राकेश भ्रमर का व्यंग्य - चिड़ियाघर

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व्‍यंग्‍य आलेख चिड़ियाघर -राकेश भ्रमर संसार एक बहुत बड़ा और अनोखा चिड़ियाघर है। इसमें भांति-भांति के जीव आपको मिलेंगे। उनमें से मनुष्‍य नाम...

व्‍यंग्‍य आलेख

चिड़ियाघर

-राकेश भ्रमर

संसार एक बहुत बड़ा और अनोखा चिड़ियाघर है। इसमें भांति-भांति के जीव आपको मिलेंगे। उनमें से मनुष्‍य नाम का जीव तो सबसे अनोखा है। यह प्राणी रिश्‍तों-नातों में विश्‍वास करता है और सबसे ज्‍यादा इन्‍हीं रिश्‍तों से परेशान भी रहता है। बाप अपने बेटे से परेशान है कि वह अध्‍ययन नहीं करता और दिन-रात मोबाइल पर बातें करता रहता है। स्‍कूल-कालेज न जाकर शहर के बाग-बगीचों की सैर करता है या किसी रेस्‍तरां में लड़कियों के साथ बैठकर लजीज दावतें उड़ाता है और बाप की गाढ़ी (बेईमानी) की कमाई को बेरहमी के साथ खर्च करता है। सास अपनी बहू से परेशान रहती है कि वह रात में उसके पैरों में तेल नहीं लगाती। सास के पैरों में तेल लगाना बहू का कर्तव्‍य है, क्‍योंकि वह दहेज कम लाई है। ज्‍यादा लाती तो सास बहू के पैरों में तेल मालिश करती। भाई अपनी बहन से परेशान है कि वह किसी लड़के के साथ गुलछर्रे उडाती फिर रही है। उसको ताकने के चक्‍कर में वह अपनी पे्रमिका के साथ घूमने नहीं जा पाता है।

कुछ बाप इस बात से परेशान रहते हैं कि बेटा शादी के बाद बहू के कहने पर चलने लगा है। मां-बाप की एक नहीं सुनता और अपना सारा वेतन पत्‍नी के हाथ में रख देता है। घर का सारा खर्च बाप की पेन्‍शन से चलता है। बेटे को अलग भी नहीं कर सकते, क्‍योंकि बहू नहीं चाहती। वह बहुत चालाक है। सास-ससुर की संपत्ति पर उसकी नजर है, क्‍योंकि इस घर की वह इकलौती बहू है। शानदार बंगला छोड़कर किराए के मकान में क्‍यों जाए? सास कुछ कहती है तो बहू धमकी देती है कि उसे दहेज प्रताड़ना के मामले में फंसा देगी। सारी उमर चक्‍की पीसते बीत जाएगी। सास डर जाती है। आज तक उसने चक्‍की क्‍या गेहूं तक नहीं देखा था। पति की कमाई में सारी उमर आटा ही मंगाया। अब क्‍या बुढ़ापे में चक्‍की पीसेगी? वही वाली कहावत है कि बुड़ढी पीसे, कुत्त्ो खाएं। जब अपना ही बेटा नालायक हो तो मां-बाप को कष्‍ट झेलना ही पड़ता है।

पत्‍नी अपने पति से दुःखी रहती है कि उसे छोड़कर उसका पति दुनिया की सारी औरतों को प्‍यार भरी नजरों से देखता रहता है और पति इस बात से दुःखी रहता है कि पत्‍नी उसकी सारी कमाई साज-श्रृंगार और गहनों-कपड़ों में खर्च कर देती है तथा घर चलाने के लिए उसे ओवरटाइम में काम करना पड़ता है।

गरीब बूढ़ा बाप इस बात से दुःखी रहता है कि उसने अपना घर गिरवी रखकर बेटे को पढ़ाया-लिखाया, खुद सारी जिन्‍दगी मेहनत मजदूरी करता रहा और मरते दम तक कर्ज में डूबा रहा कि बेटे को कोई कष्‍ट न हो और पढ़-लिखकर वह अफसर बन जाए। बेटा अफसर बन भी गया, परन्‍तु वह अहसानफरामोश निकला। अफसर बनने के बाद अपनी मर्जी से पे्रम-विवाह कर लिया और शहर में बस गया। दुबारा गांव लौटकर नहीं आया और अब बूढ़ा बाप कर्जा उतारने के लिए कोई रास्‍ता ढूंढ़ रहा है। उसकी समझ में कुछ नहीं आता... क्‍या वह बुढ़ापे में दूसरा बेटा पैदा करे जो उसका कर्ज उतारेगा...

