एस के पाण्डेय का व्यंग्य : व्यंग्यकार से बचने की जरूरत

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कि सी ने मुझसे पूछा कि एक व्यंग्यकार को क्या करना होता है। मैंने कहा कि एक हंस की तरह बड़ी बुद्धिमत्ता से क्षीर और नीर का बिभेद करना होता है।...

किसी ने मुझसे पूछा कि एक व्यंग्यकार को क्या करना होता है। मैंने कहा कि एक हंस की तरह बड़ी बुद्धिमत्ता से क्षीर और नीर का बिभेद करना होता है। उन्होंने आगे पूछा कि व्यंग्य और सच्चाई में क्या सम्बन्ध है ? मैंने कहा जो एकात सच्चे हैं और जो सच्चे नहीं भी हैं वे सबके सब सच्चे ही हैं। इस प्रकार हिंदुस्तान में सब सच्चे हैं और हर जगह सच्चाई ही सच्चाई है। बेमानों की बढ़ती जनसंख्या पर इससे बढियाँ और क्या व्यंग्य हो सकता है ? और क्या यह सच नहीं है ? व्यंग्य सच्चाई के बहुत ही करीब होता है। इसीलिए कई लोग व्यंग्य और व्यंग्यकार से चिढ़ते हैं। लेकिन व्यंग्यकार से चिढ़ने की नहीं बचने की जरूरत है।

मैंने आगे कहा कि जिसमें सच्चाई न हो वह व्यंग्य हो ही नहीं सकता। उसे मैं व्यंग्य ही नहीं मानता। वह हास्य अथवा और कुछ हो सकता है पर व्यंग्य नहीं। वे बोले हम तो व्यंग्य का मतलब अब तक यही समझते थे कि जो गुदगुदाए, जिसे पढ़कर मजा आ जाये।

हमने कहा कि व्यंग्य जब दूसरे पर किया गया हो तब तो खुगुदायेगा ही। वैसे यह रुला भी सकता है, अंदर तक हिला भी सकता है। किसी-किसी को क्रोध भी दिला सकता है। नासमझों की कमी थोड़े है। सबकी अपनी-अपनी मनोदशा होती है। सत्य की सराहना सभी करते हैं पर पसंद कम ही करते हैं। रही मजा लेने की बात तो दूसरे का मजा तो सभी लेते हैं। अपना किसी को नहीं दिखता और दूसरे का सब देख लेते हैं। बहुधा लोग जो करते हैं मजा लेने के लिए ही तो करते हैं। वे बोले अब मेरी समझ में आ गया कि व्यंग्यकार से बचने की जरूरत क्यों है।

बड़े-बूढ़े कहते थे कि पुलिस की न दोस्ती अच्छी होती है और न ही दुश्मनी। पुलिस की दुश्मनी भले ही न अच्छी हो लेकिन आजकल पुलिस से दोस्ती करके कितने ही लोग मौज काटते हैं। थाने से इन्हें भय ही नहीं लगता। मानों थाना, थाना न होकर इनका घर हो। कुछ तो कहते हैं कि कुछ भी करें लेकिन जल्दी अंदर नहीं जायेंगे और यदि अंदर चले भी गए तो इतनी मौज उड़ायेंगे कि बाहर आने को मन ही नहीं करेगा।

खैर पुलिस की बात छोड़िए। सच कहा जाय तो व्यंग्यकार की न दोस्ती अच्छी होती है और न ही दुश्मनी। क्योंकि एक सच्चा व्यंग्यकार किसी को नहीं बख्शता। क्या दोस्त, क्या दुश्मन, क्या अपना, क्या पराया, क्या नेता, क्या अभिनेता, क्या महात्मा। मतलब कोई क्यों न हो व्यंग्य के रंग में रंगना ही व्यंग्यकार का काम होता है। सही मायने में असली व्यंग्यकार स्वयं पर भी व्यंग्य करने से नहीं चूकता। कुल मिलाकर ‘काटे चाटे स्वान के दुहूँ भाँति बिपरीत’ वाली बात व्यंग्यकारों के लिए भी लागू होती है।

इसलिए जहाँ तक हो सके व्यंग्यकार से बचकर रहना चाहिए। जितने भी रचनाकार होते हैं, उनमें व्यंग्यकार का स्थान सबसे नीचे है। इनकी गिनती निम्न कोटि वाले रचनाकारों में होती है। यहाँ रचना से मतलब नहीं है। रचना कैसी भी हो तो भी व्यंगयकार को बेकार ही माना जाता है।

व्यंग्यकार का मतलब कई विद्वान भी बेकार ही लगाते हैं। कई विद्वान तो व्यंग्यकार को रचनाकार ही नहीं मानते। बहुत लोग तो व्यंग्य को असाहित्यिक भी कहते रहे हैं। इनका हृदय भले ही कभी न कभी व्यंग्य से बिधा हो, लेकिन इनका मानना था कि व्यंग्य विधा नहीं है। जो सबको बेधने की क्षमता रखता हो उसे यह कहना कि यह विधा नहीं है। कहाँ का न्याय है ? कहाँ की विद्वता है ?

