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अजय गोयल की कहानी - कम्पनी बहादुर

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कहानी कम्पनी बहादुर अजय गोयल य ह सिलसिला पिछले तीन-चार वर्ष से चल रहा था। अपनी वर्षगाँठ के दिन डॉ0 रघुनाथ शहर छोड़ देते। नर्सिंग होम भूलक...

कहानी

कम्पनी बहादुर

अजय गोयल

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ह सिलसिला पिछले तीन-चार वर्ष से चल रहा था। अपनी वर्षगाँठ के दिन डॉ0 रघुनाथ शहर छोड़ देते। नर्सिंग होम भूलकर सपरिवार अपने गणपति फॉर्म हाउस चले आते। धोती, कुर्ता और जनेऊ धारणकर दिन भर के लिए अपने स्वर्गीय पिता की प्रतिमूर्ति बन जाते। उनकी पत्नी शकुन्तला भी बढ़-चढ़कर साथ देती। सूती धोती पहनती। माँग में अन्य दिनों से थोड़ा ज़्यादा सिन्दूर भरती। माथे पर बड़ी-सी बिन्दी बनाती जो दो-तीन घंटे यज्ञ अग्नि से तप और पसीने में भीग पुच्छल तारे जैसी आकृति में आ जाती है। सूर्योदय के साथ यज्ञ आरम्भ हो जाता तो गोदान व वस्त्रदान के साथ सम्पन्न होता। इसके बाद कुटुम्बजन उनके पैरों की धूल आशीर्वाद के रूप में अपने-अपने माथे पर लगाते।

जीते-जीते अपनों के लिए एक चमत्कार बन चुके डॉ. रघुनाथ एक गाँव के गरीब परिवार में जन्में थे। उनका अक्षरज्ञान तख़्ती पर शुरू हुआ था। फटी टाट पट्टी पर बैठकर खुले आकाश के नीचे और बिना ब्लैक बोर्ड की क्लास से यात्रा शुरू कर नर्सिंग होम और फ़ॉर्म हाउस तक आ पहुँचे थे। आगे बढ़ने की यात्रा के लिए फ़्लोरी-कल्चर के पंख लगाकर विदेशों से डॉलर चुग लाने की तैयारी कर रहे थे। इसके लिए उन्होंने गाँव में हाईस्कूल के भवन निर्माण योजना का बलिदान कर दिया था। पिता की स्मृति में यह सब कर डॉक्टर साहब जन्मभूमि के ऋण से मुक्त हो जाना चाहते थे।

यज्ञ के बाद अपने भूले-बिसरे टीसते संकल्पों के साथ डॉ. रघुनाथ फॉर्म हाउस के द्वार पर आ खड़े होते। हर आने वाले का स्वागत गुड़-जल से करते और अन्दर उनका परिवार लड्डू-कचौरी का सहभोज अपनी निगरानी में कराता।

शाम उतरती तो डॉक्टर साहब सधे गले से निकले स्वरों में उछल-कूद करती राग-रागनियों के साथ दिन विदा करते। या कभी नरसीजी का भात सुनते। पर उस दिन भागीरथ बने उनके चेहरे पर बसन्त ठाठे मार रहा होता। इस बार के सान्ध्य कार्यक्रम में परिवर्तन था। पिछले वर्ष की एक छोटी-सी दुर्घटना ने डॉ. रघुनाथ को सोचने के लिए मजबूर कर दिया था, जिसके कारण उन्होंने अपने आपको सपनों तक में नंगा महसूस किया था। उनकी खुली आँखों के सामने वह दुर्घटना बार-बार घटती।

