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धर्मेन्‍द्र निर्मल का व्यंग्य - सुखद यात्रा

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सुखद यात्रा बस स्‍टाप पहुंचते ही यह जानकर खुशी हुई कि न बस छुटी है न हम। हमारे रेल की सुपरिचित सुव्‍यवस्‍थित गति की तरह बस भी समय से आधा घण्...

सुखद यात्रा

बस स्‍टाप पहुंचते ही यह जानकर खुशी हुई कि न बस छुटी है न हम। हमारे रेल की सुपरिचित सुव्‍यवस्‍थित गति की तरह बस भी समय से आधा घण्‍टा लेट चल रही थी। अच्‍छा है एक दूसरे की अच्‍छी आदतों को देख सीख कर प्रगति करने की कुचेष्‍टा करने में ही भलमनसाहत है। वहॉ बस की प्रतीक्षा में पहले से ही दो मेडमनुमा औरतें खड़ी खुसुर - फुसुर करती अपनी औरत जात होने का परिचय दे रही थी। वे कभी एक दूसरे का कंगन देखकर अपने कंगन घुमा घुमा कर देखती मिलती, कभी बालों को देखती सहेजती तो कभी दूसरे की साड़ी की धरी देख अपनी साड़ी की धरी ठीक करती। कुछ रूकती फिर वे एक दूसरे का सीना देख अपने सीने की ओर देखती। अब मै यह गंदी बात नहीं कर सकता कि वे अपने मंगलसूत्र का मिलान कर रही थी या सीने के उभार का।

मेरे साथ मेरे अतीत और भावी बच्‍चों की अम्‍मा भी थी। वह उनके बालों को एकाग्रचित्‍त हो देखने लगी क्‍योंकि इनके बाल इतने छोटे और विरल हैं कि इन्‍हें कुतरने वाले चूहे भी बदनसीब हो जाए। मैं उकताकर घड़ी देख ही रहा था कि बस आकर रूक गयी, ऐसा अक्‍सर मेरे साथ ही होता है। मैं लपक कर खाली बची मात्र दो सीट को रोककर पसर गया। मेरी एकमात्र धर्मपत्‍नी इधर उधर घूमकर मुआयना ली तब बैठी। यह उसकी आदत है। कहीं भी कभी भी वह अपने हमउम्र लड़कों को ऐसे बोकबाय देखती है कि मुझे भूल जाती है। पूछने पर बताती है कि वह मेरे साथ पढ़ा है जी। अब मैंने पूछना ही बंद कर दिया है क्‍योंकि मैं यह भली भांति समझ चुका हूँ कि संसार का हर एक उसका हमउम्र लड़का उसके साथ पढ़ा है। अब साथ साथ पढ़ने खेलने में बुराई के दिन नहीं रहे। थोड़ी दूर ही गये थे कि बस में तीन मेडम और कुछ यात्री और लद गए। अब खटारा बस में चार चांद लग गए। कोलाहल में इजाफा हो गया। मैंने देखा एक यात्री सन्‍यासी हो चला है। वह बस में चल रही बहसों, चिल्‍लपों, झमेंलो आदि के राग द्वेष से दूर खिड़की पर हवा के झोंके का आनन्‍द ऐसे ले रहा है जैसे खिड़की से आने वाली हवा, हवा नहीं परमात्‍मा का संदेश हो। उसके साथ तेरह चौदह साल का छोकरा थोड़ी सी जगह पर आधा कूल्‍हा टिकाये बकमुद्रा में तल्‍लीन बैठा था।

