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एस. के. पाण्डेय का व्यंग्य - कहीं छा न जाये

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* कहीं छा ना जाये * इधर छा जाने की घटनाएँ कुछ इस कदर बढ़ी हैं कि लोग बहुत ही सशंकित रहने लगे हैं। सबको चिंता सताती रहती है कि कहीं छा न जा...

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*कहीं छा ना जाये*

इधर छा जाने की घटनाएँ कुछ इस कदर बढ़ी हैं कि लोग बहुत ही सशंकित रहने लगे हैं। सबको चिंता सताती रहती है कि कहीं छा न जाए। कई लोगों को तो घर से बाहर निकलने के लिए कई बार सोचना पड़ता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि कोई किसी के मन पर, कोई किसी के तन पर तो कोई किसी के दिल पर ही छा जाता है। छा जाने के लिए, करने वाले जोर- जबरदस्ती पर भी उतारूँ हो जाते हैं। तन, मन, वा दिल जैसी नाजुक चीजों को छोड़ दिया जाय तो भी छा जाने के लिए बहुत सी चीजें शेष रह जाती हैं।

आजकल कोई कब और कहाँ छा जाये कौन जान सकता है ? कोई किसी के घर पर छा जाता है। या किसी के घर पर छाकर उसे बेघर कर देना चाहता है। कोई किसी के धन पर छा जाता है। कोई किसी के जमीन पे छा जाता है। कोई सार्वजनिक जमीन पे तो कोई सरकारी। सड़कों तक पर भी छाने वाले छा जाते हैं। तब अन्य जगहों कि बात ही क्या किया जाये ? लेकिन छाने वाले जरूर धन, बल वाले होते हैं अथवा किस्मत के मारे होते हैं। क्योंकि कहीं भी छाना सबके बस की बात नहीं होती है।

फिर भी लौटन एक दिन बोले पाण्डेय जी आप तो छा गये हैं। मैंने कहा जरूर आपको कोई गलतफहमी हुयी है। यह कारस्तानी तो आपके पड़ोसी रंगलाल की ही हो सकती है। मुझे तो छाना आता ही नहीं। कहीं आजतक हम भी छायें हैं क्या ? कल वे ही बल्ली-बांस के जुगाड़ में लगे थे। खैर लौटन से अपना पिंड छूटा।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि छाना ही जोर नहीं पकड़ रहा है। उजाड़ना भी। कोई किसी को उजाड़ रहा है। कोई किसी को। अथवा उजाड़ देना चाहता है। झुग्गी-झोपड़ी वाले छाते ही रहते हैं। उनको उजाड़ना कोई बड़ी बात थोड़े होती है। लोग जब बड़े-बड़े को भी उजाड़ देते हैं। तब झुग्गी-झोपड़ी वालों की बात ही क्या है ? यहाँ से उजाड़े जायेंगे तो वहाँ छा जायेंगे। जिनके नसीब में उजड़ना वा छाना ही हो, उसे चाहे सरकार उजाड़े, चाहे नेता या नेता जैसे लोग। चाहे आंधी, वर्षा या तूफान। क्या फर्क पड़ता है ?

जब कोई छाता है। तब किसी को गम तो किसी को खुशी होती है। लेकिन छाने वाले को चाहे जहाँ छाये, हमेशा ख़ुशी ही होती है। बाद में भले गम हो। दरअसल इस पर निर्भर करता है कि क्या, कौन और कहाँ छाया है ? छाया की माया और माया की छाया दोनों अजीब है। साधु-संत भी फंस जाते हैं। माया कब चाहेंगी कि छाया उन्हें चाहने वाले के मन पर छाये । छाया को चाहने वाला ही क्यों चाहेगा कि छाया किसी और के मन पर छाये ? जाड़े से पीड़ित को पेड़ की छाया क्यों रास आएगी। वहीं गर्मी से पीड़ित तो छाया को चाहेगा ही। अगर आसमान में बादल छा जाये तो मयूर तो नाचेगा ही। किसी-किसी का मन-मयूर भी नाचता है। चाहे सावन में ही। ऐसा मैंने सुना है। लेकिन किसान जिसकी फसल पक कर तैयार हो, बादल के छाने पर कैसे नाचेगा ?

