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एस. के. पाण्डेय की बाल कविता - ठंडी रानी

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ठंडी रानी

(१)

ठंडी ने लिया मन में ठान ।

कर दूँगी सबको परेशान ।।

बच्चे बूढ़े और जवान ।

देख झुकेंगे मेरी शान ।।

(२)

किसी को था न ऐसा भान ।

ले लेगी अबकी ये जान ।।

फेल हुआ मौसम का ज्ञान ।

मानो हार गया विज्ञान ।।

(३)

चली उड़ाती मन में मौज ।

और बुलाई अपनी फ़ौज ।।

कोहरा आके छाए रोज ।

धूप न पाए कोई खोज ।।

(४)

ठंडी-ठंडी चले बयार ।

हर कोई सहता इसकी मार ।।

ऐसी ठंडी अबकी बार ।

पड़ी थी पहले कहें विचार ।।

(५)

पशु-पक्षी आदमी की बात ।

कहे कौन इनकी औकात ।।

काँपे सब अरु फिरैं लुकात ।

ठंडी ज्यादा कहि अकुलात ।।

(७)

कम्बल बिस्तर और रजाई ।

लगते मानो लिए नहाई ।।

जहाज ट्रेन व मोटर कार ।

थमीं सही सबकी रफ्तार ।।

(८)

ठंडी कहती मन मुसकाय ।

ग्लोबल वार्मिंग गई हेराय ।।

कहते बढ़ता जाये ताप ।

देखो तो मेरा प्रताप ।।

(९)

बिन बारिस बर्षा हो जाय ।

आग जले तो वेग बुझाय ।।

चादर देती श्वेत ओढाय ।

पानी को दूँ बर्फ बनाय ।।

(१० )

ठंडी रानी तजिए मान ।

ज्यादा अच्छा नहीं गुमान ।।

क्या पाओगी लेकर जान ।

हम सबसे ही तेरी शान ।।

(११)

कम से कम लो इतना जान ।

कहना सबका लीजे मान ।।

बचेगी जो हम सबकी जान ।

दिखा सकोगी आगे शान ।।

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डॉ. एस. के. पाण्डेय,

समशापुर (उ.प्र.) ।
ब्लॉग: श्रीराम प्रभु कृपा: मानो या न मानो

URL1: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

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