कुबेर के तीन व्यंग्य

SHARE:

कुबेर Mo- 9407685557 1 दांत निपोरना भी एक कला है बत्तीसी विहीन सुंदरता की कल्पना बेमानी है। दूध के दांतों के झड़ने और अकल के दांतों (दाढ़ो...

कुबेर
Mo- 9407685557

1
दांत निपोरना भी एक कला है


बत्तीसी विहीन सुंदरता की कल्पना बेमानी है।

दूध के दांतों के झड़ने और अकल के दांतों (दाढ़ों) के निकलने का रिवाज यदि
नहीं होता तो बड़े-बुजुर्ग छोटों पर अपनी महानता का रौब भला कैसे जमा
पाते?

अन्य जानवरों के (यदि आदमी को जानवर न माना जाय) बड़े-बड़े घिनौने दांतों
से अपने छोटे-छोटे सुंदर दांतों की तुलना करते ही मनुष्य स्वयं को औरों
से सभ्य और श्रेष्ठ होने का भ्रम पालने लगता है। अगर जानवर कह पाते कि
’अरे मनुष्यों! हमारे दांत बड़े और बेडौल जरूर हैं, पर तुम लोगों के
दांतों के समान हिंस्र और खतरनाक नहीं हैं। दांत खट्टा करने और दांत
निपोरने की आधुनिक कला भी तुम्हीं लोगों को मुबारक हो,’ तो भला इनकी क्या
रह जाती?

कभी न कभी आपने भी दांत निपोरा होगा। यदि कोई अपनी बत्तीसी का प्रदर्शन
हें...हें...हें...की लय बद्ध स्वर के साथ इस प्रकार करे कि हालाकि उसमें
प्रदर्शन की भावना हो या न हो, सामने वाले व्यक्ति के तमतमाए हुए तमाम
तेवर क्षण भर में ही पानी-पानी हो जाए तो इस कला को दांत निपोरना समझिए।
ऐसा करके वे किसी टूथ-पेस्ट या मंजन-पावडर का विज्ञापन नहीं करते, बल्कि
अपनी श्रेष्ठता, महानता और सफलता की आभा से आपको चमत्कृत कर रहे होते
हैं। ऐसे लोगों को यद्यपि दांत निपोरू कह सकते हैं पर उनके सामने ही
उन्हें दांत निपोरू कहने की भूल आप हरगिज न करें। पीठ पीछे चाहे जितनी
बार कह लें, जैसे कि मैं कह रहा हूँ।

दांत निपोरुओं की पहचान एकदम आसान है। इनके दांतों का चमकीला होना हरगिज
जरूरी नहीं है। बल्कि जिन दांत निपोरुओं के दांत चमकीले हों, समझिये वे
इस कला के नये साधक हैं।

दांत निपोरुओं के दांतों का अर्थात बत्तीसी का सही सलामत होना भी जरूरी
नहीं है। बल्कि बत्तीसीविहीन निपोरू ही वेटरन निपोरू होते हैं।
महान दांत निपोरुओं की दांतों और साँसों से किसी टूथ-पेस्ट की चमक और महक
नहीं आती, बल्कि दांतों के ऊपर पान और खैनी की मोटी परत और साँसों से
धूर्तता और मक्कारी की असहनीय गंध आती है। इसी से तो उनकी महानता प्रगट
होती है।

दांत निपोरने की कला एक महान कला है। यह हर किसी के बस की बात नहीं है।
अन्य कलाओं की भांति इस कला में भी महारत हासिल करने के लिए सतत् अभ्यास
और चिर साधना की जरूरत होती है। यदि किसी में यह कला जन्मजात है तो अच्छा
है, नहीं है तो कोई बात नहीं। थोड़े ही दिनों की साधना से (इच्छा हो तो
लगन आ ही जाएगी) इस कला में निपुण हुआ जा सकता है। आपको बस इतना ही करना
है कि यदि आपका कोई प्रतिपक्षी या तलबगार आपके प्रति नाराजगी व्यक्त करे
या आप स्वयं सामने वाले के प्रति अपराध-बोध महसूस करें, तो बिना समय
गँवाए, बिना कुछ सोंचे समझे, अपनी सारी बत्तीसी निकाल कर
हें...हें...हें...की विशेष निपोरू राग के साथ अपना पूरा वाल्यूम कंट्रोल
खोल दीजिए।

