सप्ताह की कविताएँ

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  ०जसबीर चावला० कैसे कह दूं कि मैं आज़ाद हूं तुम कहते हो मैं आज़ाद हूं तुम आज़ाद हो हम सब आज़ाद हैं * हां मैं आज़ाद हूं यह कहने के लिये...

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०जसबीर चावला०

कैसे कह दूं कि मैं आज़ाद हूं

तुम कहते हो
मैं आज़ाद हूं
तुम आज़ाद हो
हम सब आज़ाद हैं
*
हां मैं आज़ाद हूं
यह कहने के लिये
कि मैं आज़ाद हूं
तुम्हारी हर बात
सहने के लिये
हर हाल में
रहने के लिये
मैं आज़ाद हूं
यही लक्ष्मण रेखा मेरी
यही हद है
*
तुम सिद्ध हस्त हो
कहीं भी/कभी भी
कुछ भी कर सकते हो
पक्के खिलाड़ी
हथेली में सरसों
उगा सकते हो
सरकार
बना/ बिगाड़ सकते हो
हवा में/दिल में/दिल्ली में
या
भोपाल में
तुम
सर्वगुण सम्पन्न
सगुण निर्गुण निराकार
प्रभुजी मेरे अवगुण चित न धरो
कर सकते हो हर जोड़ तोड़
हर जोड़ में बेजोड़
लगा सकते टांका
किसी को चूना
चमका सकते छवि
अतीत के खंडहर की
खोल सकते कलई
एक दूजे की
मैं चाह कर
उतार नहीं सकता
तुम्हारा मुलम्मा
तुम्हारा नकाब
यह मेरी आज़ादी है
*
मैं आज़ाद हूं
तुम्हें
ओर तुम्हें ही
चुनने के लिये
साल दर साल
पांच साल
तुम्हें ही सुनने के लिये
एक नाथ के बदले
दूसरे नाथ के लिये
बांबी से बंाबी
तुम्हारे ही साथ के लिये
मैं आज़ाद हूं
*
मैं आज़ाद हूं
तुम्हारे भ्रष्टाचार के लिये
तुम्हारे मुंह से झड़ते
हर विचार के लिये
मुझे आज़ादी है चुनाव की
कैसे मरना चाहता हूं
भूख से
भय से अत्याचार से
या थोपे/ठूंसे गये
कुत्सित विचार से
पुलिस के प्रहार से
मैं आज़ाद हूं
तुम्हें हीं चुनूं
मतपत्र में कालम नहीं होता
'कोई स्वीकार नहीं का'
न प्रतिकार का
*
भूलूं
तुम्हें मैंने चुना
कि तुम आज़ाद रहो
बेलगाम रहो
पस्त रहो
तनसे/मन से/कपड़ों से
अस्त वयस्त रहो
सत्तामद में
मस्त रहो
लूटते रहो/गिरवी रखो
देश को/विदेश को
संसाधनों को
तुम
आकाश कुसुम
न छू सकूं
न आवाज दे सकूं
न वापस बुला सकूं
संविधान जो कहता है
यह तुम्हारी आज़ादी है
*
नहीं चाहता ऐसी आजादी
मुझे चाहिये
दूसरी आज़ादी
दलों के दलदल से परे
चुनें प्रतिनिधि
जन जन के
जवाबदेह हों
हर जन के
जहां न हो भारी तंत्र
गण के
***

(अन्ना हज़ारे के विचारों के आधार पर)

--
// मसखरों के हाथ प्रजातन्त्र //


जाति जाति
अगली पांति ।।
पिछड़े पिछड़े
क्यों बिछड़े ।।
अगड़े अगड़े
अब बिगड़े ।।
खाप खाप
माई बाप ।।
एसटी एसटी
कैसे कटी ।।
एससी एससी
सबकी एजेंसी ।।
दलित दलित
सबका गणित ।।
भतीजा भतीजा
साला जीजा ।।
बेटी बेटी
मत पेटी ।।
राम राम
गया राम ।।
प्रजा प्रजा
चख मजा ।।
तंत्र तंत्र
मकड़ मंत्र ।।
***
-----------

देवेन्द्र कुमार पाठक 'महरूम'


एक उपहार ग़ज़ल


भू से आकाश तक छा गई चाँदनी.
पार दहलीज कर आ गई चाँदनी.


