साताप्पा लहू चव्हाण का आलेख : राजेंद्र यादव का आत्मकथ्यांश ‘मुड़−मुड़के देखता हूँ...’: वैचारिक पक्ष

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राजेंद्र यादव का आत्मकथ्यांश ‘ मुड़ − मुड़के देखता हूँ... ’ : वैचारिक पक्ष   डॉ. साताप्पा लहू चव्हाण “यह मेरी आत्मकथा नहीं है.इन ‘अंतर्द...

राजेंद्र यादव का आत्मकथ्यांश मुड़मुड़के देखता हूँ...: वैचारिक पक्ष

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डॉ. साताप्पा लहू चव्हाण


“यह मेरी आत्मकथा नहीं है.इन ‘अंतर्दर्शनों ’ को मैं ज्यादा−से−ज्यादा ‘आत्मकथ्यांश ’ का नाम दे सकता हूँ.आत्मकथा वे लिखते हैं जो स्मृति के सहारे गुजरे हुए को तरतीब दे सकते है.लम्बे समय तक अतीत में बने रहना उन्हें अच्छा लगता है.लिखने का वर्तमान क्षण,,,‚वहाँ तक आ पहुँचने की यात्रा ही नहीं होता‚कहीं−न−कहीं उस यात्रा के लिए ‘जस्टीफिकेशन’ या वैधता की तलाश भी होती है – मानो कोई वकील केस तैयार कर रहा हो.लाख न चाहने पर भी वहाँ तथ्यों को काट –छाँटकर अनुकूल बनाने की कोशिशें छिपाए नहीं छिपतीं‚, देख लीजिए मैं आज जहाँ हूँ वहाँ किन−किन घाटियों से होकर आया हूँ. घाटियों और शिखरों के चुनाव के पीछे ‘आज जो मैं हूँ’ का तर्क होता है. दूसरे शब्दों में इसे एक ‘गढन्त’ कह सकते हैं.आत्मकथा व्यक्ति की हो या संस्कृति की –दोनों इस ‘गढन्त’ से मुक्त नहीं हैं. ”1 कहना आवश्यक नहीं कि जीवन की घटनाओं एवं परिस्थितियों का प्रभाव आत्मकथा पर पडता है.व्यक्ति के जीवन की संपूर्ण घटनाओं को आत्मकथा के माध्यम से रखना आसान नहीं है.अतः कुछ आत्मकथ्यांश ही रखे जाते है.

