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पुस्तक समीक्षा - अन्तर्मन की गंगा यमुना

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अन्तर्मन की गंगा यमुना के अजस्र प्रवाह का शाब्दिक प्रतिबिम्बन : (प्रतिभा तिवारी के कविता संग्रह “अन्तर्मन की गंगा यमुना” पर केन्द्रित) अ...

अन्तर्मन की गंगा यमुना के अजस्र प्रवाह का शाब्दिक प्रतिबिम्बन :

(प्रतिभा तिवारी के कविता संग्रह “अन्तर्मन की गंगा यमुना” पर केन्द्रित)

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अनुभूतियाँ प्रत्येक जीवंत और संवेदनशील व्यक्ति की संपत्ति होती हैं और जब इन अनुभूतियों के साथ दैवीय चेतना का समन्वय होता है तब कविता जन्म लेती है । यहाँ दैवीय चेतना का अर्थ उस चेतना से है जो मनुष्य को मनुष्य बनाती है और जिसमें विवेक, विश्लेषण-क्षमता और दृष्टा होने की समझ विद्यमान होती है । इस प्रकार कविता वैयक्तिक अनुभूतियों और दैवीय चेतना के संगम से उत्पन्न अनुगूँज है ।

कविता लिखी या कही नहीं जाती, बल्कि उसका अवतरण होता है; वह नाज़िल होती है । रचनाकार अपने सर्वाधिक सक्रिय, और ऊर्जावान क्षणों में इस अवतरित हो रही; नाज़िल हो रही दैवीय चेतना से सम्पन्न ऊर्जा को ग्रहण करके उसे शब्दों में बांध कर उसे लौकिक और सर्वकालिक रूप प्रदान करता है । इस दृष्टि से कविता जीवन के समग्र स्वरूपों, सरोकारों और जिजीविषाओं का व्यापक और प्रामाणिक दस्तावेज़ होती है और रचनाकार इस अर्थ में एक ऐसा दृष्टा होता है जो समय को, उसके वर्तमान और भविष्य को, सटीक तरीके से विश्लेषित-व्याख्यायित करता है ।

समकालीन समय में जहां एक ओर सामाजिक, आर्थिक, वैयक्तिक और यहाँ तक कि बौद्धिक संत्रास घनीभूत होते जा रहे हैं, अनास्था और अविश्वास के घने अंधेरे दौर में तब एक सुरमई उजास की धुंधली सी किरण कविता में दिखाई देती है । कविता अपनी दिव्य चेतना से मनुष्य को अपने होने की आश्वस्ति देती है और साथ ही सुबह होने का भरोसा भी दिलाती है । इसी आश्वस्ति की शृंखला की अगली कड़ी प्रतिभा तिवारी का कविता संग्रह “अन्तर्मन की गंगा-यमुना” है ।

कविता संग्रह का शीर्षक “अन्तर्मन की गंगा-यमुना” सहज ही ध्यान आकर्षित करता है । गंगा धवलता की प्रतीक है और यमुना श्यामलता की । ये दोनों अपने अपने स्थानों पर तो महत्वपूर्ण हैं ही किन्तु जहां मिल जाती हैं उस स्थान प्रयाग को “तीर्थराज” बना देती हैं । ज़रा कल्पना कीजिये कि यदि प्रयाग में गंगा न होती, या यमुना न होती तो तो क्या उसे तीर्थराज का सम्मान मिलता-? प्रयाग को सिर्फ गंगा या यमुना ने नहीं बल्कि इनके मिलन ने; या यों कहिए कि इनके संतुलित मिलन ने तीर्थराज बनाया । इसका सांकेतिक अर्थ यह भी है कि जीवन की संपूर्णता के लिए केवल शुभत्व और धवलता ही ज़रूरी नहीं है बल्कि कालिमा और अंधेरा भी ज़रूरी है । इस कविता संग्रह के संदर्भ में गंगा श्रेष्ठ, दैवीय, पवित्र, सकारात्मक और धवल विचारों की प्रतीक है वहीं यमुना सांसारिक विरोधाभासों और कटु यथार्थों से उत्पन्न श्यामल विचारों की प्रतीक है । बरसों से अलग अलग रूपों और संदर्भों में प्रवाहित हो रही इन धाराओं का जब “अन्तर्मन” में मिलन होता है तो वह “तीर्थराज” हो जाता है, उसका कण कण पवित्र हो उठता है, उसके चिंतन में सकारात्मक यथार्थ का समावेश हो जाता है और तब वह समाज को धवलता का संदेश देने के लिए प्रस्तुत हो जाता है । प्रतिभा तिवारी का यह कविता संग्रह चिंतन और अनुभूतियों के इन्हीं पवित्र कणों का संकलन है ।

