मोनिका का आलेख - बाल अपराध बिगडता बचपन भटकता राष्ट्र

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मोनिका अनुसन्‍धान कर्ता वनस्‍थली विधापीठ (राजस्‍थान) कौन होते हैं बाल - अपराधी भारतीय कानून के अनुसार, सोलह वर्ष की आयु तक के बच्चे अग...

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मोनिका

अनुसन्‍धान कर्ता

वनस्‍थली विधापीठ (राजस्‍थान)

कौन होते हैं बाल-अपराधी

भारतीय कानून के अनुसार, सोलह वर्ष की आयु तक के बच्चे अगर कोई ऐसा कृत्य करें जो समाज या कानून की नजर में अपराध है तो ऐसे अपराधियों को बाल․अपराधी की श्रेणी में रखा जाता है। किशोरावस्था में व्यक्तित्व के निर्माण तथा व्यवहार के निर्धारण में वातावरण का बहुत हाथ होता है। हमारा कानून भी यह स्वीकार करता है कि किशोरों द्वारा किए गए अनुचित व्यवहार के लिये किशोर बालक स्वयं नहीं बल्कि उसकी परिस्थितियां उत्तरदायी होती हैं, इसी वजह से भारत समेत अनेक देशों में किशोर अपराधों के लिए अलग कानून और न्यायालय और न्यायाधीशों की नियुक्ति की जाती है। उनके न्यायाधीश और संबंधित वकील बालमनोविज्ञान के अच्छे जानकार होते हैं। किशोर․अपराधियों को दंड नहीं, बल्कि उनकी केस हिस्ट्री को जानने और उनके वातावरण का अध्ययन करने के बाद उन्हें ष्‍सुधार गृहष्‍ में रखा जाता है जहां उनकी दूषित हो चुकी मानसिकता को सुधारने का प्रयत्न किए जाने के साथ उनके साथ उनके भीतर उपज रही नकारात्मक भावनाओं को भी समाप्त करने की कोशिश की जाती है। ऐसे बच्चों के साथ घृणित बर्ताव ना अपना कर उनके प्रति सहानुभूति, प्रेमपूर्ण व्यवहार किया जाता है।

सामान्‍य रुप से देखें तो शहर के विद्यार्थियों से केवल जंगलों के बीच में बसे हुए गॉव के विद्यार्थियों में उद्दंडता, उच्छृंखलता और अनुशासनहीनता आज सामान्‍य हो गयी हैं। भावी पीढ़ी के इन कर्णधारों के चरित्र की झॉकी ले तो छुटपन से ही अश्‍लीलताओं, वासनाओं, दुर्व्‍यसनों की र्दुगन्‍ध उड़ती दिखाई देती है। छोटे- छोटे बच्‍चों को बीडी पीते गुटका खाते देखकर ऐसा लगता है कि सारा राष्‍ट बीडी पी रहा है, नशा कर रहा है युवतियों के पीछे अश्‍लील शब्‍द उछालता हैं, तो ऐसा लगता है कि सम्‍पूर्ण राष्‍ट काम वासना से उद्दीप्त हो रहा है। बडे आश्‍चर्य कि बात है कि आज के चार , पॉच, सातवें दर्जे के छोटे-छोटे बच्‍चे -बच्‍चियों जिन्‍हें उम्र का एहसास तक नहीं है वर्जनाओं और मर्यदाओं की सभी सीमाओं को पीछे छोड़ चुके हैं।

बाल- अपराधों की बढती संख्‍या भविष्‍य के लिए खतरे का संकेत हैं। बच्‍चे भविष्‍य की धरोहर है, लेकिन सामाजिक कमजोरियों और सरकार के दलमल रवैये के चलते हमारी यह धरोहर लगातार पतन के रास्‍ते आगे बढ़ती जा रही हैं बाल अपराधों की ब़ढती संख्‍या हमारे समाज के माथे एक ऐसा कलंक है जिससे तत्‍काल निजात पाने की जरुरत है। सामाजिक स्‍तर पर भी इसके अलग से कदम उठाने की आवश्यकता है इसके साथ- साथ माता पिता को भी अपनी जिम्‍मेदारियों का एहसास दिलाने की जरुरत है अन्‍यथा हमारे देश का भविष्‍य खराब होता रहेगा।

