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रामवृक्ष सिंह की कहानी - घर की तलाश

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कहानी घर की तलाश डॉ . रामवृक्ष सिंह उस सुबह दफ्तर आते समय बस पकड़ने के लिए मैं बस स्टैण्ड पर पहुँचा ही था कि पहले से वहाँ खड़ी एक महिला ...

कहानी

घर की तलाश

डॉ. रामवृक्ष सिंह

उस सुबह दफ्तर आते समय बस पकड़ने के लिए मैं बस स्टैण्ड पर पहुँचा ही था कि पहले से वहाँ खड़ी एक महिला मेरे पास आई और पूछने लगी- “सर, आप सामनेवाली कॉलोनी में रहते हैं क्या?” “जी हाँ।” मैंने सहजता से उत्तर दिया । शुरुआती संकोच के बाद उसकी वाणी में आत्म-विश्वास लौट आया था- “नहीं, वो क्या था न कि मुझे एक घर की तलाश थी...खरीदने के लिए....पर, कुछ समझ नहीं आ रहा कि क्या करूँ।” उसने बात आगे बढ़ाई।

मैंने सरसरी तौर पर उसका मुआयना कर लिया। कद लगभग पाँच फुट। बदन दोहरा, कमर के इर्द-गिर्द चरबी, जैसीकि बच्चेदार महिलाओं के अकसर हो जाती है। चेहरा गोल। रंग काफी गोरा। उम्र लगभग पैंतीस-छत्तीस। लेकिन पहली नज़र में उसे मैंने तीस या उससे कम उम्र की समझ लिया था। बस स्टैंड पर उसे मैंने कई बार देखा होगा, लेकिन दुपट्टे से नकाब बनाकर चेहरा पूरी तरह ढका होने के कारण शायद ही उसका मुँह कभी दिखाई पडा हो। लेकिन आज उसके चेहरे पर नकाब नहीं थी।

“इसमें करना क्या है! अपनी ज़रूरत और बजट के हिसाब से कोई प्रॉपर्टी देखिए। थोड़ा-सा बयाना देकर, उसके मालिक से सेल का ऑफऱ लिखवाकर ले लीजिए। पैसे का जुगाड़ कीजिए और रजिस्ट्री करा लीजिए।” मैंने ऐसे कहा कि जैसे संपत्ति खरीदना और ठेले से आलू-प्याज खरीदना एक ही बात हो।

“जी, मैंने एक प्रॉपर्टी देखी तो है। लेकिन आगे कैसे क्या करूँ, समझ नहीं आ रहा। दरअसल मैं अकेली हूँ न। कोई ऐसा है नहीं जो मेरा मार्ग-दर्शन कर दे।” महिला ने अपनी मज़बूरी बताई।

उसके अकेलेपन पर मुझे अचानक तरस आने लगा। पैंतीस-छत्तीस वर्ष की कोई ठीक-ठाक-सी दिखनेवाली महिला अपने अकेलेपन का जिक्र करे तो यह तो समझ आ ही जाता है कि या तो वह अब तक अविवाहिता रह गई और माता-पिता, भाई-बहन भी साथ छोड़ गए या विधवा अथवा तलाकशुदा है और नाते-रिश्तेदारों से दूर अकेले रहने को विवश है। हमारी मुलाकात बस कुछ ही मिनट पुरानी थी, और हमारी बातचीत का केन्द्र उसका अकेलापन नहीं, बल्कि उसके लिए घर खरीदना था, इसलिए इस विषय में कुछ भी पूछना मुझे उचित नहीं लगा। मैंने मान लिया कि मदद की अपेक्षा में ही उसने अकेलेपन का ज़िक्र किया है, किसी और प्रयोजन से नहीं। लेकिन फिर भी, किसी अकेली युवा महिला की खुलकर मदद करना भी मुझे निरापद नहीं लगा। लिहाजा मैंने बस इतना ही पूछा- “कोई तो होगा, जो आपके साथ खड़ा हो सके ? ”

