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विजेंद्र शर्मा की जसपाल भट्टी को समर्पित एक नज़्म......

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जसपाल भट्टी को समर्पित एक नज़्म......

ज़रुरत

ज़मीं के बदतर हालात देख

कभी – कभी उपरवाला भी

हो जाता है ग़मज़दा..

उसे भी लगता है

कोई उसे हँसाए

कोई उसे गुदगुदाए

और हँसने की फ़िक्र में

वो झांकता है

आसमां से ज़मीं पर

उसकी तलाश ख़त्म हो जाती है

उस शख्स पे जाकर

जो मुसलसल कहकहे बाँट रहा है

बुझे हुए चेहरों को नुस्खे बता रहा है

खिलखिलाने के, ज़िंदगी जीने के

यकबयक ...

एक आवाज़ आती है

चलो , हमे तुम्हारी ज़रुरत है

बहुत ठहाके हो गए यहाँ

और फिर ..

बिना सोचे वो मसखरा

सबको हँसाते-हँसाते

रुलाकर चल देता है

उसको हँसाने

जिसके पास निज़ाम है

सबको रुलाने का ...

सबको हँसाने का ...

अब इस तसल्ली के सिवा

कोई चारा भी तो नहीं है

कि

उस मसखरे की ज़रूरत

हमे नहीं

आसमानों को ज़ियादा है .....

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विजेंद्र शर्मा

Vijendra.vijen@gmail.com

2 टिप्पणियाँ

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