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शंकर पाटिल की मराठी कहानी - जीत

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जीत अनुवादक – डॉ. विजय शिंदे (मूल कहानी मराठी के प्रसिद्ध लेखक शंकर पाटिल की है। इनका जन्म कोल्हापुर से नजदीक हातकणंगले तहसिल के पट्टण ...

जीत

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अनुवादक – डॉ. विजय शिंदे

(मूल कहानी मराठी के प्रसिद्ध लेखक शंकर पाटिल की है। इनका जन्म कोल्हापुर से नजदीक हातकणंगले तहसिल के पट्टण कोडोली गांव इ. स. 1926 में हुआ। मराठी भाषा, साहित्य और फिल्म जगत् के लेखक के नाते बडा योगदान रहा। इनकी ग्रामीण कथाकार के नाते पहचान बनी। इन्होंने वावटळ, युगे युगे मी वाट पाहिली, गणगौळण, भोळीभाबडी, पाहुणी, पिंजरा, भुजंग, एक गाव बारा भानगडी आदि मराठी फिल्मों का पटकथा लेखन भी किया; यह फिल्में मराठी फिल्म जगत् में मानदंड मानी जाती है। वळी॓व-1958, भेटीगाठी-1960, आभाळ-1961, धिंड-1962, ऊन-1963, वावरी-1963, खुळ्यांची चावडी-1964, खेळखंडोबा-1974 प्रसिद्ध कहानी संग्रह रहें। इ. स. 1985 को नांदेड में संपन्न मराठी साहित्य संमेलन के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। मृत्यु इ. स. 1994 में हो गई।)

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मैदान में चारों ओर भीड़ उमड़ पड़ी थी। चारों तरफ लोग ही लोग दिखाई दे रहे थे। पास-पड़ोस के गांवों के सारे लोग मुकाबला देखने के लिए मैदान में इकठ्ठा हो रहे थे।

जैसे ही समय नजदिक आने लगा, एक-एक बैलगाड़ी मुकाबले के स्थान पर आकर खड़ी होने लगी। गांव के तुका पाटिल की भी गाड़ी वहां आकर खड़ी हो गई। जैसे ही उसकी गाड़ी आ गई लोगों का हुजूम उसकी ओर उमड़ पड़ा, गाड़ी के चारों तरफ घेरा करके खड़े हो गए। उसकी ओर दर्शक पागलों की तरह देखने लगे।

तुका पाटिल ने गाड़ी को अपना बूढा हर्ण्या बैल जुतवाया था। हर्ण्या अपने साथी जवान खिलारी (गाय और बैलों की एक अच्छी नस्ल जो केवल पश्चिम महाराष्ट्र में पाई जाती है।) सांड़ के साथ खड़ा था और लोग उसकी ओर आश्चर्य से बिना पलक झपकाएं देख रहे थे। असल में लोगों को मालूम भी था कि जवानी में हर्ण्या ने कई मुकाबले जीते थे। उसकी दौड़, ताकत और खासियतें किसी से छिपी नहीं थी। यह सच था कि सारे इलाके में नाम कमाने वाला वह अकेला बैल था। लेकिन अब... वह बूढा हो चुका था। उसकी पसलियां निकली थी। वह पूरी तरह थक चुका था। चेहरे और शरीर पर अब तेज नहीं था। अपने साथी खिलारी जवान बैल के साथ कैसे दौड़ सकेगा? लोग चकित थे, चिंतित भी हो रहे थे और तुका पाटिल को मन ही मन कोस रहे थे। वे समझ नहीं पा रहे थे कि इस पागल ने बूढे बैल को क्यों जोता है?

धीरे-धीरे गाड़ियों की संख्या बढ़ने लगी और मुकाबले की कतार में खड़ी होने लगी। कुछ बैल फूर-फूराने लगे। किसी के जवान सांड़ जैसे बैल डरकने लगे। कोई गर्दन झुका कर सींग हिला रहा था, और कोई खुरों से जमीन खुरच रहा था। हर्ण्या का साथी भी मचल रहा था। सारे लोगों की नजरें हर्ण्या पर टिकी थी, वे उसे टकटकी लगाए देख रहे थे। हर्ण्या की गति और दौड़ना उन्हें मालूम था। उसकी तेज रफ्तार से सभी परिचित थे। एक जगह पर ठहरी हुई बैलगाड़ी के साथ वह कभी भी शरारतें नहीं करता था। डरकता नहीं। सींग हिलाता नहीं। लेकिन एक बार दौड़ना शुरू हुआ और पहियों की खड़खड़ाहट कानों पर पड़ी कि उसके पांव हवा से बाते करने लगते थे। पहियों की आवाज के साथ वह छलांगे भरने लगता था। उसे कभी भी हांकने की जरूरत नहीं पड़ती थी। समय आ भी गया तो वह अपने साथी बैल को भी खिंचते हुए दौड़ने लगता था!

