एस. के. पाण्डेय का व्यंग्य : किस, मिस-कॉल और हाल

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किस, मिस-कॉल और हाल उन दिनों की बात है जब मेरे पास मोबाइल नहीं था। नाते-रिश्तेदार, परिचित वा घर वाले कहते थे कि जिसे देखो वही मोबाइल लेकर च...

किस, मिस-कॉल और हाल

उन दिनों की बात है जब मेरे पास मोबाइल नहीं था। नाते-रिश्तेदार, परिचित वा घर वाले कहते थे कि जिसे देखो वही मोबाइल लेकर चलता है। आज भोजन से भी जरूरी हो गया है मोबाइल। जो लोग नया-नया खरीदते हैं। वे गले में उसकी माला पहनते हैं। तथा कपड़े के ऊपर करके चलते हैं। ताकि लोग देख सकें कि इनके पास भी मोबाइल है। आप भी खरीदें जिससे जब इच्छा हो हाल-चाल तो मिल जाया करे।

लोगों की यह बात सुनकर मैं जहाँ पीसीओ से हफ्ते में एक बार फोन करता था। दो बार करने लगा। सोचा लोग तो हमारे हाल-चाल के लिए इतना परेशान रहते हैं। और एक मैं हूँ कि कोई ध्यान नहीं देता। इसके बाद मोबाइल खरीदना बहुत जरूरी हो गया। जब मोबाइल खरीद लिया तो अक्सर हर दूसरे दिन फोन करने लगा। इसका बजट पर भी काफी असर पड़ा और कान में भी दर्द रहने लगा। इससे एक रहस्योद्घाटन हुआ।

मैं एक बात को लेकर काफी परेशान रहने लगा। जब किसी दूसरे के मोबाइल की बेल बजते सुनता तो मुझे अपने मोबाइल के बारे में अनेकों गलतफहमीं हो जाया करती थी। जैसे कहीं सिग्नल वीक तो नहीं हो जाया करता। कुछ खराब तो नहीं हो गया। लेकिन जब मैं चाहूं तब किसी भी नम्बर पर कॉल कर सकता था। लेकिन भ्रम नहीं मिटता था। अक्सर यह सोचता कि जो लोग पहले इतना हाल-चाल के लिए परेशान रहते थे। अब मोबाइल हो जाने पर कभी न कभी तो फोन करना ही चाहते होंगे। शायद इनकमिंग कॉल में ही कोई समस्या रहती है।

मैं लोगों के पास फोन करता तो था। लेकिन संकोच वश पूंछ नहीं पाता था कि क्या आपने कभी मेरा नम्बर ट्राई किया था ? पूंछ भी लेता तो शायद जबाब मिलता कि ट्राई तो किया था। लेकिन लगा नहीं। तब तो मेरी शंका और भी बढ़ जाती कि जब भी कोई ट्राई करना चाहता है तो सिग्नल वीक हो जाया करता है। अथवा कुछ ना कुछ खराबी जरूर है। यदि कोई सीधा सा जबाब ही दे देता कि आखिर मैं क्यों ट्राई करने लगा आपका नम्बर तो भी क्या करता ? इससे सबसे बेहतर यही था कि कुछ भी ना पूछा जाय।

संकोच के कारण किसी को बता भी नहीं पाता था कि भाई मेरा फोन रिंग नहीं करता। आखिर इसका कारण क्या है ? कोई उपाय बताइए। किसी से कहता भी तो कैसे ? सवाल स्टेट्स का जो था। लोग क्या सोचते कि लोगों का फोन तो मिनट-मिनट पर रिंग करता हैं ? खाना, चलना-फिरना, सोना तक मुश्किल रहता है। खासकर युवकों -युवतियों का।

लोग ऑफिस में रहें तो काम करें कि बात करें। कॉलेज में ४५ मिनट के पीरियड में पाँच मिनट लेट करके आये । कुछ देर पोजीसन बनाने में तथा दो बार फोन आ जाये तो शेष पाँच-दस मिनट निकालने में कोई खास दिक्कत नहीं रह जाती। सड़कों पर कार-बाइक चलायें। या गाल। आये दिन लोग इसी चक्कर में किसी न किसी को ठोंक देते हैं। तथा गर्व का अनुभव करते हैं कि बढ़ती जनसंख्याँ को कुछ ही कम करके देश सेवा किया हैं। और एक ये हैं कि इनका मोबाइल रिंग ही नहीं करता। या तो इनसे कांटेक्ट करने वाला कोई नहीं है। या फिर कोई इनसे कांटेक्ट करना ही नहीं चाहता। आखिर कोई कांटेक्ट करना भी चाहे तो क्यों ?