क्वाँरी रातोँ की तनहाई गाने लगी;
सोलह सिँगार कर आ गई चाँदनी.


कुल-कुटुम्ब,मित्रजन; हो रहे मन-मगन;
प्रीति का स्वर मधुर गा गई चाँदनी.


प्रणय-गठबंध कर, इक नई राह पर;
चंद्र-सा वर सुघड़ पा गई चाँदनी.


आश माँ की फली, प्यारी दुल्हन मिली;
दिल गया सुख से भर भा गई चाँदनी.


---


अनुज नरवाल रोहतकी


ग़ज़लें


थोडा ही सही पर दिल में मलाल रखिये


नाराजगी दूर करने को ज़ेब में गुलाल रखिये


कोई नहीं पूछता है नाक किसी का ज़माने में


मशवरा है अपनी जेब में खुद का रुमाल रखिये


ताज़ टूटे, सत्ता-सिंहासन टूटे जब चल जायेगा


किसी का दिल न टूटे इस बात का ख़्याल रखिये


'अनुज' यूं ही नहीं मिलते जवाब हर बात के


हर बात में शक रखिये हर बात में सवाल रखिये


2-

क्या बताएं बात बढी कैसे
उनसे आंख लड़ गई कैसे
फूटी आंख वो कभी भाया नहीं
दोस्ती हममें हुई कैसे
है खुशी तो फिर खुलके हंसों
आंखें तिरी भर गई कैसे
कब का छोड चुका हूं शहर तिरा
फिर बात मिरी छिड़ी कैसे
ठोकरों पे रखता था दौलत को तू
फिर नियत तेरी बदली कैसे
दोस्ती में काहे का हिसाब ‘अनुज’
झगडे की वजह ये बनी कैसे
-- 

3-शरारत करने का मोका रखता हूँ 

दिल में अपने एक बच्चा रखता हूँ
इस दौर में मिशाल ए इमानदारी को
घर में अपने एक कुत्ता रखता हूँ
राहे आसान जहाँ भी मिल जाये
राह में अपनी खुद कांटा रखता हूँ
जब भी जाता हूँ आसमां की सैर पे
जेब में टुकड़ा मिट्टी का रखता हूँ
बटुवे में पैसे हो जरुरी नहीं 'अनुज'
मगर याद से फोटो माँ का रखता हूँ -

4 -

आह में बोल नहीं होता 

दुवा का मोल नहीं होता
सास बहु के झगडे में
बेटे का रोल नहीं होता
हर चमकती चीज सोनी नहीं होती
हर साबुन निरोल नहीं होता
पशुओ जेसे होते है वो
जिनका कोई गोल नहीं होता
मैं ग़ज़ल नहीं सुनाता जबतक
सुनने का माहोल नहीं होता
मीठा खाने से  शुगर हो सकती
लेकिन मीठा बोल नहीं होता

---------

मुलाकात उनसे मेरी जैसे के तमाशा आम हुआ है

खुदा का फजल है के फिर से मेरा जिक्र आम हुआ है

दिल खू को इधर उधर करता है इश्क नहीं करता

शरारत दिमाग करता है, दिल यूं ही बदनाम हुआ है

भले ही लगे दुनिया को,  ये इश्क है पागलो काम

जानिबे-दिलवालो से इश्क का सदा अहतराम हुआ है

बैचेन रहता था, पागल रहता था, इंतजार करता था

दीदारे-यार हुआ तो बेचारे को आराम हुआ है

लाख कोशिशों के बावजूद जो कभी मुझसे न मिला

वो तब जाके मिला है जब ‘अनुज’ से कोई काम हुआ है ..