यदि प्रथम प्रयास में काम न बने तो दोबारा प्रयास करें। फिर भी काम न बने
तो एक अंतिम प्रयास और करें। (यदि आप इस कला में माहिर हैं तो चैंथे
प्रयास की जरूरत नहीं पड़ेगी) विश्वास रखिए, सामने वाला शर्म से पानी-पानी
हो जाएगा। उसके दांत इतने खट्टे हो जाएंगे कि वह कुछ बोलने लायक नहीं
रहेगा।

दांत निपोरू सर्वव्यापी होते हैं; फिर भी दुकानों, दफ्तरों और मंत्रालयों
में ये थोक के भाव पाए जाते हैं। बाबुओं का बाबू अर्थात बड़ा बाबू वही हो
सकता है जो इस कला में सर्वाधिक दक्ष हो। इस कला में माहिर नेता मंत्री
पद के प्रबल दावेदार होते हैं।

दुकानदारों और व्यापारियों को अपनी दुकानदारी चमकाने के लिए इसी कला में
दक्ष होना पड़ता है। मिस्त्रियों का तो यह अनिवार्य गुण है। घड़ीसाज हो,
रेडियो मेकेनिक हो, सायकल मिस्त्री हो या कार मेकेनिक, जब तक ये इस कला
का सम्मिश्रण अपनी तकनीकी कला के साथ नहीं करेगें, किसी यंत्र का दुरुस्त
हो पाना नामुमकिन होता है।

लोग कहते हैं, सफलता के लिए कठोर परीश्रम जरूरी होता है। मैं कहता हूं,
ऐसा कहना इस महान कला का सरासर अपमान है। परिश्रम करें आपके दुश्मन। आपको
यदि दांत निपोरना आता है, तो सफलता आपके कदम चूमेगी। मंत्रों में
महामंत्र, चाबियों में मास्टर चाबी और सोलह कलाओं में महानतम है यह कला।

इस कला में हें...हें...हें...की जो अनुनासिक स्वरधारा प्रवाहित होती है,
जिसे इनके साधक निपोरू राग बताते हैं, अवश्य किसी शास्त्रीय राग पर
आधारित होगी वर्ना इसमें इतनी ऊर्जा संभव होती?

दांत निपोरने की कला की व्यापकता, दांत निपोरुओं की संख्या और इसकी सफलता
को देखते हुए इस कला को देश की राष्ट्रीय कला तथा ऐसे कलाकारों के चरित्र
को देश का राष्ट्रीय चरित्र मान लेना चाहिये। हें...हें...हें...।
000
2
पेट के दांत


दांत विषयक इस लेख का उद्देश्य आयुर्विज्ञान के दंत चिकित्सा विज्ञान को
चुनौती देना नहीं है अपितु दांतों की चमत्कारिक शक्तियों को प्रकाशित
करना है।

दांत की शक्तियाँ दो प्रकार की होती हैं - लौकिक और अलौकिक। ईश्वर के
साकार और निराकार स्वरूप की अवधारणा शायद यहीं से प्राप्त हुई होगी। दांत
की इन शक्तियों से संबंधित यह मत दंतयोगवादियों के द्वारा प्रतिपादित है।
इस पर शंका न करें।

संसारी व्यक्तियों के दांत लौकिक होते हैं जबकि सरकारी लोगों के दांत
अलौकिक। लौकिक दांत साकार होते हैं और ये मुंह में पाए जाते हैं। अलौकिक
दांत निराकार होते हैं। लोग कहते हैं, ये पेट में पाए जाते हैं।

