आर.वी.सिंह का आलेख - राजभाषाः सरल भाषा और प्रलाप भाषा

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  भा षा के बदलते स्वरूप पर चिन्तन-मनन न कोई नई बात है, न ही उसका संदर्भ हिन्दी तक सीमित है। जबसे समाज में संपत्ति और शिक्षा है, जबसे समृद्ध ...

 

भाषा के बदलते स्वरूप पर चिन्तन-मनन न कोई नई बात है, न ही उसका संदर्भ हिन्दी तक सीमित है। जबसे समाज में संपत्ति और शिक्षा है, जबसे समृद्ध संभ्रांत समाज और गरीब अनपढ़-अनगढ़ समाज अपनी दो अलग-अलग धाराओं में दुनिया में विद्यमान हैं, तभी से भाषा के एकाधिक रूप समाज में रहे हैं। इस स्तरीकृत समाज को आधार बनाकर लिखित साहित्य और विशेषकर कथा व नाटक जैसी विधाओं में भाषा के सुष्ठु प्रांजल रूप और अनगढ़ किन्तु लोक-रंजक, लोक-प्रचलित रूप सहस्राब्दियों से हमारे साहित्य में विद्यमान हैं।

यही कारण है कि संस्कृत नाटकों में राजन्य वर्ग, मंत्री, सेनापति, कवि, राज-गुरु, पुरोहित आदि संस्कृत में बोलते दिखाए जाते हैं, जबकि किसान और आम प्रजा वर्ग की भाषा प्राकृत है। साहित्य में इसे पात्रानुकूल भाषा-प्रयोग कहा गया और इसे अच्छे साहित्य की निशानी बताया गया। कर्मकाण्डी ब्राह्मण –प्रधान हिन्दू समाज की अतिरेकवादी जीवन-पद्धति से लगभग विरोध करते हुए जब ईसा पूर्व पाँचवीं-छठी शताब्दी में बौद्ध और जैन धर्म अस्तित्व में आए, तो उन्होंने अपना जनाधार बढ़ाने के लिए संस्कृत को नहीं, बल्कि उस समय व्यवहृत आम आदमी की भाषा यानी पालि और प्राकृतों को अपनाया। इन भाषाओं के बहुत से शब्द संस्कृत शब्दों के ही लोक-उच्चरित सरलीकृत रूप जान पड़ते हैं। जैन कवि पुप्फदन्त का तो नाम ही पुष्पदन्त का अपभ्रंश लगता है, जबकि उनकी रचना पउमचरिय वस्तुतः संस्कृत के पद्मचरित का भ्रष्ट रूप है।

संस्कृत को सर्वभावेन वरेण्य मानने के बावजूद हमारे समाज में अन्य भाषा-रूपों के लिए निरन्तर स्वीकार भाव बना रहा। यही कारण है कि उनमें प्रचुर मात्रा में साहित्य रचा गया, जो आज भी हमारे विश्वविद्यालयों में पढ़ा-पढ़ाया जाता है और जिसपर विपुल परिमाण में अनुसंधान-कार्य हुआ है।

इसके बावजूद हमारे संहिता-ग्रंथ जैसे मनुस्मृति, अर्थशास्त्र आदि, और हमारे आर्ष ग्रंथ- चारों वेद, श्रीमद्भभगवद्गीता, विविध पुराण, उपनिषद् आदि और महाकाव्यात्मक कृतियाँ जैसे वाल्मीकि रामायण, उत्तर रामचरित, महाभारत आदि संस्कृत में ही रचे गए। इनको संस्कृत जैसी मानक भाषा में रचने के पीछे शायद दृष्टि यही थी कि इनकी विषयवस्तु को दीर्घ काल तक समझा जाए और समाज का आचार-व्यवहार उनके अनुरूप रहे। सच्चाई तो यही है कि यदि ये ग्रंथ मानक वैयाकरणिक संरचना और शब्दावली वाली संस्कृत में न रचे गए होते तो इनका प्रसार-क्षेत्र इतना व्यापक न होता और न ही ये सहस्राब्दियों की यात्रा करने के बावजूद जीवित रह पाते। इसके विपरीत अमानक भाषा में रचा गया बहुत-सा साहित्य बस नाममात्र को ही शेष है।