हर्ण्या की दौड़ के बारे में किसी को शक नहीं था, लेकिन अब उसकी उम्र हो गई थी। बाजार या मेले जाते वक्त एकाध झलक दिखाना अलग बात होती है और मैदान में उतर कर दौड़ना अलग। यह जिम्मेदारी वह कैसे निभाएगा, इसकी चिंता दर्शकों को सता रही थी। और इधर तुका बेफिक्र था। हर्ण्या भले ही बूढा हो पर उसका उस पर भरौसा था। लोग चिंतातुर होकर उसकी गाड़ी की ओर देख रहे थे और तुका बेफिक्री से चेहरे पर हंसी बिखराते उनकी ओर देख रहा था।

इशारा हो गया। बैलगाड़ियां दौड़ने लगी, पहियों की खड़खड़ाहट शुरू हो गई। हर्ण्या के अंग-अंग में फूर्ति आने लगी। सभी को चिंतित करने वाला बूढा बैल जवान घोड़े के समान लंबी-लंबी छंलागे भरने लगा। उसके पांव जमीन पर ठहरने का नाम नहीं ले रहे थे। साथ वाले दूसरे खिलारी जवान बैल की बाजू पीछे पड़ने लगी। देखते ही देखते बाकी बैलगाड़ियों को पीछे छोड़ते हुए बूढे बैल की गाड़ी आगे निकले लगी। तूफानी रफ्तार से हर्ण्या अंतर कम करने लगा। दूसरे गाड़ीवान औंधे हो-होकर बैलों पर कोड़े बरसाने लगे। सभी लोग पागलों की तरह आंखें फाड़ कर देख रहे थे।

बैलगाड़ियां दूर-दूर गई, आंखों से ओंझल हो गई। इधर लोगों की जबान पर हर्ण्या की बातचित शुरू हो गई। जैसे-जैसे बैलगाड़ियां वापस लौटने का समय हो गया वैसे-वैसे दर्शक गर्दन उठा-उठा कर देखने लगे। आस पास के सारे पेड़ दर्शकों से लदा-लद भर गए। दूर से ही गाड़ीवानों का शोर और पहियों की आवाज कानों पर पड़ रही थी। वैसे ही दर्शकों का मन मचलने लगा यह जानने के लिए की किसकी गाड़ी आगे है? लोग टीलों पर, पेड़ों पर चढ़-चढ़कर देखने लगे। उसी समय एक पेड़ से कोई जोर से चिल्लाया, ‘बैलगाड़ी आ गई, बैलगाड़ी आ गई, बूढे बैल की ही!’

दर्शकों की उत्सुकता चरम पर थी, वे मैदान में इधर-उधर दौड़ कर अपनी जगह पक्की करने लगे ताकि बैलगाड़ियों को साफ देख सके। मानो उनकी आंखों मे जान आ गई थी। हर्ण्या को देखने के लिए लोग रास्ते पर दोतरफा खड़े हो गए थे। इतने में तुका पाटिल की बैलगाड़ी नजदीक आ गई। दो-तीन बैलगाड़ियां उसके पीछे से आगे निकलने की कोशिश कर रही थी। कांटे का मुकाबला शुरू था। बैलों के नथुनों और मुंह से झाग टपकने लगा था। पहियों की खड़खड़ाहट कानों में गुंजने लगी थी और हर्ण्या का ताकत लगा कर दौड़ना जारी था। पीछे से आ रही किसी भी बैलगाड़ी को वह आगे निकलने नहीं दे रहा था। मुकाबले का अंतिम लक्ष्य नजदीक आने लगा था। हर्ण्या के मुंह से निकलने वाली झाग सामने वाले दोनों पैरों पर गिरने लगी थी, उसे अपनी जान की भी परवाह नहीं थी, लक्ष्य था केवल जीत हासिल करना। पीछे से आने वाली बैलगाड़ी के पहियों की जैसे ही आवाज आती वैसे ही वह और अधिक छलांगे भरने लगता था...

