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अर्जुन प्रसाद की कहानी - मिसाल

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मिसाल सुन्‍हेड़ा गाँव के महिपाल सिंह बहुत ही सुशिक्षित, उच्‍च विचारशील, उदार, सच्‍्‌चरित और धार्मिक पुरुष थे। वह जाति-पाँति के कभी किसी को...

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मिसाल

सुन्‍हेड़ा गाँव के महिपाल सिंह बहुत ही सुशिक्षित, उच्‍च विचारशील, उदार, सच्‍्‌चरित और धार्मिक पुरुष थे। वह जाति-पाँति के कभी किसी को सताते न थे। जाति-पाँति और मजहब के आडंबरों से हमेशा कोसों दूर रहते थे। गरीबों का दुःख-दर्द समझने वाले और दीन-दुःखियों के मददगार बहुत ही नेक पुरुष थे। वह ग्राम वासियों के बड़े चहेते थे। लोग उनकी बड़ी इज्‍जत करते थे।

महिपाल बाबू की सज्‍जनता और नेकदिली देखकर कई ग्रामीघों ने एक बार एकमत होकर उन्‍हें ग्राम प्रधान के चुनाव में खड़ा कर दिया। वह खुशी-खुशी खड़े हुए और बड़ी सरलता से अपने विरोधियों को पटखनी देकर चुनाव जीत गए। समूचे गाँव में उनकी जय-जयकार होने लगी। जीत गया भई जीत गया, हार गया भई हार गया के नारों से समूचा गाँव गूँज उठा। तत्‍पश्‍चात वह गाँव के प्रधान घोषित कर दिए गए।

उनके घर के बगल में एक मुस्‍लिम परिवार रहता था जो निहायत ही बहुत ही गरीब था। उसके मुखिया थे अजीज। कमाने वाले एक और खाने वाले आधे दर्जन लोग। घर में आए दिन उपवास पर उपवास होता रहता था। दिन भर की हाड़तोड़ कड़ी मेहनत करने के बाद भी भरपेट रोटी नसीब न होती थी।

एक ओर दूसरों के खेत-खलिहान में दिन-रात कठोर परिश्रम दूसरी ओर उपवास पर उपवास के चलते भरी जवानी में ही अजीज अल्‍लाह को प्‍यारे हो गए। वह दुनिया छोड़कर चले गए। मौत ने उन्‍हें अपने आगोश में समेट लिया। उनकी जवान बीवी मेहरुन्‍निसा असमय ही विधवा हो गई।

एक तो सिर पर से पति का साया उठ गया दूसरे इस महँगाई के जमाने में चाश्र-चार बच्‍चों का खर्च। उन्‍हें पढ़ाने-लिखाने को भला कौन कहे, उनके पेट को भरपेट रोटी भी मिलना दुष्‍कर था। पति की मृत्‍यु के बाद मेहरुन्‍निसा गाँव में धनिकों के यहाँ मेहनत-मजदूरी करके अपने बच्‍चों का किसी तरह पेट पालने लगी। घर में रोटियों के लाले पड़े हुए थे। दो जून की रोटी बहुत ही मुश्‍किल से नसीब होती थी।

समयचक्र चलता रहा। देखते ही देखते उसकी बड़ी बेटी असमा आहिस्‍-आहिस्‍ता जवान और शादी योग्‍य हो गई। कंगाली में उसका सारा आटा गीला हो गया। वह कब जवान हो गई मेहरुन्‍निसा को यह पता ही न चला। यह देखकर वह परेशान हो उठी। एक ओर भुखमरी और गरीबी ने मजबूती से जकड़ रखा था तो दूसरी ओर समाज की आँखों में काँटा बनकर खटकने वाली जवान बेटी असमा थी। दो रोटियों का जुगाड़ ही होना बहुत कठिन था तो वह उसका विवाह वगैरह कहाँ से करती? महिपाल बाबू, मेहरुन्‍निसा को अपनी सगी बहन की तरह मानते थे।

एक दिन वह उससे बोले- असमा अब सयानी हो गई है। कहीं अच्‍छा सा घर-वर देखकर अब उसकी शादी कर दीजिए। जमाना ठीक नहीं है।

यह सुनते ही मेहरुन्‍निसा के नेत्रों में आँसू आ गए। वह सिसकती हुई बोली-घर में नहीं दाने अम्‍मा चलीं भुनाने भाईजान आप भी कैसी बात करते हैं। अरे भइया! आपको तो मेरा सब कुछ पता ही है। आपसे कुछ छिपा थोड़े ही है। मैं आपकी बात की कद्र करती हूँ लेकिन, तनिक यह सोचिए मैं मेहनत-मजदूरी करके बच्‍चों का जैसे-तैसे पेट पालूँ या बेटी का ब्‍याह करूँ? लगता है मेरी इन मासूम बेटियों की किस्‍मत ही खराब है। इनके अब्‍बा भी सबको छोड़कर असमय ही चले गए। इससे मेरे ऊपर मुसीबतों का पहाड़ ही टूट पड़ा।