जब हम मानक भाषा को हटाकर, उसके स्थान पर अमानक भाषा-रूपों की स्थापना की वकालत करते हैं तो प्रकारान्तर से हम उस अराजक स्थिति को आमंत्रित कर रहे होते हैं, जिसमें नियमों व मानदंडों का सीधा-सीधा नकार होता है। ऐसे भाषा रूपों की तात्कालिकता और क्षण-जीविता पर भी हमारी दृष्टि होनी चाहिए। खासकर कार्यालयीन संदर्भों में यह बेहद जरूरी है कि हमारी भाषा ऐसी हो जो एक-दो सदी बाद भी लोगों को समझ आए, ताकि उससे संदर्भ लेकर आगे का काम-काज चल सके। साथ ही, वह ऐसी हो, जिसका कोडीकरण, मानकीकरण और अंततः अनुकरण संभव हो। कारण यह कि सरकारी संस्थाओं में पिष्टपेषण का अपना विशेष महत्त्व है।

व्हाई दिस कोलावेरी डी, जैसे भाषा-प्रयोग क्षण-दो क्षण के सांगीतिक मनोरंजन का आधार बन सकते हैं। कमर लचकाकर, कंधे उचकाकर, कान में ठीसी लगाकर लड़के-लड़कियाँ ऐसे निरर्थक प्रलापी गीत-संगीत पर घड़ी दो घड़ी झूम सकते हैं, किन्तु जब स्थायी महत्त्व की कार्यालयीन टिप्पणियाँ लिखने की जरूरत होगी, देश-देशान्तर में अवस्थित संस्थाओं के बीच पत्र-व्यवहार और सार्थक संप्रेषण के मौके आएँगे, तो कोलावेरी डी से काम नहीं चलेगा। उस समय हमें मानक शब्दावली और व्याकरण-सम्मत वाक्यावली की जरूरत होगी।

जैसाकि हम ऊपर कह आए, सभी भाषा-समाजों में, सभी काल-खंडों में एकाधिक भाषा-रूपों की मौजूदगी देखी गई है। इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि आज जहाँ हिन्दी समाज में हिंदिश, हिंगलिश आदि नए-नए नामों से अभिहित हो रही विविध भाषिक प्रवृत्तियाँ दिखलाई पड़ रही हैं, वहीं भारत में अंग्रेजी का इस्तेमाल करनेवाले समाज में ब्रिटिश अथवा अमेरिकी अंग्रेजी से इतर नए-नए भाषा-रूपों पर भी चर्चा हो रही है। भारतीय लहजे में बोली जानेवाली, हिन्दुस्तानी योजकों, विरामों और कभ-कभी हिन्दुस्तानी भाषाओं के व्याकरणिक विन्यास वाली इस अंग्रेजी को भारत का आंग्ल-लेखक इंडिश कहकर संबोधित कर रहा है।

भारतीय समाज की मुख्य धारा से बड़ी तेजी से शुचिता का लोप हो रहा है। अब सिद्धान्तवादी और नीतिवादी होना हमारे समाज में दकियानूस और पुरातनपंथी होने का पर्याय बन गया है। जिस समाज की आधी से अधिक आबादी नवयुवाओं की हो, और जहाँ भोगवाद अपने चरम पर हो, उस समाज में पुराने परंपरा-पोषित मूल्यों को कायम रखना कितना कठिन होगा, इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है। परिणाम यह है कि हमारे बने-बनाए मानदंडों का शीराजा बिखर रहा है। इसका एक उदाहरण है समलैंगिकता। हाल तक हमारा समाज समलैंगिकता को न केवल सीधे-सीधे अस्वीकार करता आ रहा था, बल्कि उसे अपराध की श्रेणी में भी रखा जाता था। अब न्यायपालिका भी अब उसे न्याय-संगत मान रही है।

ऐसे में भाषा की शुचिता, मानकता, व्याकरणिकता आदि मुद्दों पर बहुत खुले मन से विचार करने की आवश्यकता है।

सरकारी दफ्तरों की भाषा सरल होनी चाहिए। इसमें कोई शक नहीं। लेकिन वह अमानक तो न हो, भाषिक नियमों के विपरीत तो न हो, लंबे समय तक उद्धरणीय तो हो। हमारी संस्कृति, हमारी शासन-पद्धति, हमारे मूल्यों के अनुरूप तो हो। अराजकता पैदा करनेवाली तो न हो।

