राजीव कुमार रावत की श्रद्धांजलि - और जॉन नहीं रहा!

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14 दिसंबर 2012 श्रद्धांजलि और जॉन नहीं रहा.........। मैं इस समय बड़ी ही कष्ट की स्थिति से गुजर रहा हूं, आंखों से आंसू रुक नहीं पा रहे हैं,...

डॉ.राजीव कुमार रावत (Mobile)

14 दिसंबर 2012

श्रद्धांजलि

और जॉन नहीं रहा.........। मैं इस समय बड़ी ही कष्ट की स्थिति से गुजर रहा हूं, आंखों से आंसू रुक नहीं पा रहे हैं, ह्दय भरा हुआ है गला रुंधा हुआ है क्योंकि मैं देख के आ रहा हूं कि हां अब जॉन नहीं रहा।

यह कोई 4 या 5 दिसंबर 2012 की सर्दी की रात थी, हमारे बैड रुम की खिड़की से एक पिल्ले की आवाजें एवं करुण पुकार बार बार नींद उखाड़ रही थी। अनू-मनू दोनों ही अपने प्री बोर्ड की तैयारियां कर रहे थे और शायद थोडीं ही देर पहले सोए थे, इसलिए शायद जग नहीं पाए लेकिन बार बार आती आवाजें मेरे कोमल मन को कचोट रही थीं और मैं सो नहीं पा रहा था। हमारे मुहल्ले में करीब एक महीने पहले ही काली कुतिया ने छह पिल्ले दिए थे, जिन्हें कि मां शाम से ही नाली में छिपा लेती थी इसलिए बार बार मन में यह आता कि यह कोई नया पिल्ला है जो कहीं से आ गया है रास्ता भूलकर या मुहल्ले के छह में से ही कोई एक है जो मां और सहोदरों से विछड़ गया है। दीपू से कहा कि चलो नीचे चलकर देखते हैं किंतु वह दुनियादारी की समझदारी में मना करने लगी कि रहने दो कुतिया काट लेगी। एक बार फिर सोने की कोशिस की लेकिन असफल, विल्कुल ऐसा लगता था जैसे वह मेरे सिरहाने पुकार रहा है, उसकी आबाज में करुणा बालकपन की घवड़ाहट, अपनों से विछड़ने का दर्द और ठंड की कपकपाहट मिली हुई होने से बहुत ही मार्मिक हूक सी थी और मुझसे रहा नहीं गया, उठा तो दीपू भी पीछे पीछे चली आईं। नीचे जाकर देखा तो वह अपने मुहल्ले का नहीं था, हल्के लाल भूरे रंग का बमुश्किल एक माह का वह श्वानशिशु बियावान सड़कों पर इधर से उधर मां की तलाश में विलख रहा था और उसकी आवाज मुझे तीसरी मंजिल की खिड़की में से भी ऐसे लग रहीं थी जैसे विल्कुल बराबर में से ही आ रही हो।

मां की ममता मां ही जानती है, दीपू ब्रेड लेती हुई नीचे आई थी। उसे ब्रेड के टुकड़े दिए पर वह अबोध अभी ठोस आहार लेना नहीं जानता था कुछ सूंघकर कुछ कुतर कर वह सानिध्य पाकर थोड़ा सा आश्वश्त हुआ तो उसकी पुकार कम हुई। हम दोनों को ही अपने अनु-मनु का बचपन याद आ गया, प्यार से पुचकार कर उसे अखबार में लपेटा-एक सुखद सा अहसास उस प्यारे से जीव को हाथों में लेने से मुझे हुआ और उसे भी स्पर्श सुख से शायद थोड़ी राहत मिली और वह चुप होकर मूक आंखों से अपनी करुण कहानी सुनाने की कोशिश करने लगा। हमने उसे गैरेज के अंदर कर अखबार लगा दिया, ठंड की कपकपाहट में कुछ कमी होने से वह थोड़ा सा शांत हुआ और हम लोग ऊपर आ गए। परंतु यह क्या थोड़ी देर बाद फिर वही करुण पुकार- वह गैरेज से निकल आया था- गेट और दीवार के बीच में काफी अंतर था और फिर वह अपनी मां की तलाश में सड़कों पर रोता घूम रहा था-कुछ देर में आवाजें कुछ कम होने लगीं और हम पता नहीं कब सो गए।