दुनिया के सारे कर्म-कुकर्म के कर्ता-धर्ता सिर्फ निराकार दांत ही होते
हैं। बाबा तुलसी इन दांतो के विषय में जानते होते तो इनकी महिमा में कुछ
इस प्रकार की चैपाइयाँ लिखते-

बिनु पद चलहिं,सुनहिं बिनु काना।
दिखत नहीं, पर खावहिं नाना।।

भोगवादियों ने अलौकिक दांतों के तीन प्रकार बताए हैं। दिखाने के दांत,
खाने के दांत और पेट के दांत। धन्य हैं वे, जिन्हें ईश्वर ने ये तीनों
दांत बख्शे हैं। दुनिया में इन्हीं लोगों का बोलबाला है। चारों ओर इन्हीं
लोगों की जय-जयकार हो रही है। दुनिया में पहले ऐसे लोग बिरले होते थे, अब
दिन दूनी रात चैगुनी इनकी आबादी बढ़ रही है।

मुँह में जो दंतावलियाँ होती हैं और जिसे हम बत्तीसी कहते हैं, लौकिक
गुणों से युक्त साकार दांत होते हैं। आम लोग भ्रम वश इसे ही दिखाने, खाने
और पेट के दांत समझ बैठते हैं। लिहाजा न तो वे कुछ खा पाते हैं और न ही
तृप्त हो पाते हैं। फिर तो इनकी अतृप्त आत्माएँ जन्म जन्मांतर तक स्वाद
के भवसागर में भटकती रहती है। जनता नामक योनी में बार-बार जन्म लेती रहती
है। रो-धो कर जिन्दगी बिताती है। बीमारी और लाचारी में जीती है। शाक-भाजी
खा-खा कर आंतों का रोगी हो जाती है।

बत्तीसी के भरोसे न तो कुछ खाया जा सकता है और न खाए हुए को पचाया ही जा सकता है।

खाना और पचाना भी एक कला है। मैं तो कहता हूँ, यह कला ही नहीं,
कला-श्रेष्ठतम है। जिसके पास यह कला होती है वह अन्य सभी पर भारी पड़ता
हैं। ऐसे लोगों पर ऊपर वालों की सदैंव कृपा बनी रहती है। ऊपर वालों की एक
स्थापित, अटूट और मजबूत श्रृँखला होती है। हर ऊपर वाला अपने नीचे वाले का
पालन-कर्ता होता है।

खाने के दांत न सिर्फ खाने के अपितु कुतरने के भी काम आते हैं। एक बार
यदि ये खाने और कुतरने पर आमादा हो जाए तो चूहे भी इनके सामने पानी भरते
नजर आते हैं। दुनिया में ऐसी कोई चीज नहीं है, जिसे ये खा और पचा न सके।
जीने और खाने का भरपूर और वास्तविक आनंद तो ऐसे दांत वाले ही लिया करते
हैं। संभवतः हमारे नेताओं, अधिकारियों और कर्मचारियों को ईश्वर ने ऐसे ही
दांत नवाजें हों? इनके पूर्वज बंदर तो कतई नहीं हो सकते, हां! चूहे जरूर
हो सकते हैं।

दिखाने के दांतों को साधारण दांत समझने की भूल कदापि न करें। इन्हीं के
पीछे काटने के दांत छिपे होते हैं। जिनके पास ऐसे दांत होते हैं, दुनिया
के सबसे जहरीले प्राणी होते हैं। साँप का काटा तो फिर भी जी जाए, इसका
काटा मजाल है कि पानी भी मांग ले। व्यापारियों, महाजनों-साहूकारों के
दांत जरूर इसी प्रकार के होते होंगे।

