शरद तैलँग का व्यंग्य - और क्या हाल है ?

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और क्या हाल है ? 0 शरद तैलँग मैँनेँ आज तक इस अंतर्राष्ट्रीय प्रश्न कि “और क्या हाल हैँ ?” का बस एक ही जवाब सुना है और वो है “सब बढ़िया है “...

और क्या हाल है ?

0 शरद तैलँग

मैँनेँ आज तक इस अंतर्राष्ट्रीय प्रश्न कि “और क्या हाल हैँ ?” का बस एक ही जवाब सुना है और वो है “सब बढ़िया है “। इसके अतिरिक्त कोई और दूसरा जवाब शायद बना ही नहीँ है । इस प्रश्न को पूछने वाला भी इस सँक्षिप्त प्रश्न के माध्यम से किसी परिचित व्यक्ति के प्रति अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह कर लेता है और यह दर्शा देता है कि उसे उस व्यक्ति के हाल की बहुत चिंता है तथा वह उसका हाल जानने का उत्सुक है । दूसरा व्यक्ति भी अपने सँक्षिप्त उत्तर “ सब बढ़िया है “के माध्यम से यह सोचकर कि तुझे क्या सुनाऊँ ओ दिलरुवा’ अपने कर्तव्य की इति कर लेता है ।

वास्तव मेँ ना तो पूछने वाले की मँशा ही हाल जानने की होती है और ना ही बताने वाले की । अब जब आमना सामना हो ही गया है तो कुछ न कुछ तो कहना ही पड़ेगा इसलिये यह एक परम्परा सी बन गई है । वैसे पूछने वाला ये भलीभाँति समझता है कि ‘सब बढ़िया” है कहने वाला झूठ बोल रहा है आज के इस दौर मेँ इतनी मँहगाई, इतने घोटाले, इतनी हत्यायेँ , इतने बलात्कार, अराजकता, चोरी, डकैती, असुरक्षा की भावना, के चलते हुए सब बढ़िया हो ही नहीँ सकता है और यदि किसी के हाल इस दौर मेँ भी बढ़िया हैँ तब तो ज़रूर दाल मेँ कुछ काला है , या तो यह किसी अनुचित कार्य मेँ सँलग्न है या फिर राजनीति मेँ वरना उस व्यक्ति के कौन से सुर्खाब के पर लगे हैँ कि वह अपना हाल अच्छा ही नहीँ, बल्कि बढ़िया बता रहा है । स्वयँ के बारे मेँ भले लोग अपनी राय बढ़िया बतायेँ किंतु यदि उनसे पूछा जाये कि आजकल देश के क्या हाल हैँ तब कोई भी नहीँ कहेगा कि “सब बढ़िया हैँ “सब यही कहेँगे कि “बहुत खराब है” यही बात ज़माने के लिये भी लागू होगी कि ज़माना बहुत खराब है पर खुद के हाल बढ़िया ही बतायेँगेँ । जब सब बढ़िया है तो देश और ज़माना कैसे खराब हो गये । यदि उससे पूछ ही लिया जाय कि भैया अपने हाल बढ़िया करने के लिये आपने क्या नीति अपना रखी है तो शायद ही कोई सँतोषजनक उत्तर मिले और फिर सब लोग यह सोचकर की वार्तालाप लम्बा हो जायेगा विस्तार मेँ पूछते भी नहीँ है क्योँकि सब लोग “सब बढ़िया है” इस उत्तर से ही सँतुष्ट हो जाते हैँ कि उनकी आशा के अनुरूप ही उन्हेँ उत्तर मिल गया और दोनोँ अपने अपने रास्ते चल देते हैँ । इसलिये यह सँक्षिप्त लघु सँवाद् समाज मेँ लम्बे समय से ही अत्यन्त प्रचलित है ।