वह दोपहर का वक़्त था। ओ.पी.डी. में तिल तक धरने के लिए जगह नहीं थी। उस समय एक अनाड़ी दुबले पतले लड़के ने डॉक्टर साहब को दवा कम्पनियों का दलाल कहा। कमीशनखोर बोला और पूछा, ''आप लोकल कम्पनियों की दो से तीन गुना मंहगी दवाईयाँ क्यों लिखते हैं?'' उसके हाथ में डॉ. रघुनाथ का पर्चा और मॉरल ग्राउंड फ़ार्मा की दवाइयाँ थीं। मरीजों को साँप सूँघ गया। इसी बीच हॉस्पिटल स्टॉफ ने पहुँचकर उस लड़के को बाहर ले 2 जाकर पटक दिया। डॉक्टर साहब बहुत दिनों तक परेशान रहे। आख़िर मन्त्रणाओं के मन्थन से उन्होंने रास्ता तलाश लिया। गाँव में अपनी पुस्तकालय निर्माण योजना को स्थगित कर फॉर्म हाउस में स्वीमिंग पूल बनवा दिया। इसके साथ उन्होंने विधायक से लेकर एम.पी. तक से निजी सम्बन्ध बनाए। फ़ार्म हाउस में डिस्को डांस से लेकर कठपुतली नाच तक की व्यवस्था थी। आहिस्ता-आहिस्ता वहाँ अधिकारियों से लेकर राजनीतिज्ञों की गहमा-गहमी बढ़ने लगी। अब डॉक्टर साहब को अपनी भुजाओं में हाथियों जैसा बल और मन में विश्वास का अन्धड़ घुमड़ने लगा। वह सोचने लगे कि कोई हिमाकत तो करे, साले को कुचलकर सड़क किनारे टँगवा दूँगा।

इस साल सान्ध्य कार्यक्रम में आठ-दस मित्रा डॉक्टरों के अलावा डी.एम. और सांसद को भी डॉ. रघुनाथ ने निमन्त्रित किया था। इसलिए राग-रागिनी या कठपुतली नाच की जगह कार्यक्रम में कुछ आधुनिक रंग घोलने की उनकी कोशिश थी। मॉरल ग्राउंड फॉर्मा के रीजनल मैनेजर तिलक और उसके जूनियर नितीश के नुक्कड़ नाटक का सुझाव उन्होंने हाथों-हाथ लपक लिया था। नाटक के आयोजन की व्यवस्था नितीश ने कर डाली। पहले तरुणों को डाकू बनने दो, फिर करवाना आत्मसमर्पण। अपराधों की राख मलो, तो चमके प्रजातन्त्र का दर्पण। नितीश के मुँह से इन पँक्तियों में नाटक का सार सुनकर डॉ. रघुनाथ ने सूँघ लिया कि व्यवस्था के छोटे स्तम्भों को राजनीति का यह स्वांगभरा ट्रीटमेंट पसन्द आएगा।

वैसे भी अपने समारोह के लिए हर बरस किसी प्रायोजक का डॉक्टर साहब शिकार कर लेते। इस बार मॉरल ग्राउंड फार्मा प्रायोजक थी। उस दिन यज्ञ सम्पन्न होने के बाद सबके साथ तिलक ने डॉक्टर साहब के चरणों की रज अपने माथे पर बैठा ली। जिसे अकेले में झाड़ते हुए वह नितीश से बोला, ''इन जैसे डॉक्टरों के कारण मैंने यह मुक़ाम इतनी जल्दी पाया है। डियर, बिजनेस में जो फ़ायदा पहुंचाए वह भी हमारा बाप है।'' तिलक और नीतिश दोनों सुबह ही फ़ार्म हाउस पहुँच गए थे। वहाँ जीन्स कसे रहने वाला डॉ. रघुनाथ का बेटा आशीष धोती-कुर्ता पहने हुए था। उसे देखकर तिलक बोला, ''एंजायिंग।'' ''याह''। धोती सँभालते हुए आशीष का उत्तर था। साथ में उसने कन्धे भी उचका दिए थे। ''धोती-कुर्ते में क्रिकेट हो जाए तो ......... ? '' तिलक ने मुस्कराकर पूछा। इस पर आशीष जोश में बोला, ''आज वर्ल्ड कप के लीग मैच में भारत पाक का मैच है। अपना तो ये ही वर्ल्ड कप फ़ाइनल है। पूरे हंगामे का दिन है। इसलिए तो चौराहे पर पाक प्राइममिनिस्टर का पुतला फूँकने का कार्यक्रम पोस्टपोन कर दिया है। पाकिस्तानी खिलाड़ियों के घुटने तोड़ देने हैं आज। इससे पाक घुसपैठियों से लड़ रहे सत्रह हजार फुट की ऊँचाई पर तैनात कारगिल के जवानों का मनोबल सातवें आसमान पर जा पहुँचेगा। लेकिन जतिन नेट प्रैक्टिस के दौरान चोट खा गया है। उम्मीद तो पूरी है उसके खेलने की।''