सुवह बच्चों को रात की कहानी बताई तो कौतुहूलवश जीव जंतु प्रेमी अनु नीचे जाकर मुआयना करके आया और बताया कि नीचे वाले तमल साहब के गार्डन मे खाद के बोरे पर उसे थोड़ी सी गर्माहट मिली होगी और वहां उस शिशु ने खुले आसमान के नीचे जीवन के लिए संघर्ष करते हुए रात बिताई है और यह उसके जीवन की पहली जीत थी जब उसने ऊंघते हुए उगते हुए सूरज की ओर देखते हुए रात के भयावह कष्टों की स्मृतियों को छटकते हुए एक जोर दार अंगड़ाई ली- हम सबने बालकोनी से इस दृश्य का आनंद लिया और जीव की जीवनी शक्ति को सलाम किया। अनु ने हल्दीराम के रसगुल्ले के खाली डिब्बे में उसके लिए दूध ब्रेड का इंतजाम किया, गैरेज से एक खाली बोरी निकाली गई और बिल्डिंग में नीचे वाले मेन गेट के कोने में उसका आशियाना बनाया गया। दिन भर वह आनंद में रहा, थोड़ा खेला कूदा, कुछ कोशिस उसने मुहल्ले वाले अन्य छह खानदानियों से मिलने जुलने की भी की और मां के विरोध के बाबजूद भी वह उनमें सातवें के रुप में शामिल हो गया क्यों कि बच्चों में अपना पराया नहीं होता वह तो बड़ों की ही विशेषता और चालाकी होती है और एक रात उसने काली कुतिया का दूध पीते हुए नाली में काटी, शायद कुतिया पहचान नहीं पाई अथवा उस मां को इस मां से बिछड़े पर कुछ प्यार आ गया। सर्दी कितनी ही क्यों न हो पर बरात में स्कूल के फर्श पर बिछे हुए धान की सूखी डंडियों (ब्रज भाषा में उसे पियार कहते हैं) पर सब बराती अपनी-अपनी लोई, कंबल लेकर सुबह के कलेऊ की चाहत में बीडीं चिलम फूंकते हुए रात आनंद से काट ही लेते हैं, और बरातियों की संख्या से तापमान कम ज्यादा महसूस होता है- ऐसे ही इन सातों ने मिलकर रात काटी होगी और फिर मां की गोद का आगोश- स्वर्ग सा देवलोक भी फीका होता है ।

अगले दिन पता नहीं इन दूर के जाति विरादरी वालों में क्या अनबन हुई, वह फिर अपने विछौने पर आ जमा और उस गैंग में जाने की साफ मना कर दी। अनू-मनू ने उसके खान पान का पूरा ध्यान रखना चालू किया, हमारे यहां रोज पढ़ी लिखी नौकरी वाली महिलाओं के घर की तरह ब्रेड आने लगीं और वह श्वानशिशु परिवार का एक अभिन्न अंग बनता चला गया। बैसे तो पिछले एक माह से घर के आटे का खर्च लगभग आधा और बढ़ गया है क्योंकि जब भी मौका लगता है अनु कटोरदान से निकाल कर कुतिया और उसके नौनिहालों की यथासंभव क्षुधापूर्ति का प्रयास करता है और इस दयालुता में कभी कभी उसे पारिवारिक क्रूरता का भी सामना करना पड़ता है किंतु निश्चित ही इसका इन जीवों से कुछ नाता है जैसा हम सभी भाई बहनों का गंगो नाम की गाय से था जिसका दूध हम सभी भाई-बहनों ने पिया और जिसे हमने सदैव मां ही माना था। पिछले कुछ दिनों से हमारे यहां से मुहल्ले के 6, जान को मिलाकर 7 और अचानक दो दिन के लिए 4 पिल्ले और कहां से आ गए उसी वय और कद काठीं के- का यथाशक्ति पालन प्रभु करा रहा है- बचपन की यादें ऐसा कराती हैं जब दादी गांव में किसी भी ब्याही कुतिया के लिए फूटी गागर के ऊपर के मुंह को तोड़कर एक पात्र बनाकर उसमें लपसी बनाकर देती थी और साथ भी हिदायत कि बहुत ध्यान से जाना जनानी है बहुत भूंख दौड़ रही होगी, काट ना खाए और हम बड़ी सावधानी से किसी लढ़ामनी में या भुस की भुरजी में ब्याही कुतिया को लपसी देकर लक्ष्य भेदने के गर्व के साथ लौटते थे और रात को अघियाने पर बड़ों के बीच मौका तलाशते थे कि कब इस वीरगाथा का श्रवण लाभ सभी को कराया जाए।