राजेंद्र यादव ‘गढन्त’ आत्मकथा से बचना चाहते हैं. आत्मकथ्यांश में व्यक्त सहजभाव यादव जी की वैचारिक परंपरा का परिचय करा देता है.समाज का बौद्धिक विकास और तर्कशीलता की क्षमता बढ़ती देखकर यह कहा जा सकता है कि सच्चे भाव से जो आत्मकथन लिखा गया है वहीं आत्मकथन पाठकों को प्रामाणिकता का परिचय करवा देता है. “मुझे याद कुछ नहीं रहता.सिर्फ कुछ आधी−अधूरी तस्वीरें होती हैं जो लहरों की तरह झलकती−कौंधती हैं और फिर कहीं गायब हो जाती हैं. ये तस्वीरें उस समय से शुरू होती हैं जब मैं दो−तीन बरस का था.”2 राजेंद्र यादव अपने जीवन की पगडंडियों को भी अपने अनुशासन प्रियता से जोड़ना चाहते हैं.श्रेष्ठता की बात छोड़ वे साहित्य के मानवीय और सामाजिक पक्ष के साथ रहें दृष्टिगोचर होते हैं. मुड़−मुड़के देखता हूँ...आत्मकथ्यांश की भूमिका से लेकर राजेंद्र यादव अपना विशिष्ठ विचार रखते हैं. राजेंद्र यादव जो बताना चाहते हैं,वह साफ−साफ शब्दों में बता देते हैं.और जो बातें बताना नहीं चाहते वह बाकायदा छोड़ देते हैं.समाज के लिए जो आवश्यक है वहीं विचार राजेंद्र यादव प्रस्तुत करते हैं. अनावश्यक विचारों से बचना चाहते हैं.राजनेता, माफिया, बिल्डर्स सब एक दूसरे के पूरक हैं और ये सब पूरक होने के कारण ही पालिटीशियन्स मजे में रहतें हैं.साहित्यिक पालिटिक्स भी कुछ इस प्रकार की है.अनेक साहित्यिक अपना मूल चेहरा कभी दिखाते नहीं “ हममें से अधिकांश अपने कीमती कागजों की मूल प्रति कहीं तिजोरियों−लॉकरों या अलमारियों में बंद रखते हैं और अपने साथ लिए फिरते हैं प्रतिलिपियाँ.कल को नष्ट हो जाएँ या खो जाएँ तो मूल प्रति बची रहे क्या सारे बहुरूपिए अपने मूल चेहरें को कहीं सुरक्षित जगहों पर छोड आते हैं और सिर्फ मुखौटों के सहारे ही जिंदगी काट देते हैं ”3 राजेंद्र यादव द्वारा प्रस्तुत यह प्रश्न बहुत कुछ स्पष्ट करा देता है.आज के साहित्यिक माहौल में रचनाकार का मूल चेहरा स्पष्ट रूपा में प्रस्तुत नहीं होता.रचनाकार की कृति का मूल्यांकन करते समय भी सच को किनारे करने की वृत्ति बढ़ रही है.“हकी‌र कहो फकीर कहो...आगरे का हूँ...”4 “जो दुर्घटनाओं में भी बचा रहता है अर्थात संकल्प”5 “ऐयार(इम्पोस्टर)से सावधान”6 “अपनी निगाह से”7 “मुड़−मुड़के देखता हूँ...”8 “यह तुम्हारा स्वर मुझे खींचे लिए जाता”9 “हम न मरैं मरि है संसारा”10 राजेंद्र यादव शपथ लिए बगर सच का बयान करते हैं.अपने सारे अनुभव विनयपूर्ण भाव से पाठकों तक पहुँचाना चाहते हैं.यह सर्वविदित है कि राजेंद्र यादव ऐसे साहित्यकार हैं जो हर पल विवादों के घेरे में रहते हैं. मुड़−मुड़के देखता हूँ... आत्मकथ्यांश के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि राजेंद्र यादव वैचारिक अस्पृश्यता के विरोध में निरंतर लड़ना चाहते है.वैचारिक गुलामी को आवाहन देना चाहते है. साहित्यिक विश्व में कार्यरत अव्यावहारिक तत्त्वों को जड़ से उखाड़ फेंकना चाहते हैं. मुड़−मुड़के देखता हूँ... आत्मकथ्यांश का साहित्यिक और वैचारिक महत्त्व असाधारण रहा है, इस बात को हम नकार नहीं सकते. राजेंद्र यादव को व्यापक साहित्यिक समर्थन प्राप्त हुआ.देश−विदेशों में यादव जी के विचारों को अपनाया गया.

आत्मकथ्यांश हमे ज्ञात कराता है कि आर्थिक लापरवाही के कारण राजेंद्र यादव को अनेक बार संघर्ष करना पडा लेकिन उन्होंने अपना लेखना कार्य जारी रखा.अपने चिंतन पर उनका पूरा विश्वास था.पद और प्रतिष्ठा राजेंद्र यादव के पैर चूमती दृष्टिगोचर होती है.प्रेमचंद की वैचारिक परंपरा को राजेंद्र यादव ने बखूबी आगे बढाया है.स्वतंत्र लेखन का उनका संकल्प ही इस बात का प्रमाण है.“मस्ती, फक्कड़पन और लापरवाही का ही एक पक्ष पैसे के लिए निर्मोह भी है.या कम−से−कम वे ऐसा सोचना पसन्द करते हैं.सुना या शायद कहीं पढा है कि स्वतंत्र लेखन के संकल्प के साथ जीवन की शुरूआत करते हुए उन्हें प्लेटफार्म पर सो लेने,,‚फुटपाथ पर खा−नहा लेने और कंघी−शीशा बेचकर रोटी कमा लेने परंतु लेखन के स्तर पर पूरी तरह से स्वतंत्र ही बने रहने का सपना देखा था.तब और अब के बीच तय किया गया एक लम्बा फासला है.आर्थिकता के प्रति लापरवाही राजेंद्रजी की आत्मछवि का सबसे जरूरी हिस्सा है.हर आत्मछवि को दूसरों का सत्यापन भी चाहिए.वरना वह विश्वसनीय नहीं होती.बल्कि मत−सम्मत में छपने के लिए आलोचना को ही प्रोत्साहित भी करते हैं लेकिन इस पक्ष को लेकर आत्मछवि के विरूद्ध जानेवाली हर बात से विचलित हो उठते हैं.”11अर्चना वर्माजी के उपर्युक्त विचारों से ज्ञाता होता है कि राजेंद्र यादव ने स्वतंत्र लेखन को अपनाया. लेखन को जीवन का आधार माना. राजेंद्र यादव एकमात्र पूर्णकालीन स्वतंत्र लेखन करनेवाले लेखक हैं.हिंदी साहित्य-विश्व में राजेंद्र यादव के जीवन को संघर्षयात्री का जीवन मानना उचित होगा. राजेंद्र यादव के आत्मकथ्यांश विषय−वस्तु और अंतर्वस्तु के संदर्भ में वैविध्यपूर्ण है. ‘मुड़−मुड़के देखता हूँ...’ आत्मकथ्यांश की भाषा जीवंत एवं शाश्वत है. राजेंद्र यादव का व्यक्तिगत परिचय का क्षेत्र भी अपार एवं विशाल है.