उस समय नितीश को याद आया कि सुबह के अख़बार में कारगिल के शहीद मेजर प्रसाद का चित्रा गायब था। पर चोटिल जतिन की दस बाई बारह की तस्वीर इठला रही थी। साथ में एक लम्बा-चौड़ा इतराता लेख था। उसमें बल्लेबाजी के रिकॉर्डों को नाप चुका जतिन वामन अवतार था और भारतीय क्रिकेट का गोवर्धन उठाए कृष्ण था। उसके गोचर में काँइयाँ शनि की मंगल पर दृष्टि के कारण आजकल उसका पराक्रम पहले जैसा विस्फोटक नहीं रह गया था। लेकिन पराक्रम भाव में बैठे हुए चन्द्रमा ने उसे महान खिलाड़ी बनाया। ग्रहों में चन्द्रमा माँ का प्रतीक है। इसलिए कारगिल में लड़ रहे हज़ारों सैनिकों की माँओं की शक्ति शनि की दुष्टता पर निश्चित भारी पड़ेगी। और ओल्डट्रेफर्ड के पिच पर जतिन पाकिस्तानी गेंदबाजी के परखचे उड़ाकर उनके सीने पर तिरंगा लहरा देगा।

3 तिलक की चिन्ता दूसरी थी। उसे शाम के कार्यक्रम का सन्तुलन गड़बड़ाता नज़र आने लगा। ''कैसे प्रबन्ध में चूक हो गई?'' उसने सोचा। तुरन्त अपने अधिकारियों से फ़ोन पर बातें कीं। इसके बाद वह सामान्य हो गया।

तिलक को लगता कि इस क्रिकेट ने अपने गिल्ली-डंडे का गला घोंट दिया है। फ़ॉर्म हाउस के काले हिरनों को चुग्गा खिलाते हुए उसके दिमाग में एक नयी योजना कौंध गई। उसने सोचा, ''क्यों न डॉक्टर साहब अपनी मैरिज एनीवरसरी का जश्न मनाएँ? उसमें गिल्ली-डंडे का टूर्नामेंट कराया जाए। यह चेंज अच्छा रहेगा। तगड़ा प्रचार मिलेगा। फिर आजकल ज़माना उल्टा चल रहा है। पहले ग़रीब मोटा अनाज खाता था। आज अमीर खाता है। पहले गरीब सूती पहनता था, आज अमीरर पहनता है।'' डॉक्टर साहब के लम्बे-चौड़े फ़ार्म हाउस के एक कोने में तिलक नितीश के साथ खड़ा था। फ्लोरी कल्चर में साल भर की मेहनत रंग भरती लग रही थी। नितीश के गले में हाथ डालकर तिलक बोला, ''अफ़सोस यही है कि कितना भी कोई सफल हो जाए, पर उसे आदमी बने रहना पड़ता है। रहना धरती पर पड़ता है और मरना भी धरती पर होता है। तभी वह अपनी जड़ों की तलाश में भटकता है। इसके लिए लाख नौटंकी करता है। अब ससुरा डॉ. रघुनाथ डिस्को में जाकर कूल्हे मटकाने लगे तो कोई दो पैसे फेंकेगा इस पर। जानता है। इसलिए यज्ञ करेगा। इंटरनेट के इरा में कठपुतली नचवाएगा। पक्के राग का घंटे भर तक आलाप सुनेगा और बोर होगा, फिर भी संतोष का रंग मुँह पर पोते रहेगा। हमें क्या? पर डॉक्टर के लौंडे का मुझ पर बड़ा अहसान है।''

