पुस्तक समीक्षा : 'एक बूँद शहद' - ये गीत

SHARE:

' एक बूँद शहद ' - ये गीत पिछली सदी के छठे-सातवें दशक में जब अज्ञेय और अज्ञेयवादियों ने नये युग-सन्दर्भ की दुहाई देकर गीत की संभाव...

'एक बूँद शहद' - ये गीत

पिछली सदी के छठे-सातवें दशक में जब अज्ञेय और अज्ञेयवादियों ने नये युग-सन्दर्भ की दुहाई देकर गीत की संभावनाओं को खारिज करते हुए उसे बर्तमान समय में अप्रासंगिक और अनुपयोगी घोषित किया और बाद में भी हठपूर्वक उसकी उपलब्धियों को नज़रन्दाज़ करने की साजिश करते रहे, तब किसने सोचा था कि एक दिन गीत की औरस सन्तान 'नवगीत' समय-संदर्भ को परिभाषित करने की वे अनूठी क्षमताएँ विकसित कर लेगा, जिनसे वह फ़िलवक्त के तेज़ी से बदलते क्षितिजों और आयामों को व्याख्यायित ही नहीं अपितु उन्हें नई अर्थवत्ता भी देने में सक्षम होगा। आज का नवगीत उन अर्थ-सामर्थ्यों का खोजी है, जिनसे वह भविष्य की कविता होने की संभावनाओं को प्राप्त कर सके।

इस समय नवगीत अपने चौथे आयाम में है और उसकी भावभूमि और कहन में जो इधर परिवर्तन आये हैं, उनकी सशक्त साखी देता है युवा नवगीतकवि मनोज जैन 'मधुर' का प्रवेश संकलन 'एक बूँद हम'। मनोज जैन 'मधुर' का नाम इधर एक दशक में उभर कर आये उन युवा कवियों में है, जिन्होंने नवगीत को अपने कृतित्त्व से समृद्ध-सम्पन्न किया है।

ईसवी सन २०११ यानी पिछले वर्ष आये इस नवगीत संग्रह में ५२ रचनाएँ हैं, जो अपने विशिष्ट कथ्य और अछूती कहन की दृष्टि से अधिकांश गीतकवियों के कृतित्त्व से पूरी तरह अलग है। पिछली सदी के मध्य के अमरीकी कवि राबर्ट लावेल और उसके अनुनानियों की 'स्वीकारोक्ति कविता' (कॉन्फेशन पोएट्री) की कहन-भंगिमा वाली ये कविताएँ फिलवक्त की तमाम चिंताओं से हमें रू-ब-रू करती हैं। इनमें प्रतीक-कथन, जो कभी नवगीत की एक प्रमुख पहचान रही थी, विरल ही है -संभवतः यह इधर की आम विशुद्ध यथार्थवादी दृष्टि के कारण है। अपनी बात को सीधे-सीधे स्पष्ट कहने की प्रवृत्ति आज की पीढ़ी की खासियत है। उसी कहन-शैली को अपने इन गीतों में मनोज जैन ने अपनाया है।

इस संग्रह का एक गीत है 'गीत मेरे', जिसमें कवि ने अपने और मिस से समूचे गीत-धर्म को यों परिभाषित किया है -

गीत मेरे कवि हृदय को / पाँव देते हैं

                 ...           ...             ...

गीत खुशियों के सुनहरे / गाँव देते हैं

                ...            ...            ...

भावना के सिंधु को हम / रोज़ मथते हैं

शब्द लय में बाँधकर हम / छंद रचते हैं

गीत दुख के पार जाकर / ठाँव देते हैं

यह जो गीत होने की मनस्थिति है, इसे पाने के लिए समग्र सृष्टि के संगीत से जुड़ने, उससे एकात्म होने की जो मौन साधना कवि को करनी होती है, उसका हवाला मनोज के इस गीत-अंश में बड़ी ही सक्षमता से बखूबी हुआ है -

