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कुमार गौरव अजीतेन्दु की कुण्डलियाँ

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कुण्डलिया - बंजर पड़ी जमीन है

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१.

बंजर पड़ी जमीन है, धधक रही सम आग।

दस्तक देती आपदा, जाग मनुज अब जाग॥

जाग मनुज अब जाग, नीर को रक्षित कर ले,

भरा पात्र में खूब, जरा नयनों में भर ले।

छीन रहा है चैन, भयानक है ये मंजर,

पिसने को मजबूर, सिसकता जीवन बंजर॥

२.

सूखा आमंत्रित हुआ, हरियाली के दाम।

लालच ने साजिश रची, किया स्वार्थ ने काम॥

किया स्वार्थ ने काम, सुने बिन अंतर्मन को,

लगा दिया ही दाग, चेतना के दामन को।

घुसा सभी में आज, हवस का दानव भूखा,

लाज-शर्म का स्रोत, पड़ा है जबसे सूखा॥

३.

समझाते पुरखे रहे, पानी है अनमोल।

हँसी उड़ाई आपने, आज हुए गुम बोल॥

आज हुए गुम बोल, बूँद को तरस रहे हैं,

बादल बनकर नैन, रात-दिन बरस रहे हैं।

चार कोस चल रोज, घड़े दो भरने जाते,

बचा-बचा उपयोग, करो सबको समझाते॥

४.

पानी काफी घट गया, बहुत बढ़ गई प्यास।

व्याकुलता चहुँओर है, निशिदिन, बारहमास॥

निशिदिन, बारहमास, तभी तो छीना-छोरी,

डाका, लूट-खसोट, चीखना, सीनाजोरी।

दीख रहे हैं लोग, बने सम दुश्मन जानी,

आये दिन ले रूप, खून का बहता पानी॥

५.

पाँवों में छाले पड़े, जलता बहुत शरीर।

लोग सभी हलकान हैं, नहीं दीखता नीर॥

नहीं दीखता नीर, दूर तक मरुथल फैला,

चक्कर खाये माथ, दिखे सबकुछ मटमैला।

सूख रहे तालाब, ताल, पोखर गाँवों में,

यही नगर का हाल, चुभें कंकड़ पाँवों मे॥

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कुण्डलिया - जंगल का कानून

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१.

हत्यारों का राज है, जंगल का कानून।

मँहगी होती दाल तो, सस्ता होता खून॥

सस्ता होता खून, रोज बहता सड़कों पर,

झोंपड़पट्टी फूँक, दीप जलते महलों पर।

पुछवैया है कौन, वक्त के उन मारों का,

सबके अंदर नाच, रहा भय हत्यारों का॥

२.

आई जबसे आपकी, ये गूँगी सरकार।

आतंकी हैं घूमते, निर्भय ले हथियार॥

निर्भय ले हथियार, डकैती अब होती है,

आप उड़ाते मौज, नित्य जनता रोती है।

नौकरशाही भ्रष्ट, जान लेती मँहगाई,

घोटालों की बाढ़, झूठ की आँधी आई॥

३.

चलते सीना तान के, अनपढ़ चार गँवार।

करते उनकी चाकरी, शिक्षित बीस हजार॥

शिक्षित बीस हजार, घूमते मारे-मारे,

लठमारों के भाग्य खुले, हैं वारे-न्यारे।

धूल फाँकते हंस, काग महलों में पलते,

ठोकर खाते संत, चोर कारों में चलते॥

४.

अपने दमपर है नहीं, दस की भी औकात।

खानदान के नामपर, करते सौ की बात॥

करते सौ की बात, लाख जेबों में भरते,

मक्खनबाजी रोज, साठ चमचे मिल करते।

जिन दीनों को खूब, दिखाते ऊँचे सपने,

सबकुछ उनका छीन, सजा लेते घर अपने॥

५.

हिन्दी भाषा खो रही, नित अपनी पहचान।

अंग्रेजी पाने लगी, घर-घर में सम्मान॥

घर-घर में सम्मान, "हाय, हैल्लो" ही पाते,

मॉम-डैड से वर्ड, "आधुनिकता" झलकाते।

बनूँ बड़ा अँगरेज, सभी की है अभिलाषा,

पूरा करने लक्ष्य, त्यागते हिन्दी भाषा॥

रचयिता - कुमार गौरव अजीतेन्दु

शाहपुर, पटना - ८०१५०२ (बिहार)

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2 टिप्पणियाँ

  1. आदरणीय अजीतेन्दु जी समसामयिक परिवेश को दर्शाती हुई सुन्दर कुण्डलियाँ बन पड़ी हैं।
    सादर बधाई स्वीकारें।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. प्रोत्साहन हेतु आपका बहुत-बहुत धन्यवाद आदरणीया वंदना जी।

      हटाएं

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