बालअपराध के लिए उत्तरदायी परिस्थितियां

· अभिभावकों और शिक्षकों की उपेक्षा बच्चे के चरित्र को बढ़ावा देने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका उसके अभिभावकों और शिक्षकों द्वारा निभाई जाती है। लेकिन अगर माता․पिता ही अपने बच्चे की गलत आदतों पर ध्यान नहीं दें तो ऐसे में उन बुरी आदतों को बढ़ावा मिलेगा जो आगे चलकर नुकसानदेह साबित हो सकती हैं।

  • अश्लील फिल्में और साहित्य पढ़ना माता․पिता को यह ध्यान देना चाहिए कि उनका बच्चा कैसी फिल्में देखता है। क्योंकि अधिकांश बच्चे फिल्मों को देखकर ही प्रेरित होते हैं। वह फिल्म के नायक जैसा बनने के चक्कर में बड़ी गलतियां कर बैठते हैं। इसके अतिरिक्त अश्लील किताबें भी उनमें भद्दे चरित्र का निर्माण करती हैं। इसीलिए बच्चों को अभिभावकों का पूरा ध्यान मिलना बहुत जरूरी हो जाता है।
  • बच्चे की संगति ऐसा माना जाता है कि स्वभाव और आचरण पर संगत का असर सबसे ज्यादा पड़ता हैं। अगर कोई भी बच्चा गलत संगत में रहता है तो निःसंदेह उसका दुष्प्रभाव उसके भी आचरण पर पडेगा।
  • पारिवारिक परिस्थितियां आमतौर पर बच्चा वही करता है जो वह परिवार से सीखता है, इसीलिए अगर उसका परिवार आपराधिक वारदातों में संलिप्त है तो उसका भी ऐसा करना स्वाभाविक हो जाता है।

बालअपराध की श्रेणी में रखे जाने वाले कृत्य

बाल․अपराधों को हम सामाजिक और पारिवारिक दो भागों में बांट सकते हैं, हालांकि पारिवारिक अपराधों के प्रति दंड देने जैसी कोई व्यवस्था भारतीय कानून में नहीं हैं, लेकिन फिर भी 16 वर्ष से कम आयु वाले बच्चे अगर ऐसा कोई भी काम करते हैं जिसके दुष्प्रभावों का सामना उनके परिवार को करना पड़ता है तो वह बाल․अपराधी ही माने जाते हैं, पारिवारिक बाल अपराधों में निम्नलिखित कृत्य शामिल किए जाते हैं।

  • माता․पिता की अनुमति के बिना घर से भाग जाना
  • अपने पारिवारिक सदस्यों के प्रति अभद्र भाषा का प्रयोग करना
  • स्कूल से भाग जाना
  • ऐसी आदतों को अपनाना जो ना तो बच्चों के लिए हितकर है ना ही परिवार के लिएण्‍ परिवार के नियंत्रण में ना रहना।

परिवार शायद बच्चों के भद्दे और गलत आचरण को एक बार सहन कर सकता है लेकिन अगर बच्चे ऐसी आदतों को अपनाएं जो समाज की नजर में घृणित समझे जाते हैं तो निःसंदेह उसे अनदेखा नहीं किया जाता, बल्कि ऐसे अपराधों को किशोर․अपराध या बाल․अपराध की श्रेणी में रखा जाता है।

  • चोरी करना
  • लड़ाई,झगड़ा करना
  • यौन अपराध करना
  • जुआ खेलना, शराब पीना
  • अपराधी गुट या समूह में शामिल होना
  • ऐसी जगहों पर जाना, जहां बच्चों का जाना पूर्णत वर्जित है
  • दुकान से कोई समान उठाना
  • किसी के प्रति भद्दी और अभद्र भाषा का प्रयोग करना

अगर कोई भी बच्चा जो उपरोक्त गलत कृत्य करता है तो उसे अपराधी माना जाएगा, जिसके लिए उसे वयस्क अपराधियों से अलग रख सुधरने का एक मौका दिया जाता है।

भोपाल - कभी शांति का टापू कही जाने वाली राजधानी अब बाल अपराध के मामले में भी नंबर वन की तरफ बढ़ रही है। एक साल के भीतर करीब 50 बाल अपराधी किसी न किसी अपराध में लिप्त पाये गए हैं, जबकि दो सौ अन्य मामले ऐसे हैं जिनमें यह बच्चे किसी न किसी प्रकार से अपराध में संलिप्त पाये गए। हालांकि विशेष किशोर पुलिस इकाई एसजेपीयू बाल अपराधों पर काउंसिलिंग के जरिये लगाम लगाने में काफी हद तक कारगर साबित हुई है।

