अर्जुन प्रसाद की कहानी - ऊपरी चक्कर

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ऊपरी चक्कर जुए और लाटरी का खेल भी बड़ा अजीब है। कभी किसी को दस बीस रूपए का लाभ दिखाकर अपना गुलाम बना लेता है। उसे मटियामेट कर देता है। इस...

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ऊपरी चक्कर

जुए और लाटरी का खेल भी बड़ा अजीब है। कभी किसी को दस बीस रूपए का लाभ दिखाकर अपना गुलाम बना लेता है। उसे मटियामेट कर देता है। इसके जाल में फँसा आदमी पिंजरे में बन्द पक्षी की तरह मुक्त होने के लि्ए आजन्म पंख फड़फड़ाता रहता है। लेकिन अगले राउन्ड में जीत जाने का झूठा भ्रम उसे अपने चक्रब्यूह में उलझाए रखता है और वह उससे मुक्त नहीं हो पाता है। कैसी बिडम्बना है कि जुआरी को हार जाने पर भी जीतने का पक्का यकीन होता है। जुआ गैर-लाइसेंसी खेल है तो लाटरी एक लाइसेंसयुक्त जुआ है। यह खेल सामाजिक और नैतिक रूप से तो बहुत बुरा है किन्तु, सरेआम खेलने की पूरी आजादी रहती है।

इन भयानक खेलों के साथ यदि कोई व्यक्ति तांत्रिक और ओझा के फेर में भी पड़ जाय तो फिर इस दलदल से बचने के लिए जमीन आसमान एक कर देने पर भी बड़ा दुष्कर है। पाण्डवों को जुए की लत ने महल से निकालकर वन में भेज दिया। द्रोपदी जैसी कुशल पत्नी भी छिनी। उन्हें राजा से नौकर बनकर 13 वर्ष वन में जीवन बिताना पड़ा। राजा नल की कहानी से तो सभी भली-भाँति परिचित ही हैं। सामाजिक कुरीतियों और अंधविश्वासों के चक्कर में पड़कर जीवन बिल्कुल नर्कमय बन जाता है। सुख-सम्पत्ति का नाश हो जाता है।

श्याम बाबू बड़े ही सज्जन और नेक पुरूष थे। दिल्ली विद्युत बोर्ड में सरकारी नौकर थे। पाँच हजार रूपये महीना वेतन था। अब वही वेतन दूना हो गया है। श्याम जी रिश्वत लेने-देने का नतीजा जानते थे। इसलिए घूसखोरी को हराम की कमाई मानते थे। कभी किसी को सताते न थे और न तो कभी किसी से एक पैसा लिए। उनका स्वभाव सरल और विनीत तो था ही। उनकी वाणी में गजब की मधुरता भी थी।

उनकी पत्नी सरिता भी अत्यन्त मृदुभाषिणी थी। बच्चों का स्वभाव भी बड़ा मनमोहक था। अब क्या कहा जाय पॉकेटमार बड़े बेरहम होते हैं। दूसरों के गाढ़े पसीने की कमाई पर हाथ साफ करते हुए उनका कलेजा जरा भी नहीं पसीजता। लोगों की भरी जेबें पलक झपकते ही खाली कर देते हैं। अब देखिए न, श्याम बाबू तीन अक्टूबर को पगार लेकर दफ्तर से घर की ओर चले।

दिल्ली गेट के पास बस में किसी सज्जन ने उनकी जेब काट ली। टिकटहीन और खाली जेब पाकर कण्डक्टर ने उन्हें बीच रास्ते में ही उतार दिया। काली अंधेरी रात और दिन भर माथा-पच्ची की थकान। इसलिए वह पैदल ही चलकर घर पहुँचे और मुँह लटकाकर बैठ गए। न कोई रौनक न उत्साह। मन में भाँति-भाँति की शंका होने लगी। संदेह में घिरकर मनुष्य सत्य को भूल जाता है। वह दुविधा का शिकार हो जाता है। उसे अपने ऊपर भी यकीन नहीं रहता।

