शैलेन्‍द्र नाथ कौल का हास्य-व्यंग्य : नहीं चाहिए पड़ोसन

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नहीं चाहिए पड़ोसन -शैलेन्‍द्र नाथ कौल कहावत है कि पत्‍नी और पड़ोसन दोनों ख़ूबसूरत नहीं होनी चाहिए क्‍योंकि अपने पति के छिटक कर ग़लत रास...

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नहीं चाहिए पड़ोसन

-शैलेन्‍द्र नाथ कौल

कहावत है कि पत्‍नी और पड़ोसन दोनों ख़ूबसूरत नहीं होनी चाहिए क्‍योंकि अपने पति के छिटक कर ग़लत रास्‍ते पर जाने का डर या शक हमेशा पत्‍नी के मन में बना रहता है। कुछ ऐसा ही आनन्‍द के साथ भी हुआ।

मेरा मित्र आनन्‍द शर्मा जब अपनी पत्‍नी रागिनी के साथ शहर में नया-नया आया तो किराए का मकान ढूंढने में मैंने उसकी मदद की थी। उसकी शादी को कुछ ही महीने हुए थे । दोनों की जोड़ी ख़ूब जमती है।

उनके पड़ोस में गीता शंखधर रहती हैं। वह हैं तो थोड़ी अधेड़ उम्र की, मगर रुप और नख़रे में अच्‍छी-अच्‍छी नवयौवनाओं को भी मात दे सकती हैं। स्‍वभाव की बहुत विनम्र और सबके सुखदुख में सहायता करने वाली गीता को अपने रुप का घमंड छू तक नहीं गया था।

गीता शंखधर की आनन्‍द और रागिनी से घनिष्‍ठता तब शुरु हुई उनके यहां पुत्र रत्‍न की प्राप्‍ति हुई। रागिनी की मां कुछ दिन बेटी के पास रह कर अपने शहर वापस चली गई इसलिए आनन्‍द के आफ़िस जाने के बाद रागिनी घर पर अकेली रह जाती थी। ऐसे समय में अपने स्‍वभाव के अनुसार गीता नवजात शिशु की देखरेख करने में रागिनी की सहायता एक बड़ी बहन की तरह किया करती थीं।

आनन्‍द भी गीता से काफ़ी हद तक हिलमिल गया था। शाम को जब वह घर लौटता तो कई बार गीताजी उसके घर पर ही होतीं और झट उस के लिए चाय बना लातीं। चाय का कप मुस्‍कुराकर आनन्‍द को देते समय जब वह उसकी ओर देखतीं तो उनकी आंखों में कोई भाव न होते हुए भी रागिनी को उसमें ख़तरे के बादल दिखाई दे जाते।

एक दिन आनन्‍द ने यूं ही कह दिया, ‘‘गीता जी आप चाय बहुत अच्‍छी बनाती हैं।‘‘ गीता के थैंक्‍यू कहने से पहले कई दिन से ख़तरे का आभास कर रही रागिनी के मन को यह महज औपचारिक सी प्रशंसा सहन नहीं हुई और उसने तुरन्‍त कहा, ‘‘हाँ हाँ क्‍यों नहीं?‘‘

गीता ने क्‍या सोचा यह तो नहीं मालूम पर आनन्‍द के लिए रागिनी का यह व्‍यंग्यात्‍मक अतिक्रमण अप्रत्‍याशित था। आनन्‍द को आभास हो गया कि रागिनी के मन में कहीं शक का बीज अंकुरित होे रहा है। आनन्‍द सावधान हो गया और उसने गीता से औपचारिक दूरी बढ़ानी शुरु कर दी।

उस दिन रविवार था और आनन्‍द घर पर ही था। सर्दी की गुनगुनाती धूप में चिंटू की मालिश कर उसे नहलाने का प्रस्‍ताव लिए गीता धड़धड़ती हुई अन्‍दर आईं। धूप में बैठ कर गीता जी ने चिंटू की मालिश की और उसे नहलाया। बच्‍चे की मालिश करने व नहलाने की प्रक्रिया में किसी स्‍त्री की साड़ी का पल्‍ला सामने से सरक जाना अस्‍वाभाविक नहीं कहा जा सकता।

आनन्‍द बरामदे में बैठा अख़बार पढ़ रहा था। उसने गीता की ओर नहीं देखा था पर रागिनी ने देखा था। आनन्‍द ने देखा होगा और दृश्‍य का रसास्‍वादन किया होगा, यह शक रागिनी के मन में इतना गहराया कि विश्‍वास में बदल गया। उसे लगा कि चिंटू के कारण वह आनन्‍द को पूरा समय नहीं दे पाती है और इसका फ़ायदा उठा कर गीता उसके पति पर डोरे डाल रही है। आनन्‍द का व्‍यवहार बिल्‍कुल सामान्‍य था लेकिन रागिनी को लगा यह उसका नाटक है और दोनों के बीच कुछ खुसरपुसुर चल रही है। अगर अभी नहीं चल रही है तो आगे चल सकती है, और यह सोच कर रागिनी परेशान रहने लगी।

