रचनाकार.ऑर्ग की विशाल लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोजें -
 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें.

कृष्ण कुमार यादव की कविता : सभ्यता की आड़ में

 

सभ्यता के झीने आवरण से दूर
वे करते हैं विचरण
अपनी दुनिया में
जंगली सूअरों और गोह का
शिकार कर खाते लोग
कभी सीपियों का माँस, तो कभी
मछली-कछुए मार खाते लोग
डरते हैं जंगली जानवर
इनके तीखे भालों-बाणों से
पर वो डरते हैं
सभ्यता के शिकारियों से
सभ्यता की आड़ में
उनकी आस्मिता का शिकार करती
उनकी संपदा को ललचाई
निगाहों से घूरती
विकास के खोखले नारों के बीच
जंगल और जमीन कब्जाते लोग
छीन रहे हैं उनका सुकून।

हर कोई देखना चाहता है
छूना चाहता है उन्हें
पर नहीं चाहता उन्हें समझना।
वे एक उत्पाद-भर रह गए हैं
उनके चेहरे, उनकी भाव-भंगिमायें
कैद करके कैमरों में
लौट जाते हैं लोग
अपनी सभ्य दुनिया में
और भूल जाते हैं
इन आदि मानवों को।

कृष्ण कुमार यादव
भारतीय डाक सेवा
निदेशक डाक सेवाएं
अंडमान व निकोबार द्वीप समूह, पोर्टब्लेयर-744101

2 टिप्पणियाँ

  1. अंडमान-प्रवास के दौरान आदिवासियों के दुःख-दर्द को कृष्ण कुमार यादव जी ने न सिर्फ देखा, बल्कि उसे सार्थक रूप में पन्नों पर उतरा भी. वाकई बेहतरीन कविता..बधाई.
    अब अंडमान से प्रयाग की धरा पर आपका स्वागत है..

    जवाब देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.