किसी रचनाकार के लेखन को समझने के लिए सृजन के दौरान उसकी मनःस्थिति और परिस्थितियों का विवेचन ज़रूरी होता है । अपनी रचनाधर्मिता के बारे में कृति के प्रारम्भ में ही प्रतिभा जी बहुत विनम्रता से सूचित करती हैं कि उन्होने लगभग बारह वर्ष की उम्र से लेखन प्रारम्भ किया था । वे मानती हैं कि जीवन में अति हर्षोल्लास एवं गहन विषाद के क्षण, दोनों ही स्थितियाँ भावातिरेक हेतु उत्तरदायी होते है और कभी कभी लेखनी द्वारा शब्द रूप पा जाते हैं । उनका आत्मकथ्य पढ़ते हुये ऐसा लगता है जैसे वर्ष 2013 का नोबल पुरस्कार प्राप्त करने वाली सुपरिचित अमरीकी कथाकार एलिस मुनरो के वक्तव्य का भारतीय रूप पढ़ रहे हों । एलिस मुनरो अपने बारे में बताती है :

“जब मैं किशोरी थी तब मैं खूब शारीरिक काम किया करती थी, क्योंकि मेरी मां ज्यादा काम नहीं कर सकती थी । लेकिन यह मुझे रोकने के लिए काफी नहीं था । मुझे लगता है, एक तरह से यह मेरी खुशकिस्मती थी । अगर मैं न्यूयॉर्क में किसी काफी धनी परिवार में जन्मी होती, ऐसे लोगों के बीच जो लेखन के बारे में सबकुछ जानते होते, तो मैं पूरी तरह से नष्ट हो जाती । तब मुझे बार बार ऐसा लगता कि मैं ऐसा नहीं कर सकती और मेरा आत्मविश्वास डोल गया होता । लेकिन क्योंकि मेरे आसपास ऐसा कोई नहीं था, जो लिखने के बारे में सोचा करता था, इसलिए मेरे अंदर यह विश्वास आया कि हां, मैं यह कर सकती हूं ।

यहाँ जिस विश्वास की चर्चा एलिस मुनरो कर रही है वो ही विश्वास, उसी संघनित रूप में प्रतिभा तिवारी में भी दिखाई देता है । और यही विश्वास एक समर्थ रचनाधर्म की आधारशिला है ।

प्रतिभा जी अनुभव सम्पन्न है और उनका अनुभव उनके शब्दों में सहज ही उतर आता है । उनकी अनुभूतियों ने अपने परिवार, अपने बच्चों और उनके माध्यम से वैश्विक संवेदनाओं को अभिव्यक्त करने का सफल माध्यम कविता को बनाया है । उनकी रचनाएं स्पष्ट रूप से परिभाषित करती हैं कि कविता की सार्थकता किसी विचार विशेष का अनुगमन करने में नहीं, बल्‍कि मानवीय वेदना और संवेदना को मुखरित करने और उसके माध्यम से बेहतर जिंदगी की संभावनाओं को तलाश करने में है । आज जब परिवार, बच्चे, रिश्ते सब तेज़ ज़िंदगी की आपाधापी में कहीं पीछे छूट चुके हैं तब ऐसे बहुत बिरले रचनाकार हैं जिन्होंने अपनी रचनाओं में और अपने चिंतन में, अपने विचारों में और अपने सरोकारों में सम्बन्धों और रिश्तों को शिद्दत से बचा कर न केवल रखा है बल्कि उनको संस्कारित किया है, उनकी जातीयता को सहेज कर रखा है और उन रिश्तों को अगली पीढ़ी तक सुरक्षित पहुंचाने का दायित्व भी स्वेच्छा से ग्रहण किया है । प्रतिभा तिवारी इसी दायित्वबोध की समावेशी प्रतिदर्श हैं । उनकी कवितायें “यशोदा का कृष्ण”, “देखो घर आ गई बिटिया सजीली”, “संस्कार डालें”, “बेटी की विदाई”, “दिन हँसते-मुसकाते होंगे” आदि कविताओं में अपने आसपास के वातावरण, लोगों, और तमाम ज़रूरी तत्वों के लिए वही धारा जीवंत रूप में अपने पूरे उत्स से प्रवाहमान है जो चिली की सुपरिचित कवयित्री गैब्रीयला मिस्तरल की कविताओं के शिल्प और भाव-भूमि में है और लगता है कि जो कुछ प्रतिभा तिवारी अपनी कविताओं में कह रही हैं वही चिंतन सूत्र रूप में गैब्रीयला मिस्तरल दे रही हैं । इस संबंध में उनकी बहुचर्चित कविता “सी नोम्ब्र ए ओए” (हिज़ नेम इज़ टुडे) दृष्टव्य है :