रोज़ घर आने वाली गीताजी कई दिनों तक दिखाई नहीं दीं तो आनन्‍द ने एक दिन रागिनी से पूछ लिया, ‘‘ क्‍या बात है, आज कल गीताजी नहीं आती हैं?‘‘

‘‘क्‍यों ? क्‍या मालिश करवाने और नहाने का इरादा है?‘‘ रागिनी का उत्‍तर आनन्‍द को आवाक कर गया। इसके बाद कुछ भी बोलने का साहस उसमें नहीं रहा। उसे लगा कहीं कुछ टूट रहा है, जिसे टूटने से रोकना बहुत ज़रुरी है। वह चुपचाप दूसरे कमरे में जा कर कुछ सामान इधर उधर कर अपना ध्‍यान बंटाने की नाकाम कोशिश करने लगा क्‍योंकि इस के बाद रागिनी ने अपनी रागिनी इस तरह अविश्‍वास की कड़वाहट में भिगो कर छेड़ी कि उसे किसी भी तरह रोका नहीं जा सकता था। यह ज़रुर था कि वह ख़ुद ही बोलते बोलते थक जाए । पके फोड़े की तरह रागिनी के शंकालु मन का मवाद निकल रहा था और आनन्‍द उसकी बदबू से त्रस्‍त हो रहा था। शादी के इन दो सालों में यों तो नोंक झोंक कई बार हुई थी लेकिन ऐसा तूफ़ान कभी नहीं आया था।

उस रात आनन्‍द मेरे घर आया तो बहुत परेशान था। उसकी परेशानी का कारण था आपसी संबंधों में विश्‍वास का टूटना। मैंने उसे सलाह दी कि वह भूल से भी न तो गीताजी का नाम ले और न उसकी ओर देखे, चाहे उसका यह व्‍यवहार एक अच्‍छे पड़ोसी के लिए ठीक न हो । उसके लिए रागिनी के मन से शक को दूर करना बहुत आवश्‍यक है।

आनन्‍द ने ठीक वैसा ही किया। वह गरदन झुका कर घर से बाहर निकलता और गरदन झुकाए ही घर में चला जाता। आते जाते सोचता रहता कि कहीं गीताजी की उस पर नज़र न पड़ जाए ।

कुछ दिन बाद पति-पत्‍नी के बीच सब कुछ ठीक ठाक चलने लगा। गीताजी ने शायद आना बन्‍द कर दिया था या वह आनन्‍द को दिखाई नहीं दीं। जो भी हो आनन्‍द संतुष्‍ट था कि रागिनी उससे ठीक से बात करने लगी थी। पर एक दिन फिर ज्‍वालामुखी फूट पड़ा।

हुआ यह कि उस दिन आनन्‍द आफिस जाने के लिए घर के बाहर स्‍कूटर स्‍टार्ट कर ही रहा था कि अचानक गीताजी प्रकट हुईं और बिना किसी औपचारिकता के निश्‍छल भाव से बोलीं, ‘‘आनन्‍द जी मुझे ज़रा बैंक तक छोड़ दीजिएगा। आज इनकी तबियत ठीक नहीं है। मुझे कुछ पैसे निकालने हैं और दवा भी लानी है। आप के साथ जल्‍दी पहुंच जाउंगी।‘‘

गीताजी को शायद मालूम नहीं था कि उसके कारण आनन्‍द के घर में क्‍या तूफ़ान मचा था। आनन्‍द की आवाज़ गले में ही अटक कर रह गई, क्‍योंकि वह जानता थी कि गेट बंद करने के लिए रागिनी बाहर आ चुकी है। ‘हां‘ कहे तो कैसे और ‘ना‘ कहे तो कैसे।

आनन्‍द के कुछ कहने से पहले ही गीताजी ने स्‍कूटर का फ़ुटरेस्‍ट सीधा किया और बड़े अधिकार से पीछे बैठ गईं। बैठते बैठते गीताजी ने पीछे खड़ी रागिनी का अभिवादन भी किया जिससे यह पक्‍का हो गया उसने यह विस्‍फोटक दृश्‍य देख लिया है। गीताजी को बैंक के पास उतार कर आनन्‍द अपने आफ़िस पहुंचा। शाम को रागिनी क्‍या भूचाल लाएगी यह सोच सोच कर कर दिन भर वह अनमना सा रहा। जब घर चलने का समय हुआ तो पैर उठ ही नहीं रहे थे क्‍योंकि पैरों को भी शायद आने वाली प्रलय का आभास हो गया था। घर तो आना ही था इसलिए स्‍कूटर स्‍टार्ट कर धीरे धीरे घर आ गया। लगभग दस मिनट तक कुछ कुछ अंतराल के बाद घंटी बजाने के बाद दरवाज़ा खुला।