अन्यथा साल भर तक एक एरिया मैनेजर के रूप में मिलते रहने के बाद भी तिलक अपनी कम्पनी का कोई भी प्रोडक्ट डॉ. रघुनाथ से लिखवाने में सफल नहीं हो सका था। उन दिनों मरीज़ों से लबालब भरा डॉक्टर साहब का नर्सिंग होम देखकर तिलक पसीने-पसीने हो जाता। चैम्बर में आने से पहले वह पूरी हनुमान चालिसा मन-ही-मन दोहरा लेता। तभी एक सुनहरे दिन उसे भनक मिली कि डॉ. रघुनाथ व आशीष के बीच एक एयर कंडीशनर पर ठनी है। जिसे वह अपनी गर्लफ्रेन्ड दीप्ति को 'बर्थ-डे' गिफ्ट के रूप में देना चाहता था। डॉक्टर साहब को आशीष का यह न समझ आने वाला बेवकूफी भरा कदम लगता। क्रिकेट के मैदान से छनकर तिलक को यह ख़बर नसीब हुई थी। उस दिन पहली बार तिलक को जीत का पाला नज़रों के सामने महसूस हुआ था। उसे लगा था कि कितना महान है क्रिकेट। वह क्रिकेट मैदान के कारण हाथ आए अवसर पर शतकीय पारी जैसा कुछ कर गुजरना चाहता था। उसे मालूम था कि डॉ. रघुनाथ के गले में फन्दा पड़ गया तो इलाके भर में उसके प्रॉडक्ट की धूम मच जाएगी। बिना वक़्त जाया किए उसने अधिकारियों से फ़ोन पर बातचीत की। अगले दिन वह एक एयरकंडीशनर के साथ डॉ. रघुनाथ के नर्सिंग होम में था। जाते वक़्त डॉक्टर साहब ने उससे पूछा था, ''क्या लिखवाना चाहते हो?'' उन दिनों जाड़े के दिन थे। आधी दुनिया के फेफड़े खाँसते-खाँसते बलगम से धरती का वक़्त-बेवक़्त अनुष्ठान कर रहे थे। सावन के अन्धे को और चाहिए भी क्या था?

''सर, एक एन्टीबायटिक और साल्ब्यूटामोल''। खुशी में ब्रांड के स्थान पर मेडिसिन का नाम तिलक के गले से निकला था। इसके बाद सम्बन्धों की डोर तिलक ने खुद कात ली, क्योंकि डॉ. रघुनाथ जो कुछ लिखते उसे शहर के झोला छाप डॉक्टर शिरोधार्य कर लेते। और प्रॉडक्ट की धूम मच जाती। पिछले शारजाहा में हुए एशिया कप टूर्नामैंट के दौरान तिलक ने डॉ. रघुनाथ के चैम्बर में एक टी.वी. सेट स्थापित कर दिया। क्रिकेट के शौक़ीन डॉक्टर साहब हैं, वह जानता था। इसके बाद अपनी व्यस्तता में उन्हें मैच के दौरान 4 पिच पर झाँकने का सुयोग्य मिलने लगा।

अब डॉक्टर साहब मॉरल ग्राउंड का साल्ब्यूटामोल ब्रांड छोड़कर उसका एक टॉनिक लिखने लगे थे। उस समय नितीश कम्पनी में नया-नया था। उसकी जिज्ञासा का तिलक ने समाधान किया। बोला, ''डॉक्टर कोई एक ब्रांड थोड़े ना लिखते चला जाता है। चेंज करता रहता है। साल्ब्यूटामोल डॉक्टर साहब ने किसी और दवा कम्पनी का पकड़ लिया होगा। वैसे टॉनिक लिखें, इसमें ज़्यादा लाभ है। हज़ारों साल पुराना हमारा प्यारा हिन्दुस्तान एक थका हुआ देश है। इसलिए यहाँ के पहलवान को भी टॉनिक की प्यास लगी रहती है। फिर टॉनिक में लगता क्या है? एक के दस मिलते हैं। और हर किसी को लिखा जा सकता है।'' उस समय दोनों डॉक्टर साहब के चैम्बर में थे। बीच में डॉक्टर रघुनाथ को सीरियस मरीज़ देखने वार्ड में जाना पड़ा। नितीश रिमोट लेकर टी.वी. चैनलों में उलझ गया। रिमोट का वह बटन दबाता तो चैनल बदलता और पर्दे पर क्षण में पहला सबकुछ मिट एक नया संसार उभर आता। किसी धारावाहिक में समय हज़ारों वर्ष पीछे छलाँग लगाकर धृतराष्ट्र की सभा में जा पहुँचता। जहाँ द्रौपदी पितामह से अपनी शील रक्षा भीख माँग रही होती। अचानक करुण दृश्य को कुछ समय के लिए स्थगित कर सन्तुलन की कमान विज्ञापन सँभाल लेते, जिसमें विदेशी साबुन के झागों में सनी सिने तारिका अपना शील बेचने के लिए आमादा लगती। उसे देख, बाल सुलभ उत्सुकता में डुबकी लगाकर तिलक बोला, ''अरे, ई वोई तो मकड़ी है जिसने प्रोड्यूसर डायरेक्टर बाप-बेटे दोनों को ही अपने मायाजाल में एक साथ कठपुतली बना रखा है।''

