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देवी नागरानी की लघुकथा - आदेश

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51. उदेश्य और आदेश (लघुकथा)

पिता के गुज़र जाने की खबर सुनकर बेटा विदेश से भारत आया, और विद्धि अनुसार पिता के अंतिम दाह-संस्कार संपूर्णता से अर्जित किए। पंद्रह दिन के बाद विदेश लौटते वक़्त उसने उसने माँ के पाँव छूटे हुए विदा ली, यह कहते हुए कि वह पिता की पुण्य-तिथि के लिए साल के बाद लौट आएगा और तब तक वह मास मच्छी नहीं खाएगा।

समय बीता, ग्यारह महीने होने को आए। फोन पर बात कराते हुए एक दिन माँ ने कहा-“बेटा अब मेरी भी उम्र ढल रही है, जाने कब जीवन कि आख़री शाम ......!”

“माँ ऐसा तो बिलकुल मत कहो।“ बेटे ने बीच में बात काटते हुए कहा। “यह तो मुझपर ज़ुल्म होगा। अभी तो पिता को एक वर्ष पूरा होने को है। मैं जैसे तैसे घास फूस पर गुज़ारा कर रहा हूँ। तुम तो अब कुछ साल रुक जाओ।“

देवी नगरानी पता: ९-डी॰ कॉर्नर व्यू सोसाइटी, १५/ ३३ रोड, बांद्रा , मुंबई ४०००५० फ़ोन:

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