ग्रामीण संस्कार ही राजेंद्र यादव के आत्मकथ्यांश लेखना के केंद्र में रहे हैं.अपना सारा जीवन समग्रता के साथ प्रस्तुत कर एक सच्चे लेखक,पत्रकार का राजेंद्र यादव ने परिचय करवा दिया है,इस बात को मानना होगा. संवेदनशील लेखक होने के नाते राजेंद्र यादव ने लोक−पक्ष और जनचेतना को ‘हंस’के माध्यम से पाठकों के सामने रखा है.मौलिक लेखन को तथाकथित हिंदी आलोचकों और साहित्यकारों से वैचारिक लड़ाई कर ‘हंस’ में स्थान दिया. ‘हंस’ ही राजेंद्र यादव का सच्चा जीवन रहा है. आत्मकथ्यांश में सकारात्मक दृष्टिकोण से इन्हीं बातों को राजेंद्र यादव ने रखा है.प्रेमचंद की परंपरा का वाक् प्रवाह गतिशील बनाया. “राजेंद्र यादव 84 बरस के हो चुके हैं,लेकिन अदब से उनका जुडाव और मुंशी प्रेमचंद से उनका ताल्लुक ऐसा नहीं की वे धूम−धडक्के से इसका इजहार न करें”12 कहना सही होगा कि राजेंद्र यादव हर साल 31 जुलाई को दिल्ली में मुंशी प्रेमचंद जी का जन्मदिवस धूम−धडक्के से मनाते है.अपने सहयोगियों से मिलजुलकर हँसी−मजाक के साथ राजेंद्र यादव एक नई विचारधारा जो जीवन समझने के लिए आवश्यक है,आगे बढ़ा रहें हैं.“ राजेंद्र यादव पिछले 25 साल से हिंदी की सबसे पॉपुलर साहित्यिक पत्रिका हंस का सफलतापूर्वक संपादन कर रहे हैं. इस पत्रिका के मार्फत उन्होंने सबसे पहले स्त्री, दलित और मुसलमानों से जुड़े मुद्दों को उठाया. नए रचनाकारों को प्लेटफॉर्म दिया और इस प्लेटफॉर्म ने एक दर्जन से ज्यादा नए अच्छे लेखक पैदा किए. संभवतः वह हिंदी के इकलौते ऐसे व्यक्ति हैं, जो बहुत खुलकर कहते हैं कि स्त्री को देह के बंधन से आजाद होना चाहिए... राजेंद्र यादव हिंदी के खलनायक से लेकर सबसे बड़े यारबाश, हरफनमौला और जिंदादिल दोस्त हैं. उनके साथ रहने वाले लड़के किशन और उसके परिवार के लिए वे पिता से बढ़कर हैं. उनकी सहकर्मी वीना उनियाल को वे कभी बॉस लगे ही नहीं. दोस्त उनसे प्यार करते हैं. लड़कियां आज भी इस बूढ़े कैसानोवा पर जान छिड़कती हैं. अजीब पहेली है कि उसी को देखकर जीते हैं, जिस काफिर पर दम निकले. राजेंद्र मुड़-मुड़कर देखते हैं और कहते हैं, ''मैंने अपनी जिंदगी लिटरेचर के नाम कर दी.'' चाहते थे कि एक लेखक के रूप में उनकी पहचान बड़ी होती, लेकिन उन्हें दुख है इस बात का कि हंस के संपादक के रूप में उनकी पहचान लेखकीय पहचान से ज्यादा बड़ी हो गई. कुछ कहानियां अब भी अधूरी हैं. उम्मीद है, पूरी होंगी एक दिन. ऐसी हजारों अधूरी ख्वाहिशों पर दम निकलता है हर रोज. ”13 कहना आवश्यक नहीं कि राजेंद्र यादव ने हिंदी पत्रकारिता के स्तर को ऊँचा उठाने में अपना योगदान किया है और साथ ही काल−चिंतन का गंभीर विचार हमारे सामने रखा है.गंभीरता से सोचने पर हमें ज्ञात होता है कि राजेंद्र यादव ने पश्चिमवाद,भूमंडलीकरण, नवसांस्कृतिक साम्राज्यवाद,बाजार व्यवस्था,नवपूँजीवाद,धर्म, धर्मनिरपेक्षता और वैश्विक राजनीति आदि अनेक वैचारिक विषयों का चिंतन ‘मुड़−मुड़के देखता हूँ...’ आत्मकथ्यांश के माध्यम से हमारे सामने रखा है.जो आज अधिक प्रासंगिक लगता है.