अक्सर मुझसे भी यह प्रश्न किया जाता रहा है और मैँ भी हमेशा ही “सब बढ़िया है” कहकर परम्परा का निर्वाह कर दिया करता था किंतु जब हाल ही मेँ मेरे एक परिचित ने जब इस प्रश्न का पुन: प्रसारण किया गया तो प्रश्नकर्त्ता को यहीँ आशा थी कि मैँ “सब बढ़िया” है” कहकर अपने दायित्व से मुक्त हो जाऊँगा और हो भी सकता था लेकिन उस दिन ‘सत्यमेव जयते” सिर पर सवार हो गया था और मैनेँ हकीकत बयान कर ही दी ।

मैनेँ मुँह बनाकर उत्तर दिया - ”हाल तो ठीक नहीँ है “।

” क्योँ क्या हुआ ? उनके ऊपर जैसे बिजली गिर गई थी । उन्हेँ मुझसे ऎसे उत्तर की आशा नहीँ थी । उन्हेँ यह विश्वास करना मुश्किल हो रहा था कि मेरे भी हाल खराब हो सकते है । जैसे मैँ किसी दूसरे ग्रह का प्राणी हूँ और मेरे हाल बढ़िया के अलावा घटिया हो ही नहीँ सकते ।

उसके माथे पर चिंता की लकीरेँ उभर रहीँ थीँ । ये लकीरेँ मेरे बुरे हाल के कारण नहीँ थी बल्कि मेरा हाल क्यूँ बढ़िया नहीँ हैँ यह जानने के लिये कम और उसे कुछ देर तक अपना काम-धाम छोड़कर उसका वर्णन सुनने के लिये रुकना पड़ेगा, इस कारण अधिक थीँ । आज वो फँस गया था । मन ही मन वो पछता रहा था कि हाल क्योँ पूछ लिया , अच्छा भला अपने काम से जा रहा था । ये तो बड़ा बेशर्म किस्म का प्राणी निकला कि अपना हाल बढ़िया नहीँ बता रहा है, खराब बता रहा है । अपने आप को बड़ा सत्यवादी समझता है । कैसे कैसे लोग होते हैँ । इन्हेँ अपना हाल खराब बताने मेँ शर्म भी नहीँ आती है । क्या ज़माना आ गया है ।

मैँने क्रमश: को एक ओर धकेलते हुए कहा ”कुछ नहीँ मेरी श्रीमती जी बाथरूम मेँ फिसल गईँ और उनकी रीड की हड्डी मे फ्रेक्चर हो गया है ,, डॉक्टर ने चलने फिरने से मना किया है । 2-3 महिने तक सिर्फ लेटे रहने को ही कहा है”।

“अच्छा ! अरे अरे ! यह तो बहुत बुरा हुआ’ । उसने खेद प्रकट किया ।

फिर उसने एक सर्वे रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमेँ बताया गया था कि उसके परिवार या रिश्तेदारोँ मेँ या परिचितोँ मेँ कौन कौन, कब कब और कहाँ कहाँ बाथरूम मेँ फिसलकर अपनी हड्डी तुड़वा चुके हैँ तथा उनका क्या हश्र हुआ था। यदि वह चाहता तो “ बाथरूम मेँ फिसलने के कारण एवँ हड्डी टूटने की सँभावनाएँ” विषय पर शोध भी कर सकता था । उसकी याददाश्त तथा फिसलकर हड्डी तुडवाने वालोँ के प्रति उसकी रुचि के बारे मेँ जानकर मैँ उसके इस शौक का प्रशँषक हो गया था । तात्पर्य यह था कि मेरी पत्नी की बाथरूम मेँ फिसलकर गिरने की घटना कोई अनोख़ी घटना नहीँ थी इतिहास गवाह था कि हर देश, हर राज्य, हर जिले मुहल्ले तथा परिवार मेँ ये घटना घट चुकी है और लोगोँ की हड्डियाँ टूट चुकीँ हैँ ।