घर पहुँचकर श्याम सोचने लगे - कैशियर ने मु-ो पगार दिया या नहीं? अगर उसने दिया तो मैंने पैसे कहाँ रख दिए? मेरी महीने भर की तनख्वाह क्या मेरी जेब लील गई ? या आसमान खा गया। कहीं मेरा सहयात्री गिरहकट तो नहीं था। यह सोचकर चेहरे पर चिंता की तस्वीर खिंच गई। उनके मुँह का रंग उतर गया।

उन्हें उदास मुख देखकर उनकी पत्नी सरिता ने पूछा- अजी, क्या बात है? आपकी तबीयत तो ठीक है न? क्या उधेड़बुन में लगे हुए हैं? लीजिए, एक कप गरमा-गरम चाय पीजिए। टेंशन दूर कीजिए। लगता है आज आफिस में अधिक काम था।

तब श्याम लाल बोले - प्रिये, दर्द से सिर फटा जा रहा है। चाय की इच्छा नहीं। मेरी भूख भी आज पता नहीं कहाँ चली गई।

यह सुनते ही सरिता ने फिर पूछा - क्यों जी, आप पहेली ही बुझाएंगे या कुछ साफ-साफ कहेंगे।

इसके बाद श्याम बाबू बोले - अरे, तुम औरतों में तो यही कमी है। जरा-जरा सी बात पर हठ करने लगती हैं। आखिर, त्रियाहठ के आगे श्याम बाबू को नतमस्तक होना पड़ा।

सरिता को अपना दुखड़ा सुनाते हुए वह बोले - सरिता, आज मु-ो किसी नमक हराम ने चूना लगा दिया। किसी ने बस में मेरी जेब काट ली। समझ में नहीं आ रहा कि क्या करूँ? इस कड़की में गुजारा कैसे होगा? मंहगाई का जमाना है, वह आसमान छू रही है।

तब सरिता आह भरकर बोली - आपने जरूर कोई लापरवाही की होगी। खैर, जो हुआ सो हुआ। उसे भूल जाइए। चिंता करके अब क्या फायदा? फिक्र से मन में दुख ही होता है और यह वुद्धि का नाश भी कर देती है। मैंने काट-कपट कर कुछ पैसे बचाकर रखे हैं। इस महीने का जैसे तैसे खर्च चल जाएगा।

इस प्रकार अक्टूबर का महीना बड़ी तंगी से गुजरा। उन्हें रोजमर्रा की जरूरतों को भी कुचलना पड़ा। दशहरे के मेले में बच्चों को एक खिलौना भी नसीब न हुआ। स्कूल की फीस भी जमा न हुई तो बच्चों का नाम ही कट गया।

धीरे-धीरे चार नवम्बर को अगला वेतन हाथ में आते ही श्याम पिछली बातों को भूल गए। कष्टदायी पिछली घटनाओं को भूल जाना बुद्धिमानी भी है। श्याम बाबू ने सोचा सर्दी बढ़ने वाली है। बीवी - बच्चों के लिए कपड़े बनवाने जरूरी हैं। पारिवारिक जीवन सुखी बनाने के लिए भीं यह आवश्यक है।

इसी उधेड़बुन के साथ श्याम जी कोटला बस स्टाप पर उतरकर घर की ओर चले पड़े। रात के दस बज रहे थे। चौराहा पार करते ही उनके सामने एकाएक दो युवक आकर उनका रास्ता रोक कर खड़े हो गए। उन्हें देखकर श्याम के हाथ-पाँव फूल गए। वह इतने घबरा गए मानो, उनके हृदय की घड़कन बन्द हो जाएगी। उनका दम घुटने लगा।

एक छोकरे ने पूछा-कौन हो तुम, कहाँ रहते हो और क्या काम करते हो? उसने एक ही साथ कई सवाल दाग दिए। प्रश्नों की बौछार कर दिया। श्याम जी की घिग्घी बँध गई। कांपते हुए बोले - भाई - मैं - मैं - मैं श्याम लाल, बिजली विभाग में काम करता हूँ। शिफ्ट की ड्यूटी है। इसलिए रात को घर आता हूँ।

इतने में दूसरा टपक पड़ा - रोकड़ा कब मिलता है। मतलब तनख्वाह। घबराहट में मनुष्य के मुँह से कब क्या निकल जाय कुछ पता नहीं। श्याम जी की मति मारी गई और बोले- चार तारीख को ।