सुनकर अचकचा गया था नितिश। उसने चैनल ही बदल दिया। पर्दे पर शारजाह का क्रिकेट स्टेडियम फिर झाँकने लगा था। श्रीलंका के साथ भारतीय टीम का मैच चल रहा था। मैच में जब ओवर समाप्त होता तो क्षणों के ख़ाली वक़्त में विज्ञापन चहकने लगते। उनमें पर्दे पर भागती कार सीधे चैम्बर में छलांग लगाती महसूस होती। विज्ञापनों ने पुराने दिग्गजों को नयी जिन्दगी दे दी थी। भीम चार-पाँच गिलास ठंडा पीकर सोफ़्ट ड्रिंक्स के लायक हो गए थे। और हनुमान संजीवनी का अर्थ कुदरत की शक्ति बताकर तेल बेच रहे थे। लगता कि पुराने महानायक मातम मना रहे हों कि आज क्यों न पैदा हुए? पैदा होते तो मॉडलिंग जैसी क्रिकेट देखते हुए सोफ़्ट ड्रिंक्स का प्रसाद पाते और विदेशी कार में घूमते। फिर इस सदी के सच्चे भारतीय बनते। आख़िर कम्पनियों का उग्रवाद हमारे राष्ट्रवाद का क ख ग बन गया है।

इस बीच मैच का अगला ओवर शुरू हुआ। उसकी दूसरी गेंद पर बाउंड्री पार शॉट था। बाउंड्री पर दर्शकों के हाथों में झूलते बैनरों के दर्शन मुफ़्त हो गए। उनपर लिखा था, ''क्रिकेट इज़ अवर रिलीजन। जतिन इज अवर गॉड।''

''क्रिकेट में कुछ सालों में अरबों कमाने वाला महानायक जतिन इस ग़रीब देश का देवता है। वह अपने बल्ले पर किसी कम्पनी का लोगो लगाने के लिए करोड़ माँगता है। किसी विज्ञापन में अपने चेहरे की मुँह दिखाई में करोड़ों डकार लेता है। और इसी देवता की आड़ में मल्टीनेशनल कम्पनियाँ हमारे द्वारे हमसे निःसंकोच व्यवहार की भीख माँगती है, जिससे वे अपना अरबों का धन्धा खरबों का कर सकें। द्वार पर आए त्रिदेवों तक को बन्धक बनाने वाले अपने देश में आज कहां है इतनी ताकत कि इन कम्पनियों के गले में पट्टा बाँधकर इनको दुह लें।'' नितीश ने तिलक से कहा। दोनों डॉ. रघुनाथ के चैम्बर में से उठकर बाहर आ गए थे।

''तुम्हारी सोच तो पिछड़ी हुई है और आतंकवादियों जैसी।'' तिलक का उत्तर था।

नितीश ने जवाब नहीं देना चाहा। अन्यथा विवाद होता। वह कम्पनी के काम में व्यस्त हो गया। अकेले डॉक्टर 5 रघुनाथ ही टॉनिक की लगभग 40-50 बोतलें प्रतिदिन लिख रहे थे। जिनकी लगातार उपलब्धता का दायित्व उसका अपना था।

श्रीलंका के खिलाफ़ एक और शतक ठोक देने पर जतिन अगले दिन अखबारों में छाया था। अब उसकी पारी में समीक्षकों को कोहिनूर के चमक के साथ आध्यात्मिक अनुभव तक होने लगे थे।