वैसे तो सामने सीट पर भी एक अधेड़ सो रहा था। वह ऐसे सो रहा था जैसे अपने बाप की गाड़ी से अपने चाचा की बारात जा रहा हो। उसे किसी भी प्रकार का डिस्‍टरबेंस पसन्‍द नहीं था। उसकी बगल में बैठा नवयुवक ऊँघते ऊँघते अपना सिर उसके कंधे पर दे मारता। वह नवयुवक जैसे उसकी नींद की नकल कर रहा था। वह एक दो बार सिर हटाया तब भी युवक नहीं चेता। इस बार फिर वही ! कोई कितना सहे आखिर। उस आदमी ने झल्‍लाकर उसे झिंझोड़ डाला और उसकी टोपी फेंक दी। वास्‍तव में उस अधेड़ को नवयुवक की मलमली टोपी से चिढ़ थी क्‍योंकि वह उसके पास नहीं थी। दुनिया की यही रीत है, मनपसंद चीज दूसरे के पास देखकर जलना, और किसी बहाने खीझकर अपनी जलन पर जल छिड़ककर शांति महसूस करना। दूसरी बात - आदमी जो स्‍वयं करे तो अच्‍छा है लेकिन वही कोई दूसरा करे तो अशोभनीय होता है। एक मेडम कुड़मुड़ाई ” देख न जिसे सीट मिल गयी कैसे सो रहे है ! हम लोग कितनी तकलीफ में है जरा भी सोच नहीं। ऐसे लोगों पर मुझे बहुत गुस्‍सा आता है।“ आये भी क्‍यों न। सभी मेडम सोते यात्रियों को ललचायी नजरों से ऐसे बोकबाय देखने लगी जैसे पाकिस्‍तान का गुलाम सुन्‍दरता की बेगम काश्मीर को देखता है। तभी एकाएक ड्राइवर ने जोर की ब्रेक मारी और खिड़की से झांकते हुए दादर से लेकर नगर हवेली और मादर से लेकर गॉव की कोठी तक की गालियॉ दे डाली। बस में हड़कंप मच गयी। सोते सब जाग गये लेकिन मेरी भागवान नहीं जागी उसका घोड़ा बिक कर रजिस्‍टर्ड हो चुका था। पता चला सामने ही बुद्धि विकास केन्‍द्र है। वहां से निकलता हुआ बिना किसी कोलाहल के हलक तक एल्‍कोहल में डूबा एक शराबी लड़ाकू विमान की तरह वातावरण की गड़बड़ी के कारण हमारे यान से टकरा गया था। वह तो बस के मंगलसूत्र ”ईश्वर आपकी यात्रा सफल करे“ का सुप्रभाव था जो हम बाल बाल बच गये। ड्राइवर बड़बड़ाने लगा - देखा ! साला मर जाता तो लोग क्‍या कहते। ड्राइवर पीके चलाता है। ये जो पीके निकल रहे है इसका क्‍या ? ड्राइवर ने गाड़ी के साथ साथ बात भी बढ़ा दी। एक बार सड़क पर दो गोल्‍लर लड़ बैठे। मैंने बस खड़ी कर दी। वे रिक्‍शे में जा टकराये। रिक्शा, चालक और सवार दम्‍पत्ति सहित पलट गया। मैं सोच ही रहा था कि पुलिस इस केस पर कौन सी धारा लगाएगी। इतने में मेडमों का गंतव्‍य आ गया। नियमित यात्री को कंडक्‍टर ही नहीं ड्राइवर भी पहचानते हैं। वे अपने सामने लगे आइने से सबको देखते ताकते रहते हैं। भागमानी लोग नवरात्र पर्व में मंदिर जाकर बमुश्किल देवी दर्शन कर पाते है। ड्राइवर इसी शीशे से आठोंकाल बारहों माह देवी दर्शन करते रहते हैं।

वे कीर्तन गाते हैं ः-

यारों हमको चैन कहां, हर वक्‍त सफर में रहते हैं।

किस किस को नजर में रक्‍खे हम, हम सबकी नजर में रहते हैं।

उसने गाड़ी रोक दी। मेडमें उतर ही रही थी कि बस बंद हो गयी, जैसे उनसे बिछड़ने के गम में उसकी छाती धसकने लगी हो। किसी ने कहा - अरे ! इस ढपोरषंख बैल को भी यहीं बैठना था, ठीक से हॅांको ना भाई गाड़ीवान। लोगों के दांत एकाएक बाहर झांकने लगे। वहीं तीन टपोरी सवार हुए। उन्‍होंने चढ़ते ही नजरे घुमाकर बस का मुआयना किया कि लड़कियां या आंटी कहॉ पर है ताकि वही जाकर टाइमपास बकर किया जाय।

बस में बीचोबीच एक कमसिन मांगपर शादी का सनद, गले में पतिव्रता का शील्‍ड और तन को गृहस्‍थी के पुरस्‍कार स्‍वरूप पट्‌टे यानी साड़ी से लपेटे खड़ी थी। ये तीनों नौजवान वहीं हो लिये। व जताना चाह रहे थे कि हम लोग पढ़े लिखे है। जहां लिखित प्रमाण पत्र नहीं होता वहां भौतिक साक्ष्‍य मान्‍य होता हैं। एक ने बात शुरू की यार नौकरी चाकरी नहीं मिल रही है क्‍या करें समझ में नहीं आता। दूसरे ने गंभीरता ओढ़कर कहा - ”अब इधर तो आशा ही छोड़ दो सरकार सब पद समाप्‍त कर रही है।“ ”साला युद्ध भी नहीं हो रहा है। बढ़िया सेना में जाते। दो चार को मार नहीं सकते तो कम से कम मर तो सकते है इससे हमारे साथ परिवार समाज और देष सबका का भला हो जाता।“