गणित, विज्ञान, दर्शन, अध्यात्म कविता और व्यंग्य आदि के रंग तो कुछ ना कुछ समझ में आ ही गये। लेकिन बतरंग नहीं समझ सके। लच्छेदार बात करना भी तो एक कला है। हंसी-ठिठोली, मंसखरी और इसके थोड़ा आगे बढ़े तो हास्य रस या इसके नये आयाम में महारथ तो दूर जब 'क ख ग' भी नहीं सीख सका तो यह सब तो सहना ही पड़ेगा।

हास्य रसिकों को तो लोग घेरे रहते हैं। खासकर लड़कियां। और उनसे बात करके अपने को गौरवान्वित समझती हैं। कुछ लड़कियों ने तो नम्बर नोट भी किया था। तथा पहला कॉल भी आया। लेकिन वही अंतिम भी था। क्योंकि बतरस से शून्य बात का क्या अर्थ ? एक बार एक लड़की ने पहली बार फोन किया। उसे तुरंत सब समझ में आ गया। फोन तुरंत कट तो नहीं किया। लेकिन जुगुत ढूढ़ने लगी। बोली क्या करने जा रहे थे ? मैंने बताया आराम कर रहा हूँ। इसके बाद खाना खाऊँगा। बोली बहुत ठीक है। आप खाना खा लीजिये। अभी फोन करती हूँ। जल्दी-जल्दी खाना खाया कि बीच में ही फोन ना आ जाये। इंतजार करते रह गये। लेकिन फोन ना आना था और ना ही आया। इतना ही नहीं कुछ लोग फोन उठाने में भी कन्नी काट जाते हैं। जिसमें लड़कियों का स्थान ऊपर है। बशर्ते भनक लग जाये कि किसका फोन होगा ? रूखी-सूखी बात से चुप रहना बेहतर है।

मैं अक्सर सोचता कि कुछ भी हो माना हास्य रसिक नहीं हूँ। तब भी हाल-चाल के लिए तो फोन मिलाना ही चाहिये। लोग मिलाते होंगे। फोन लगता नहीं। जरूर कुछ ना कुछ खराबी हो गाई है। ऐसा सोचकर कभी-कभी बहुत परेशान हुआ। सच्चाई कडुई होती ही है। जल्दी यकीन नहीं पड़ता। एक बार जब दिन, हफ्ता , पाख वा महीना भी इंतजार में बीत गया । लेकिन मेरा मोबाइल रिंग नहीं किया । तब आख़िरकार एक युक्ति सूझी। मैं अपना फोन कमरे में रखकर एक पीसीओ बूथ पर गया। और अपना ही नम्बर ट्राई करने लगा। नम्बर लग गया। रिंग सुनाई दे रही थी। मुझे ख़ुशी भी हुयी और दुःख भी। ख़ुशी इस बात की कि फोन खराब नहीं है। दुःख इस बात का कि सचमुच कोई मेरा नम्बर ट्राई नहीं करता। मैं केबिन से निकला। बूथ वाले से बोले कि उठ नहीं रहा है। कमरे पर आये तो देखा मिस कॉल लिखा था । आज सोच कर गया था कि किसी न किसी मैकेनिक को दिखा दूंगा। लेकिन फोन खराब होने की शंका निर्मूल हो गयी।