तीन-चार दिन बाद डॉ. रघुनाथ की नितीश के लिए कॉल थी। इन पिछले दिनों में एशिया कप फ़ाइनल में जतिन के होते हुए भी पाकिस्तानी टीम से भारतीय टीम एक बार फिर पिट गई थी। डॉक्टर साहब द्वारा बुलाये जाने का कारण नितीश अन्य कम्पनियों के रिप्रजेन्टेटिवों से पता कर चुका था। अपने पिता की स्मृति में फ्री दवाएँ बाँटकर परमार्थ का बैंक बैंलेंस मोटा कर लेना चाहते थे डॉ. रघुनाथ। इसलिए दवाओं के साथ नितीश पहुँचा था। चैम्बर में पहुँचने पर डॉक्टर साहब बोले, ''तुम्हारा टी.वी. सेट तो इंडियन क्रिकेट की तरह फुस्स हो गया।'' ''सर, कल ही यह ठीक करा दिया जाएगा। दवाएँ मैंने बाहर रख दी हैं ...।'' संक्षिप्त-सा नितीश का उत्तर था। हार से डॉक्टर साहब व्यथित थे। बोले, ''अपनी टीम बेइज्जती कराने शारजाह जाती ही क्यों है? जब पता है फाइनल शुक्रवार को ही होगा। उसमें पाकिस्तान को ही जीतना है। चाहे अम्पायरों को एल.बी.डब्ल्यू. से भारतीय खिलाड़ियों के कितनी भी सिर काटने पड़े।''

''सर, मैचों को जीत-हार से नहीं जोड़ना चाहिए। खिलाड़ी तो क्रिकेट नोटों के लिए खेलते हैं। इसमें कहाँ से आ गया। अब जतिन को ही लीजिए। करोड़ों के उसके पास कॉन्ट्रेक्ट हैं। अकेले एक सोफ़्ट ड्रिंक्स कम्पनी से 8 करोड़ का है।''

डॉक्टर साहब निरुत्तर थे।

इसके बाद नितीश जब चैम्बर से बाहर निकला तो उसके साथ डॉक्टर साहब की सूफ़ीयाना यादें थीं। कोई दाँत चमकाकर और ठंडी बोतल पीकर सालभर में करोड़ों अपनी झोली में भर ले तो औरों को ज़िन्दा रहने के लिए सूफ़ी सन्त ही सहारा दे सकते हैं। डॉक्टर साहब ने नितीश को भाषण पिला डाला था। बोले, ''डियर, यह सच है, जो दीखता है, वह मिथ्या है, भ्रम है। और जो सच है वह कहीं नजर नहीं आता। कभी सोचा है, इस पृथ्वी पर जो हंगामा हो रहा है, वह किसकी बदौलत हो रहा है। बृहस्पति और शनि ग्रहों की वज़ह से। जैसे कोई बुजुर्ग अपने नन्हें बच्चे को गोद में छिपाए रखता है, ठीक उसी तरह बृहस्पति हमारी पृथ्वी को बचाए हुए है। नहीं तो कब का कोई आवारा छोटा-मोटा आकाश पिण्ड धरती की धड़कनों को दफ़न कर गया होता। और शनि महाराज की वज़ह से धरती कभी तपती है, कभी हँसती है तो कभी ठंडी हो जाती है। असली सितारे ये हैं।''

कम्पनियों ने वर्ल्ड कप को भुनाने की शुरुआत डॉक्टरों के मध्य क्रिकेट खिलाड़ियों को भेजने के लिए 'गुडलक' कार्ड देने से शुरू की। नितीश ने तिलक को सुझाव दिया कि अपनी कम्पनी को जतिन का कोई हमशक्ल ढूँढ़ लेना चाहिए। जो कम्पनी को प्रमोट करे, क्योंकि असली करोड़ों में बिक चुका है। मल्टीनेशनल कम्पनियों के हाथ। हम उसकी आरती करने लायक रह गये हैं। आरती श्री जतिन लला की।

