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सुशील यादव का व्यंग्य - पीर पराई जान रे...

पीर पराई जान रे ...

वैष्णव जन तो तेने कहिए,जो पीर-पराई जाने रे ...

पर दुख उपकार करे तो ये मन अभिमान न माने रे ...

वो ज़माना हमारे देखे हुए सतयुग यानी गांधी बाबा के समय का था।

‘पराई-पीर’ जबरदस्त हुआ करती थी,सताए हुए लोग होते थे ,तो उनकी बेचैनी को पीड़ा को समझने वाले लोग भी हुआ करते थे। डाक्टर किसी मरीज को देख के आए तो रत भर सो नहीं पाटा था। वकील मुकदमा हर जाए तो सजा उसे खुद को मिल गई हो ऐसा महसूस करता था। एक के घर में मातम हुआ तो उन दिनों क्रियाकर्म होते तक पूरे मोहल्ले में चूल्हा नहीं जलता था।

अब तो ये हाल है कि कोई मारता हुआ दिख जाए तो लोग कन्नी काट के चल देते हैं। कौन बेकार पुलिस –कछेरी के चक्कर में पड़े ?कुछ जाने बच सकती है पर बचाई नहीं जाती। कोई हिम्मत से ले भी जाए तो अस्पताल में डाक्टर तत्परता दिखाने में दिलचस्पी कहाँ लेते हैं?वे वहीं पुलिस-कछेरी के फेर में पड़कर ,पुलिस के आने का इंतजार करवा देते हैं।

‘पराई-पीर’ को जानने के लिए आजकल एन .जी, ओ. बनाने का फैशन शुरू हो गया है। आपरेशन पराई पीर आजकल कमाई का नया सेक्टर बन के उभर रहा है।

श्रीवास्तव जी पहले ऐसे न थे। सब की मदद के लिए हाजिर रहते थे। बच्चे का स्कूल में एडमिशन हो ,बिजली का बिल ज्यादा आ जाए या बैंक में ड्राफ्ट बनवाना हो ,किसी को कालिज ,हास्पिटल आना-जाना हो, सब का बुलावा श्रीवास्तव जी के लिए होता था।

वो समय मोबाइल का नहीं था , हास्पिटल से बिजली आफिस ,फिर कालेज और न जाने कहाँ –कहाँ उसे अपना पेट्रोल जलाना पडता। वो सबकी पीर हरने में अपनी काबिलियत का लोहा मनवा लिए थे।

उनका कहना था कि आदमी किसी की मदद करे इससे अच्छी बात क्या होगी?

मदद करते-करते वे अपना बजट बिगाड़ लेते थे। दो जोडी हाफ बुश-शर्ट,एक चलने-चलाने लायक स्कूटर ,घर में मामूली सा क्लर्क की हैसियत वाला फर्नीचर-क्राकरी बस|

बीबी के ताने सुन के अनसुना कर देना उनकी दिन-चर्या में अनिवार्यत: शामिल सा हो गया था।

मदद का जुनून इस हद तक कि ,बीबी की बुखार से ज्यादा पड़ोसी की छींक उसे परेशान करती थी।

ऐसे मददगार ,सर्व-सुलभ आदमी की भला जरुरत किसे नहीं होती ?

सो उसकी मदद के लिए लोग मंडराने लगे। वे उसके मार्फत ऍन जी ओ बनाने का प्लान बनाने लगे। प्रथम- दृष्टियां,साफ सुथरी छवि जो ऍन जी ओ चलाने के काबिल हो ,वो श्रीवास्तव जी में विद्यमान थी।

सलाह देने में माहिर विशेषज्ञ की फौज ,फार्मूला ,प्लान ,रोडमेप के नाम से न जाने क्या –क्या उनको परोसने लगे।

उन्हें ये बतलाने में कतई चूक नहीं किए कि अपना समय –धन और श्रम को व्यर्थ न जाने दो। पराई –पीर को समझना ,दूर करना बहुत हो गया|

माहिरों ने, ये बात श्रीवास्तव जी के दिमाग में ठूंस-ठूंस के घुसेड़ दिया कि तुम्हारे पास ‘सदकाम’का एक ब्लेंक चेक है।

लोगों का तुमपे विश्वास है। तुम्हारे जन-हित कार्यों से जनता प्रभावित है। तुम्हारी बातों में वजन है। तुम्हारी सलाह से बेटे-बेटियों के रिश्ते तय हो रहे हैं। तुम कुछ नया तो करो।

दुःख-भंजक श्रीवास्तव जी हाड़ –मांस के बने थे वे हामी भर गए।

उनके हामी भरते ही , लोगो ने झंडू –बाम मलहम नुमा, एक ‘पीड़ा-हर्ता’ लेबल का ऍन .जी.,ओ रजिस्टर करवा लिया।

मदद के बड़े –बड़े दावे किए जाने लगे।

ला-ईलाज बीमारी से ग्रस्त लोगों को जगह-जगह ढूँढा जाने लगा।

अपाहिजों को पैर,बैसाखी,ट्राइसिकल बांटे जाने लगे।

अन्धों को आँखे मिलने लगी| गरीबों-दुखियों की नय्या पार लगने की ओर रूख करने लगी।

एन जी ओ पर दानियों के रहम और सरकार की मेहरबानी के चलते अंधाधुंध पैसों की बारिश होने लगी।

श्रीवास्तव जी के पैरों तले की जमीन के नीचे अब मार्बल,टाइल्स या कालीन के अलावा कुछ नहीं होता। स्कूटर का ज़माना कब का लद गया|कब कबाडी के हवाले गया ,पता नहीं ?

एयर-कंडीशन महंगी गाड़ियों से नीचे चलने में उनको अटपटा सा लगने लगा ।

अब वे बीबी की छींक पड जाए तो घर से नहीं निकलते ,भले ही पड़ोसी का कहीं दम निकल रहा होवे ।

पराई-पीर के इलाज में , देखते-देखते उनने बेवक्त अपना बुढापा बेवजह जल्दी बुला लिया ऐसा इन दिनों वे सोचने लगे हैं|

फिर ये सोच कर कि ऐसा खुशहाल बुढापा भगवान सब को दे,वे खुश हो लेते हैं।

अखबार में छपी त्रासदी भरी उत्तराखंड की खबर को वे मोड कर एक तरफ रख देते हैं।

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सुशील यादव

वडोदरा

09426764552

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