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मधु शर्मा की पहली कविता

 

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मधु शर्मा की पहली कविता

  • कल सुबह,
    ओस की नन्हीं-नन्हीं बूंदों को
    देखकर
    मन खुश हो गया,
    सोचा,
    धूप निकलने से पहले
    सहेज लूं इनको
    अपने हाथों में,
    वरना सूरज
    इन्हें निगल लेगा.
    हाथ में लेना चाहा तो बिखर गयी ओस,
    रह गया केवल पानी,
    लगा, कुछ लोगों का अस्तित्व
    बस खत्म होने के लिये होता है,
    खत्म करने वाला चाहे सूरज हो या
    इन्सान.

9 टिप्पणियाँ

  1. किसी भी रचनाकार की पहली ही रचना को पढ़ने का सुख अलग ही होता है। उसमें भविष्‍य के बीज छुपे होते हैं। एक दस्‍तक की तरह होती है पहली रचना। स्‍वागत मधु जी

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  2. अभिनन्दन! बहुत सुन्दर! पहली रचना में इतनी परिपक्वता तो आगे तो बहुतों की दुकान बंद होने वाली है।

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  3. बहुत सुन्दर रचना है. लगता ही नहीं कि पहली है. लिखती रहें लगातार.

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  4. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  5. बहुत सुन्दर कविता मधु जी. सुन्दर भाव और शिल्प. बधाई आपको .

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  6. बात तो गंभीर कही हैं आपने,पर हम जानते है न तो ये आखिरी हैं और पहली तो हो ही नही सकती

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  7. मधु शर्मा जी बात तो समझदारी की कि हैं , पर हम जानते हैं कि ये आख्रिरी तो है नही पर सच ये भी हैं‍ कि ये पहली रचना भी नही हैं .....

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  8. मधु यदि ये आगाज है तो आगे आगे क्या होगा एक रचनाकार पर उसके पाठकों का पूरा हक होता है और उसी हक के चलते मैं तुमसे कहता हूँ की और लिखो बहुत लिखो ये अंतिम ना हो तुम बेहतरीन ख्याल रखती हो बहुत सुन्दर लिखती हो
    अगली रचना के इंतज़ार में

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  9. बहुत सुंदर और प्यारी रचना है मधु जी । इसे आखिरी मत होने देना ।

    जवाब देंहटाएं

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