“सर, कोई नहीं है। किराए के मकान में रहती हूँ। पाँच हजार रुपये महीने किराया देना पड़ता है। सर्वहारा कंपनी में काम करती हूँ। चौदह हजार रुपये तनख्वाह मिलती है। मेरठ की रहनेवाली हूँ। यहाँ मेरा कोई भी सगा-संबंधी नहीं है। चार बच्चे हैं। दो बेटियाँ, दो बेटे। सब पढ़ने जाते हैं। ” उसने अपनी पारिवारिक और माली हालत संक्षेप में, लेकिन बड़ी बेबाकी से बयान कर दी।

चूंकि उसने मकान खरीदने के सिलसिले में मेरी मदद चाही थी, इसलिए उसके परिवार के बारे में अधिक चर्चा करना मुझे मुनासिब नहीं लगा। लेकिन यह तो तय था कि मकान या प्लॉट खरीदने के लिए धन चाहिए और धन या तो हमारे पास पहले से जमा हो या उधार लिया जाए। उधार लिया जाए तो उसे लौटाने की हमारी क्षमता होनी चाहिए। लौटाने की क्षमता हमारी आय, हमारे वर्तमान और भावी खर्चों तथा हमारी अवशेष आय-अर्जक आयु पर निर्भर करती है। महिला ने यह तो बताया कि उसकी मासिक आय चौदह हजार रुपये है, उसे हर महीने पाँच हजार रुपये भाड़े के देने पड़ते हैं। चार बच्चे हैं जो स्कूल जाते हैं। इसलिए उनके खर्चे तो होंगे ही। सभ्यता के नाते मैं उसकी वर्तमान आयु नहीं पूछ सकता था। इसलिए लोन लेने पर चुकाने के लिए उसके पास कितने साल की सर्विस बकाया होगी, उसका केवल अनुमान ही लगाया जा सकता था। इतनी कम आय...., इतने ढेर सारे खर्चे..., इसमें वह मकान कैसे खरीदेगी, या प्लॉट खरीदकर उसपर मकान कैसे बनवाएगी, यह सोचकर मैं परेशान हो उठा।

“बच्चे कौन-कौन-सी क्लास में हैं?” संकोच करते-करते भी मैंने पूछ लिया।

“बड़ी बेटी नौवीं में है। बाकी सब उससे छोटी कक्षाओं में ..।”

“इसका मतलब यह हुआ कि दो-तीन साल में आपकी बच्ची कॉलेज जाएगी। उसके पीछे-पीछे दूसरे बच्चे भी बड़े होंगे और उनकी पढ़ाई का इन्तजाम भी आपको करनी होगी। चौदह हजार में आप कैसे ये सब मैनेज करेंगी!” मैंने चिन्तातुर लहजे में ऐसे कहा जैसे मैं न जाने कितने बरसों से उससे परिचित हूँ।

“नहीं पाँच लाख रुपये तो मेरे पास पहले से जमा हैं। बाकी लोन ले लूँगी।”

“जो मकान आप खरीदने की सोच रही हैं, उसकी कीमत कितनी है?”

“बेचनेवाले तो बारह लाख रुपये माँग रहे हैं। लेकिन हो सकता है पचास हजार तक कम कर दें।”

“इसका मतलब है कि आपको लगभग सात लाख रुपये का लोन लेना पड़ेगा। बेहतर होगा कि आप ये लोन अपनी कंपनी से ले लें, जो धीरे-धीरे आपके वेतन से कटता रहेगा।...” इस बीच हमारी बस आ गई। हमने आगे-पीछे की सीटें लीं। वह अगली सीट पर तिरछी होकर बैठ गई और पीछे मुड़कर मुझसे बातें करती रही। जब तक वह उतर नहीं गई, मैंने जमीन-जायदाद खरीदने के बारे में उसे ढेर सारी व्यवहारिक बातें बताईं। और बीच-बीच में यह भी कहना नहीं भूला कि इस मामले में थोड़ा बड़ा ही सोचना चाहिए, क्योंकि कालान्तर में हमारी आय बढ़ती ही है और उसी अनुपात में हमारी आकांक्षाएं, आवश्यकताएं भी बढ़ती हैं। तब छोटा मकान हमें बार-बार याद दिलाता है कि काश, हमने समय रहते थोड़ा और पैसा लगाकर थोड़ा-सा और बड़ा मकान या बड़ा प्लॉट ले लिया होता।

