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कोणिक दोषी की कविता - आतंकवाद की सालगिरह

आती है आतंकवाद की सलगिरह,

शहीदों की मृत्यु जयन्ती आती है -

जब नवम्बर की छ्ब्बीसवीं तारीख आती है /

त्राहिमाम की आवाज से गूंज उठ था भारतवर्ष /

बम्ब के विस्फोटों ने हिला दी थी सत्य और अहिंसा की दीवारें /

भारत माँ ने न जाने खोई थी कितनी संतानें /

द्रवित हो जाता है दिल ,

आँखों से नीर बहता है -

जब छब्बीस नवम्बर का वो दृश्य यादों में तैरता है /

ताज होटल ,नरीमन हाऊस ,पर्यटन स्थल नहीं

श्मशान बन गए थे /

यहाँ पर आतंकवाद के नए पताके गढ़ गए थे /

मिटा दिया हमने कसाब को/

कसाबियत नहीं मिटा पाए /

अब भी घूम रहे हैं कई कसाब आजाद

उन्हें हम अब तक सजा नहीं दे पाए /

सोचता हूँ- क्या ये सिर्फ छब्बीस नवम्बर को ही होता है ?

अरे! ये तो वो हर उस दिन होता है जब भारत का कोई बच्चा भूखा सोता है /

आज गरीबी, भ्रष्टाचार और आतंकवाद ने भारत माँ को रुलाया है /

फिर क्यू हमारे उसूलों को हमने अब तक सुलाया है ?

वो हर दिन जब हमारा रूपया डॉलर के आगे छोटा पड़ जाता है,

वो हर दिन जब कोई किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाता है ,

जब जला दी जाती है कोई दुल्हन दहेज़ की आग में ,

गोटालों की बम्बारी से जब हमारी नैतिकता को रौंदा जाता है -

वो हर दिन नवम्बर की छब्बीसवीं तारीख बन जाता है /

हर उस दिन छब्बीस नवम्बर की उसी घटना को फिर से दोहराया जाता है /

कुछ ही समय में हम जनसंख्या में

चीन से भी आगे पहुँच जाएँगे /

अधिकतम जनसंख्या वाला देश कहलाएँगे /

कभी सोचा है- क्या खाएँगे और क्या खिलाएँगे?

इतिहास कहता है- भारत सोने की चिड़िया था

इसका हर एक पंख सुनहरा था /

मैं तो कहता हूँ -भारत अब भी सुनहरा है

सोने की चिड़िया है /

लेकिन नोच दिए हैं उसके पंख

भर दिया उन पंखों को काले धन के नालों में

क्यों .........?

क्यों हर तारीख छब्बीस नवम्बर बना दी जाती है ?

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