”बाकी हाल तो बढ़िया हैँ ना ? उसने फिर पूछा ।

“काहे के बढ़िया हैँ यार ! इस कारण घर के सारे काम काज, खाना बनाने से लेकर खिलाने, कपड़े धोने झाडू पौछा तक सब मुझे ही करने पड रहे है । खाना बनाना आता भी नहीँ है और श्रीमतीजी को छोड़कर कहीँ आ जा भी नहीँ सकता हूँ । आज समझ मेँ आया कि महिला होना कितना सँघर्ष भरा और पुरुष होना कितना आरामदायक है ।

मेरे इस कथन के जवाब मेँ उसने एक ऐसी बात कहीँ जिसे मेरे घर पर मेरी पत्नी को देखने आने वाला हर व्यक्ति कहता है :

” इन्हेँ किसी अच्छे डॉक्टर को दिखा दो”

उसकी इस बात पर पहले तो मेरा मन हुआ कि उसकी हत्या कर दूँ फिर सोचा कि मैँ अपने ही बाल नोँच डालूँ । हर आने वाले व्यक्ति के इस परम वाक्य का यही अर्थ निकलता है कि मैँ अपनी पत्नी को अभी तक किसी बुरे डॉक्टर को ही दिखाता रहा हूँ तथा मैँ उन्हेँ किसी अच्छे डॉक्टर को दिखाना ही नहीँ चाहता हूँ ।

वो इस वाक्य को बोलकर मुझसे छुटकारा पाने की कोशिश कर ही रहा था कि मैंने फिर उसे धर लिया और उससे ही पूछा – यहाँ अच्छा डॉक्टर कौन है ? आपको तो जानकारी होगी क्योँकि आप तो हड्डी तुड़वाने वालोँ के सम्पर्क मेँ रह चुके हैँ ।

वह बगलेँ झाँकने लगा । उसे इस प्रश्न की भी आशा नहीँ थी । उसे तो इलाज के इस महायज्ञ मेँ अपनी आहुति ही देनी थी । फिर भी वह बोला “अच्छा डॉक्टर ? हूँ हूँ “!– “आजकल तो किसी भी डॉक्टर के पास चले जाओ सभी ढेर सारी जाँच लिख देते हैँ, ब्लड टेस्ट, एक्स रे, एम आर आई, सीटी स्केन और न जाने क्या क्या ? और जब रिपोर्ट आती है तो सब नॉर्मल निकलता है ।

“ पर मैनेँ तो जिस डॉक्टर को दिखाया उसने तो कुछ भी टेस्ट नहीँ करवाये . ना एक्स रे और ना ही एम आर आई” । मैनेँ उसका यह बार भी बेकार कर दिया ।

” फिर काहे का अच्छा डॉक्टर है जो बिना जाँच करवाये ही इलाज करना शुरू करदे । तभी तो कहा है कि किसी अच्छे डॉक्टर को दिखाओ । मैनेँ भी एक बार डायबिटीज़ के लिये तीन जगहोँ पर टेस्ट कराये पर कहीँ भी कुछ निकला ही नहीँ सब जगह नॉर्मल ,फिर किसी ने एक और पैथेलोजिकल लेब का पता दिया उस लेब मेँ जब जाँच करवाई तो रिपोर्ट मेँ खराबी आई। कहते हैँ कि उस लेब मेँ रिपोर्ट कभी नॉर्मल नहीँ आती है कुछ न कुछ खराबी आती ही है भले खराबी हो या ना हो” ।

“ अच्छा चलता हूँ” यह कहकर वह अपना स्कूटर स्टार्ट करने लगा किंतु चलते चलते फिर एक भारी भूल कर बैठा। परम्परा के अनुसार वह जाते जाते कह उठा “ और कोई काम हो तो बताना” ।