जिस रचनाकार को लोग रचनाकार न मानते हों। जिसे बेकार समझा जाता हो। जिसकी रचना को असाहित्यिक माना जाता हो। अर्थात जिसकी इतनी दुर्दशा हो वह किसी दूसरे की कितनी दुर्दशा कर सकता है। खुद अनुमान कीजिए।

गणित में जीरो या शून्य होता है। उससे चाहे जो टकराये शून्य ही बना देता है। अर्थात अपने जैसा ही कर देता है। यही हाल व्यंग्यकार का भी है।

व्यंग्यकारों पर कई लोग आरोप लगाते हैं कि ये हर जगह कमी ही देखते हैं। अच्छाई इन्हें नहीं दिखती। इनकी दृष्टि हमेशा बुराई पर ही पड़ती है। जो ऐसा सोचते अथवा कहते हैं उनके शरीर और चेहरे पर भी तो व्यंग्यकार की दृष्टि पड़ती होगी। इसलिए कहा गया है कि बहुत सोच समझ कर ही बोलना चाहिए। लेकिन लोग आदत से मजबूर होते हैं। तो कोई व्यंग्यकार क्या करे ?

लोग करें चाहे जो लेकिन अच्छा ही करते हैं। ऐसा दिखाना, बताना और सुनना भी चाहते हैं। लेकिन हर नंगे को दिगम्बर तो नहीं कहा जा सकता। नंगे को व्यंग्यकार नंगा तो कहता ही है साथ ही यह भी कह देता है कि कपड़े के पीछे सभी नंगे होते हैं। जो सच्चाई है। तो इसमें क्या बुरा है ? असलियत छिपाने से थोड़े बदलती है। मुखौटा लगाने से चेहरा भले बदल जाय लेकिन असलियत तो वही रहती है। असल और नसल का भेद बताओ तो कई लोगों को रास नहीं आता। इसी से कई लोग व्यंग्यकार को गलत मानते हैं।

एक ग्रामीण कहावत है कि ‘मुंहै मुँह मारे जाय ऊपर से कहे कि बनारसी जूता होय’। इस कहावत को चरितार्थ करना एक व्यंग्यकार से अधिक और कौन जान सकता है ? व्यंग्यकार के बेकारी की मार किस पर नहीं पड़ती ? वैसे तो व्यंग्यकार से बचना मुश्किल है। फिर भी प्रयास करने में क्या बुराई है ? हर बुराई से बचने का सबको प्रयास तो करना ही चाहिए। चाहे बुराई अपने से बुरी न हो।

आमतौर पर देखा जाय तो हिंदुस्तान का हर प्राणी एक व्यंग्यकार है। हर कोई किसी न किसी पर कभी न कभी व्यंग्य जरूर करता है। सास बहू पर और बहू सास पर व्यंग्य करती है। बच्चे बड़ों पर, जवान बूढों पर, स्त्री पुरुष पर और पुरुष स्त्री पर व्यंग्य करते हैं। ऐसे में तो आप कह सकते हैं कि व्यंग्यकार से बचना असम्भव है। लेकिन घबराइए मत आपको इन व्यंग्यकारों से ज्यादा खतरा नहीं है। और जिससे ज्यादा खतरा न हो लोग उससे बचने का प्रयास भी नहीं करते।

आपको बचने की जरूरत है उस व्यंग्यकार से जिसने अपने अंदर के व्यंग्यकार को लेखनी थमा दी है। जिसने लेखनी थमा दी और यदि लेखनी चल पड़ी तो उसका रुकना मुश्किल हो जाता है। फिर वह कब किसकी और कैसे खबर ले, यह नहीं कहा जा सकता।

हम समझते हैं कि जहाँ मति की कमी होती है। वहाँ मतभेद ज्यादा होता है। कहते हैं कि जहाँ चार विद्वान हों वहाँ अपनी शेखी नहीं बघारना चाहिए। लेकिन एक सच्चा हिंदुस्तानी इस बात को नहीं मानता। क्योंकि हिंदुस्तान में हर कोई विद्वान ही होता है। फिर हिन्दुस्तान में मत भेद ज्यादा क्यों पाए जाते हैं ? यहाँ मतभेद में भी मतभेद होता है। जीवन और मरण तक में भी मतभेद है। कई लोग तो सिर्फ मतभेद ही पैदा करते हैं। क्योंकि कुछ लोग इसे बिद्वता की कसौटी मानते हैं। यदि ऐसा है तो क्यों न हम भी कम से एक मतभेद पैदा कर दें। हिंदी साहित्य की सबसे पहली व्यंग्य रचना कौन है ? यह गद्य में लिखी गई थी अथवा पद्य में। हमारा मत है कि पद्य में कई सो वर्ष पूर्व लिखी गई थी।