तीसरा भला मुंह में पट्‌टी कैसे बांधे रहता। दार्शनिक अंदाज में उसने कहा -”लगेगी जरूर लगेगी लेकिन हमारी भर्ती होने तक युद्ध समाप्‍त हो जाएगा और हम लोग सीमा पर बैठ कर तंमाखू मलेंगे।

पहला तपाक से बोला - रक्षा विभाग में तो रोकड़ा ही रोकड़ा है। हम अच्‍छी अच्‍छी मिसाइलों तोपों की जगह उंचे किस्‍म के खिलौने खरीद लायेंगे।

और अच्‍छी क्‍वालिटी के बम की जगह दिवाली में फोड़े जाने वाले फुसका एटम बम खरीद कर सरकार को चूना लगायेंगे। पान का बीड़ा हम दबायेंगे। और वे एक साथ दांत निपोर कर यह जताने लगे कि हमने भी सुबह दाँत में झाड़ू पोंछा किया था। फिर पहला और तीसरा उस औरत कम कमसिन लड़की को ऐसे देखने लगा जैसे किसी के हाथ में रोटी देखकर कुक्‍कुर जीभ निकालकर होंठ चाँटते दुम हिलाते हुए झपट्‌टा मारने की फिराक में देखता है।

तभी कंडक्‍टर कांख कर पूछा- फलां गॉव वाला कोई है क्‍या और सीटी मार दी। बस रूक गयी , तीनों को अचानक झटका लगा । तीनों उतरे। वहीं एक महिला शिशु को गोद में लिए चढ़ी। साथ में एक अंगरक्षिका जिसे हम द्धापर युग में मंथरा के नाम से जानते थे , भी थी जो अपने दोनों हाथों में थैला लटका रही थी। उसने टिकिट क्‍या ली जैसे पूरी बस खरीद ली। बैठे हुए एक छोकरे से कहा -”ऐ थोड़ा हट जा न, बैठने दे बच्‍चा वाली है।“

कहॉ हटूँ माई इधर जगह हो तब तो हटूँ न!

यह हमारी भारतीय नारियों का सांस्‍कृतिक गुण है कि जहां काम नहीं बनता वहां उनका मुण्‍डा भसक जाता है और वे आंय बांय बकने लगती है।”थोड़ा खसक जाने से तेरा क्‍या जायेगा जैसे तू बस को खरीद लिया है। ....... बड़ा सीट वाला हो गया। .......... रूतबा झाड़ रहा है।“ छोकरे को गुस्‍सा तो आया लेकिन वह उसे बिना पानी के थूक संग लपेटकर निगल गया। वह समझ गया था कि यह काली केवल काली नहीं कराली, कण्‍डिका, चण्‍डिका, रण्‍डिका सब है। एक तो करेला और दूसरा नीम चढ़ा।