अब यह दैनिक नियम बन गया था दो तीन दिन से कि जब हम सुवह टहलने जाते, वह हमारे पीछे पीछे चलता, हम रुकते वह अंगड़ाई लेकर मांशपेशियों को खींचता-आराम देता और दिशा मैदान को जाता, हम कहते चला जा किंतु नहीं मानता फिर अनू-मनू को आवाज देकर बुलाना पड़ता, वह वहां से दूध ब्रेड लेकर आता, उसे फुसलाता तब वह रुकता और हम घूमने जा पाते। दिन भर में जब भी हम ऊपर से नीचे उतरते अथवा कहीं से लौटते उसे अपने स्थान पर पाते, अपनी भाषा में वह स्वागत करता, प्रसन्नता व्यक्त करता, धीरे धीरे वह हमें और हम सब उसे समझने लगे थे। बिल्डिंग के ही एक मित्र ने उसके लिए एक वस्त्र की व्यवस्था कर दी थी और एक अन्य पात्र में मुड़ी सेवन कराया था जिसका वह आनंद लेता था, पर उसे विशेष सुख दूध ब्रेड और बिस्किट से ही आता था जो कि अनू मनू उसे दे जाते थे। दिन में वह थोडी देर के लिए बाहर निकलता और थोड़ा सा राजा बेटे की तरह खेल कर वापस आजाता था। अभी परसों ही अनू कह रहा था कि अब तो इसका थोड़ा सा पेट निकल आया है, दीपू ने उसका नामकरण जॉन कर दिया- आखिर सारे उपक्रम के पीछे अन्नपूर्णा तो वही थीं, अपने कमजोर स्वास्थ्य के बावजूद भी रोटी बनाना और सुख मिश्रित दुखानंद में भी जो विशेष संतोष आता है वह उन्हें मिलता है- बड़बड़ाती भी जाती हैं और स्वादिष्ट भोजन भी बनाती हैं और उसमें कुछ मात्रा जॉन के लिए और अन्य खानदानियों के लिए भी बढने से उनके श्रम एवं कारोबार में वृद्धि हुई है लेकिन प्रभु का विशेष आशीर्वाद है कि उसने ऐसा कोई अवसर हमें दिया है और अब यह रुटीन बन गया है।

आज सुवह दीपू लेट हो जाने के कारण घूमने नहीं गईं, मैं अकेला ही गया, नीचे उतरा जॉन तैनात था गेट पर, बाहर निकलते ही उसने दुआ सलाम की, मेरे साथ थोड़ी देर घास की ओर टहला, फ्रैश हुआ और पीछे पीछे चलने लगा, मैं चकमा देकर दूसरी बिल्डिंग की ओर ले गया, बालक ही तो है वहां से एक बच्चा केन्द्रीय विद्यालय की पोशाक पहनकर स्कूल जाने की तैयारी में था, उसे देखकर वह थोड़ा ठिठक गया तो मैं चुपके से भाग लिया, पीछे मुड़कर देखा तो वह थोड़ा घवड़ाया हुआ एक दूसरी गैरेज में देख रहा था, तब तक अनू दूध ब्रेड लेकर आ गया मैंने प्यार से उसे आवाज दी वह खुश होते हुए दौड़ कर आया और नाश्ता करने लगा। इस समय वह दौड़कर आता हुआ इतना प्यारा लग रहा था जैसे बचपन में बच्चा थोड़ा पीछे रह जाता है और मां बाप आगे निकल जाते हैं और फिर बच्चा दौड़कर उन तक पहुंचता है बहुत सारे भावों के मिश्रण की उसकी प्रतिक्रिया होती है उलाहने की, मिलन की, दौड़ कर कुछ हासिल करने की उपलब्धि पर प्रोत्साहन पाने की और अपने दौड़ने की शक्ति के भरोसे की, अकेलेपन से जीत लेने की और एकाकीपन की घवड़ाहट से उपजी हार को हरा देने की प्रफुल्लता से युक्त उसकी वह छवि इतनी जल्दी मेरे करुण क्रंदन में बदल जाएगी, मुझे नहीं पता था। शायद इसी को - सुनहुं भरत भावी प्रबल विलखि कहेउ मुनिनाथ-हानि लाभ जीवन मरण यश अपयश विधि हाथ, कहते है।