बाल अपराधियों के लगातार बढ़ते ग्राफ से हर कोई चिंतित है। हम जिन मामलों का जिक्र कर रहे हैंए वो तो रिकॉर्ड में दर्ज हैं, लेकिन कई मामले ऐसे हैं जिनका पता भी नहीं पड़ता। जब अपराध भाव से ग्रस्त बच्चों की काउंसिलिंग की जाती है तो कई ऐसे महत्वपूर्ण पहलू निकलकर सामने आते हैं। अधिकतर मामलों में बच्चे घरेलू तनाव के कारण अपराध कर देते हैं। हत्या, चोरी, मारपीट, नशा या अपहरण जैसे मामलों में तो किशोर माहिर हो गए हैं। हालांकि इन घटनाओं के लिए परिस्थितियां जिम्मेदार हैं।

एसजेपीयू की भूमिका

हालांकि विशेष किशोर पुलिस इकाई एसजेपीयू बाल अपराध को रोकने में कारगर साबित हो रही है। भोपाल सहित उज्जैन, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर, कटनी, शिवपुरी, गुना शहरों में प्रारंभ हुए इसे सवा साल हो गया है।

इससे पहले यदि बाल अपराधी पकड़ा जाता तो उसे थाने में रखा जाता था। जहां आपराधिक प्रवृत्तियों का इनके मन․मस्तिष्क पर विपरीत असर पड़ता था। यहां इन्हें काउंसिलिंग के माध्यम से समझाया जाता है। बाल अपराधियों को रखने की यहां विशेष सुविधाएं भी हैं।

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बच्‍चों में शराब ,सिगरेट पीना, हल्‍की मादक दवाईयॉ लेना, गुप-चुप और सपाट से स्‍कूल अचानक स्‍कूल से गायब हो जाना, साईबर कैफे में इंटरनेट पर अश्‍लीलता से सरोवार होना, और बार आदि में जाने के लिए झूठ बोलना, ऐसा परिधान का चयन करना जिन्‍हे वे घर में भी पहनने का एहसास नहीं जुटा पाते आदि प्रचलन बन गया हैं। हकीकत यह है कि आज के अधिकतर बच्‍चों में न अभिभावकों के प्रति सम्‍मान और श्रद्धा ही बचा है और न व्‍यस्‍कों के साथ प्रेम और सहयोग की भावना। नैतिकता का स्‍तर इतना नीचे गिरता जा रहा है कि अध्‍यापक और बाजार में बैठे दुकानदार उनके लिए समान है। कुछ शेष रहा है, तो फैशन, सिनेमा और मटर गस्‍ती का अन्‍त-हीन आलम।

मानसिक रूप से दोषपूर्ण, मानसिक रोग से ग्रसित, परिस्‍थितजन्‍य एवं सांस्‍कृतिक वातावरण के अतिरिक्‍त बालकों द्वारा किये गये अधिकांश अपराधों में से लगभग 2․3 प्रतिशत ही पुलिस और न्‍यायलय के ध्‍यान में आती है। बाल अपराधों का हम यदि आंकलन करें तो स्‍थानीय एवं स्‍पेशल विधियों के तहत 1998 में सबसे अधिक आबकारी एक्‍ट (23․9) और गेम्‍बलिंग एक्‍ट (4․6) के अर्न्‍तगत आते हैं। सन 1998 में 5 राज्‍यों महाराष्‍ट (21․6) मध्‍य प्रदेश (27․2) राजस्‍थान (8․5) बिहार (6․8) आन्‍ध्र- प्रदेश (8․0) में पूरे देश में आई․ पी․ सी․ के तहत स्‍कूल अपराधों में से 77 प्रतिशत हुए। बाल अपराध के मुख्‍य कारकों में गरीबी और अशिक्षा सबसे महत्वपूर्ण आयाम हैं। बाल अपराध की दरें लडकियों की अपेक्षा लडकों में अधिक पायी जाती है। बाल अपराध की दरें प्रारम्‍भ की किशोरवस्‍था 12-16 वर्ष में सबसे ऊँची है । बाल अपराध ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षा नगरों में अधिक है।

