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दिनेश पालीवाल का आलेख - अखबार, अपराध, नकारात्‍मक सोच और मीडिया

अखबार, अपराध, नकारात्‍मक सोच और मीडिया

मेरे बेटे ने टीवी पर खबरें देखना और अखबार पढ़ना बिल्‍कुल बंद कर दिया। पूछा--क्‍यों? आदमी को, खासकर आधुनिक ,पढे-लिखे, समझदार व्‍यक्‍ति को देश, प्रदेश, समाज और दुनिया में हो रही अच्‍छी-बुरी घटनाओं की जानकारी रखनी चाहिए। जानकारी के अलावा भी मीडिया में ऐसा बहुत कुछ परोसा जाता है जो व्‍यक्‍ति की समझ को और जानकारी को बढ़ाता है। जानकारी से शून्‍य व्‍यक्‍ति को आजकल कोई आदमी नहीं मानता। तुम किसी गांव-कस्‍बे के सीमित दायरे में नहीं रहते। एक सरकारी संस्‍थान में उच्‍च पद पर बैठे जिम्‍मेदार अधिकारी हो। नगर में नहीं, महानगर में नौकरी करते हो। तेजी से बदल रही दुनिया में तुम ऐसे बिना जानकारी और समाज व राजनीति में हो रहे परिवर्तनों को बिना ठीक से समझे कैसे सही निर्णयों पर पहुंच सकते हो? माना, समाज और देश-दुनिया में बहुत कुछ गड़बड़ हो रहा है। उसे देख-सुन-पढ़ कर मन बुरी तरह खिन्‍न हो जाता है। झल्‍लाहट और गुस्‍से से रोम-रोम सुलग उठता है। मन में बुरे-बुरे ख्‍याल पैदा होते है। नकारात्‍मक सोच हम पर हावी हो जाता है। हम निराश हो जाते हैं कि अब देश-दुनिया और समाज में कुछ भी अच्‍छा और सही नहीं हो सकता। फिर भी जिस देश और समाज में हम रहते हैं, जिसके हम अंग हैं, जो समाज हमारे आसपास पाया जाता है, उसकी जानकारी रखना किसी भी समझदार आदमी के लिए बेहद जरूरी है।

लड़का बोला--क्‍यों जरूरी है? क्‍यों उस जानकारी को हासिल करने के लिए अपना कीमती वक्‍त बर्बाद करूं? समाज, देश-प्रदेश और दुनिया से ले कर हमारे शहर तक जो कुछ रोज अच्‍छा-बुरा घट रहा है, हो रहा है, हम उसे रोक तो पा नहीं रहे। स्‍थितियों को हम किसी भी स्‍तर पर न प्रभावित कर पा रहे हैं, न बदल पा रहे हैं। समाज को न अच्‍छा कर पा रहे हैं और न अपराधों को रोकने में कोई भूमिका निभा पा रहे है। जिन्‍हें रोकना चाहिए, वे अपराधों को बढ़ा कर रुपया कमाने में जुटे हुए हैं। नेतागण पूरी तरह निजी स्‍वार्थों में अंधे हो चुके हैं। उन्‍हें सिर्फ वोट, जाति, मजहब और अपना परिवार, अपनी कुर्सी से मतलब है। कुर्सी पर बैठ कर देश को लूटने से मतलब है। जनता के लिए कुछ भी अच्‍छा करने का न उनका मन है, न वे करना चाहते हैं। जब हमारे हाथ में चीजों को बदलना है ही नहीं, तो उन वाहियात, बुरी और नकारात्‍मक सोच उत्‍पन्‍न करने वाली खबरों-सूचनाओं को क्‍यों जानूं? क्‍यों वक्‍त बरबाद करूं? अपना मन खराब करूं? चाय पीते वक्‍त जो अखबार मेज पर सुबह-सुबह सिवा बुरी खबरों के कुछ भी अच्‍छा सामने नहीं लाता, उस बुरी खबरों से भरे अखबार को हम सुबह-सुबह क्‍यों देखें-पढ़ें और गुस्‍से से उबलें? क्‍या हम सुबह की शुरूआत बुरी खबरों के कारण गुस्‍से के उबाल के साथ करें?