छाता कोई है और छाती जलती है किसी और की। एक पड़ोसी को अपने पड़ोसी का छाना तो कतई रास नहीं आता। एक सच्चा पड़ोसी सदा इसी उधेड़-बुन में रहता है कि कहीं ये छा ना जाये। बचपन में एक कहानी सुनी थी। जिसमें दो पड़ोसी थे। एक छाता जा रहा था। लेकिन दूसरे को उसका छाना फूटी आँख भी नहीं सुहा रहा था। किसी तरीके से उसने एक देवता को खुश किया। देवता सारी बात समझ रहे थे। बोले जो मांगना हो मांग लो। लेकिन ध्यान रखना, जो तुम मांगोगे उसका दुगुना तुम्हारे पड़ोसी को अपने आप तुरंत मिल जायेगा। पड़ोसी बेचारा असमंजस में पड़ गया। मगर फौरन युक्ति सूझ गयी। सोचा देखता हूँ। अब आगे और कैसे छाते हैं ? बोला मंजूर है। दो वरदान चाहिये। पहला मेरी एक आँख फूट जाये। दूसरा मेरे मुख्य द्वार के ठीक सामने एक गहरा कुआँ खुद जाये। सच्चे पड़ोसी का यही उत्तम कर्तब्य होता है।

आजके समय में कौन छाना नहीं चाहता ? यदि छाना है तो तिकड़मबाजी, जर-जुगाड़ सभी हथकंडे अपनाने ही पड़ते हैं। साथ ही चौकस वा चौकन्ना भी रहना पड़ता है कि कहीं छा ना जाये ? खासकर अच्छे वा सच्चे पड़ोसियों को तो रात-रात नींद नहीं आती। जब एक पड़ोसी किसी तरह सोने का उद्यम करता है। तब नेक पड़ोसी या तो ढ़ोल पीटना शुरू करता है। मतलब तब उसे शास्त्रीय संगीत का शौक चर्राता है। या इनकम टैक्स वालों को चाय पिलाना शुरू करता है। ऐसे पड़ोसी दो टका जबाब भी दे देते हैं कि हम अपने घर में चाहे कुआँ खोदें। तुम्हारी छाती काहे को जलती है। हम अपने दरवाजे पर मिर्चा सुलगाते हैं। तब भी आप हल्ला मंचा कर सारे मोहल्ले वालों को क्यों सुनाते हो ?

गाँव में ऐसे ही दो पड़ोसियों में झगड़ा हो गया। जब पहला अपने घर में आग लगाने चला। तब दूसरा गुहार लगाने लगा। सच में पड़ोसी ही पड़ोसी के काम आते हैं। चाहे कोई समझे या ना समझे अथवा देर में समझे। पहला यही कहे जा रहा था कि हम अपना घर फूँक रहे हैं तो तुम्हारी छाती क्यों फटी जा रही है ? दरअसल दोनों का घर छप्पर का ही था ।

आज के समय में कौन एक-दूसरे को छाते देख सकता है ? आज एक देश दूसरे देश को छाते नहीं देख सकता। एक समाज दूसरे समाज को छाते हुए नहीं देख सकता। देश और समाज की तो बात छोड़िये एक भाई दूसरे भाई को भी छाते हुए नहीं देख सकता। किसी ना किसी उद्यम से लोग दूसरों के छाने पर रोक लगाना चाहते हैं। लेकिन खुद दिनों-दिन छाना चाहते हैं। छा जाने के लिए लोग क्या-क्या नहीं करते ? दोस्ती से लेकर दुश्मनी तक। नीति से अनीति तक। चोरी से बेमानी तक। मतलब जिससे भी छाया जा सके लोग वह करने को तैयार रहते हैं। अपना तन तक खोल-खोल कर दिखाते हैं। कुछ लोग भरे समाज में नंगे तक हो जाते हैं। गाते हैं, नाचते हैं और नाचते-नाचते कपड़ा खिसका देते हैं। ताकि टीवी में दिखकर छा जाएँ। समाचार पत्रों में छा जाएँ। छाने की महिमा बहुत है। छाने के तरीके बहुत हैं। किसी छाते हुए को उजाड़ने के भी नाना तरीके हैं।

जब एक नेता दूसरे नेता को छाते देखता है। तब उसे खाया अन्न नहीं पचता कि कहीं अगले चुनाव में पत्ता ही साफ ना कर दे। किसी ना किसी तरीके से उसे रोकता हैं। अथवा सीमित कर देने का प्रयास करता हैं। कुछ नहीं हुआ तो उसे सांप्रदायिक बताना शरू कर देता हैं। जब एक डॉक्टर का लगाया इंजेक्सन पक जाता है। तब वह मरीज को पटा कर अपने मुकाबले छाते हुए डॉक्टर को बदनाम करके उसका छाना कम करता है। एक मास्टर का पढ़ाया हुआ लड़का जब परीक्षा में फेल हो जाता है। तब वह उस लड़के को पटा कर उसे अपने प्रतिद्वंदी का पढ़ाया हुआ बताता हैं और उसके कोचिंग में ताला लगवाने का प्रयास करता है। इसी तरह अन्य सभी लोग छाने वालों की खबर लेते हैं। हिदुस्तान में तिकड़म लगाने वालों की कमी नहीं है। इसलिए ही विदेश में कई लोग भारत को तिकड़म वालों का देश भी कहते हैं।