गीत के तुमको / मिलेंगे ठाँव

साधना के सिंधु में / गोते लगाओ तो

कलरवों में लय घुली है / गीत, उड़ती तितलियों में

पवन, बदली, चाँद, सूरज / तार सप्तक बिजलियों में

जग उठेंगे गोपियों के गाँव

बाँसुरी कान्हा सरीखी / तुम बजाओ तो

संग्रह के तमाम गीत उनकी इस साधना के साक्षी हैं। कवि की यह साग्रह आस्तिक साधना आज के इस विषम-विकट नास्तिक समय में मौजूँ और नितांत लाज़िमी है। घर और परिवार से, आज तेजी से विखंडित होते उसके स्वरूप से परिचित कराते, उससे उपजे अनर्थों और अनर्गल होती सामाजिक संरचना की खबर देते कई गीत इस संग्रह में हैं। देखें एक गीत-अंश -

कुछ दिन पहले ही बदला है / घर मकान में

         ...         ...             ..

वैमनस्य के ठूंठे सबके / मन में फूट पड़े

बंटवारे के लिए सभी / गिद्धों से टूट पड़े

धीरे-धीरे बदल रही है / छत मचान में

मोती चुगने वाली दादी / तिनके चुनती है

         ...          ...         ...

नफरत चिन्ता चुभन निरन्तर / बढती जाती है

शंका अमरबेल सी ऊपर / चढती जाती है

युग भी कम पड़ता है / घर के समाधान में

संग्रह का 'हम जड़ों से कट गए' शीर्षक गीत हमारी आज की पदार्थिक भोगवादी दृष्टि से उपजे सामाजिक विपर्ययों की आख्या कहता है - 'जड़ों से कट' जाने की आज की स्थिति में 'प्यार वाली छाँव' गाँव में ही छूट गई है और 'थामने वाली जमीं हमसे / कहीं पर है खो गई', इसी वज़ह से 'भीड़ की खाता-बही में / कर्ज़ से हम पट गए'। 'खोखले आदर्श के...मुकुट धारण किए' आज का मनुष्य 'बेचकर सभ्यता के / कीमती गहने' जीने को अभिशप्त है। और गीत की अंतिम पंक्ति  'कद भले अपने बड़े हों / पर वज़न में घट गए' कहकर कवि ने आज के तथाकथित सभ्य मनुष्य के खोखलेपन को ही जैसे व्याख्यायित कर दिया है। मनोज जैन 'मधुर' ने इन गीतों में आज के विज्ञापनी समय में आम आदमी की विवशता और आर्थिक वैषम्य से उपजे उसके अभावग्रस्त होने के, निरर्थक होकर जीने के भाव को बड़ी ही शिद्दत से महसूसा है और उसे बड़ी ही सटीक अभिव्यक्ति भी दी है। आज उसके 'सिर के ऊपर / कुंठा की / तलवार' लगातार लटकती रहती है, 'मँहगाई की मार'(उसकी) कमर को जमकर तोड़ रही' है, उसकी 'नींदों में भी / विज्ञापन का / प्रेत उभरता है', जो 'लोहे को सोना. राई को / पर्वत करता है' और जिससे उपजती है 'इच्छा को बेबसी' बुलाने की बेबसी। ऐसे में 'मेहनत के क्षण / बाजारों की बलि चढ़ जाते हैं' और 'आशा बरबस पीड़ाओं के / घूँट गटकती' रह जाती है। मेरी राय में, यह गीत वर्तमान सभ्यता के आर्थिक-सामाजिक विकास के दंभ का बड़े ही सशक्त ढंग से खुलासा करता है और इस दृष्टि से यह संग्रह की एक उपलब्धि-रचना है।

संग्रह में ग्राम-संदर्भ के कई गीत हैं - उनमें गाँव कभी तो प्रतीक बनता है मनुष्य की खोई हुई परम्परागत अस्मिता का तो कहीं आज के आधुनिकीकरण को अपनाते और अपनी सहज आस्तिकता को खोते बदलते ग्राम्य परिवेश का। देखें निम्न गीत-अंश -

बहुत बुरे हालात हुए हैं / पुरखों वाले गाँव के

                          ...          ...          ...