पास खड़ी औरत को मानो बल मिल गया। कहा -”अरे ये मरद की जात ही ऐसे होते है बैठ गये सो बैठ गये।“ औरत और बकरी की एक ही जात है। बात करने का बहाना चाहिए बस। दूसरी औरत के फूले मुंह पर जैसे फल लग आये-”उधर टाटा में महिला सीट पर कभी मरद नहीं बैठते। बैठे भी रहते है तो उठ जाते है।“ पीछे खड़े छोकरे ने बहती गंगा में हाथ धोने का शुभ अवसर जान हड़बड़ी में हाथ की जगह अपना सिर डुबो लिया। यह सोचकर कि ये मरद महिलाओं से भी गये गुजरे है। उसने परसाई जी के चाचा स्‍टाइल में कहा - ”यहां भी कहां मरद जात बैठे है ? इतना सुनते ही वह चण्‍डी गुस्‍से की छत पर जा बैठी और शो रूम से निकली नई मॉडल की चमचमाती कार की तरह चमचमाते अपने काले पीले दांत शो करते हुए गुर्रायी -”आँख नहीं बटन लगाये हो क्‍या ? ............ यहां कहां मरद जात। वह अब तब डस ही लेगी ऐसी फन्‍नायी हुई नागिन की तरह घूमकर आंख तरेरने को हुई कि उसके गुस्‍से पर एकाएक हिमपात हो गया। वह वही छोकरा था जिसके मुंह पर उस शिशु वाली बाई को देखकर और माथे पर उस काली की बात सुनकर पानी आया था। जिसने कम से कम इस सफर तक के लिये उस औरत की नजर में शिशु के पापा की जगह पर अपनी तस्‍वीर बिठाने की जुगाड़ में अपनी सीट दे दी थी। वह काली हें हें हें हें करती अपने कर कमल की पांचों उंगलियॉ सिर पर डाल खर्रस खर्रस खुजलाते हुए प्रायश्चित जतलाने लगी। उस छोकरे के अट्‌टहास पुरस्‍कार पाने की प्रबल इच्‍छा पर पानी फिर गया। उसकी इस असफलता पर अपने मौन की सफलता समझ मेरी कुटिल मुस्‍कान मेरे होठों पर ऐसे इतराने लगी जैसे प्रेम की इच्‍छुक लड़कियां अपने अवारा प्रेमी को मोहल्‍ले में मंडराते देख घर के अँगना दरवाजे पर मिटमिटाती है।

बस की गति धीमी हो गयी। कण्‍डकक्‍टर दरवाजा खोल अपना सिर पहले ही ऊॅट की तरह निकाल रखा था। अब गला फाड़ने लगा - कहॉ जाओगी ?

...............................। नीचे खड़ी बुढ़िया गॉव का कुछ नाम बतायी।

”अंय ?“ कण्‍डक्‍टर ने आँख मिचमिचाते हुए कान खड़े कर पूछा।

बस अभी रूकी भी न थी कि वह कूद पड़ा। दौड़ न कहते हुए उसने बुढ़िया का थैला वहीं फेंक दिया जहाँ उपर लिखा था - यात्री अपना सामान स्‍वयं संभाले। और उस बुढ़िया को बांह पकड़कर भीड़ में ठूँस दिया। बुढ़िया ऊँ .. आँ ... करती रही और हाथ पांव पसार कर मुंह फाड़े पैर फैला पसर गयी।

बस चल ही रही थी। दो लोग लड पड़े - ” ए पंगा नई लेना। क्‍या ?“

”तू बार बार क्‍यों धकियाता है ?“

” अरे भीड़ में धक्‍के नहीं तो क्‍या लड्‌डू मिलेंगे।“

”फला गॉव वाले बाहर आ जाओ भाई। कण्‍डकक्‍टर ने कांखकर दंगे को ठण्‍डा कर दिया।

यात्री उतरे चढ़े, गाड़ी बढ़ी, इधर दंगे वाली बात बढ़ गयी। कोई कह रहा था राम के नाम में इतनी शक्‍ति है कि पत्‍थर को पानी में तैरा सकता है। अब देखो न, नाम ही तो है जिसके कारण उसके भगत लोग मरकट लोग मर कट रहे है। हमें तुलसी की चौपाई याद आई - कलयुग केवल नाम अधारा। मिनट भर नहीं हुआ था कि बस रूकी ।

”मेरा एक रूपया”

अरे यार चिल्‍हर नहीं है कहां से लाऊॅगा ? चिल्‍हर लेके बैठा करो न।

मैं ही कहा से लाऊॅगा ?

तो मैं ही सबको चिल्‍हर देने के लिये ठेका लिया हूँ। है नई।

वह यात्री एक रूपया कम होने से आदमी के लेबल से नीचे उतर गया। और बड़बड़ाता हुआ नीचे उतरा कि एक रूपया खा लेगा तो आदमी नहीं बन जाएगा।

दो लड़कियां सवार हुई नीचे रक्षा विभाग का जवान अपनी जेब की सुरक्षा में चौकस आतुर भाव से पूछा - दो सीट ले जा सकते हो क्‍या ?

कण्‍डक्‍टर - नहीं भैया!

जवान - साहब का है।

अरे ले जा तो सकता हूं लेकिन सामने तो मेरा बाप खड़ा मिलेगा जीप में। न ?