इसी जोश में तुका पटिल की गाड़ी लक्ष्य को लांघ कर थोड़ा आगे जा कर रूक गई। वैसे ही लोगों के हुजूम ने हर्ण्या को घेर लिया। दर्शक गर्दन उठा-उठा कर हर्ण्या को देख रहे थे।

...लेकिन हर्ण्या अपनी ओर उमड़ी भीड़ से मोहित नहीं था, शांत था। उसने प्रतिक्रिया स्वरूप कान नहीं उठाए। सींग नहीं हिलाए। गर्दन से जुआ हटाते ही वह धम से नीचे बैठ गया और एकाएक उसकी गुदा से खून की धार बहने लगी। र्ह्ण्या ने गर्दन लुढ़काई और अपने चारों पांवों को फैला कर करवट बदली। उसके पिछले दोनों पैरों की एड़िया जमीन पर घिसने लगी। मिट्टी उछल कर ऊपर उठने लगी और गढ्ढा पड़ने लगा...

मूल मराठी कहानी – शंकर पाटिल

अनुवाद – डॉ. विजय शिंदे, देवगिरी महाविद्यालय, औरंगाबाद.

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर: 27
  1. marmantak kahani...sadha hua anuvaad...abhar..

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  2. कविता जी यह ताकत और कमाल मेरा नहीं मूल ग्रामीण लेखक के नाते पहचान प्राप्त कर चुके और मराठी फिल्म जगत को बडा योगादान देनेवाले शंकर पटिल जी के कलम का है। कहानी के अनुवाद के पिछे यहीं उद्दे्श्य था कि एक उत्कृष्ट कहानी हिंदी पाठकों तक पहुंचे। टिप्पणी के लिए आभार।

    जवाब देंहटाएं
  3. अत्‍यन्‍त शानदार कहानी। बैल को मानुषिक वेदना प्रकट करता उकेरा गया है कहानी में। बहुत ही प्रेरक।

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    उत्तर
    1. विकेश जी कहानी पसंद आई, आभार। सच कहा आपने बैल को मनुष्य रूप में वर्णित किया है और उसमें मानवीय भाव भी भरे हैं। भारतीय किसानों के लिए बैल बैल नहीं तो उनके घर का एक सदस्य ही होता है। यह बात बैल के लिए ही लागु होती है ऐसी बात नहीं उसके परिवार में पल रहे प्रत्येक पशु सदस्य के लिए लागु होती है।

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  4. बहुत ही मार्मिक कहानी,आभार.

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. राजेंद्र जी अप कहानी के मर्म तक पहुंचे इसका अर्थ होता है आपके हृदय में भारतीय संस्कृति और किसान बैठा है।

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  5. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    जवाब देंहटाएं
  6. कांटे का मुकाबला शुरू था। बैलों के नथुनों और मुंह से झाग टपकने लगा था। kaante ka mukabla hota hi aisa hai ......sikh deti hui kahani .....

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    उत्तर
    1. डॉ. निशा जी बैलों के माध्यम से कह दूं की भारतीय किसान भी अपनी जान जोखिम में डाल लंबी दौड लगा रहा है सालों से। आपके माध्यम से अपेक्षा करूं कि उसकी जान न जाए पर जीत अवश्य हो।

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  7. खुप खुप आभार शिंदे जी,
    आले हं आताच कहानी वाचायेला !

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    उत्तर
    1. सुमनताई आभार हो। किचन मधुन भाज्यांचा सुंदर गंध येतोय आणि माझ्याचं घरचं कोणीतरी मला थांब येते म्हणतय, याचा आनंद दोन वाक्यातून मिळाला.

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  8. बहुत ही मार्मिक कहानी

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    उत्तर
    1. रंजना जी आपकी टिप्पणी मेरा हौसला बढाएगी। भारतीय भाषाओं के साहित्य में अद्भुत क्षमता है। इतनी रोचक और मार्मिक कहानियों का आदान प्रदान होना चाहिए। इससे दो तरफ फायदा होगा, विभिन्न भाषाओं का साहित्य विस्तृत पाठकों के पास पहुंचेगा और हिंदी भाषा भी ताकतवर बनेगी।

      हटाएं
  9. शंकर पाटिल यांच परिचय आणि उत्कृष्ट कहानी आमच्या पर्यन्त
    पोचवल्याबद्दल आभार ....सुन्दर कहानी आणि त्याच हिंदी अनुवाद छान केलात !