पहले युवक ने तुरन्त एक बड़ा चाकू निकाला और खोलकर उनके सीने पर रखते हुए बोला - अब चालाक बनने की कोशिश मत करना। बीवी बेवा हो जाएगी और बच्चे अनाथ। फटाफट माल निकालो और रास्ता नापो। आज चार तारीख है। अब तुम हमारे जाल में बुरी तरह फँस गए हो।

श्याम जी वास्तव में विचित्र मुसीबत में घिर गए। आगे कुंआ तो पीछे खाई वाली स्थिति हो गई। वह मनन करने लगे कि पैसा इन लुटेरों के हवाले कर दूँ तो घर कैसे चलेगा? न देने पर जान जोखिम में। यह सोचकर वह पिंजड़े में कैद पक्षी की तरह मुक्त होने के लिए छटपटाने लगे। मन में युवकों को कोसने लगे। इतनी रात को किसी अन्य राही से भी मदद की उम्मीद नहीं रही। अतः बिल्कुल किंकर्तव्यविमूढ़ बन गए।

दोनों लड़कों ने उनकी तलाशी लेकर सारे रूपये अपने कब्जे में ले लिया। श्याम जी हक्का-बक्का से देखते रह गए। वह पल भर में ही लुट गए। लुटेरों ने वेतन के बदले उन्हें एक लम्बा उपदेश दे दिया - सुनिए! आइन्दा रात को अकेले दुकेले मत चलिएगा । जमाना बड़ा नाजुक है, खतरा मोल लेना अच्छी बात नहीं। श्याम बाबू अपनी दुर्दशा का खूब रोना भी रोए। पर, सब व्यर्थ।

विवश होकर अश्रुपूर्ण नेत्रों के साथ किसी तरह घर पहुँचे। घर जाते ही माथा ठोक कर बैठ गए और अपने भाग्य को कोसने लगे। उसने मानो, उन्हें चुनौती दे दी हो। उनके चेहरे पर उड़ती हवाइयों को देखकर सरिता ने पूछा - अजी, तनख्वाह मिल गई ?

यह सुनते ही श्याम का मुँह जैसे सिल दिया गया। कुछ कहने का साहस ही न हुआ। ज्यादे कुरेदने पर वह बोले - भाग्यवान, अपने नसीब को तो पाला मार गया है। न जाने, किसकी नजर लग गई। आज बदमाशों ने मेरा वेतन छीन लिया। उन्होंने अपनी विपत्ति कथा सरिता को सुना दी। वह बेचारी सुनते ही पछाड़ खाकर गिर पड़ी।

अगले दिन श्याम बाबू, ब्रहमा नंद तिवारी के पास जाकर अपनी दुःख भरी राम कहानी सुनाकर बोले - तिवारी जी, मेरी मदद कीजिए वरना, परिवार भूखों मर जाएगा। तिवारी जी पक्के खिलाड़ी थे। सूद पर रूपये उधार देने से पहले ऋणी की गरज का तुरंत पता लगा लेते। वह जानते थे कि अधिक जरूरतमंद आदमी अधिक से अधिक ब्याज होने पर भी उधार लेने से नहीं चूकता। ऐसे लोगों से मनमानी ब्याज भी वसूल किया जाता है। तिवारी जी घाट-घाट का पानी पी चुके हैं। कर्जदार की नब्ज टटोलकर ही लेन-देन का सौदा करते हैं। महीने भर का ब्याज एडवांस काट लेने पर भी पूरे पैसों का ब्याज लेते हैं। जमानती होने पर भी घर-मकान गिरवी रख लेते हैं। वह लिखा-पढ़ी के बाद ही पैसे उधार देते हैं। उनके पैसों की भरपाई करते-करते कर्जदारों की कमर टूट जाती है।

श्याम बाबू भी अपना मकान गिरवी रखकर तिवारी जी से 20 हजार रूपये कर्ज ले लिए। तिवारी जी उन्हें 18 हजार ही दिये और दो हजार सूद काट लिये। श्याम ने सकुचाते हुए अपने सहकर्मियों से भी अपने दुःखों का जिक्र किये। आफिस में जितने मुँह उतनी बातें होने लगीं।