एक नवयुवक को व्यंग्य लिखने का शौक चर्राया। वह एक व्यंग्यकार के पास गया। बोला कि हम भी व्यंग्य लिखना चाहते हैं। आप को बहुत अच्छा व्यंग्यकार जान कर आया हूँ। आप हमारी कुछ मदद कीजिए। कोई बेकार आदमी के पास जाय और उससे उसकी राय अथवा मदद मांगे। तो बेकार को अपनी बेकारी पर गर्ब होना लाजिमी है। इसलिय व्यंग्यकार को जीवन में पहली बार अपनी बेकारी पर गर्ब हुआ। लेकिन व्यंग्यकार तो व्यंग्यकार सो उसने सोचा कि एक अच्छा व्यंग्यकार जान कर आया है। मानकर नहीं। अतः उसने यहाँ भी व्यंग्य कर दिया। बोला मदद क्या करना है ? आजकल जो लोग ‘व्यंग्य’ भी नहीं लिख पाते वो भी व्यंग्य लिखते हैं। समझते हैं कि जो कुछ लिख दो वही व्यंग्य हो जाता है। नवयुवक अपना सा मुँह लेकर लौट आया। आखिर क्या करता ?

एक नेता चुनाव में वोट मांगने एक व्यंग्यकार के घर जा पँहुचे। नेता का पिछलग्गू बोला कि इस बार ये यहाँ से खड़े हैं। नेता जी ने हाथ जोड़ा। शायद व्यंग्यकार किसी दूसरी पार्टी से जुड़ा है। लोगों ने यही समझा। क्योंकि चारपाई की ओर इशारा करते हुए उसने कहा कि खड़े हैं तो बैठ जाय। नेता का मन कसैला हो गया। सोचा कैसा आदमी है जो वोट देने की बात न करके बैठने को कह दिया। चुनाव के समय नेता उठना, बैठना, सोना आदि सब भूल जाते हैं। याद रहता है तो सिर्फ हाथ जोड़ना। रात में बिस्तर पर भी हाथ जोड़कर ही लेटते हैं। चुनाव के समय बैठने का मतलब चुनाव से बैठना और उठने का मतलब अपने विरोधी से ऊपर समझते हैं।

व्यंग्यकारों से बचने का सलाह देते हुए किसी ने यहाँ तक कहा है कि किसी लड़की को किसी व्यंग्यकार से शादी नहीं करना चाहिए। और अगर किसी को इस पर कोई आशंका हो तो वह व्यंग्यकारों के पत्नियों से एक बार जरूर पूछ कर देख ले।

किसी लड़की को एक लडके से प्रेम हो गया। लड़की को यह नहीं पता था कि यह छोटा-मोटा व्यंग्यकार है। अन्यथा इसके चक्कर में क्यों पड़ती ? एक दिन लड़की ने लड़के से अपनी सुंदरता के बारे में दो शब्द कहने को कहा। लड़का बोला कि आप की सुंदरता का क्या कहना। आप तो छछुंदर से भी कहीं अधिक सुंदर हैं। लड़की फूट-फूट कर रोई। और इन्हें छोड़कर किसी दूसरे से प्रेम करने लगी। यह स्थिति है व्यंग्यकारों की।

खैर आजकल स्थिति तो किसी भी रचनाकार की ठीक नहीं है। रही बात व्यंग्यकार की तो इनकी ज्यादा खराब है। इतनी ज्यादा खराब है कि इनसे बचने की जरूरत होना लाजिमी है। लोग अन्य रचनाकारों से बचने की ज्यादा जरूरत भी नहीं समझते। जो सही भी है।

सच कहा जाय तो कोई चाहे लाख कोशिश कर ले लेकिन व्यंग्यकार से नहीं बच सकता। क्योंकि हिंदुस्तान की आज वह हालत हो गई है कि यहाँ का हर प्राणी चाहे वह छोटा हो चाहे बहुत बड़ा हो अपने आप में एक व्यंग्य बन गया है। ऐसे में कोई व्यंग्यकार से कैसे बचेगा ?

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डॉ. एस. के. पाण्डेय,

समशापुर (उ. प्र.)।

URL: https://sites.google.com/site/skpandeysriramkthavali/

ब्लॉग: http://www.sriramprabhukripa.blogspot.com/

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COMMENTS

BLOGGER: 1
  1. bananme bagaryo basnthai ke samanic me vyang
    samayo hai Aankh sabakodekhati hai kintu khud
    ko nahi yahan to khud ko bhi dekha hai

    जवाब देंहटाएं
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रचनाकार: एस के पाण्डेय का व्यंग्य : व्यंग्यकार से बचने की जरूरत
एस के पाण्डेय का व्यंग्य : व्यंग्यकार से बचने की जरूरत
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