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विजय वर्मा की कविता - जानवर कौन ?

  

जानवर कौन ?

हाड़ कंपाती ठंड में,

शीतलहर प्रचंड में ,

एक रात जब मैं घर आया , 

बच्चों को कुछ चिन्तित पाया।

उनके चिंता की कारण थी----

चार गायें ,या शायद

दो बछड़े और दो माएँ .

हमारे घर के सामने

सड़क के उस पार

ठंड से ठिठुरते हुए

आस-पास बैठे थे ये चार .

बच्चों ने कुछ करने की ठानी ,

मौका पाकर बन गए दानी।

एक पुरानी बड़ी-सी चादर

दो सटकर बैठे गायॊं पर डाला

ताकि उन्हें लगे न पाला।

एक पर्दा,एक कार-सीट का कवर

बाकी दोनों ज़ानवरों पर रखकर

लौटे थोड़े-से खुश होकर।

पर ख़ुशी उनकी टिक पायी न ज्यादा

बच्चों का मन रह गया आधा।

कोई गायॊं पर से था चादर ले भागा .

न जाने था कौन वह अधम,अभागा।

एक बात पूछना चाहता हूँ ,मान्यवर !

इन तीनों में आख़िर कौन है जानवर ?

वह जो दीवार से सटे-सिमटे

पगुरा  रहे थे चुपचाप निपटे? ,

या जो दूध निकालने के बाद

करते है जानवरों का अनादर?

या जो बेशर्मी से चुरा लेते हैं

जानवरों के भी पीठ से चादर ?

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v k verma,sr.chemist,D.V.C.,BTPS

BOKARO THERMAL,BOKARO
vijayvermavijay560@gmail.co

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