पेट के दांतधारी तो साक्षात अवतारी ही होते हैं। जहाँ-जहाँ ईश्वर पाया
जाता है वहाँ-वहाँ ये भी पाये जाते हैं। धर्म-कर्म का ठेका इन्हीं लोगों
के पास होता है। ये स्वयं को ईश्वर की ही औलाद मानते हैं। मजाल है कि ऐसे
दांत वालों से ईश्वर भी बच जाए?
अलौकिक दांतधारियों से ईश्वर इस देश की रक्षा करे।

000

3
आओ पूंछ विकसित करें


पूंछ के ऊपर की बिन्दी हटा लेने से पूछ बन जाता है। पूंछ विकसित करने का
यह सबसे बढ़िया, आसान और फूलप्रूफ तरीका है। आजकल वे सब, जिनके पूंछ उग आए
हैं, इसे छिपाने और पूंछ विकसित करने के लिए इसी तरीके का इस्तेमाल कर रहे
हैं। पूंछ पशुता की निशानी जो ठहरी।

जिस प्रकार बिना पूंछ का कुत्ता, कुत्ता नहीं उसी प्रकार बिना पूंछ का
आदमी आदमी नहीं। आजकल पूंछ का होना निहायत जरूरी है, कुत्ते के लिए भी और
आदमी के लिए भी। पूंछ हो तो नाक की जरूरत नहीं पड़ती। जैसे-जैसे पूंछ विकसित
होती है, नाक कटती जाती है। पहले सबके पास नाक हुआ करती थी, आजकल यह
दुर्लभ होती जा रही है। भविष्य में केवल इसके जीवाश्म ही मिलेंगे। तब
साहित्य और विज्ञान के स्नातक इस पर शोध करके पी. एच. डी. की उपाधि
प्राप्त कर रहे होंगे।

लोग अब नाक की चिंता कम और पूंछ की चिंता ज्यादा करने लगे हैं। हमारे
पूर्वज पूंछ की चिंता कम और नाक की चिंता अधिक करते थे। जमाना नाक का था,
मजाल है कि नाक पर एक मक्खी भी बैठ जाए। नाक की वजह से ही राम को रावण से
लड़ाई लड़नी पड़ी थी। अब नाक के दिन लद गए हैं। जमाना पूंछ का है। नाक वाला
कुत्ता भले ही मिल जाए, नाक वाला आदमी ढ़ूँढ़ कर तो बताओ!

पूंछ और पूंछ, दोनों में असीमित और अक्षय ऊर्जा नीहित होती है। इसी कारण
जहाँ कुत्ते अपनी पूंछ को संभालने में लगे रहते हैं वहीं आदमी अपने पूंछ
की चिंता में रात-दिन घुलते रहता है।

कुत्ते की पूंछ का ऐतिहासिक महत्व है। इसका हिलना परम आनंद-दायी होता है।
हिलती हुई पूंछ कहती है, - ’’तलवे चाटूँगी, लात खाऊँगी, तिरस्कार सहूँगी,
पर नमक हरामी कभी नहीं करूँगी।’’

पूंछ विकसित करता हुआ आदमी भी यही कहता है।

कुत्ते की पूंछ की ऐतिहासिकता पर अभी अमरिकी पेटेंट वालों की नजर शायद
नहीं पड़ी है वरना नीम और हल्दी के समान इसके भी पेटेंट का लफड़ा शुरू हो
चुका होता।

राज हठ, बाल हठ और त्रिया हठ की तरह पूंछ और पूंछ की भी अपनी हठ होती है -
ये सीधी कभी नहीं होतीं।

पूंछ और पूंछ का रिस्ता अटूट है। पूंछ वालों में उनकी ही गिनती होती है
जिसके आसपास हमेशा दो-चार पूंछ वाले पूंछ हिलाते हुए पाए जाते हैं।