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सुमन जी आपको कहानी पसंद आई, आभार। मराठी भाषा जानती, बोलती और लिखती भी हैं तो आपकी टिप्पणी मेरे लिए मायने रखती है कारण आप अनुवाद के भीतर की कमियों को आसानी से पकड सकती है। आगे और अधिक हमारी साहित्यिक चर्चा होती रहेगी।

      हटाएं
  10. मार्मिक ओर हृदय्स्पर्शीय ... लेखनी बाँधे रही अंत तक ...
    मानवीय संवेदनाएं लिए अच्छी कहानी ...

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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    2. दिगंबर जी आपको कहानी अच्छी लगी आभार। आपके हृदय को स्पर्श करने का एहसास हो गया।

      हटाएं
    3. दिगंबर जी कहानी पसंद आई आभार। पशु-पंछियों में भी मानवीय भाव होते हैं और मालिक के साथ हृदय से जुडने के कारण मालिक की मंशा को जानने की बैल की क्षमता वाले मर्म और संवेदना को आपने समझा है। लगता है कहानी की सूक्ष्मताओं को भी आपने बारीकी से पकड लिया।

      हटाएं
  11. शंकर पटिल जी की कहानी का सुन्दर अनुवाद किया है अन्यथा ये हम तक आ भी नहीं पाती . आपका आभार . इसे पढ़ते हुए सारा दृश्य जीवंत हो उठा..

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. अमरिता जी अनुवाद करना सार्थक हुआ। लेखक की भावनाओं एवं अभिव्यक्ति को तोडे बिना अनुवाद करने का प्रयास भर किया था। डर यह भी था कि कहीं शंकर पाटिल जी के मूल कहानी को ठेंस तो नहीं पहुंचेगी। आप सभी पाठकों और दोस्तों के बदौलत मन के भीतर का वह डर काफुर हो गया।

      हटाएं
  12. मूल मराठी कहानी का अनुवाद 'जीत' अत्यन्त बढ़िया कहानी है। कहानी में बैल के भीतर मानव की कोमल भावनाओं को दर्शाया गया है।जो पाठकों के लिये प्रेरक है। धीरे-धीरे आप के लेखन कार्य को पढ़्ने की कोशिश करूँगी।

    विजय जी, मैं ब्लोग के क्षेत्र में नयी हूँ। अतः आप से अनुरोध है कि जरा मेरे ब्लोग'Unwarat.com' पर भी समय निकाल कर जाइये | कहानी वा लेख पढ़ने के बाद अपने विचार अवश्य व्यक्त कीजियेगा। मुझे अच्छा लगेगा।

    विन्नी,

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. विन्नी जी 'जीत' कहानी का अनुवाद पसंद आया धन्यवाद। मूल कहानी की क्षमता के बदौलत यह संभव हुआ है कि कहानी पाठकों की रूचि में खरी साबित हो गई। आप मेरे लेखन में रूचि रखती है आभार।
      आपने अपने ब्लॉग का जिक्र किया है। बिल्कुल मैं आपके ब्लॉग पर प्रकाशित साहित्य पढता रहूंगा।

      हटाएं
  13. प्रवाहमयी अनुवाद , जो कहानी का भाव बनाये रखता है....
    कथा ...हृदयस्पर्शी

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. मोनिका जी आपको कहानी का अनुवाद और मूल कहानी पसंद आई आभार। आपकी प्रतिक्रिया स्वरूप एहसास हो रहा है कि शंकर पाटिल जी के मूल कहानी को न्याय देने में मैं सफल हो गया हूं।

      हटाएं
  14. निशिकांत मुळे1:32 pm

    अनुवाद अप्रतीमं जमलाय

    जवाब देंहटाएं
  15. Abhijeet More9:46 pm

    छान कथा व तितकाच छान अनुवाद आहे. अभिनंदन लिहित रहा.

    जवाब देंहटाएं
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तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,1,बाल कथा,346,बाल कलम,25,बाल दिवस,4,बालकथा,68,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,16,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,28,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,244,लघुकथा,1255,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,327,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,68,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2009,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,711,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,797,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,17,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,88,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,208,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,77,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: शंकर पाटिल की मराठी कहानी - जीत
शंकर पाटिल की मराठी कहानी - जीत
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