अभी वह स्‍कूटर अंदर भी नहीं कर पाया था कि रागिनी ने पहला बाउंसर फेंका, ‘‘आ गए गुलछर्रे उड़ा कर।‘‘

आनन्‍द ने स्‍कूटर खड़ा ही किया था कि रागिनी ने कई वार एक साथ किए, ‘‘लंच तो साथ किया ही होगा ? पिक्‍चर कौन सी देखी ? छम्‍मक छल्‍लो को साथ लेकर नहीं लौटे ? क्‍या भेद खुलने का डर था ?‘‘

‘‘क्‍या कह रही हो ? कुछ तो सोच कर बोलो‘‘ , आनन्‍द ने डरते डरते आश्‍चर्य से कहा। उसकी आवाज़ में जो ईमानदारी का भाव था वह रागिनी की समझ में नहीं आया या यों कहें कि उसके शक्‍की दिमाग़ ने समझने का प्रयास ही नहीं किया।

आनन्‍द उसे दुनिया का सबसे बड़ा धोखेबाज़, धूर्त और मक्‍कार इंसान दिखाई देने लगा। इस के बाद रागिनी ने शब्‍दों के जो हृदयभेदी, मस्‍तिष्‍कभेदी और आत्‍माभेदी बांण चलाए उनके घावों की पीड़ा सहन करना आनन्‍द को बहुत असहनीय हो रहा था। क्‍या इन घावों को समय का मरहम कभी भर पाएगा ? यह सोचता हुआ आहत और दुखी आनन्‍द चुपचाप घर से बाहर आ गया। कुछ देर तक सड़कों पर बेकार चक्‍कर लगाने के बाद वह मेरे घर आया। बिना किसी भूमिका के उसने कहा, ‘‘मैं घर बदलना चाहता हूँ। तुम मेरे लिए कोई दूसरा घर ढूंढो।‘‘

मुझे समझते देर नहीं लगी कि आज फिर कोई बात हो गई जिस से आनन्‍द बहुत परेशान है । मैं उसे शान्‍त करने के इरादे से एक पार्क में ले गया। हम दोनों पार्क के एक कोने में बेंच पर बैठ गए, वह मुझे सवेरे की उस घटना और उस पर रागिनी की प्रतिक्रिया के बारे में बताने लगा। मुझे आनन्‍द पर बहुत तरस आया।

क्‍या घर बदलने से आनन्‍द की परेशानियों का अंत हो जाएगा ? ईंट पत्‍थर जोड़ कर दरवाजे़ खिड़कियां लगाने से जो ढांचा तैयार होता है क्‍या उसे सही अर्थों में घर कहा जा सकता है ? बिना आपसी विश्‍वास के एक छत के नीचे रहने वाले क्‍या सुखी रह सकते हैं ?

मैं आनन्‍द को बचपन से जानता हूँ। किसी प्रकार के अभद्र व्‍यवहार की आशा उससे कभी की ही नहीं जा सकती है। सोचता हूँ, आज के इस आधुनिक युग में भी अपनी सड़ीगली मानसिकता के कारण रागिनी जैसी पढ़ी लिखी युवतियां भी अपने हंसते खेलते परिवार के लिए कैसे परेशानी का कारण बनती हैं।

कुछ दिनों की मेहनत के बाद मैं आनन्‍द के लिए दूसरा घर ढूंढने में सफल हो गया हूं। यह घर शहर के नए बसने वाले क्षेत्र में है। यहां लोग एक दूसरे से कम ही मिलते जुलते हैं। संयोग से पड़ोस का मकान भी ख़ाली है। मकान देखकर आनन्‍द खिलखिला कर हंस पड़ा है, ‘‘यहां कोई गीताजी नहीं रहती हैं। मुझे कोई पड़ोसिन नहीं चाहिए ।‘‘

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(‘‘सरिता‘‘ फ़रवरी (द्वितीय)-2008 में प्रकाशित)

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रचनाकार: शैलेन्‍द्र नाथ कौल का हास्य-व्यंग्य : नहीं चाहिए पड़ोसन
शैलेन्‍द्र नाथ कौल का हास्य-व्यंग्य : नहीं चाहिए पड़ोसन
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