कुत्ते की तुलना आदमी से करने की भला है किसी में हिम्मत? पर आदमी की
तुलना कुत्ते से करने में किसी को हिचक नहीं होती। आदमी झगड़ते हुए एक
दूसरे को कुत्ते की औलाद ही कहता है। अब तो अपने आप को कुत्ता कहलवा कर
आदमी गर्वित भी होने लगा है। कुत्ते आपस में झगड़ते वक्त कदाचित ही एक
दूसरे को आदमी की औलाद कहते होंगे। वे इतने गए गुजरे नहीं हैं। कोई आदमी
किसी कुत्ते को आदमी की औलाद कह दे तो कुत्ता शायद उसे कांट ले। नाक के
मामले में कुत्ते निश्चित ही आदमी पर भारी हैं। इतनी ऐतिहासिक पूंछ पाकर
भी उन्होंने अपनी नाक का महत्व कम नहीं होने दिया।

डार्विन अपने प्रसिद्ध विकासवाद के सिद्धांत को आज लिख रहा होता, तो यह
कभी नहीं लिखता कि विकास-क्रम में आदमी की पूंछ लुप्त हो गई है।

जैसे कुत्ते की पहचान उसकी पूंछ से होती है, उसी प्रकार आदमी की पहचान
पूंछ से होती है। दफ्तर में जिस आदमी की पूंछ सबसे ज्यादा होती है, वह बड़ा
बाबू होता है। समाज में जिसकी पूंछ अधिक होती है वह नेता होता है और
नेताओं में सर्वाधिक पूंछ वाला व्यक्ति प्रधान नेता होता है।

समझ-समझ का फेर है। पूंछ और पूंछ में बहुत ज्यादा बुनियादी अंतर नहीं
समझना चहिये। केवल बिंदी ही का तो अंतर है। इसी तरह पूंछ वालों और पूंछ
वालों में भी अंतर नहीं समझना चहिये।

पूंछ विकसित करना बड़ा सरल कार्य है। शायद इसीलिए आज पूंछ वालों की कोई कमी
नहीं है। हर गली-नुक्कड़ पर अपनी पूंछों का प्रदर्शन करते सैकड़ों लोग मिल
जएँगे; पूंछ हिलाते हुए जैसे कुत्ते मिल जाते हैं। चाहें तो आप भी अपनी
पूंछ विकसित कर सकते हैं। विधि बड़ी सरल है, आपको अपनी नाक थोड़ी सी कटवानी
पड़ेगी, बस। कुछ पाने के लिए कुछ खोना तो पड़ता ही है। फिर आजकल नाक कटवाने
से कोई फर्क भी तो पड़ने वाला नहीं है न। विश्व के सारे सुदर्शन लोग आज
नकटे ही हैं। रैंप पर थिरकने वाली सुंदरियों की नाक आपने देखी है? फिर भी
यदि आप अपनी नाक न कटवाना चाहें तो कोई बात नहीं, चूने से भी काम चल सकता
है। जैसे कोई चंदन लगाता है, आप थोड़ा सा चूना अपनी नाक पर लगवा लें। बस
फिर क्या, आपकी भी पूंछ विकसित होनी शुरू हो जाएगी। बीच-बीच में धो-रि-भ्र
नामक उर्वरक का छिड़काव करते रहें।

घो-रि-भ्र अर्थात घोटाला, रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार। यह हर जगह मुफ्त
में मिलता है। यदि जान-पहचान वालों को चूना लगाना आ जाय तो सोने पर
सुहागा समझो।

पूंछ विकसित करना हमारा जन्म-सिद्ध अधिकार है। आओ पूंछ विकसित करें।

000
नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: कुबेर के तीन व्यंग्य
कुबेर के तीन व्यंग्य
http://lh4.ggpht.com/-Z7K0DxOOQ8Y/UgTk6WkKFRI/AAAAAAAAVdQ/rW21yZpL6jE/clip_image002%25255B8%25255D.jpg?imgmax=800
http://lh4.ggpht.com/-Z7K0DxOOQ8Y/UgTk6WkKFRI/AAAAAAAAVdQ/rW21yZpL6jE/s72-c/clip_image002%25255B8%25255D.jpg?imgmax=800
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2013/10/blog-post_440.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2013/10/blog-post_440.html
true
15182217
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content