निष्कर्ष

जीवन की घटनाओं एवं परिस्थितियों का प्रभाव आत्मकथा पर पडता है.व्यक्ति के जीवन की संपूर्ण घटनाओं को आत्मकथा के माध्यम से रखना आसान नहीं है.अतः कुछ आत्मकथ्यांश ही रखे जाते है.राजेंद्र यादव ‘गढन्त’ आत्मकथा से बचना चाहते हैं. आत्मकथ्यांश में व्यक्त सहजभाव यादव जी की वैचारिक परंपरा का परिचय करा देता है.समाज का बौद्धिक विकास और तर्कशीलता की क्षमता बढ़ती देखकर यह कहा जा सकता है कि सच्चे भाव से जो आत्मकथन लिखा गया है वहीं आत्मकथन पाठकों को प्रामाणिकता का परिचय करवा देता है. “मुझे याद कुछ नहीं रहता.सिर्फ कुछ आधी−अधूरी तस्वीरें होती हैं जो लहरों की तरह झलकती−कौंधती हैं और फिर कहीं गायब हो जाती हैं. ये तस्वीरें उस समय से शुरू होती हैं जब मैं दो−तीन बरस का था.”2 राजेंद्र यादव अपने जीवन की पगडंडियों को भी अपने अनुशासन प्रियता से जोडना चाहते हैं.श्रेष्ठता की बात छोड वे साहित्य के मानवीय और सामाजिक पक्ष के साथ रहें दृष्टिगोचर होते हैं. मुड़−मुड़के देखता हूँ...आत्मकथ्यांश की भूमिका से लेकर राजेंद्र यादव अपना विशिष्ठ विचार रखते हैं. राजेंद्र यादव जो बताना चाहते हैं,वह साफ−साफ शब्दों में बता देते हैं.और जो बातें बताना नहीं चाहते वह बाकायदा छोड़ देते हैं.समाज के लिए जो आवश्यक है वहीं विचार राजेंद्र यादव प्रस्तुत करते हैं. अनावश्यक विचारों से बचना चाहते हैं.राजनेता, माफिया, बिल्डर्स सब एक दूसरे के पूरक हैं और ये सब पूरक होने के कारण ही पालिटीशियन्स मजे में रहते हैं.साहित्यिक पालिटिक्स भी कुछ इस प्रकार की है.अनेक साहित्यिक अपना मूल चेहरा कभी दिखाते नहीं.

आज के साहित्यिक माहौल में रचनाकार का मूल चेहरा स्पष्ट रूपा में प्रस्तुत नहीं होता.रचनाकार की कृति का मूल्यांकन करते समय भी सच को किनारे करने की वृत्ति बढ़ रही है. राजेंद्र यादव शपथ लिए बगर सच का बयान करते हैं.अपने सारे अनुभव विनयपूर्ण भाव से पाठकों तक पहुँचाना चाहते हैं.यह सर्वविदित है कि राजेंद्र यादव ऐसे साहित्यकार हैं जो हरपल विवादों के घेरे में रहते हैं. मुड़−मुड़के देखता हूँ... आत्मकथ्यांश के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि राजेंद्र यादव वैचारिक अस्पृश्यता के विरोध में निरंतर लड़ना चाहते है.वैचारिक गुलामी को आवाहन देना चाहते है. साहित्यिकविश्व में कार्यरत अव्यावहारिक तत्त्वों को जड़ से उखाड़ फेंकना चाहते हैं. मुड़−मुड़के देखता हूँ... आत्मकथ्यांश का साहित्यिक और वैचारिक महत्त्व असाधारण रहा है, इस बात को हम नकार नहीं सकते. राजेंद्र यादव को व्यापक साहित्यिक समर्थन प्राप्त हुआ.देश−विदेशों में यादव जी के विचारों को अपनाया गया.