चौपालों पर डटा हुआ है / विज्ञापन का प्रेत

धीरे-धीरे डूब रहे हैं / यहाँ कर्ज़ में खेत

बाँट रही घर-घर मँहगाई / पर्चे रोज़ तनाव के

आर्थिक विकास के साथ-साथ जो 'सड़कें लाईं जादू टोना', उससे 'शहर मदारी' के इशारों पर, उसके सम्मोहन में बँधे जीने को अभिशप्त हो गया है गाँव। हाँ, जिस गाँव-चौपाल में 'बाँची जाती थी रामायण / पावन साँझ-सकारे में', वहीं अब

नई फसल की आँखों में है / 'बॉलीवुड' की चाल

नहीं सुनाता बोध-कथाएँ / विक्रम का बेताल

टूट रहे हैं रिश्ते-नाते / यहाँ धूप से छाँव के

पंचायत राज के नाम से जो राजनीति ग्रामीण परिवेश में व्यापी है, उसका हवाला देते हुए कवि कहता है -

बदल गई है चौसर चाहे / पाँसे वही पुराने हैं

गंगू के घर पहले दुख था / सुख अब भी बेगाने हैं

मुखिया घर घर पूजा जाता / जैसे वह अवतारी है

हमारे देश में प्रजातंत्र के, विकास के नाम से जो प्रजा को ठगने का तन्त्र रचा गया है उसकी खबर देते हुए कवि कहता है

रथ विकास का / गाँव हमारे / आने वाला है

...            ...              ...

नेता फिर वादों की / फसल उगाने वाला है

...           ...            ...

लगे राम-सा किन्तु चरित / रावण का जीता हे

मृग की छल ओढ़ कर / घर में आता चीता है

मांस नोंचकर जन-जन / का वह खाने वाला है

और

किस कदर मिथ्याचरण / हमने लिए हैं ओढ़

...              ...              ...

मौन साधे एक युग से / सत्य कोने में पड़ा

पुज रहा पाखण्ड जग में / धर्म पर पहरा कड़ा

छल-कपट नेपथ्य में अब / कर रहे गठजोड़

ऐसे विकट मुखौटों वाले समय में कवि करे तो क्या करे? संग्रह के कई गीतों में इस प्रश्न से रूबरू हुआ है मनोज जैन का कवि। देखें तो ज़रा -

बेमानी की लाख दुहाई / देंगे जग वाले

सुनने से पहले जड़ लेना / कानों पर ताला

मुश्किल से दो चार मिलेंगे / तुझको लाखों में

करुणा तुझे दिखाई देगी / उनकी आँखों में

अपने दृग जल से तू उनके / पग को धोया कर

और इसी के साथ है एक सात्विक संकल्प -

समय चुनौती देगा तुझको / आकर लड़ने की

तभी मिलेंगी नई दिशायें / आगे बढने की

  ...        ...          ...

सबको सुख दे, दुनिया आगे / पीछे घूमेगी

मंजिल तेरे खुद चरणों को / आकर चूमेगी

कर्म-मथानी से सपनों को / रोज़ बिलोया कर

यही है सही अर्थों में मनुष्य होना और और इसके लिए चाहिए एक आस्थावान मानुषी संवेदना। वह कैसे हो, यह देखें इस गीत-अंश में -

तेरा जीवन नदिया की / धारा की लय है

किन्तु सफर में रोड़े मिलना भी तो तय है

समय एक छन्नी है / पहले सार और / थोथे को दफना

यही है वह आस्तिक कर्म-दृष्टि जो आज की अमानुषिक-पाशविक होती सभ्यता को बचा सकती है। 'कट जायेगी रात / सबेरा निश्चित आयेगा' - इसी भविष्य की संकल्पना एवं आस्था की स्थापना करता है कवि अंतत अपने इन गीतों के माध्यम से। जैन तीर्थंकर भाव मनोज जैन के कवि का सहज भाव है, मेरी राय में। एक होली गीत के माध्यम से कवि ने इसी आस्तिकता को वाणी दी है -

सारे रंज मलाल भुलाकर / होली आज मनाएँ

मन की थाली में रहीम ने भावों का रंग घोला

रंग लगाकर राम तोड़ता / बरसों का अनबोला

आओ मिलकर हम नफरत को / होली में सुलगाएँ

और ...