---

यारो बारहा गुल ए इश्क नहीं खिलता 

यकीन मानिए वक्त कभी उल्टा नहीं चलता 

आखिर खुद को कोसने के सिवा कुछ नहीं मिलता 

जो शख्स वक्त के साथ साथ नहीं चलता 

हर काम मुमकिन है गर खुदपे यकीन हो 

हौसलों को तोड़ने से कभी काम नहीं चलता 

तुम क्यों उदास हो मुझ से जुदा होकर 

सूरज कभी सदा के लिए नहीं ढलता 

कभी याद आये तो आ जाया करो मिलने 

फिर न कहना आपसे अनुज नहीं मिलता 

कभी हमको वक्त नहीं था उनसे मिलने का 

अब वक्त है तो  'अनुज ' नहीं  मिलता 

 

मनोज 'आजिज़'


ग़ज़ल


फिर एक नई शम्मे आस जली

बावक़्त पस्त जुनूँ की बात टली

अर्से हुए कि कोई वादे निभाए

फिर वफ़ा की ख़्वाब पली

रौशनी आई जिन्दगी की तंग गलियों में

कब किसकी हमेशा रौशनदान जली

दम घुंटता है यहाँ ऐ 'आजिज़'

झूठे वादों से बुरी हालात भली

------------

नीतेश जैन


आज भी अकेला है ये दिल

ये राहें

बड़ी ही हसीन होती है

किसी को इन पर भटकना होता है

तो किसी को मंजिल नसीब होती है

लेकिन न मेरी कोई राह है

और न कोई मंजिल

एक दिन किसी की तलाश में

उसके नजदीक ले आया ये दिल

वो तो है खुदा की परछाईं

मैं ही नहीं था उसके काबिल

जैसे पहले तन्‍हा था

वैसे ही आज भी अकेला है ये दिल


आज भी हर दिन ये यादें

बहुत कुछ कह जाती है

उनके साथ बिताये लम्‍हों को

यूं ही ताज़ा कर जाती है

एक वक्‍त था जब उसके गमों में

और मेरी मुस्‍कुराहट थी वो

लेकिन अब अकेली है मेरी मुस्‍कुराहट

और अकेला हूं मैं

ना ही खुद को पाया

ना ही उसे किया हासिल

जैसे पहले तन्‍हा था

वैसे ही आज भी अकेला है ये दिल

---------------

अखिलेश चन्द्र श्रीवास्तव

2 कविताएँ
वे ....आते ही होंगे ......
निकल चुके हैं ......दलबल के साथ ....
जीपों ..और ...मोटर साइकलों ..पर ...
तलवारों ...छुरों ...बन्दूकों के ..साथ
मुझे मारने .. .क्योकि मैंने ..
सच ... बोला ...है .......


मुझ अकेले को .....मारने .......
वे दल बल से आते हैं ....
क्योकि वे कायर हैं ...डरपोक ...हैं ..
वे ...सच से .........बहुत ....डरते हैं ...
हालाँकि मैं कोई .................
अभिताब बच्चन या .धर्मेन्द्र ...नहीं
जो अकेले ही उन्हें ...मार भगा ऊँगा ....
या मार मार कर ......उन्हें गिरा कर
ज़मीन पर बिछा दूँगा ...


मुझे पता है .....................कि ..
जब वे आयेंगे ...मेरे आस पास वाले ..
जान पहिचानी .............मिलनेवाले
कहीं छुप जायेंगें .. .छुप छुप कर ....
तमाशा देखेंगे ......उनके ज़ुल्म का ..
मेरे ...पिटने का ......अकेले होकर भी
उन कायरों की भीड़ का ....
भरपूर ..... .मुकाबले का ...
दो ...चार उनमें तो अवश्य गिरेंगें ...
क्योंकि आत्मबल मेरे साथ है ...
सच मेरे साथ है ...मैं भागूँगा नहीं .....
डटकर ... मुकाबला ...करूँगा ....
बेदम होकर ..... .गिरने तक ........
वीरगति .... .मिलने तक ...