किसी ने सच ही कहा है कि 'दीवालों' के भी कान होते हैं। मै समझ रहा था कि मैं बता नहीं रहा हूँ तो फोन रिंग ना करने का राज किसी को पता नहीं है। लेकिन एक दिन मेरे आश्चर्य कि सीमा ना रही जब एक सज्जन कहने लगे कि पाण्डेय जी पार्टी दीजिये। मैंने पूछा आखिर किस ख़ुशी में ? वे बोले आज पहली बार आपके मोबाइल की बेल सुनायी पड़ी है। दरअसल उस दिन मोबाइल कम्पनी का विज्ञापन कॉल आया था। काफी दिन तक ना विज्ञापन कॉल और न ही कोई मैसेज आता था। अभी हाल ही में कम्पनी ने यह सिलसिला शुरू किया था। मैंने तुरंत ना ही कॉल कट किया और ना ही रिसीव किया। शायद मेरे मन में कहीं ना कहीं था कि लोग सुन लें कि मेरा मोबाइल भी रिंग करता है।

थोड़ी देर में कुछ और लोग जुट गाए। सभी हँस रहे थे। खैर स्टेट्स की बात थी। मैंने कुछ इस ढंग से समझाया कि वे लोग ही झेंप गये। मैंने कहा दरअसल मुझे यह पसंद नहीं है कि दिन में कोई मुझे काम के वक्त कॉल करे। मैंने सभी को मना कर रखा है कि बहुत अर्जेंट हो जैसा कि आज का कॉल, तभी दिन में फोन करना। नहीं तो हाल-चाल के लिए तो सारी रात खाली रहती है। रात में नींद खराब हो जाय, यह तो मुझे पसंद है। लेकिन मुझे यह कतई पसंद नहीं है कि बार-बार फोन आये जिससे मेरे साथ-साथ और लोग डिस्टर्ब हों। मेरा मानना है कि घर में बात करो और ऑफिस में सिर्फ काम करो।

इधर लोगों के मिस कॉल की संख्या बढ़ने लगी। लेकिन इनकी फुर्ती का जबाब नहीं। फोन देखो तो मिसकाल लिखा मिले और रिंग सुनाई ही न पड़े। फोन मिलाने की गजब की स्टाइल लगा नहीं की कट। अपने पल्ले यह भी नहीं पड़ता। एकाध बार हमारे भी मन में इच्छा हुई कि चलो हम भी मिसकाल करके देखते हैं। जवाब आता है कि नहीं। लेकिन जैसे उधर लोग तैयार बैठे हों तुरंत रिसीव कर लिए। तब से हमने कहीं मिसकाल नहीं किया। सोचा कि नाहक में टेंसन लेने से क्या फायदा ? जैसा सोचो वैसा अगर न हो तो टेंसन तो होती ही है।

मैंने कभी किसी को निराश नहीं किया। कॉल करना भले ही कम कर दिये हों। लेकिन मिस कॉल का जबाब तुरंत कॉल से ही देता हूँ। लेकिन यह कहता हूँ कि अभी आपका मिस कॉल आया था। कई लोग जो बेशर्म होते हैं वे कह देते हैं कि मैंने कॉल किया था। उठा नहीं शायद आप कहीं व्यस्त थे। ऐसे लोगों को लगता है शायद फोन पास में न रहा हो तो जान थोड़े पाएँगे कि कॉल थी कि मिसकाल। कोई बुजुर्ग हो तो सुन लेते हैं नहीं तो कह देते हैं कि फोन तो हाथ में ही था। लेकिन बेशर्म तो बेशर्म वे सुन लेते हैं और अगली बार भी यही कहते हैं।

कई लोग जो कम बेशर्म होते हैं वे कह देते हैं कि हाल-चाल के लिए किया था। मैं चाह कर भी पूंछ नहीं पाता कि क्या मिस कॉल से ही हाल मिल सकता है ? कॉल करोगे तब क्या हाल नहीं बताऊंगा ? दरअसल लोग एसटीडी से डरते हैं। कोई -कोई कहता है कि बैलेंस नहीं है। पता नहीं जब तक बैलेंस रहता है तब हाल जानने की जिज्ञासा क्यों नहीं होती ?