सर्वसमावेशी सधुक्कड़ी भाषा के पुरोधा कबीर ने ज्ञान क पंथ कृपान क धारा कहकर ज्ञान-मार्ग को दुस्तर बताया। कबीर के समवर्ती और परवर्ती, सभी भक्त-आचार्यों ने जब अपने-अपने पंथ का सिद्धान्त कथन किया तो प्रांजल मानक भाषा में किया, किन्तु जब जनता से मुखातिब हुए तब उन्होंने लोक-भाषाओं को अपनाया, कछु लीला वर्णन करि कहकर अपने अनुयायियों को लोक-भाषा में रचना के लिए प्रेरित किया।

शायद यही तरीका हमारे सरकारी विभागों को अपनाना चाहिए। जब वे आपस में पत्र-व्यवहार करें, नियमावलियाँ बनाएं, संहिताएँ रचें, स्थायी महत्त्व की सामग्री तैयार करें, परिपत्र निकालें, तब पारिभाषिक शब्दावली वाली मानक भाषा का इस्तेमाल करें। किन्तु यही विभाग जब आम आदमी से मुखातिब हों, तब आम आदमी की भाषा लिखें- ऐसी भाषा जो उसे आसानी से समझ आ जाए।

संदर्भानुसार, भाषा के एकाधिक रूपों का अस्तित्वमान रहना स्वाभाविक है। इस स्थिति को बने रहने देना चाहिए। इसमें अनावश्यक छेड़-छाड़ से हम भाषिक अराजकता को जन्म दे रहे होंगे। इस मामले में हुक्मरानों की नासमझी से राजभाषा मछली बाजार के गुलगड़ापे में तबदील हो जाएगी। पता नहीं, ऐसी राजभाषा सरल होगी या नहीं, लेकिन वह इतनी विरूपित हो चुकी होगी कि उसे अपनाने में किसी को गौरव-बोध नहीं होगा।

हम उसी को अपनाते हैं, जिससे हमें अनुराग हो। कभी-कभी हम उसे अपना बनाने के लिए उतावले होते हैं, जिसकी समाज में मान-मर्यादा हो। हम उसे अपनाते हैं, जिससे हमारा स्वार्थ सधता हो। यही कारण है कि आज तक हम अंग्रेजी को सीने से लगाए-लगाए घूमते आ रहे हैं और हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं को हमने बदहाली के कगार पर पहुँचा दिया है। अपनी इन भाषाओं से कोलावरी (बताया गया कि कोलावरी का अर्थ है बेरुखी) करके हम उनका गौरव तो कतई नहीं बढ़ा रहे। उनमें जबरदस्ती अंग्रेजी घुसेड़कर हम उनका चाहे जो भी रूप विकसित या विनशित कर रहे हैं, पर उनकी श्री-वृद्धि तो कतई नहीं कर रहे। सवाल यह उठता है कि क्या इन ग्लैमर-रहित, गौरव-रहित भाषा-रूपों को अपना बनाने के लिए हम तैयार हैं? जो लोग ऐसा करने के लिए तैयार हैं, उनकी उदारता प्रणम्य है। और जो नहीं तैयार हैं, उनसे अपील है कि वे अपनी स्वदेशी भाषाओं को अपने कार्य-व्यापार का हिस्सा बनाएँ और अधिमान्य स्वदेशी स्रोतों से (तथा बहुत मजबूरी में विदेशी स्रोतों से) अपनी भाषाओं को और समृद्ध करें। अपनी भाषाओं का इस्तेमाल करें, वरना उनके लुप्त होने का खतरा पैदा हो जाएगा। अंग्रेजी की कहावत तो याद है न- यूज इट ऑर लूज इट, अपनाओ या गँवाओ। चयन हम सबको ही करना है।

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आर.वी.सिंह/R.V. Singh
उप महाप्रबन्धक (हिन्दी)/ Dy. G.M. (Hindi)
भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक/ Small Inds. Dev. Bank of India
प्रधान कार्यालय/Head Office
लखनऊ/Lucknow- 226 001

COMMENTS

BLOGGER: 3
  1. सार्थक चिंतन ....किसी भी परिवर्तन को विवेकशील होकर ही अपनाना चाहिए

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  2. काफी दिनों के बाद धमाकेदार उपस्थिति
    सिंह साहब गहरा चिंतन है
    पर चिंताएं काफी हैं

    डॉ रावत

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  3. सिंह साहब
    काफी दिनों बाद आपका लेख मिला है
    चिंतन प्रसूत पर क्या करें साब चिंताएं भी इतनी हैं
    कि हम सब का हाल मुंबई बालों का सा हो गया है
    हम कुछ नहीं कर पा रहे बस भीड़ कर रही है जो भी कर रही है
    सादर

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