सोच में पड़ गया। लड़का कह तो सही रहा है। जिन घटनाओं पर हमारा वश नहीं है, जिन्‍हें होने से हम न समाज में रोक पा रहे हैं, न देश-प्रदेश में, उनके बारे में हम जान-पढ़ कर भी क्‍या कर लेंगे? इसका मतलब है, हम टीवी में भी केवल मनोरंजक कार्यक्रम देख लें और टीवी बंद कर दें। भाड़ में जाए देश, चूल्‍हे में जाए प्रदेश, समाज और दुनिया, अपन राम मस्‍त रहें। बस्‍ती जलती है तो जलने दें। हम नीरो बने चैन की बंसी बजाते बैठे रहें। लेकिन सवाल यह है कि टीवी में भी मनोरंजक कार्यक्रम कितने और किन चैनलों पर आते हैं? जितने घरेलू सीरियल आते हैं, उनमें कुटनी स्‍त्रियां हर वक्‍त घरों में कोई न कोई बखेड़ा खड़ा करने वाला षडयंत्र रचती रहती हैं, परिवार के सही और सच्‍चे व्‍यक्‍ति या बहू-महिला का जीना हराम किए रहती हैं। जायदाद के झगड़े चलते रहते हैं। प्र्रेम पर बिजलियां गिरती रहती हैं। दकियानूसी ढंग से पूजा-पाठ हर सीरियल मे निरंतर चलता रहता है। सजी-धजी घरेलू स्‍त्रियां अपने आलीशान किचन में ढेरों सब्‍जियां और व्‍यंजन बनाती रहती हैं।

डायनिंग टेबल पर आलीशान क्रॉकरी में वे व्‍यंजन परोसे जाते रहते हैं। देख-देख कर कुढ़न होती है कि जिस देश में अस्‍सी प्रतिशत समाज को जीने की मामूली चीजें हासिल नहीं हैं, गैस और बिजली की किल्‍लत जिंदगी हलकान किए है, उस समाज को ऐसे सीरियल दिखा कर गरीबों का मजाक क्‍यों उड़ाया जा रहा है? हम उन्‍हें क्‍यों देखें भला? क्‍या मतलब है ऐसे वाहियात सीरियलों को देखने का? वास्‍तव में हमें नकारात्‍मक सोच पैदा करने वाली बुरी खबरों, घटनाओं, सीरियलों और फिल्‍मों से किनारा कर लेना चाहिए, जिससे जिंदगी में थोड़ा तो सुकून मिले! हम ऐसे वाहियात टीवी कार्यक्रम, बेकार और अपराधों की बुरी खबरों से भरे अखबारों को अपनी जिंदगी से निकाल कर बाहर करें जिससे हम पर वक्‍त बचे, हम जीवन के बारे में कुछ बेहतर ढंग से सोच सकें। अच्‍छे विचार मन में उत्‍पन्‍न हों। टीवी और अखबार हमारे जीवन का चैन छीन रहे हैं। हमें संवेदनशून्‍य और कठपुतले इंसानों मेंं बदल रहे हैं। हममें नकारात्‍मक सोच उत्‍पन्‍न कर रहे हैं। नकारात्‍मक सोच हमारे जीवन के लिए सबसे खतरनाक होता है। उससे हम अवसादग्रस्‍त होते हैं। निराश होते हैं और जीवन पर सें हमारा विश्‍वास डिगनें लगता है जो समाज और व्‍यक्‍ति के लिए बेहद खतरनाक है। खतरों से बचना है तो टीवी को घरों से बाहर फैंक दो। अखबार आज से ही पढ़ना बंद कर दो! चैन से जिओ।

--डॉ दिनेश पालीवाल

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