मेरे एक परम मित्र हैं। परम इसलिए कि वह अपने सुख-दुख की दास्‍तानों से प्रतिदिन मेरे सिर में दर्द पैदा करते रहते हैं। मेरे सिवा उनकी दुखभरी दास्‍तानें और कोई नहीं सुनता, परन्‍तु उनकी गाथाएं अखण्‍ड रामायण की तरह चलती ही रहती हैं। कभी खत्‍म होने का नाम नहीं लेती। एक दिन यह सृष्‍टि समाप्‍त हो जाएगी, परन्‍तु दुःखी पतियों की गाथाओं का अंत कभी नहीं होगा।

मेरे मित्र पहले इस बात से दुखी थे कि उनकी शादी नहीं हो रही थी। अक्‍सर वह इस विचार में मग्‍न रहते थे कि वह अभी तक अविवाहित क्‍यों थे? लोगों के पूछने पर कहते, ‘‘यार कोई ढंग की लड़की ही नहीं मिल रही है।'' लेकिन असलियत ये थी कि कोई लड़की उन्‍हें ही पसन्‍द नहीं कर रही थी। जब शादी की उम्र लगभग निकल चुकी थी तब एक गरीब लड़की से बिना दहेज के शादी कर ली। न करते तो वह भी हाथ से निकल जाती, परन्‍तु अब वही लड़की उनकी पत्‍नी बनकर उनको हाथ ही धरने नहीं देती थी।

अब वह इस बात से दुखी थे कि उन्‍होंने शादी ही क्‍यों की? न करते तो ज्‍यादा सुखी रहते। पत्‍नी से दुखी रहने का कारण पूछने पर मन मारकर बताते, ‘‘यार आज समझ में आया है कि स्‍त्री सच में एक महाशक्‍ति है। वह जो ठान लेती है, करके ही मानती है। कोई उसे अपने इरादे से नहीं डिगा सकता। वह जो सोचती है, वही कहती है और जो कहती है उसे करके ही मानती है। यह अलग बात है कि जो कुछ वह सोचती, कहती और करती है, वह सदैव सही ही हो, ऐसा नहीं हो सकता।

मैंने तर्क दिया, ‘‘कोई भी स्‍त्री इतनी बुरी नहीं हो सकती, वरना सभी पति अपनी-अपनी पत्‍नियों को तलाक दे देते। दूसरे देशों की अपेक्षा अपने देश में तलाक की दर काफी कम है।''

‘‘इसलिए कि हर पत्‍नी अपने पति को परमेश्‍वर समझती है। स्‍त्रियां काफी धार्मिक और अंधविश्‍वासी होती हैं। उनका मानना है कि पति-पत्‍नी का रिश्‍ता सात जनम का होता है, इसलिए कष्‍टों के साथ जीवन बिताते हुए भी वह अपने पति को छोड़ना नहीं चाहती। उनके लिए उनके पति-परमेश्‍वर से उनका अटूट रिश्‍ता होता है।''

‘‘लेकिन पति-पत्‍नी को पता कैसे चलता है कि वर्तमान जनम उनका कौन सा जनम है? और अभी और कितने जनम तक उन्‍हें एक साथ रहना है।'' मैंने आश्‍चर्य से पूछा।

‘‘शादी कर लो, फिर स्‍वयं पता चल जाएगा।'' उसने गुस्‍से में कहा।

‘‘गुस्‍सा मत करो, साफ-साफ बताओ।'' मैंने उसे सांत्‍वना देते हुए कहा।

‘‘मेरे यार, कुछ भी पता नहीं चलता कि उन दोनों का साथ-साथ यह कौन सा जनम है। सब बकवास है। बस पति जीवन भर भगवान से प्रार्थना करता रहता है कि यह उनका सातवां जनम हो और पत्‍नी यह कहकर पति का सुख चैन लूटती रहती है कि उनका यह पहला जनम है और अगले छः जनमों तक वह पति की छाती में मूंग दलेगी।'' कहते-कहते वह रुआंसा हो गया था।

मुझसे उसका दुख देखा न गया। मैंने उसे सलाह दी, ‘‘यार एक काम करो, आज शाम उससे जाकर कहो, कि एक ज्‍योतिषी ने तुम्‍हें बताया है कि यह जनम तुम दोनों का साथ-साथ सातवां जनम है, और यह अन्‍तिम है। इसके बाद तुम दोनों अलग हो जाओगे। ज्‍योतिषी ने यह भी बताया है कि इस जनम में अगर तुम दोनों एक दूसरे को दुःख दोगे तो कुंभीपाक नरक में यातना भुगतने के बाद अगले जनम में अलग-अलग तो रहोगे ही, बल्‍कि जन्‍म भी एक भयानक घिनौने कीड़े के रूप में होगा।''

मेरा मित्र मुझे आश्‍चर्य से देखता रह गया। आश्‍चर्य से कम, भय से ज्‍यादा... कुछ पल बाद उसका मुंह खुला, ‘‘यार, तुम क्‍या मेरी बीवी को अहमक समझते हो? तुम अभी तक उससे मिले नहीं हो न! एक बार मिल लो, फिर ऐसी सलाह नहीं दोगे। मैं जैसे ही तुम्‍हारी बात उसे बताऊंगा, वह मेरा गला दबा देगी और सीधे उस ज्‍योतिषी के पास ले जाएगी, जिसका इस दुनिया में कोई अता-पता नहीं है।''