मैँ इसी वाक्य की प्रतीक्षा कर रहा था ।

“हाँ यार काम तो है” । मेरी बहन तुम्हारे मोहल्ले मेँ ही रहती है, उसने कहा है कि वह रोज़ सुबह शाम हमारा खाना बनाकर टिफिन तैयार कर देगी बस यहाँ लाने की परेशानी है । बडी मेहरबानी होगी यदि तुम टिफिन रोज़ ऑफिस जाते समय वहाँ से यहाँ पहुँचा दो और शाम को वापस जाते समय खाली टिफिन वहाँ पहुँचा देना । तुम्हेँ परेशानी तो होगी पर . . . .।

उसने ना चाहते हुए भी बुरा सा मुँह बनाकर तथा दूसरी तरफ फेरकर जिससे मैँ उसके मुखमण्डल पर आते हुए ज्वार भाटे को न देख सकूँ “हाँ पहुँचा दूँगा” इसमेँ परेशानी की क्या बात है” कह ही दिया । जाने क्यूँ उसकी आवाज़ कुछ भर्रा रही थी ।

दो तीन दिन तक तो टिफिन समय पर आता रहा, लेकिन वह कुछ बात नहीँ करता था चुपचाप दे कर चल देता था तथा “ और अब क्या हाल है” जैसा भी कुछ बोलता नहीँ था । फिर तीसरे दिन उसका फोन आया कि वह किसी रिश्तेदार की शादी मेँ बाहर जा रहा है इसलिये कुछ दिनोँ तक टिफिन पहुँचाने का कार्य नहीँ कर पायेगा आप कोई दूसरा इंतज़ाम कर लीजिये ।

कहते है सच्चे मित्र की पहचान मुसीबत के समय ही होती है । मेरे घर आने वाले मेरे मित्र जब जब भी यह वाक्य कहते थे कि “कोई काम हो तो बताना” मैँ उन्हेँ उनकी इच्छा की कद्र करते हुए काम बता दिया करता था । किसी से दूध मँगाता तो किसी से सब्जी, तो किसी से दवाईयाँ ।

ऐसे ही जब मैनेँ एक मित्र को कुछ दवाईयाँ लाने के लिये डॉक्टर का पर्चा पकडाया तो वह बडी देर तक पर्चे को लेकर दवाईयोँ के नाम पढ़ता रहा और पूछता रहा कि कौन कौन सी कितनी कितनी लानी है । इन सब के पीछे उसका इतना समय व्यतीत करने का मकसद यही था कि दवाईयोँ के लिये रुपये तो निकालो । मुझे उसकी इस अकुलाहट पर मज़ा आ रहा था तथा मैँ भी जानबूझ कर बिलम्ब कर रहा था कि और पूछो काम के लिये । एकाएक उसने अपना पर्स निकाला तथा पर्चे को उसमेँ इस तरह रखने लगा कि मुझे दिख जाये कि उसमेँ बहुत कम पैसे है । वो मन ही मन मुझे और गालियाँ देता उससे पूर्व ही मैनेँ उसे 500 का नोट पकड़ा दिया । तब उसके चेहरे पर सँतोष के भाव उभरे ।

कुछ दिनोँ पूर्व तक तो हमारे घर श्रीमती जी का हाल जानने वालोँ का ताँता लगा हुआ था लेकिन इन घटनाओँ के बाद अब काफी कमी आ गई है । सबके रिश्तेदारोँ की शादियाँ एक साथ ही आ गईँ हैँ । हमेँ भी सबको बार बार इस घटना या दुर्घटना का वर्णन सुनाने से मुक्ति मिल गई । अब यदि कोई मिलने आता भी है तो बाकी लोग उसको पहले से ही सावधान कर देते हैँ वहाँ जाकर “ और क्या हाल हैँ ? या “कोई काम हो तो बताना” बिलकुल भी नहीँ कहना, नहीँ तो फँस जाओगे ।

0 शरद तैलँग

240 माला रोड (हाट रोड) कोटा जँ

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रचनाकार: शरद तैलँग का व्यंग्य - और क्या हाल है ?
शरद तैलँग का व्यंग्य - और क्या हाल है ?
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