कुछ लोगों ने कहा - भाई श्याम जी, यह सब आपके साथ किसी ऊपरी चक्कर के कारण हो रहा है। तनिक किसी ओझा को भी दिखाएं। इस प्रकार धीरे-धीरे श्याम जी अंधविश्वास के दलदल में धँसते चले गए। भैय्या, मुझे भी कुछ ऐसा ही प्रतीत होता है। श्याम ने कहा।

आखिर, श्याम बाबू अगले दिन से ओझा के घर के चक्कर काटने लगे। एक ओझा अनाम देव से मुलाकात हो गई। उनके यहाँ भीड़ न पाकर बड़ी प्रसन्नता हुई। अनुनय विनय के बाद श्याम बाबू ने कहा -ओझा जी, जरा ढंग से देखकर बताइए कि हमारे ऊपर किसी भूत-प्रेत की साया तो नहीं। आखिर, हमारे ही साथ ऐसा क्यों हो रहा है? ओझा जी यही तो चाहते थे। वह सदा नए शिकार की तलाश में रहते। बैठे बिठाए उनकी इच्छा पूरी हो गई।

कुछ देर हू - हा - हे करते रहे। फिर बोले - अरे भाई, आपके ऊपर बहुत बड़े शैतान का साया पड़ गया है। बड़ा हठी है। उससे पीछा छुड़ाना कोई बच्चों का खेल नहीं। काफी मेहनत करनी होगी। एक बात और शैतान का कहना है कि अपना चढ़ावा मिलने के बाद वह आपको मालामाल जरूर कर देगा। आप लखपती बन जाएंगे। आपके भाग्य में लाटरी का पहला ईनाम है और नौकरी में कष्ट तथा मुसीबत के सिवा कुछ भी नहीं। रातों रात मालदार बनने की आकांक्षा ने धीरे-धीरे अपना असर दिखाना शुरू कर दिया।

श्याम बाबू नौकरी को जंजाल समझकर उससे विमुख हो गए। उनकी अक्ल पर परदा पड़ गया। मति भ्रष्ट हो गई। हृदय में बड़े - बड़े अरमान जागने लगे। कोठी, बंगला और गाड़ी के सपनों ने उन्हें एक बड़े कुमार्ग पर ढकेल दिया। वह लाटरी की ओर अग्रसर हो गए और सोचने लगे - शान से जीना ही जीवन है। कंगालों जैसा क्या जीना? अब गाड़ी से चलेंगे, पैदल चलने से जान मुसीबत में फँस जाती है।

वह मन में भाँति-भाँति के मंसूबे बाँधने लगे। लाटरी की धुन में इतने मग्न हुए कि तिवारी जी से मिले 18 हजार रूपये ओझा को शैतान से पीछा छुड़ाने की फीस दे दिये। घर-परिवार बिल्कुल भूल गए।

बाबा ने कहा - देखो, टिकट खरीदने में जरा सी भी देर मत करना। शैतान को मैंने ठिकाने लगा दिया है। सहकर्मियों की मदद से वम्बर का महीना जैसे-तैसे बीत गया। दिसम्बर में वेतन मिलते ही लाटरी टिकट खरीदने का शुभारम्भ हुआ। कभी किसी टिकट पर दस-बीस रूपये का ईनाम निकल जाने से श्याम जी ने सोचा - ओझा जी बहुत ज्ञानी हैं। सबका जो काम 40-50 हजार में करते हैं, मेरा 15-20 हजार में हो गया। ईनाम भी आता दिखाई दे रहा है। पर, कहीं कुछ देर हो रही है। बिगड़े हुए कार्य को बनने में समय तो लगता ही है। उन्हें लाटरी का ऐसा चस्का लगा कि, पूरी पगार उसी में खर्च हो गई। मुसीबतों से छुटकारा पाने की कोशिश में उसमें उलझते गए। मानो, मकड़ी के जाल में मक्खी फँस गई।