आत्मकथ्यांश हमे ज्ञात कराता है कि आर्थिक लापरवाही के कारण राजेंद्र यादव को अनेक बार संघर्ष करना पडा लेकिन उन्होंने अपना लेखन कार्य जारी रखा.अपने चिंतन पर उनका पूरा विश्वास था.पद और प्रतिष्ठा राजेंद्र यादव के पैर चूमती दृष्टिगोचर होती है.प्रेमचंद की वैचारिक परंपरा को राजेंद्र यादव ने बखूबी आगे बढाया है.स्वतंत्र लेखन का उनका संकल्प ही इस बात का प्रमाण है. राजेंद्र यादव ने स्वतंत्र लेखन को अपनाया. लेखन को जीवन का आधार माना. राजेंद्र यादव एकमात्र पूर्णकालीन स्वतंत्र लेखन करनेवाले लेखक हैं.हिंदी साहित्यविश्व में राजेंद्र यादव के जीवन को संघर्षयात्री का जीवन मानना उचित होगा. राजेंद्र यादव के आत्मकथ्यांश विषय−वस्तु और अंतर्वस्तु के संदर्भ में वैविध्यपूर्ण है. ‘मुड़−मुड़के देखता हूँ...’ आत्मकथ्यांश की भाषा जीवंत एवं शाश्वत है. राजेंद्र यादव का व्यक्तिगत परिचय का क्षेत्र भी अपार एवं विशाल है. ग्रामीण संस्कार ही राजेंद्र यादव के आत्मकथ्यांश लेखना के केंद्र में रहे हैं.अपना सारा जीवन समग्रता के साथ प्रस्तुत कर एक सच्चे लेखक,पत्रकार का राजेंद्र यादव ने परिचय करवा दिया है,इस बात को मानना होगा. संवेदनशील लेखक होने के नाते राजेंद्र यादव ने लोक−पक्ष और जनचेतना को ‘हंस’के माध्यमा से पाठकों के सामने रखा है.मौलिक लेखन को तथाकथित हिंदी आलोचकों और साहित्यकारों से वैचारिक लड़ाई कर ‘हंस’ में स्थान दिया. ‘हंस’ ही राजेंद्र यादव का सच्चा जीवन रहा है. आत्मकथ्यांश में सकारात्मक दृष्टिकोण से इन्हीं बातों को राजेंद्र यादव ने रखा है.प्रेमचंद की परंपरा का वाक् प्रवाह गतिशील बनाया. ‘मुड़−मुड़के देखता हूँ...’ आत्मकथ्यांश स्वतंत्र लेखन करनेवाली नई वैचारिक लेखकीय परंपरा का दस्तावेज है. इसमें दो राय नहीं.

संदर्भ निदेश $

1.राजेंद्र यादव− मुड़−मुड़के देखता हूँ... ‚पृष्ठ−04

2.वही‚ पृष्ठ−06

3. वही‚ पृष्ठ−14

4. वही‚ पृष्ठ−21

5. वही‚ पृष्ठ−22

6. वही‚ पृष्ठ−31

7. वही‚ पृष्ठ−38

8. वही‚ पृष्ठ−52

9. वही‚ पृष्ठ−73

10. वही‚ पृष्ठ−155

11. वही‚ पृष्ठ−196

12.www.bhaskar.com Dtd.19/08/2012

13. www.ajtak.intoday.in Dtd.17/03/2012

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Ø डॉ. साताप्पा लहू चव्हाण
सहायक प्राध्यापक
स्नातकोत्तर हिंदी विभाग,
अहमदनगर महाविद्यालय,
अहमदनगर 414001. (महाराष्ट्र)
दूरभाष - 09850619074
E-mail - drsatappachavan@gmail.com.

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रचनाकार: साताप्पा लहू चव्हाण का आलेख : राजेंद्र यादव का आत्मकथ्यांश ‘मुड़−मुड़के देखता हूँ...’: वैचारिक पक्ष
साताप्पा लहू चव्हाण का आलेख : राजेंद्र यादव का आत्मकथ्यांश ‘मुड़−मुड़के देखता हूँ...’: वैचारिक पक्ष
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