वे गोलियों से ....मुझे छलनी कर देंगे ...
चिल्ला .. ...चिल्ला ...कर कहेंगें ...
देखो मोहल्ले वालो ....(जो छुपे होंगे )
सच बोलने का नतीज़ा ...
हमसे भिड़ने का नतीजा .....
कुत्ते की मौत ..मरा है ....
देखो सड़क पर लावारिस मरा पड़ा है ...
बड़ा ...सच का बंदा बनता था
उछला . .उछला .. ..फिरता था


वे ख़ुशी मानते . ..नारे लगाते
जीपों .. मोटर साइकिलों ...पर
चले जायेंगें . बीच चौराहे पर ..पड़ी
मेरी खून से लथपथ लाश .
लोगों की भारी तमाशबीन भीड़ ...
सब चर्चा करेंगे बेमौत मरा ये .बुढ्ढा ..
बड़ा ...सच ...... .सच करता था .........
अरे सच से इसे क्या मिला .....?
भाई जैसे ज़माना चले ...वैसे ...चलो ...
क्यों ऐसे लोगों से ............
पँगा लेना जान से हाथ धोना


पुलिस की गाड़ी आ गयी है ...
उसे देख पब्लिक छटने लगी है ...
दरोगा मुझे देखकर पहिचानने की ..
कोशिश कर रहा है ...
सिपाही भीड़ को हटा कर ..
.आस ..पास मार्किंग कर रहा है
इन्हें किसने मारा ...?
दरोगा पूँछ रहा है .....
सब चुप इधर उधर देख रहे हैं ..
कोई बोलता नहीं ....डर ..छाया है ...
दहशत का ........राज है ..
कौन लोग थे ..? कितनी संख्या में थे ..?
आप लोगों ने ....क्या देखा ...
कोई कुछ नहीं बोलता
लोग चुपचाप ...खिसक रहें हैं ...


एक पगला भीड़ से बाहर आता है ..
दरोगा को बताता है बुढ्ढा पागल था ...
सच के लिये भागता था ....
सच को पूजता ...था ....
झूठ को बेनकाब करता था ..
भ्रष्टाचार का.अनाचार का विरोध करता था
इसे तो मरना ही था सो मर गया ...
दरोगा जी इसे उठाइये ....
रस्में .. .निभाइये ..
पंचनामा बनाइये ...
पोस्ट मार्टम ...कराइये ..
अन्तिम संस्कार ....
सरकारी खर्चे पर कराइये
नहीं तो ..लाश नदी के पानी में डाल ...
छुटकारा ,, ,पाइये ...


इसका तो यही अन्जाम होना था
इसका तो यही अन्जाम होना था अरे ..
क्या .कोई पत्थर से भी सिर फोड़ता है ...?..
मैं सोच रहा था ...
मैंने सच ही तो बोला था .........



(समाप्त) ये आज के समाज की सच्चाई है कि लोग सामाजिक
सरोकारों से मतलब नहीं रखते पर व्यवस्था को
पानी पी पी के गरियाते हैं जो थोड़े बहुत लोग बुराइयों का विरोध
करतें हैं उन पर अत्याचारों का कहर टूट पड़ता है और आमतौर
पर लोग उनका साथ नहीं देते
--
आदमी रोता हुवा ...
भद्दा दिखता है ....गन्दा दिखता है ...
और वोही आदमी मुस्कराता .
हँसता ... अच्छा दिखता है .......
जानतें हैं ... .क्यों ......?
क्योंकि भगवान चाहतें हैं ...
कि वोह हँसे ....मुस्कराये ...
इस दुनिया में सबको खुश रखे .....
खुशियाँ ..... .मनाये ......
इसके लिये उन्होंने बनाई ....
यह सुन्दर दुनियाँ .....
कलकलाती नदियाँ .......
हरे भरे पहाड़ ...... .मस्त हवाएँ ..
सुन्दर पशु ....पक्षी ....