यह सुनकर महिपाल बाबू बोले- अरे भई! ते आप चिंता क्‍यों करती हैं। मुझे भलीभाँति मालूम है कि आप सब दाने-दाने को मोहताज हैं लेकिन जब आपको अपनी बहन माना है तब मेरा भी तो कुछ फर्ज है। ऐसा कीजिए आप तो सिर्फ एक शरीफ सा अच्‍छा लड़का देखिए और बाकी सब कुछ मुझ पर छोड़ दीजिए। आपको लेशमात्र भी फिक्र करने की जरूरत नहीं है। मेरे रहते ऐसा हरगिज नहीं हो सकता कि रुपए-पैसे के अभाव में ये बेटियाँ घर में क्‍वाँरी ही बैठी रहें।

वह फिर बोले-हम हिंदू हैं और आप एक मुसलमान तो क्‍या हुआ? असमा आपकी ही नहीं हमारी भी बेटी है। अभी इंसानियत इस कदर मर थोडी ही चुकी है। अभी वह बची हुई है। यह भारत है पाकिस्‍तान या कोई अन्‍य विदेश नहीं। यहाँ की मिट्टी में संस्‍कार मिलते हैं। भारत माता सबको संस्‍कार देती हैं। यही हमारी सबसे बड़ी पहचान है। हिंदू-मुस्‍लिम और जाति-पाँति के भेदभाव के फेर में पड़ोसी अपने पड़ोसी के दर्द को न पहचाने, क्‍या यह भी कोई इंसानियत है? हरगिज नहीं। संस्‍कारविहीन इंसान, इंसान नहीं साक्षात पशु होता है।

फिर एक लंबी साँस लेकर वह बोले- इसलिए हम अधिक से अधिक जितना भी करने में समर्थ रहेंगे आपकी भरपूर मदद करेंगे।

उनका आश्‍वासन पाकर मेहरुन्‍निसा मन ही मन उन्‍हें दुआ देते हुए बोली-आज मैं सचमुच धन्‍य हो गई। अल्‍ला-ताला आपको लंबी उम्र दे। आपके बच्‍चे सुखी रहें। आज आपने मेरी सारी चिंता ही दूर कर दी। आप जैसा दिलेर शरीफ इंसान दुनिया में चिराग लेकर ढूँढ़ने पर भी न मिलेगा। आप जैसा नेक पड़ोसी भगवान सबको दे। आप वाकई बड़े महान हैं। अब मैं कुछ दिन चैन से और जी सकूँगी।

ईश्‍वर की मर्जी हुई कि हकीकत में असमा असहाय और निर्धन होते हुए भी बड़ी किस्‍मत वाली लड़की निकली। काश! ऐसा ही नसीब हर बेटी को मिले। इसके बाद मेहरुन्‍निसा ने पास के ही एक गाँव खेकड़ा में एक लड़के को देखभाल कर पंसद किया और निकाह की तारीख पक्‍की कर दी। उस लड़के का नाम था गुलजार अहमद। इससे पहले उसके अब्‍बा मुश्‍ताक अहमद अपनी ओर से रिश्‍ते की बात चलाने की गरज से मेहरुन्‍निसा के पास गए थे। तदंतर गुलजार को देखने के बाद मेहरुन्‍निसा ने सहर्ष हाँमी भर दी।

इसके पश्‍चात इतवार के दिन नियत तारीख पर गुलजार बारात लेकर हँसी-खुशी असमा के दरवाजे पर पहुँच गया। बारात आती देखते ही गुलजार और असमा की शादी का गवाह बनने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। गाँव के स्‍त्री-पुरुषों ने पारंपरिक रीति-रिवाज से बारात का स्‍वागत किया।

तत्‍पश्‍चात निकाह की रस्‍म पूरी की गई। वास्‍तव में असमा और गुलजार की शादी ने सांप्रदायिक सौहार्द की एक मिसाल कायम कर दिया। समाज को जाति, धर्म, मजहब और भाषा की बेडि़यों में जकड़ने वाले ठेकेदारों की आँखें खोल देने वाला सुन्‍हेड़ा गाँव एक बेहतर नजीर बन गया।

इस प्रकार विवाह समारोह धूमधाम से शाम तक चलता रहा। एक हिंदू प्रधान के परिवार की चौखट से एक मुस्‍लिम बेटी की डोली विदा हुई तो गाँव वालों के हाथ दुआ और आशीर्वाद के लिए एक साथ ऊपर उठ गए। यह विवाह समारोह उन लोगों को नसीहत देने के लिए काफी है जो जाति, मजहब और सप्रदाय की आड़ में समाज में जहर घालने का काम करते हैं।

असमा के विवाह यानी निकाह का पूरा का पूरा खर्च उठाने का बीड़ा उठाने वाले प्रधान महिपाल सिंह बखूबी अपना वचन निभाकर एक अमिट छाप छोड़ने में सफल रहे। इससे उनकी इज्‍जत और सोहरत में चार चाँद लग गए। उनके इस जज्‍बे को उनके परिवार और रिश्‍तेदारों ने तो भलीभाँति मजबूती दी ही साथ ही मुसलमानों ने भी सजदा किया।

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रचनाकार: अर्जुन प्रसाद की कहानी - मिसाल
अर्जुन प्रसाद की कहानी - मिसाल
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