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रमा शंकर शुक्ल की कविता - दिल में तांडव

 

"दिल में तांडव" की ताजा कड़ी
7-1-13
डा0 रमा शंकर शुक्ल
बोधिवृक्ष कटे हुए हैं, दिल में भाव मरे हुए हैं
मंदिर-घाटो की थाती पर माननीय के घर खड़े हुए हैं
अखबारों में प्याऊँ की ख़बरें,नेता देकर बड़े हुए हैं
और टिकट के दावे में, ले गुर्गों को अड़े हुए हैं
इन बेर के वृक्षों से किस परिवर्तन की उम्मीद करूं
इनके कांटो से आये दिन राहगीर का खून निकलता है
मेरे दिल में प्रीत नहीं एक तांडव चलता है।

पूछो इनसे किस बिरते पर ये नायक का दंभ भरे हैं
किस पीड़ा का आंसू पोछे, हाँ जख्म जरूर हरे हैं
ह्रदय विदारक मौतों पर भी सहयोग राशि जो हडपा हो
जिनकी हबस कहानी पर कलुआ कतरा-कतरा तडपा हो
फिर मंचों पर धन के बूते यशोगान, माला अभिनन्दन
धन्य लोकतंत्र धिक्कार तुम्हें, जो यह सब सहता है।
मेरे दिल में प्रीत नहीं एक तांडव चलता है।

देखा है न्यायालय में कैसे न्याय बिका करता है
न्याय देव का प्रमुख पुजारी पेशगी ले धरता है
जिला-जवार से दिल्ली तक अनगिन तो न्यायालय हैं
कुछ में मंदिर की आभा तो कुछ ज्यूं मदिरालय हैं
सच एक पर निर्णय कितने, परत दर परत उलझे हैं
दो बिस्वा पर जीवन भर कलुवा एक मुकदमा लड़ता है
मेरे दिल में प्रीत नहीं एक तांडव चलता है।

श्वेत सत्य पर काला कपड़ा, क्या सच पर पहरेदारी है?
निर्दोषों को यदि दंड मिला तो यह किसकी जिम्मेदारी है?
रोटी-धोती की चोरी पर आम आदमी को कारागार मिला
और बलात्कारियों को संसद में माननीय का सम्मान मिला
यक्ष प्रश्न ले खडा हुआ हूँ, इसका उत्तर देगा कौन
इस प्रश्न पर क्यों तंत्र हमारा मौन खड़ा मिलता है
मेरे दिल में प्रीत नहीं एक तांडव चलता है।


सपना सदृश रुलाते अपने, मौज-ख़ुशी ज्यो हो गए सपने
दिल झरना विष पूरित बन रह-रह के लगता है तपने
पनघट में हैं मरी मछलियाँ, कल-कल पर छल-चल गति
नरछोही पर कब्ज़ा प्रधान का, मंदिर की अपनी दुर्गति
कस्बा-कस्बा देसी शराब, दूध-दही के लाले हैं
इस विकास का स्वागत जैसे जख्म मवाद सा बहता है
मेरे दिल में प्रीती नहीं एक तांडव चलता है।

गांवा-भाई का नाता दुर्लभ, लगे पराये सारे अपने
भैया-मैया कह जीते थे हम, अब पैसा-पैसा हैं जपते
धन आया माई बेगानी, भैया-भौजी का नाता टूटा
दादा-दादी वृद्धाश्रम पकडे, घर-घर ज्यों घट फूटा
अपनापन ज्यों मरा पड़ा है, गैरों से अब यारी है
घर से ज्यादा शादी-घर, सबको अपना लगता है।
मेरे दिल में प्रीती नहीं एक तांडव चलता है।

कैसे-कैसे दिल पत्थर हैं और बहाने सत्तर हैं
शब्द स्वान-से चाट रहे, राजनीति निरंतर हैं।
जिनके हाथों में दम है, उनमें न्यायशक्ति ही कम है
मुंह में उपदेश भरा है, मन में ह्विस्की-रम है।
बेटी-भगिनी खुद भोगी हों जिल्लत की परिभाषा
उन नायकों पर घृणा का महासमुद्र उफनता है।
मेरे दिल में प्रीत नहीं एक तांडव चलता है।

डा0 रमा शंकर शुक्ल
मिर्ज़ापुर, उत्तर प्रदेश

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