जब मैं एमएससी में था तो एक लड़का जो दिन-रात पढ़ता रहता था। बहुत परेशान रहता था कि उसके मुकाबले कहीं कोई दूसरा न छा जाए। इसलिए खुद तो बहुत मेहनत करके पढ़ता था और जब उसका मन पढ़ने से ऊबता तो अन्य छात्रो के पास आकर उनकी किताब बंद कर दिया करता था। और कहता था क्या पागलखाने जाने की इच्छा है ? चलो कुछ दुनियाबीदुनिया की बात सुनाते हैं। क्लास की लड़कियों की ऐसी-ऐसी बातें जो शायद उन्हें भी मालुम नहीं होती, एक से एक कहानी, कविता, चुटकुले सुनाकर व सुनकर खुद तो जाकर पढ़ने लगता। जबकि लोगों से कहता चलकर अब सोते हैं। दरवाजा बंद करके अंदर पढ़ाई करता। अन्य सभी उसी कविता, कहानी में मस्त रहते। अधिकांश लोग जिनके पास वह बैठता था फेल हो जाते थे। रजल्ट आने पर वह छा जाता था।

छाने की चिंता से बेचारे पशु तक अछूते नहीं हैं। लोग गाँव, शहर, ताल-तलैया व बाग-बगीचों में पहले से ही छाये हैं। बश चले तो नदियों को पाट डालें, दुर्गति तो कर ही चुके हैं। धीरे-धीरे जंगलों में भी छाये जा रहे हैं। कुछ वुद्धिजीवियों का मानना है कि मनुष्यों के आये दिन छाने के नये-नये कीर्तमान स्थापित करने से मानवता लाज को भी लजा रही है। तथा पशुता अकुला रही है। लडकियों व महिलाओं को तो हमेशा भय बना रहता है। पशु, पशु की दुर्गति होते देख मस्त रहता है। कोई-कोई पशु तो बचाव में भी आ जाते हैं। लेकिन मानव खुद मानव की दुर्गति करते और कराते हैं। दूसरे की दुर्गति होते देख ताली बजाते हैं। जब तक अपने सिर पर नहीं पड़ता मजा लेते हैं। जब पड़ता है तब जोर-जोर चिल्लाना शुरू करते हैं। जन्मदाता माता-पिता को अनाथालय भेज देते हैं। गो माता का माँस तक खा जाते हैं। ईश्वर को कहते हैं कि इश्वर ! कौन इश्वर ? कहा रहता हैं ? मैं ही हूँ। मैं ही ईश्वर हूँ। हाँ एक दूसरा भी है- नगदेश्वर ! और कोई ईश्वर नहीं है।

बेचारे पशुओं को तो इतना ज्ञान कभी नहीं रहा कि किसके तन पर छाना है किसके नहीं। उनके लिए कोई नियम और नीति कभी नहीं थी। पशुओं का कहना है कि मानव को अब अपने लिए कोई उचित संज्ञा खोज लेनी चाहिये। क्योकि पशु तो पशु थे और आज भी पशु ही हैं। लेकिन मानव दिन-दिन गिरते जा रहे हैं। पशु को तो कुछ पता नहीं कि क्या मानें और क्या ना मानें ? इसीलिए तो वे पशु हैं। लेकिन मानव का मतलब है मानौं ! लेकिन आज जब वह कुछ भी नहीं मान रहा है। जैसे माता-पिता, सदगुर, गो, ईश्वर आदि। तब उसे मानव कहलाने का अधिकार भी नहीं है। पशुओं के बहुत से गुन और अधिकार पर मानव छा गए हैं। और उन्हें डर है कि जो शेष हैं उन पर भी कहीं छा न जाएँ ?

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डॉ. एस. के. पाण्डेय,

समशापुर (उ.प्र.)।

URL1: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

ब्लॉग: http://www.sriramprabhukripa.blogspot.com/

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(चित्र - मुखौटा कलाकृति - नव सिद्धार्थ आर्ट ग्रुप)

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रचनाकार: एस. के. पाण्डेय का व्यंग्य - कहीं छा न जाये
एस. के. पाण्डेय का व्यंग्य - कहीं छा न जाये
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