बाल अपराधियों को दिए जाने वाले दंड

कोर्ट यह मानता है कि इस उम्र के बच्चे अगर जल्दी बिगड़ते हैं और उन्हें अगर सुधारने का प्रयत्न किया जाए तो वह सुधर भी जल्दी जाते हैं। इसीलिए उन्हें किशोर न्यायसुरक्षा और देखभाल अधिनियम 2000 के तहत सजा दी जाती है। इस अधिनियम के अंतर्गत बाल अपराधियों को कोई भी सख्त या कठोर सजा ना देकर उनके मस्तिष्क को स्वच्छ करने का प्रयत्न किया जाता है। उन्हें तरह तरह की व्यायसायिक परीक्षण देकर आने वाले जीवन के लिए आत्म․निर्भर बनाने की भी कोशिश की जाती है, हालांकि सुधार गृह में भी उनके साथ कड़ा व्यवहार ही किया जाता है, लेकिन सिर्फ उतना जितना माता․पिता अपने बच्चों के साथ करते हैं।

किशोर न्यायसुरक्षा और देखभाल अधिनियम 2000 में किए गए संशोधन

सन 2006 में बाल․अपराधियों को सुधारने के उद्देश्य से बनाए गए अधिनियम में कुछ संशोधन किए गए जिसके अनुसार किसी भी बाल․अपराधी का नाम, पहचान या उसके निजी जानकारी सार्वजनिक करना एक दंडनीय अपराध माना जाएगा और ऐसा करने वाले को 25,000 रूपए तक का जुर्माना देना पड़ सकता हैंण्‍ इसके अलावा खंड 29 के अनुसार बाल․अपराधियों को सजा देने वाले पांच सदस्य समिति में कम से कम एक महिला भी शामिल होनी चाहिए।

हमारे देश में बाल अपराधियों की संख्या दिनों․दिन बढ़ती जा रही है खासतौर पर निम्न आर्थिक वर्ग से संबंधित वह बच्चे जो झुग्गी झोपड़ी में रहते हैं। वो इन अपराधों की चपेट में जल्दी आ जाते हैं, क्योंकि उनके माता․पिता दोनों ही मजदूरी करते हैं इसीलिए वह अपने बच्चे पर ध्यान नहीं दे पाते। लेकिन सिर्फ यह समझ लेना कि बाल․अपराध इसी वर्ग तक सीमित है तो यह कदाचित सही नहीं है। आंकड़ों की मानें तो पढ़े․लिखे और अच्छे स्कूल में जाने वाले बच्चे भी गलत क्रिया․कलापों में संलिप्त हो जाते हैं। जिसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह होता है कि उनके माता․पिता उन पर ध्यान ही नहीं देते। वह अपने जीवन में स्वयं इतने व्यस्त होते हैं कि उन्हें बच्चों की सुध․बुध ही नहीं रहती। हमें यह ध्यान रखना चाहिए आज के बच्चे ही कल का भविष्य हैं जिनके कंधों पर हमारे समाज की पूरी जिम्मेदारी है। अगर हमारी अनदेखी की वजह से यह कंधे कमजोर पड़ जाएंगे तो यह हमारे लिए कतई हितकारी नहीं होगा।

सुझाव-

आधुनिक जीवन शैली में भी इन मूल्‍यों को समायिक ढंग से समाहित करके अनेक गतिरोधों को समाप्‍त किया जा सकता है। गहरे अपनेपन के आधार अभिभावकों और बच्‍चों के बीच की दूरी और दरार को मिटाकर वर्तमान समस्‍याओं से उपजते बाल अपराध से निजात पाई जा सकती है। अतः हम बच्‍चों को उचित संस्‍कार देने व उनमें मानवीय मूल्‍यों का स्‍थापना करने के लिए सजग, सचेष्‍ट और सक्रिय होना होगा, तभी इस बिगडते बचपन और भटकते राष्‍ट्र के नव पीढी के कर्णधारों का भाग्‍य और भविष्‍य उज्‍जवल हो सकता है।

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रचनाकार: मोनिका का आलेख - बाल अपराध बिगडता बचपन भटकता राष्ट्र
मोनिका का आलेख - बाल अपराध बिगडता बचपन भटकता राष्ट्र
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