मैं आज कुछ ज्यादा ही लंबा टहलने निकल गया, दो घंटे में लौटा लगभग 7-8 किमी की सैर करके जब मैं बापस आया तो वह मुझे अपने आसन पर विराजमान प्राप्त हुआ, सामान्य सी हलो हाय हुई, पर उसने अलसाते हुए बस यह देखा भर कि हां मैं हूं, मैं मन ही मन यह कहता हुआ कि पता नहीं किस जन्म का संबंध है- सीढिया चढ़ गया मन में आया कि देखूं उसका डिब्बा खाली तो नहीं है परंतु यह सोचकर कि अभी सुवह तो अनू ने दिया ही है, मैं ऊपर चला गया। पिछले एक हफ्ते से ससुरजी (दीपू के पिताजी) की तबियत काफी खराब चल रही है और वे तीन दिन से आगरा में अपस्ताल में भर्ती है ,दीपू से उन चर्चाओं को करते हुए नहाया धोया, पूजा पाठ किया, आगरा सालेसाहब मुकेश से बाबूजी का हाल चाल पूछा- थोडा ठीक हो रहे हैं- सूचना मिली। मैं हैलमेट और बैग लेकर नीचे उतर आया। दरवाजे पर जॉन नहीं था, मैं थोड़ा निश्चिंत हुआ कि चलो पीछे-पीछे नहीं आएगा, पर पता नहीं क्यों मन उसे देखने को कर रहा था कि कहीं खेलता हुआ दिख जाए, मोटर साइकिल स्टार्ट की तो वह सामने सड़क पर धूप में पसरा हुआ था, देखकर चैन मिला, सोचा इसके पास से ही निकलूंगा क्योंकि पीछे की ओर एक कार खड़ी थी, मैंने मोटर साइकिल उसके पास के लिए आगे बढ़ाई। मोटर साइकिल को आता देखकर भी उसने कोई हलचल नहीं की तो मन में आया कि बड़ी मस्ती में है सुवह की धूप का आनंद ले रहा है लेकिन जैसे ही मैं उसके नजदीक पहुंचा मैने उसे सुन्न पड़ा देखा और उसके मुहं से गाढ़ा-गाढ़ा खून सड़क पर विखर कर जमा हुआ था, शायद ऑफिस जाने वाले किसी की कार के पहिए के नीचे आने से वह शिशु अनायास ही काल कवलित हो गया।