कोई बात नहीं कहता हुआ वह जवान बिना किसी शरम के दरवाजा बंद कर जेब में हाथ डाले ऐसे खड़ा रहा जैसे मिशन समाप्‍त हो गया और उसकी फतह हुई हो। उसने लड़कियों के टिकट ले लिए।

दुनिया में एक से बढ़कर एक आदमी है। कोई बूढ़ा फटे नोट लेने से इंकार कर रहा था। कण्‍डक्‍टर ठंन्‍नाया तेरे लिये नये नोट छापते बैठा रहूं क्‍या ? ले धर और आगे बढ़। कण्‍डक्‍टर का घीसा पीटा सड़ेंला एक ही डायलॉग था जब वह पीछे दरवाजे पर होता तो कॉखता अरे आगे बढ़ो भाई। लोग आगे बढ़ जाते। आगे दरवाजे पर होता तब भी कॉखता आगे बढ़ो भाई और लोग आगे बढ़ जाते यानी पीछे खिसक जाते। सीधी बाई सबकी भौजाई। वह एक सीधे सादे देहाती छाप छोकरे को बार बार कहता - ये छोकरा ! तेरे को बार बार बोला न आगे बढ़, आगे बढ़ तू वहीं का वहीं खड़ा है।

ये डोकरी खिसक ना, यहां कहां मर रही है और उसने उस बूढ़िया की कमर पकड़कर धकिया दिया। बूढ़िया दई दई करती रहीं।

इंजन कब खराब हो जाए पता नहीं वैसे ही आदमी का भेजा कब भसक जाए कौन जाने ? अचानक बस में ब्रेक लगी ड्राइवर तमतमाया - ये बीड़ी बंद कर, लोगों को मार डालेगा क्‍या। इतने सारे लोगों को बीड़ी में तंमाखू बनाकर फूँकने की हिम्‍मत रखने वाले उस महानुभाव के दर्शन की उत्‍कट इच्‍छा से सब खुसुर फुसुर करने लगे। वह बीड़ी बाज तो बीड़ी फेंक चुका था सो हम उसे पहचान न पाए लेकिन बस में एक मंत्र जरूर पा लिया- धुम्रपान निषेध।

हमने देखा कि भीड़ की आड़ में एक नौसिखिया निमोछिया छोकरा अपनी हमउम्र छोकरी से चिपका संयोग श्रृंगार रस के आनंद में आकण्‍ठ डूबा हुआ था। यह दृश्य देख कर हमारे मन में भी संचारी भाव जाग उठा। हमने कंधे पर सिर रख सोई अपनी धर्मपत्‍नी को निहारते हुए उसका सिर सहलाया तभी वह गुर्रा उठी कभी तो सीधाई से बैठा कर, इसके अलावा कुछ और भी आता है तुम्‍हें। इतना सुनना था कि हमारा सारा जोश हवा निकले गुब्‍बारे की तरह फुसका हो गया। गनीमत है बस का टायर बचा रहा।

हम इधर उधर देखने लगे। एक आदमी खिड़की के पास बैठा बकरी से तेज कचर कचर चनाबूट खाये जा रहा था और छिलका वहीं फेंक रहा था। उसी के ऊपर सुन्‍दर अक्षरों में लिखा था - यहां गंदगी ना फैलाये। हमें अपना शहर याद आया और साथ ही भारतीय संस्‍कृति भी। लोग वहीं मूतते है जहां लिखा होता है - यहां पेशाब करना मना है। एक आदमी गिरगिट की तरह मुण्‍डी घुमा घुमाकर इसे उसे पूछता. ”कहॉ जाना है ?“ ये कहॉ जाना है ? एक ने उसी से पूछ बैठा - क्‍यों ?“ उसने कहा आसपास उतरते तो सीट मिलती और क्‍या ? क्षणभर में दोनो का मुंह गुपचुप की तरह फूल गया और वातावरण में चुप्‍पी छा गयी। अचानक कण्‍डक्‍टर कॉखा - खपरी वाले कौन कौन है भाई। हम उतरने की तैयारी करने लगे, तभी नजर पड़ी बस में सामने लिखा था - ईश्वर आपकी यात्रा सफल करे। और हम अपनी सुखद सफल यात्रा के लिये बस कम्‍पनी को धन्‍यवाद देते हुए उतर गये।

रचनाकार

धर्मेन्‍द्र निर्मल

ग्राम व पोष्‍ट ः कुरूद

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर: 1
  1. शुरु किया था तो लगा बस में चढ़ गये हैं अंत में लगा अब उतर लेना चाहिये :)

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जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,75,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: धर्मेन्‍द्र निर्मल का व्यंग्य - सुखद यात्रा
धर्मेन्‍द्र निर्मल का व्यंग्य - सुखद यात्रा
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