आँत खाली तो, ईमान भी खाली। मकड़जाल में फँसकर प्रायः मनुष्य सत्य को भूलकर झूठ का दामन पकड़ लेता है। जबकि सत्य से मुँह मोड़ना अधर्म है। उसे ठोकर मारने वाला सदैव झूठ का सहारा लेने की फिराक में रहता है। फिर भी झूठ, झूठ ही रहता है। वह सच नहीं बन सकता। श्याम भी अंधविश्वास में पड़कर अधर्म की शरण में चले गए। सहकर्मियों और पत्नी से तीन-पाँच करने लगे। घर में हर बात अगर-मगर करके छिपाने और टालने लगे। तरह-तरह के बहाने बनाने लगे। लाटरी का धंधा जोरों पर होने से दफ्तर से छुट्टी होने लगी। गैर हाजिरी अधिक होने से विदाउट भी होने लगे। दिसम्बर में तो वेतन पूरा मिला। पर, नवरी में खाली हाथ लौटना पड़ा।

अब वह घर और दफ्तर में बीमार होने का ढ़ोंग रचने लगे। उनकी गरीबी दिन दूना, रात चौगुनी बढ़ने लगी। कर्ज का भारी बोझ सिर पर लद जाने से पूरा परिवार विपत्ति और दुर्दशा के दलदल में फँस गया। बच्चों की शिक्षा अधूरी रह गयी। उनकी पढ़ाई छूट गयी।

काठ की हाड़ी चढ़ै न दूजी बार, वाली बात को सोचकर महाजनों ने कर्ज देना बन्द कर दिया। उनकी दीन दशा देखकर अपनों ने भी आखें फेर लीं। लोग डरने लगे कि पता नहीं, श्याम कब पैसे माँगने लगें। धीरे-धीरे घर में रोटियों के भी लाले पड़ गए। उपवास पर उपवास होने लगा। ऋण दाता अपना-अपना पैसा माँगने लगे।

गरज यह कि ओझा के झाँसे ने अंधविश्वास में फँसे श्याम लाल पर अपना असर डाला तो बिना इस्तीफा दिए नौकरी को ठोकर मारकर घर बैठ गए। उनकी दीन दशा पर तरस खाकर अधिकारियों ने उन्हें नौकरी से हटाया नहीं। वह घर से ड्यूटी जाने का बहाना करके निकल जाते और सुबह से शाम लाटरी अड्डे पर बिता देते। धीरे-धीरे पत्नी के जेवर गहने सब बिक गए। जब देनदारों के तकाजे बढ़ने लगे तो औने-पौने में मकान भी बेचना पड़ा।

इस प्रकार सब कुछ गंवा देने के बाद लाटरी का भूत उनके सिर से उतरने लगा। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। बार-बार अवेहलना से तंग आकर विभाग ने उन्हें बरखास्त भी कर दिया। यदि कोई पूछता कि भाई साहब, आपको ड्यूटी से क्या हटा दिया गया ? तो, बड़ी आत्मीयता से कह देते कि - ऊपरी चक्कर है। जबकि चक्कर तो उनके मन का है। सब भीतरी चक्कर का असर है। क्योंकि इसी से वह परिस्थिति का गुलाम बन गए। इस चक्कर ने पति-पत्नी के मधुर रिश्तों के बीच दीवार खड़ी की और आपस में अनबन हुई।

पत्नी ने बीमारी की दवा कराने को कहा तो बोले - इसमें डाक्टर, वैद्य कुछ नहीं कर सकते। यह सब उसी चक्कर की करामात है। पुरूषों की अपेक्षा महिलाएं अधिक अंध विश्वास मानती है। यदि वह भारतीय और अनपढ़ भी हो तो क्या कहना? बुरे वक्त की मार से सरिता भी अक्ल का दुश्मन बन गई और एक दिन उदास मुख श्याम से बोली - किसी अच्छे सोखा ओझा से ऊपरी चक्कर ही दिखा लीजिए।

यह सुनकर श्याम बाबू के मुँह से एक सर्द आह निकल गई। ओझा का कारनामा बयान करते हुए वह पत्नी से बोले- अरे, तुम्हें अब क्या बताऊँ सरिता ? उस धूर्त ने तो लख़पति बनने का सपना दिखाकर हमें घर से बेघर कर दिया। तिवारी जी से उधार लिए हुए रूपये भी उसने ठग लिए। पत्नी बेचारी को क्या पता था कि उसका पति, ओझा के फेर में आकर पहले ही सब कुछ गँवा चुका है।

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रचनाकार: अर्जुन प्रसाद की कहानी - ऊपरी चक्कर
अर्जुन प्रसाद की कहानी - ऊपरी चक्कर
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