मेरे पास अपने मित्र के दुख को दूर करने का दूसरा कोई उपाय नहीं था।

दुःख तो मैं किसी का दूर नहीं कर सकता। इस संसार में कोई किसी का दुख दूर नहीं कर सकता। हम सब एक दूसरे के दुख को बढ़ाते ही रहते हैं। राजनीतिक दल चुनावों के दौरान जनता के दुख दूर करने का बीड़ा उठाते हैं। परन्‍तु चुनाव के बाद जनता के दुखों में और इजाफा हो जाता है। हम केवल आश्‍वासन देते हैं। जो लोग आश्‍वासनों पर विश्‍वास कर लेते हैं, वह सदा कष्‍ट और दुख उठाते हैं। अहमक लोग दूसरों पर जल्‍दी विश्‍वास कर लेते हैं और सदा ठोकर खाते रहते हैं, मन में भी और तन में भी... कई बार तो पीछे चलने वाला भी उन्‍हें ठोकर मारकर गिरा देता है। इस तरह देखा जाए तो हर आदमी स्‍वयं से भी दुखी है और दूसरों से भी।

राजनीतिक दल अगर जनता को झूठे आश्‍वासन देकर दुखी करते हैं, तो जनता भी उन्‍हें अगली बार सत्ताच्‍युत करके दुखी कर देती है। इसीलिए आजकल कोई भी सरकार विकास और प्रगति का काम नहीं करती। वह अच्‍छी तरह जानती है कि अगली बार जनता उन्‍हें सत्ता की गद्दी तक नहीं पहुंचाने वाली है, अतः वह पूरे पांच साल तक नेता अपनी तिजोरियां भरते रहते हैं और इस बात से दुखी रहते हैं कि अभी बहुत कम कमा पाए हैं। पांच साल और मिल जाते तो कुछ और कमा लेते।

साधु महात्‍मा इस बात से सदैव दुखी रहते हैं कि उन्‍होंने माया-मोह और लोभ-लालच को त्‍यागकर सन्‍यास लिया था, परन्‍तु मन से इनको पूरी तरह नहीं निकाल पाए। इन्‍हीं की तरफ इन्‍द्रियों का पलायन होता है। जनता को मीठे-मीठे प्रवचन सुनाकर करोड़ों-अरबों रुपये जमा भी कर लिए, परन्‍तु अब चेले उस पर आंख गड़ाए बैठे हैं। पता नहीं कब गुरूजी का टेंटुटा दबा दें और सारा माल-मत्ता लेकर चम्‍पत हो जाएं। आजकल महात्‍माजी को ठीक से नींद भी नहीं आती। बेचारे बड़े-बड़े आश्रम बनवाकर और अथाह धन-सम्‍पत्ति इकट्ठा करने के बाद भी सुख-चैन से नहीं रह पा रहे हैं। अब बताइए भला, इनके दुख का कोई अंत है?

स्‍कूल प्रबन्‍धन के लोग इस बात से परेशान हैं कि उनके स्‍कूल में बहुत कम बच्‍चे प्रवेश ले रहे हैं। अतः उनके स्‍कूल का कलेक्‍शन काफी कम है। दूसरे स्‍कूल वाले उनसे ज्‍यादा कमा रहे हैं। बच्‍चों को अपने स्‍कूल की तरफ खींचने के लिए वह झूठे आश्‍वासन देते हैं और ऐसा प्रचारित करते हैं कि शहर का वह नम्‍बर वन का स्‍कूल है और वहां प्रवेश आसानी से नहीं मिलता है। किसी बड़े अधिकारी और मंत्री के कहने पर ही वहां प्रवेश मिलता है। यह प्रचारित होते ही वहां प्रवेश लेने के लिए बच्‍चों के अभिभावकों की लंबी कतार लग जाती है। प्रवेश किसी को मिले चाहे न मिले, परन्‍तु प्रवेश पत्र बेचकर ही स्‍कूल करोड़ों रुपये कमा लेता है। बाद में जिन बच्‍चों को प्रवेश मिल जाता है, उनके मां-बाप इस बात से परेशान रहते हैं कि मोटा डोनेशन और फीस देने के बावजूद ठीक से पढ़ाई नहीं होती और जिनके बच्‍चों को प्रवेश नहीं मिलता है, वह इस बात से दुखी रहते हैं कि एक अच्‍छे स्‍कूल में प्रवेश पाने से उनका बच्‍चा वंचित रह गया।

इस तरह देखा जाए तो हर आदमी एक दूसरे से परेशान और दुखी है। इसी कारण वह हर घड़ी पंछियों की तरह चें...चें....करता रहता है।

(राकेश भ्रमर)

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रचनाकार: राकेश भ्रमर का व्यंग्य - चिड़ियाघर
राकेश भ्रमर का व्यंग्य - चिड़ियाघर
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