वास्तव में मेरे परिचित लोग शर्मा जी जैसे हैं। जब इन्होंने फोन लिया। तुरंत लाइफ टाइम करा दिया। पत्नी से बोले हर छठे महीना पचास रुपया लगेगा। याद रखना यह मोबाइल मैंने कॉल रिसीव करने के लिए लिया है। या कभी-कभार मिस कॉल करने के लिए। कॉल करने के लिए नहीं। लेकिन जैसे शर्मा जी घर से बाहर कदम रखते। पत्नी को अपने मायके का ख्याल आता। अपने बहनों का वा जीजा लोगों का। शर्मा जी कहते कि कोई फोन मिला दे तो बाकायदा हाल चाल पूछो। हर एक सदस्य का। गाँव घर का। लेकिन मिस कॉल का यहाँ कोई जवाब नहीं है। कॉल तो सपने में ही हो सकता है।

एक दिन उनकी पत्नी को अपने बहन की याद आई। शर्मा जी बाहर हुए नहीं कि कॉल कर दिया। वे तुरंत वापस आ गये। छोटे लड़के से पता चला कि मम्मी ने ही कॉल किया है। बोले घर से कदम बाहर नहीं निकाला कि तुम्हें बहन-बहनोई याद आने लगे। कट करो। इतने में पत्नी की आवाज आई कि जीजा कैसे हैं ? शर्मा जी बोले अरे एक बात और बढ़ा दिया। मैं कहता हूँ रखो। किसी ने कहा आप जरा धीरे बोलिए। आपकी आवाज वहाँ जाती होंगी। शर्मा जी बोले यहाँ पैसा जाता है और तुम्हें आवाज की पड़ी है। मुझे तो लग रहा है फोन छीनना पड़ेगा।

पत्नी ने सोचा बात बिगड़ने वाली है तो कट कर दिया। बोली आपको पूंछ रही थीं। मैं तो बुलाने वाली थी। लेकिन आप नाराज हो रहे थे सो डर गयी। बोले बुलाओगी क्यों नहीं ? मैं कहे देता हूँ कि कोई मुझे पूछे तो साफ कह दिया करो कि शर्मा जी घर पर नहीं हैं। लड़का बोला अगर फोन कहीं से आये तो भी। शर्मा जी थोड़ा नरम पड़े। बोले तब तो बात कर सकता हूँ। उनको नरम पड़ते देख पत्नी ने समझाना शुरू किया कि महीने दो महीने में तो कहीं-कहीं कॉल कर लेने दिया करो। बोले ठीक है तुम तो मेरा जी खा जाओगी। तुम्हारी अकल पर पत्थर जो पड़ा है। आगे बोले एक दो महीने में नहीं तीन-चार महीने में एक बार। जहाँ बहुत जरूरी समझो मिला लिया करो। वो भी दो मिनट से ज्यादा नहीं। ख्याल रहे पचास रूपये में छ महीने निकालना है। लड़का बोला लेकिन पापा तुरंत रखें कैसे ? बात पूरी भी ना होने पाए। बोले तूँ भी इनपर ही गया है। अकल नहीं आएगी। फोन मिलाओ तो जैसे एक मिनट पूरा होने वाला हो बोल दो सिग्नल बहुत वीक है। अभी कट जायेगा। उसके बाद जब दूसरा मिनट पूरा होने वाला हो तो जोर-जोर से हेलो-हेलो करो। साथ में बोलो आवाज नहीं आ रही है। हेलो-हेलो ! और इसके बाद फोन कट कर दो।

शर्माजी अपने लड़के को एक और ट्रिक बताते हैं कि यदि पास से, जैसे एक दो किलोमीटर मतलब जहाँ आसानी से पैदल पहुँचा जा सके, मिसकाल आये तो सीधे मिसकाल करने वाले के घर पहुँच जाया करो। बोलो भाई क्या बात है ? आपका मिसकाल आया था। सोचा चलो हाल-चाल ले आते हैं। घर पे जाओगे तो कम से कम चाय-पानी तो पिलाना ही पड़ेगा और उसके बाद कभी भूलकर भी वह मिसकाल नहीं करेगा।

करने वाले फोन पर क्या-क्या नहीं करते ? मतलब बहुत कुछ करते हैं। डांस भी ओ भी डिस्को। किस करते हैं। मिस करते हैं। जिससे किसमिस बन जाता है। और बात की मिठास बहुत बढ़ जाती है। इसी से तो लोग पूरी-पूरी रात बात करते रहते हैं। लेकिन जो अज्ञानता वश समझ नहीं पाते। खासकर माता-पिता या बुजुर्ग। वे सोचते हैं कि आखिर रात-दिन क्या बात करते हैं कि पेट नहीं भरता ? नींद नहीं आती। आँखों-आँखों में रात गुजर जाती है। दिन में तारे दिखते हैं। जगह खोजते रहते हैं । कहाँ जाएँ और बात करें। मेरा छोटा भाई कोई सुरक्षित जगह नहीं पाता तो गाँव में गन्ने के खेत में घुस जाता है और घंटों बात करके पसीने से लथपथ निकलता है।