नितीश को लगता कि क्रिकेट अब उद्योग है। जिसकी पार्टनर बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ है उसके सेल्समैन क्रिकेट टीम के खिलाड़ी हैं। पिच स्टेज है। कैसी आध्यात्मिकता से लथपथ है वातावरण। वर्ल्ड कप बैनर गली-गली में टँगे हैं। टी.वी. के पर्दे पर दुनिया को हिला डालने का शोर है। अपनी ग़रीबी में तृप्त, नंगेपन में मस्त और क़र्ज के अघाए देश में क्रिकेट का उन्माद नसों में खदक रहा है। विज्ञापनों में जनित को तिलक लगाकर शंख ध्वनि के बीच पिच 6 पर तिरंगा फ़हराने भेजा जा रहा है। टीम के लिए हर कोई आल-द-बेस्ट गा रहा है। अप्रवासी महामानव जीत में आत्मसम्मान की मलाई ढूँढ रहे हैं। और भस्मासुर बनी विदेशी कम्पनियाँ अलख जगा रही हैं। उठो, हमारी ठंडी बोतलों से कुल्ला करो। हमारी जींस कसो। हमारे जूते पहनकर खड़े हो सकने लायक बनो। हमारी बाइक पर चढ़ क्रिकेट मैदान पहुँचों। और मर्द हो तो मीर जाफ़र के नये अवतार बनो। हमारी लूट में साथ रहोगे तो हम तुम्हें महानायक बना देंगे। आख़िर इस देश के पिछले हज़ार साल लूट के कई संस्करणों के गवाह हैं।

मैन-चेस्टर का ओल्डट्रेफर्ड स्टेडियम दिल्ली और लाहौर में बँटा था। दर्शक राष्ट्रीय झंडों को पोशाक बनाए हुए थे। मैच शुरू होने से पहले टी.वी. स्क्रीन पर 15-20 मिनट तक विज्ञापनों का युद्ध चला था। कारों ने युद्ध का बिगुल बजाया। एक खास कार में जतिन आकाश तोड़कर पृथ्वी पर उतरता और ऊबड़-खाबड़ रास्तों को दनदनाता पार करता जाता। या विज्ञापनों के बीच पर्दे पर जतिन समूचे समुद्र को बिलो प्यास बुझाने के लिए कोला पेश करता। पर मैच के शुरुआती ओवरों में ही लहराते बैनर आग उगलने लगे थे। उनमें लिखा था कश्मीर और वर्ल्ड कप दोनों हमारे हैं। या पाकिस्तानी टीम परमाणु बम है। उन्हें देख आशीष उबल गया। तिलक से बोला, ''सब शनि ग्रह के कारण है। जतिन पर शनि की आजकल टेढ़ी-नज़र चल रही है ना। अब हार गई समझो अपनी क्रिकेट टीम आज। कारगिल में लड़ रहे सैनिकों के मनोबल का क्या होगा? जतिन ही तो है अपने पास जो पिच पर अंगद की तरह जमना जानता है।''

कुछ देर बाद दूसरा भारतीय खिलाड़ी आउट हुआ तो आशीष ने अपने बाल नोच लिये और चैनल बदल दिया। उस पर न्यूज कैप्सूल प्रसारित हो रहा था। 20 फुट ऊँचे और 60 किलो फल दे चुके अपने बैंगन के पेड़ के साथ अब्दुल मजीद खड़ा था। गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में अपना नाम दर्ज होने पर बस मुस्करा भर रहा था अब्दुल। लेकिन अपने पेड़ का पेटेन्ट कराने के सवाल पर मजबूती से उसने ना में सिर हिला दिया। उस समय ग्लेडिएटर की तरह व्यवहार कर रहे आशीष ने अपना मुँह बिचका दिया था। अशान्त तो वह था ही। बेचैनी में जाते हुए बोला, ''एम. पी. और डी. एम. साहब आने वाले हैं। उनके लिए ड्रिंक्स और चिकन का इन्तज़ाम देखूँ।''

''चिकन। ड्रिंक्स। एम.पी.। हम उनके सामने नुक्कड़ नाटक करेंगे और वे शराब पीते हुए चिकन तोड़ेंगे। वो नुक्कड़ होगा या मुजरा।'' नितीश ने पूछा।

तिलक ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने टी.वी. रूम से बाहर देखा तो कुछ हलचल थी। पाक प्रधानमंत्री के पुतले के साथ एल.सी.डी. प्रोजेक्टर आ गया था। तिलक की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। अब क्रिकेट मैच का सीधा प्रसारण ओपन मिनी थियेटर के अनुभव के साथ देखा जा सकता था। इस विशेष प्रबन्ध के लिए उसने अधिकारियों से सुबह फ़ोन पर बात की थी।

फ़ॉर्म हाउस के फ़व्वारे के पार्श्व में आठ बाई चार फुट की स्क्रीन लगाई गई। पास ही पाक प्रधानमंत्री का पुतला उल्टा लटका दिया गया। दो-चार जूते मारकर उसका अभिषेक किया गया।

