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बच्चन पाठक 'सलिल' की कविता - बांस की चुनौती

बांस की चुनौती


           -- डॉ बच्चन पाठक 'सलिल'

बांस ने चन्दन को निहारा
चन्दन उसे उपेक्षा पूर्ण दृष्टि से देख रहा था
और इतरा रहा था अपने सौभाग्य पर ।
बांस ने किंचित आवेश में  पर संयमित ढंग से कहा
बंधु , क्यों व्यर्थ में इतरा रहे हो ?
अपनी उपेक्षा से मुझे क्यों भरमा रहे हो ?
तुम्हारे साथ रहने वाले सभी काष्ठ
थोड़ी देर के लिए सुगन्धित बन जाते हैं
पर हटने पर पूर्ववत हो जाते हैं ।
मैंने कभी नहीं लिया तुम्हारे सौरभ का एक भी कण
अपनी साधना में, गाँठ वाली देह लिए
लोक सेवा के लिए तड़पता रहा हर क्षण ।
मैं लोक के साथ रहा
देवों के  ललाट पर चढ़ने की नहीं रही चाह ,
मैं चलता रहा अपनी राह
मैं वैवाहिक मंडप का बांस हूँ ,
मैं अरथी का बांस हूँ
मैं लाठी बन अशक्तों की सेवा करता
मैं गरीब की झोपड़ी का बांस हूँ
मैं कुर्सी के रूप में आसन बनता हूँ
डंडा बन कर शासन चलाता हूँ
प्रभु ने दिए हैं मुझे विविध रूप
मैं हूँ लोक जीवन के लिए वरदान स्वरुप
चन्दन लजाया
उसने बांस को शीश झुकाया ।
पता -- जमशेदपुर  
        झारखण्ड
फोन 0657/2370892

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