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नियाज़ अहमद वाहिदी का ख़त सीताराम गुप्ता के नाम

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मोहतरम गुप्ता जी, तस्लीमात।
उम्मीद है आप मयमुतअल्लिक़ीन बख़ैरियत होंगे।
     मुझे ये जानकर बहुत ख़ुशी हुई कि आप मेरे वालिद जनाब ‘नुशूर’ वाहिदी की ग़ज़लों से दिलचस्पी रखते हैं। उनकी वफ़ात के बाद मैंने उनकी किताबों की इशाअत का सिलसिला जारी कर रखा हैं थोड़ा बहुत काम हुआ है और अभी बहुत कुछ करने को बाक़ी है। आप के लिए ‘नुशूर’ साहब की ग़ज़लों का एक इंतख़ाब ‘‘सिल्के-शबनम’’ भेज रहा हूँ जिसमें वो ग़ज़ल भी शामिल है जिसके लिए आप ने लिखा है।
     ख़त का जवाब दीजिएगा और अपने बारे में लिखिएगा ताकि हम लोग आपस में मुतआरिफ़ हो सकें क्योंकि नुशूरशनासों का मैं ख़ुद फैन हूँ। मेरी वालिदा साहिबा आपको दुआ लिखवाती हैं।
फ़क़त
मुख़्लिस
नियाज़ वाहिदी
30:11:94
ख़त में उल्लिखित ग़ज़ल का देवनागरी लिप्यंतरण निम्नलिखित है :

            ग़ज़ल

कभी सुनते हैं अक़्लो-होश की और कम भी पीते हैं,
कभी साक़ी की नज़रें  देखकर पैहम  भी  पीते  हैं।

ख़िज़ाँ  की फ़स्ल  हो  रोज़े के  अय्यामे-मुबारक हों,
तबीयत  लहर पर आई  तो  बेमौसम  भी  पीते  हैं।

तवाफ़े-काबा   बेकैफ़ियते-मय   हो  नहीं   सकता,
मिला लेते हैं  थोड़ी सी  अगर ज़मज़म भी  पीते हैं।

कहाँ  की  तौबा  कैसा  इत्तिका  अहदे-जवानी  में,
अगर समझो  तो आओ तुम भी चखो हम भी पीते हैं।

कहाँ  तुम  दोस्तों के  सामने  भी पी  नहीं  सकते,
कहाँ  हम  रूबरू-ए-नासेहो-बरहम  भी   पीते  हैं।

’नुशूर’ आलूदा-ए-इस्याँ सही  फिर  कौन  बाक़ी है,
ये बातें राज़ की हैं  क़िब्ला-ए-आलम  भी  पीते हैं।

                         - ‘नुशूर’ वाहिदी

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संकलन, लिप्यंतरण एवं प्रस्तुति :    
सीताराम गुप्ता


ए.डी.-106-सी, पीतमपुरा,
दिल्ली-110034
फोन नं. 011-27313679/9555622323
Email: srgupta54@yahoo.co.in

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