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सूरजपुरी की कविताएँ और गीत

 

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 याद के बादल.

(गीत)

हृदय-आकाश पर मेरे,

छितरकर छा गए बादल,

तुम्हारी याद के बादल. !

 

लरज के,साथ गरजन के,

बदरिया छा गई उर पे,

कि जैसे याद के पाहुन,

भटककर आ गए घर पे,

कि भूलों की सगाई,

याद से करवा गए बादल,

तुम्हारी याद के बादल !

 

घहरकर छा रही बदरी,

मिलन को कर रही इंगित,

तडपकर टूटती बिजुरी,

धडक कर मिल गए दो दिल,

कि बिजली की तडप से

दिल जुडाते आ गए बादल,

तुम्हारी याद के बादल !

 

घटा ने थाम ली ढपली,

कि बूंदे गा रही कजली,

“बिदेसिया पी नहीं आए”-

कोयलिया दर्द से बोली

तुम्हारे दर्द से रिश्ता,

बंधाते आ गए बादल,

तुम्हारी याद के बादल !

तुम्हारी याद, बीते पल

सजाकर इस तरह बैठी,

कि जैसे कोई बिरहन रात में

दियना जला बैठी,

तुम्हारी याद को बांधे,

उतारे जा रहे बादल,

तुम्हारी याद के बादल !

 

 

प्रीत के छन्द

अधर पर खिले

प्रीत के छन्द

मुस्कान बनकर

सजन अब कौन सी

व्यथा मन की

बेचैन हो रह गई मौन

पलकों की सेज पर

महक उठे सपने

एक याद बनकर

सजन अब कौन

टीस रह गई

गलहार बनकर

घटायें सावन की

पलकॊं मे सिमट रह गई

मूक बनकर

सजन अब कौन सी

व्यथा रह गई

प्यास बनकर

अलकॊं मे बांधकर

मलयज हौले से

शुन्य अब संसार हुआ

सजन अब कौन हार

हार कर रह गई

कण्ठहार बनकर

 

१७ कपसीले बादल

कांधो पर विवशताओं का बोझ

हथेली से चिपकी-

बेहिसाब बदनाम डिग्रियां

दिल पर आशंकाओं-कुशंकाओं के-

रेंगते जहरीले नाग

निस्तेज निगाहें

पीले पके आम की तरह लटकी सूरतें

और सूखी हड्डियों के ढाचों के-

गमलों मे बोई गईं

आशाओं की नयी-नयी कलमें

और पाँच हाथ के

कच्चे धागे मे लटके-झूलते -

कपसीले बादल

जो आश्वासनों की बौझार कर

तालियों की गडगडाहट के बाद

फिर एक लंबे अरसे के लिये

गायब हो जाते हैं

और कल्पनाओं का कल्पतरु

फ़लने-फ़ूलने के पहले ही

ठूंठ होकर रह जाता है

--

गीतकार-सूरजपुरी मु.मुलताई(बैतुल)म.प्र

प्रस्तुति : गोवर्धन यादव

103 कावेरी नगर ,छिन्दवाडा,म.प्र. ४८०००१
07162-246651,9424356400

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