बात करने वाले लड़के-लड़कियों का सिरदर्द नहीं करता। सारा साइड इफेक्ट माता-पिता और बुजुर्गों पर पड़ता हैं। बतियाते ये हैं और सिरदर्द करता है इनका। रसपूर्ण मेसेजों का आदान प्रदान भी होता है। लेकिन अपने पल्ले कुछ नहीं पड़ता। इसकी भी शिकायत मिलती है।

अभी तो खैर कुछ गनीमत है । असली मजा कुछ दिन बाद आएगा । लोग नंगे होकर मोबाइल पर डिस्को करेंगे । किस-मिस को नया आयाम मिलेगा। अभी सिर्फ खुलकर बतियाते हैं। तब खोलकर बतियाएंगे। खुद देखेंगे और दिखायेंगे।

एक दिन सोते समय मेरे मोबाइल की रिंग बजी। अचानक अर्ध निद्रा में ही कॉल रिसीव कर लिया। शायद कॉल करने वाले मिस कॉल के चक्कर में थे। लेकिन मौका चूक गये। मिस कॉल के बदले कॉल वाली फेसिलिटी का सदुपयोग करना चाहते थे। कुछ लोग तो चाहे शर्म वश ही सही लेकिन अब कॉल की कौन कहे मिस कॉल से भी तौबा कर लिए हैं। लेकिन ये तो आज फंस गये। दो मिनट भी पूरा नहीं हुआ बोले रखता हूँ। मैंने पूछा आखिर क्यों ? कुछ और बात करिये। उनहोंने सच्चाई बताई कि फोन मैंने ही मिलाया है। सच में मैंने अर्ध निद्रा में रिसीव किया था, मुझे पता नहीं था। मैंने कहा नहीं मैंने ही मिलाया है। वे भी चक्कर में पड़ गये। कभी मिलाते तो थे नहीं। दरअसल उन्हें मिलाने का अभ्यास नहीं था । इतने में तीसरा मिनट पूरा होते-होते बोले। नहीं मैंने ही मिलाया है और फोन कट कर दिया। कॉल कट होने के बाद मैंने देखा। सच में उन्होंने ही मिलाया था। अपनी सफाई देना चाहा। उनके यहाँ शेर-शायरी का बहुत चलन है। कभी-कभार एकाध मेसेज भी आ ही जाते हैं । उनका भाई और उसके दोस्त भी शायर हैं। बहनों का क्या कहना ? एक से एक दोहे, शेर, शायरी से परिपूर्ण हैं। वे लोग शेर-शायरी की भाषा ज्यादा आसानी से समझते हैं। कविता का उनपर कोई खास असर नहीं पड़ता। गद्य तो बहुत ही कम समझते हैं। मैंने सोचा ' खग समझे खग ही की भाषा '। सो भले ही शेर-शायरी पर अपना पकड़ नहीं है। लेकिन एक शेर बनाकर मेसेज कर दूंगा। भाव तो समझ ही जायेंगे। शायद उनका भ्रम दूर हो जाय कि मैंने झूठ नहीं बोला था। आशा भी है कि वे समझ गये होंगे। वह शायरी यही थी-

फोन मैंने ही मिलाया कहा लेकिन तुमने ही मिलाया था।

फोन मिलाने की ही आदत जो बन गयी है अपनी,

सो समझा नहीं क्योंकि अर्ध निद्रा में उठाया था।।

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डॉ. एस. के. पाण्डेय,

समशापुर (उ.प्र.)।
ब्लॉग: श्रीराम प्रभु कृपा: मानो या न मानो

URL1: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

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रचनाकार: एस. के. पाण्डेय का व्यंग्य : किस, मिस-कॉल और हाल
एस. के. पाण्डेय का व्यंग्य : किस, मिस-कॉल और हाल
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