मेरे होश उड़ गए, मोटर साइकिल किनारे कर मैं उसे बहुत देर तक देखता रहा हूं, मेरे आंसू नहीं रुक रहे, सोचा एक बार ऊपर वापस जाकर दीपू को बुला कर लाऊं पर फिर लगा कि वह वेचारी इस दृश्य को नहीं देख पाएगी क्योंकि एक तो यह बाल मृत्यु, वह भी इतनी वीभत्स कि जिस को अभी थोड़ी देर पहले ही कुछ खिलाया था उसके मुंह से रक्तस्राव वह नहीं देख पाएंगी और दूसरे अपने पिता की बीमारी की स्थिति में इस हिला देने वाली वाल मृत्यु के सदमे को माइग्रेन,बीपी का कमजोर मरीज पता नहीं कैसे सहेगा- यह सोचकर मैं ऊपर नहीं गया। ज्यादा देर वहां टिक भी नहीं सकता था, आस-पड़ोस की महिलाएं खिड़की से झांकने लगतीं और मैं उनके किसी के सामने रोता हुआ नहीं दिखना चाहता था,. बमुश्किल मोटर साइकिल चलाता हुआ, उस प्यारे से शिशु के सानिध्य के कोमल पलों की स्मृतियां रह रह कर कचोट रही थीं, बड़े ही भारी मन से सैनिटरी सैक्शन में गया, राव साहब से कहानी कही कि उस शरीर को वहां से हटवाएं, उन्होंने तभी किसी को मोबाइल पर फोन किया और अभी पता किया है कि उस शरीर को वहां से हटा दिया गया है। कल्पना से एक गिलास पानी लिया, बाहर गैलरी में जाकर गायत्री मंत्र बोलते हुए उसकी आत्मा की शांति के लिए पांच बार गायत्री मंत्र पढते हुए उसे जल तर्पण किया है, बाथरुम में जाकर कुल्ला कर शुद्धि हेतु जल छिड़क कर आया हूं, मन बहुत उदास है और याद आ रहा है ओ नन्हे से फरिश्ते तुझसे था क्या नाता ? अब मैं दोपहर को घर जाऊंगा तो वह दौड़ा दौड़ा नहीं आएगा, मैं अनू को आवाज नहीं लगाऊंगा कि इसे दूध ब्रेड दो......... और रात को कोई कूं कूं नहीं करेगा और हमें अहसास दिलाएगा कि जॉन नहीं रहा ।

दोपहर में घर गया- अनू मनु स्कूल से आ चुके थे, और पिल्ले को नीचे न पाकर मां से पूछा था मां पिल्ला कहां हैं, क्योंकि मैं सुवह कुछ भी बता के नहीं आया था तो उसने कह दिया कि कहीं खेल रहा होगा। मेरे घर में घुसते ही उसने मुझसे भी वही सवाल कर दिया और मैं उन मासूमों से झूंठ नहीं बोल पाया और रो पड़ा। बच्चे भी दुखी हो गए, रो दिए, कुछ अंट शंट गाड़ी वालों को कहा परंतु क्या कर सकते थे। पत्नी दूसरे कमरे में थीं उन्होंने अपने पिता की आशंका समझी और बदहवास सी हो गईं और कष्ट में सहभागी बन गई किंतु काफी देर बाद जब यह पता चला कि बच्चों के नानाजी नहीं अपने जॉन के लिए आंखें सजल हैं तो एक ओर राहत की सांस ली लेकिन उस अबोध के लिए संवेदनाओं से उनके आंसू भी रुके नहीं. बस दुख का कारण भर बदल गया। हम सबने प्रार्थन की कि भगवान उसकी आत्मा को शांति दे-ऐसी प्रार्थना है और सब गाड़ी वालों से निवेदन है कि सड़क पर घूमते किसी भी कूकरसुत को देखकर सोचें कि इससे किसी परिवार की संवेदनाएं जुड़ी हो सकती हैं, अतः गाड़ी ध्यान से चलाएं. काश.. मैं जब घर पहुंचूं तो जॉन कहीं से पूछ हिलाता हुआ आ जाए... पर नहीं आएगा, मुझे ही समझना पड़ेगा कि उससे हमारा यही कोई 6-7 दिन का नाता था जिसमें उसने जगह बनाई और एक खालीपन छोड गया --------- और अब जॉन नहीं रहा।

(पात्र परिचय- दीपू- पत्नी, अनु मनु –जुडंवा पुत्र, कल्पना – कार्यालय परिचर)

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डॉ. राजीव कुमार रावत,हिंदी अधिकारी

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान खड़गपुर-721302

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. 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तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया 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रचनाकार: राजीव कुमार रावत की श्रद्धांजलि - और जॉन नहीं रहा!
राजीव कुमार रावत की श्रद्धांजलि - और जॉन नहीं रहा!
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