उसने मेरी सारी बातें ध्यान से सुनीं। मेरा विजिटिंग कार्ड माँगकर पर्स में रख लिया और अपना मोबाइल नंबर दिया। मैंने उसका नाम पूछने की जरूरत नहीं समझी। बल्कि अपने मोबाइल में उसका नंबर “घर-खरीददार” नाम से दर्ज़ कर लिया। वह बार-बार बस एक ही रट लगाए रही- “सर, मुझे तो कुछ पता नहीं है। अब तो बस जो कुछ करना है आपही को करना है।” जितनी बार उसने यह जुमला बोला, उतनी बार मैं उसके प्रति और चिन्तित होता गया। मैंने मन ही मन ठान लिया कि इस बेबस महिला के लिए ज़रूर कुछ न कुछ करूँगा।

फिर भी उसके ऐसा कहने पर हर बार मैं संकोच से गड़ता रहा और बार-बार यंत्रवत एक ही उत्तर देता रहा- “करना तो मैडम आपही को है। मैं तो सिर्फ आपको गाइड कर सकता हूँ।” जैसाकि मेरा स्वभाव है, कई बार मन में आया कि उससे कहूँ कि कभी आप बच्चों सहित मेरे घर आइए। लेकिन बहुत कोशिश करके मैंने खुद को ऐसा कहने से रोका। कहीँ अंदर ही अंदर यह डर भी था कि इसे अपना घर दिखाकर मैं आगे के लिए कोई मुसीबत न मोल ले लूँ। मेरे ज़हन में ऐसे कितने ही किस्से तैर गए, जिनमें सुनने में आया कि किसी चालबाज महिला ने पहले मदद माँगी और फिर पुरुष को ब्लैकमेल करना शुरू कर दिया। यह महिला वैसी नहीं लगी, फिर भी....।

उसका स्टैंड आया तो वह बस से उतरकर चली गई।

उसके बाद हमारी मुलाकातें बस स्टैंड पर और वह भी सुबह के समय ही होतीं। जब भी वह मिलती, मैं उससे संपत्ति की खरीद के मामले में हुई प्रगति के विषय में पूछता। इसी क्रम में पता चला कि जो छोटा-सा घर वह खरीदना चाह रही थी, वह प्राधिकरण द्वारा आश्रयहीन लोगों को रियायती दामों पर आवंटित किया गया था और उसे किसी दूसरे को बेचने की अनुमति नहीं थी। बेचनेवाला उससे पचास हजार रुपये बयाना माँग रहा था और मकान के कागजों की फोटोकॉपी तथा बेचने के बारे में कोई ऑफऱ लेटर आदि देने को तैयार नहीं था। लिहाजा उस संपत्ति की रजिस्ट्री किसी दूसरे के नाम कराना और खरीद के लिए नियोक्ता अथवा सरकारी बैंक से लोन लेना संभव नहीं था। महिला की उलझन समझकर मैंने उसे आश्वस्त किया- “आप चिन्ता न कीजिए। कई प्रॉपर्टी डीलर मेरे जाननेवाले हैं। मैं उनसे बात करके आपको घर दिलवाऊँगा।”

हर रोज शाम को घर लौटने के बाद मैं पत्नी से भी इस पूरे प्रकरण के विषय में बातें करता और घर के ही फोन से अपनी जान-पहचान वाले कई डीलरों से कहता कि वे दस-बारह लाख के किसी छोटे मकान या सात-आठ लाख रुपये तक के प्लॉट के बिकाऊ होने पर मुझे सूचित करें। अगले शनिवार-रविवार को मैं गाड़ी ठीक कराने गैराज गया तो उससे सटा हुआ दफ्तर देखा, जिसपर किसी प्रॉपर्टी डीलर का बोर्ड लगा था। मैंने वहाँ से भी कुछ संपत्तियों के ब्यौरे जुटा लिए। अब मैं आश्वस्त हो गया कि उस बेचारी अकेली महिला की घर की तलाश पूरी करने में कुछ न कुछ मदद तो मैं जरूर पाऊँगा।

