ho ye naya saal. dr t.r. verma

    जवाब देंहटाएं

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