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देवेन्द्र पाठक ' महरूम ' की कविताई - 2 मुक्तिकाएँ

मुक्तिका -

बिना समर्पण भक्ति नहीँ है ।

भक्ति नहीँ तो मुक्ति नहीँ है ॥

 

करुणाहीन हृदय हो यदि तो ;

कुछ सार्थक अभिव्यक्ति नहीँ है॥

 

कथ्य- वाक्य हैँ अर्थहीन सब ;

यदि उपयुक्त विभक्ति नहीँ हैँ ॥

 

परिचित स्वयं से हो जो पूर्णतः ;

ऐसा कोई व्यक्ति नहीँ है ॥

 

स्वानुभूति 'महरूम' न हो तो ; प्रा

माणिक कोई उक्ति नहीँ ॥

 

~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~

मुक्तिका

कटु सत्यपान-भय से

अस्वस्थ हो गए |

अपदस्थ हो त्रिशंकु-से

अधरस्थ हो गए ॥

 

दायित्वभार-वहन

कर सके न इसलिए:

पद त्याख कर सन्यास मेँ

पदस्थ हो गए ||

 

अवसानासन्न पापतिमिर-

यामिनी निरख ;

बक के सदृश कूल पर

ध्यानस्थ हो गए ||

 

चलते हैँ तांत्रिकोँ के तंत्र

शक्ति से जिनकी ;

वे बीजमंत्र उनको भी

कंठस्थ हो गए ॥

2 टिप्पणियाँ

  1. देवेन्द्र पाठक ' महरूम ' जी की रचनाएं पढ़कर अच्‍छा लगा

    जवाब देंहटाएं
  2. Dharmendra Tripathi7:20 pm

    shabdon ka sundar tana-bana racha gaya hai. lagatar rachnaye prakashit karne ke liye sadhubad.

    जवाब देंहटाएं

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