जीवन के इस इस युद्धक्षेत्र में / उखड़ी जिनकी साँसें

चलो पोंछने आँसू उनके / नम हैं जिनकी आँखें

सम्बल के रंग भर आँखों में / चलकर धीर बँधाएँ

समग्रतः यह संग्रह हमें रूबरू करता है आज के समय से, उसकी चिंताओं एवं अनास्थाओं से एवं उसके तमाम छल-प्रपंचों से, किन्तु साथ ही यह हमें एक दिशा-निर्देश एवं भविष्य-दृष्टि भी देता है। कहन की आज की शैली एवं भंगिमा का परिचय देता यह संग्रह संकेतक है कवि मनोज के उस मनोजगत का, जिसमें उनकी रचनाधर्मिता गीत को नये-नये आयाम देने को समुत्सुक है। प्रभु उनके सात्विक संकल्पों को और-और क्षितिज दे, इन गीतों की दस्तकें सुदूर समय तक सुनी जाती रहें और उनकी गीतधर्मिता निरंतर यों ही सक्रिय रहे, यही हार्दिक शुभकामना है मेरी इस युवा कवि के लिए।

क्षितिज ३१० अर्बन एस्टेट -२ हिसार -१२५००५

मो. ०९४१६९-९३२६४ - कुमार रवीन्द्र

ई-मेल : kumrravindra310@gmail.com

‘'सप्तराग'’ –

यानी यह सात सुरों का सरगम

'अँजुरी में आस लिये दिन' के सुर

'धरती, पेड़, पहाड़ी, अम्बर' के गायन

'बोधि वृक्ष पर जमे (हुए) बैताल' दिखे

'बूढ़ी इमली की अपराजित चीख' मिली

'नेह गंग का गोमुख रीता'-पीर उसी की

'ग्यारह दोहा पाँच सोरठा दस चौपाई'  

'शब्दों की निष्ठा अकुलानी' 

मधुर-प्रभात-अर्चन-मयंक-दिवाकर-बंधु-विकल की / ने साधी

यह गीतों के सात सुरों वाली है वंशी

-- कुमार रवीन्द्र

गीत और नवगीत के बीच जो एक घनिष्ठ रिश्ता है और उनके बीच जो एक सूक्ष्म विभाजन रेखा है, उनकी साखी देता संग्रह है यह भोपाल नगरी की गीत-अस्मिता का सात सुरों वाला समवेत संकलन -'सप्तराग'। गीत की विविध भंगिमाएँ इस संकलन के माध्यम से हमारे सामने प्रस्तुत हुई हैं - कुछ पूरी तरह नवगीत की आग्रही हैं तो कुछ नवगीत की परिधि को छूते हुए भी गीत की पारम्परिक कहन की बानगी देती हैं। वैसे इसमें उपस्थित सभी रचनाकार कहीं-न-कहीं किसी-न-किसी रूप में नवगीत की नई मुद्राओं से परिचित हैं और उन्हें अपनाने को सचेष्ट भी दिखते हैं। यही इस संकलन की विशिष्टता है। मेरी राय में, 'सप्तराग' आज की हिंदी कविता में गीत-नवगीत की सशक्त भूमिका को पूरी शिद्दत से रेखायित करता है। इसका संयोजन-सम्पादन-मुद्रण जिस मनोयोग एवं त्रुटिविहीन कौशल से किया गया है, वह भी साधुवाद का हक़दार है।

क्षितिज ३१० अर्बन एस्टेट -२ हिसार -१२५००५

मो. ०९४१६९-९३२६४ कुमार रवीन्द्र

ई-मेल : kumrravindra310@gmail.com

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: पुस्तक समीक्षा : 'एक बूँद शहद' - ये गीत
पुस्तक समीक्षा : 'एक बूँद शहद' - ये गीत
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2012/06/blog-post_8982.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2012/06/blog-post_8982.html
true
15182217
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content