पर आदमी ने क्या किया ...?
नदियाँ गन्दी की ...
हरे भरे पहाड़ उजाड़ ....
हवाओं में ज़हर भर दिया ....और
पशु पक्षियों का अधाधुन्द शिकार ..कर
दिये जंगल के जंगल उजाड़ ...
खड़े कर दिये कांकरी टों के
जंगल और पहाड़ ......
सब नष्ट कर डाला और
करते ही जा रहें हैं ....
अपने रोने का सामान ....
इक्कठे ही करते जा रहें हैं ...


भगवान ने आदमी के लिये ...
बनाई ... औरत .....
उसे आदमी बनाये रखने के लिये ..
उसे जन्म देने ...उन्होंने माँ बनाई ..
उसके साथ खेलने बहिन बनाई ..
प्यारा जीवन जीने पत्नी बनाई
पुत्रियों के रूप में देवियों का प्यार दिया ..
और आदमी ने नारी के हर रूप की ...
बेईज्जती की ... उसे कोख में ही ...
मार डाला ...मूर्खता की हद कर दी ...
जब वह नारी के प्रति असंवेदनशील बना
वह रक्षाबंधन भूल गया …………
शादी के ..पवित्र बन्धन भूल ......गया .
वह पुत्रियों का ...खिलखिलाना भूल गया
वह भूल गया कि ....नारी . .शक्ति है
लक्ष्मी ..दुर्गा ..पार्वती ..के रूप में भक्ति है
वोह हर तरह से .......... .
पूजनीय ...है सम्माननीय ...है
वोह ....साथिन है आदमी की हर रूप में
वोह .....अर्धांगिनी है आदमी की हर रूप में
खुशियों की चाँदनी या ग़मों की धुप में

पर आदमी ने उसे नष्ट करने की ठान ली
सेक्स रेशियो ... .घटने लगे
लड़के ....कुवारे .... रहने .... लगे
अब ..जब ..समाज में यह असन्तुलन होगा
तो परि डाम भी समाज को ही भुगतना होगा


ये बढ़ते अपराध नारी के प्रति .....
ये रेप ... हत्याएँ .....ये सब क्या हैं ......?
कि नर ...नारी का सहज रेशियो डगमगा गया है
आदमी ...अपने ही भाग्य को खा गया है
और अब वोह कुंठित है रोता है
पर ......अपने किये पर लज्जित नहीं होता है
वोह किये जा रहा है मूर्खता पर मूर्खता
भगवान भी आखिर उसे कहाँ तक सम्भालता


भगवान का बनाया आदमी ..अब रो रहा है
बस रो रहा है ..वोह हँसना भूल गया है
वोह मुस्कराना भूल गया है
और यह हमारा हरा भरा सुन्दर सन्सार
नरक बन गया है ..बद से बदतर बनता जा रहा है
बद से बद तर बनता जा रहा है ....


न जाने आदमी ..........कब चेतेगा ...?
अपनी .... गल्तियों को समझेगा
और उन्हें ....आगे ... .होने से .........रोकेगा ...
फ़िलहाल भगवान भी बेचारे और लाचार हैं
आदमी को समझाने में
उसकी अक्ल ठिकाने लगाने में
उनके प्रयास बेकार हैं ...
उनकी बात न सुननेके हठ पर ............
आदमी बेवकूफी की हद तक जाने को तैय्यार है



(समाप्त) कहतें हैं आदमी भगवान की उत्कृष्ट रचना है
उसे भगवान ने बुद्धि रुपी निधि दी है पर वह
उसका सदूपयोग न करके विनाश की और कदम बढ़ा
रहा है और भगवान की आवाज़ जो उसके ही अंतस
में है नहीं सुनता

--


(ऊपर का चित्र : सौजन्य - जसबीर चावला)

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया 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पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: सप्ताह की कविताएँ
सप्ताह की कविताएँ
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