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मनोज 'आजिज़' की नज़्म - चाहत

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मनोज 'आजिज़' की नज़्म
चाहत
     --- मनोज 'आजिज़'
गुलदानों की खूबसूरती
आँखों को रौशनी देती है
दिल को सुकूँ पहुंचाती है
और चाहत होती है
हर शख्श कुछ ऐसा ही खिले।
पर ये मंजर कहाँ !
सपने तो अक्सर बिखरते हैं,
अरमान अक्सर टूटता है
रंज
हर नब्ज़ को थाम बैठा है
जैसे लोहे में जंग
ऐसा हो--
हर शख्श लब पे
हंसी का गुल खिलाले
और
चेहरे को गुलदान ;
रौशन हो हर आँख
हर दिल में सुकूँ कायम हो ।

कविता 911112504750228490

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