अगले कुछ दिन हम बस स्टैंड पर कई बार टकराए। मैं हमेशा की तरह एक ओर खड़ा होकर बस का इंतजार करता। वह बस स्टैंड पर आती, और एक ओर खड़ी रहती। बस आने पर मेरी ही बस में चढ़ती, लेकिन कभी पास आकर बोलती नहीं थी। जैसे आजकल की लड़कियाँ और युवा महिलाएँ अपने पूरे चेहरे को किसी कपड़े से लपेटे नकाबपोश बनी रहती हैं, वैसे ही उसका भी बाना रहता। उससे बात करने का विचार मन में होने पर मुझे यही लगता कि यदि ज़रूरत होगी तो वह खुद बात करेगी, कि यदि उसे संपत्ति खरीदने के बारे में मेरी मदद दरकार होगी या वह बात को आगे बढ़ाना चाहेगी तो खुद ही पहल करेगी, क्योंकि मेरा सड़क पार करके बस स्टैंड पर आना तो वह देख ही लेती होगी। मेरा कार्ड उसके पास था ही, जिसमें मेरे दफ्तर, घर और मोबाइल- तीनों नंबर दिए हुए थे। हाँ, उसका मोबाइल नंबर भी मेरे पास था, लेकिन उसका जो सीमित परिचय मुझे प्राप्त था, उससे मुझे यह आश्वस्ति नहीं थी कि उसे फोन करना निरापद होगा या नहीं। इसलिए उसे फोन न करना ही मुझे श्रेयस्कर लगता। यदि फोन करने का विचार मन में आया भी तो मैंने बार-बार अपने खुद को समझाया कि छोड़ो, जाने दो, उसे ग़रज होगी तो खुद ही फोन करेगी, कि मैं एक सीमा से अधिक चिन्ता दिखाने लगा तो वह कुछ और न समझ बैठे, माता-पिता, भाई-बहन और पति-विहीन, अकेली व सुन्दर महिला...!

ऐसे ही कुछ दिन बीत गए। इसके बाद उसे जब भी देखा, नकाब में देखा। न उसके चेहरे की नकाब उतरी, न जुबान से कोई बात निकली। लेकिन उसकी देहयष्टि की बनावट, कद-काठी और कपड़ों से ही उसे पहचानता रहा। फिर एक परिवर्तन आया। पहले जहाँ वह पैदल चलकर बस स्टैंड तक आती थी, वहीं अब किसी तीस-पैंतीस वर्षीय युवक की बाइक पर बैठकर आने लगी। युवक उसे बस स्टैंड पर उतारता और आगे निकल जाता। वह बस पकड़ती और अपने नियत स्टैंड पर उतर जाती। लगभग एक-डेढ़ महीने यह सिलसिला चला। फिर उसका बस स्टैंड पर आना बंद हो गया। कई हफ्ते बीत गए और उसे मैंने फिर कभी नहीं देखा। उसके लिए कई मकानों और प्लॉटों की जानकारी मैंने एकत्र कर ली थी, लेकिन अब शायद उसे उनकी मदद की ज़रूरत नहीं थी। इस बीच जिन दलालों से मैंने बात की थी, वे मेरे पीछे पड़ गए कि साहब, पहले तो प्रॉपर्टियों के बारे में बड़ी तत्परता से पूछ रहे थे और अब जब बता दिया तो क्या बात हो गई, जो फोन करना भी छोड़ दिया। अब मैं उन्हें क्या समझाता! उलटे अपने मन को ही समझा लिया कि शायद उस महिला ने अपने लिए कोई उपयुक्त घर तलाश लिया होगा और अब वहीं रहने चली गई होगी। मेरे मन ने बार-बार चाहा कि काश, ऐसा ही हुआ हो, कि काश उस महिला को कोई घर मिल गया हो।

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रचनाकार: रामवृक्ष सिंह की कहानी - घर की तलाश
रामवृक्ष सिंह की कहानी - घर की तलाश
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