शाम सात बजे तक भारतीय टीम ने अपने 50 ओवरों की निश्चित पारी में 218 रन बनाए थे। इस बीच नुक्कड़ की पूरी टीम फ़ॉर्म हाउस आ चुकी थी।

डी.एम., सांसद और डॉ. रघुनाथ के मित्रा डॉक्टर भी आए और क्रिकेट मैच में अटक गए। पाकिस्तानी टीम की बल्लेबाजी शुरू हो चुकी थी। इस बीच सांसद महोदय नुक्कड़ टीम को भी आदरपूर्वक अपने साथ बुला लाए। पाक टीम ने बल्लेबाज़ी मूँछ मरोड़ आक्रामकता के साथ शुरू की। पाकिस्तान जिन्दाबाद के नारे लगातार प्रसारण में सुनाई 7 पड़ भी रहे थे। 19 रन पर पाकिस्तानी सलामी बल्लेबाज़ क्लीन बोल्ड हो गया। इसके साथ आशीष ने पटाखों की एक लम्बी लड़ी फ़ॉर्म हाउस में स्वाहा कर दी थी।

केवल 78 रन पर पाकिस्तानी टीम के पाँच विकेट गिरने के बाद हर गेंद पर विकेट की प्यास दर्शकों के चेहरे पर उतर आई थी। वातावरण में पटाखों का युद्ध प्रारम्भ हो चुका था। स्टेडियम में सभी भारतीय ढोल और मँजीरों के साथ 'मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे-मोती' फ़िल्मी गीत गा रहे थे। पैंतालीसवें ओवर तक पाकिस्तानी टीम 175 रन बना सकी थी। जबकि उसका अन्तिम विकेट गिरना शेष रह गया था। जीत भारतीय टीम की मुट्ठी में थी। तभी स्टेडियम में पाक समर्थकों ने तिरंगे को जलाने की कोशिश की। क्षण-भर में वहाँ अफ़रा-तफ़री फैल गई। थोड़ी देर के लिए मैच रोक दिया गया। उस समय आशीष लगातार पटाखे जला रहा था। जश्न की उत्तेजना में वह अपनी कार पर चढ़कर ठुमकने लगा। उस रुके हुए समय में विज्ञापन स्क्रीन पर धूम-धड़ाका मचा रहे थे। इस बीच आशीष गुस्से में कार से उतरा और पाक प्रधानमंत्री के पुतले को दो-चार जूते लगाकर उसमें आग लगा दी।

नितीश ने सोचा, 'तिरंगा जले। या कोई पुतला। क्या फ़र्क पड़ता है कम्पनियों को? उन्हें तो क्रिकेट के साथ अपना माल बेचने से मतलब है।' उसने डॉक्टरों से घिरे तिलक को देखा। वे सब भव्य प्रबन्ध के लिए उसे बधाई दे रहे थे। सबने चिकन और ड्रिंक्स के साथ मैच और समय को गटका था।

मैच एक बार फिर शुरू हुआ। एक रन भी बना। अगली गेंद पर पाक का अन्तिम विकेट गिर गया। भारत मैच जीत गया था। उठकर सब नाचने लगे। बधाई देने लगे। उस समय नुक्कड़ टीम की किसी को चिन्ता भी नहीं थी। टीम ने चुपचाप पैकअप किया और गणपति फ़ॉर्म हाउस से बाहर हो गई।

अजय गोयल

निदान नर्सिंग होम

फ्री गंज रोड

हापुड़ - 245101

a.ajaygoyal@rediffmail.com

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर: 3
  1. भारतीय नागरिक8:11 pm

    हर ओर यही हो रहा है..

    जवाब देंहटाएं
  2. बेनामी5:35 pm

    sahi baat hai par sanvedansheel hardey se prapt anubhav zindagi ko sahaj kar deta hain

    जवाब देंहटाएं
  3. बेनामी10:45 pm

    sochane par majboor karti hai . good & diffrent.yad bhee rahegee .

    जवाब देंहटाएं
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रचनाकार: अजय गोयल की कहानी - कम्पनी बहादुर
अजय गोयल की कहानी - कम्पनी बहादुर
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