हम बहुत सी गलतियों और

बहुत से पापों के लिए शर्मिंदा हैं ।

पर

हमारा सबसे घृणित अपराध है

बच्चों का परित्याग

और इस प्रकार जीवन की गतिशीलता को अनदेखा करना ।

बहुत सी चीज़ें

हमारा इंतज़ार कर सकती हैं ।

पर बच्चे नहीं-

अब वह समय आ गया है

जब उसकी हड्डियाँ बनने लगी हैं

उसकी रगों में खून दौड़ने लगा है

और उसकी अनुभूतियाँ जागने लगी हैं ।

उसे हम

भविष्य के लिए नहीं टरका सकते-

उसका नाम “आज” है ।                       (भावानुवाद : आनंदकृष्ण)

इस कविता में जिसे “आज” कहा गया है उसकी शक्ति बन कर प्रतिभा जी अपनी कविता “शुभ-कामना” में कहती है :

हो सुख का समय या कि दुःख का हो डेरा,

सदा साथ पाओगे तुम साथ मेरा

कि संघर्ष में मैं सदा साथ दूँगी,

हंसी अपनी देकर मैं ग़म बाँट लूँगी;

मैं दूँ साथ हर दम ये तुम भी मनाओ..... ।।

हजारों बरस तुम जियो मुस्कुराओ,

हजारों बरस तुम जियो मुस्कुराओ ।।

प्रतिभा तिवारी की कविताओं को पढ़ते हुये यह आश्वस्ति होती है कि वे एक नैसर्गिक कवयित्री हैं । वे केवल कवयित्री ही हो सकती थीं, जो वे हुई । उनकी कविता के विषय बहुत सीधे सादे, आसपास की दुनिया के जाने पहचाने चित्र हैं जिनको उन्होने मौलिक रंग देकर उनको नए रूप और नए अर्थ दे दिये हैं । संग्रह में उनकी ऐसी अनेक कवितायें हैं जो यथार्थ के कड़वे सच से सामना कराती है और जिनमें उनके संवेदनशील मन के आँसू चमकते दिख जाते हैं । “दिल रोया आँखें रोई”, “कभी गौर तो किया होता”, “बिखरे मोती”, “बीते दिन” सहित अनेक कविताओं में उनका सूक्ष्म यथार्थबोध प्रतिबिम्बित होता है ।

समकालीन वाङमय में स्त्री विमर्श एक महत्वपूर्ण प्रवृत्ति के रूप में उभरा है जिसने सृजन और चिंतन के कई आयामों को प्रभावित किया है; किन्तु यह विडम्बना है कि स्त्री विमर्श की अवधारणा अपने लक्ष्य से भटक गई है । आज स्त्री विमर्श के नाम पर जो कुछ लिखा जा रहा है उसे पढ़ कर लज्जा से सिर झुक जाता है । स्त्री विमर्श के नाम पर स्त्री के अस्तित्व के एक बहुत छोटे से अंश पर ही सब कुछ केन्द्रित कर दिया गया है । स्त्री के सरोकार, उसकी ज़रूरतें, उसकी वांछनाएँ हाशिये से भी बाहर हो चुकी हैं । हमारे समय की ये बहुत बड़ी त्रासदी है । हम उत्तर आधुनिकता की बातें करते हैं पर सही अर्थों में हम अभी आधुनिक भी कहाँ हुये हैं-?? यथार्थ से परे की नारेबाजी प्रतिभा जी को प्रभावित नहीं कर पाई । उन्होने स्त्री होने के दर्प को अपनी कविताओं में जिया है और उसके अस्तित्व का समग्र रचनात्मक अन्वीक्षण किया है । स्त्री विमर्श  के सधे हुये, स्पष्ट और व्यावहारिक स्वर उन की रचनाओं में सहज रूप से विद्यमान हैं । उनकी लंबी कविता “अनुभूति.... चेतना.... संकल्प” में लड़की “सोई हुई लड़की”, “जागी हुई लड़की”, “डरी हुई लड़की”, “एक चुप-चुप लड़की”, “एक मुड़ती हुई लड़की”, “कुछ सोचती हुई सी लड़की” और “एक सहमी सी लड़की” के विविध रूपों में आती है । ये सारे रूप उसे समाज ने दिये हैं । पर इस कविता का चमत्कार वहाँ से शुरू होता है जब वे पूरे आत्मविश्वास के साथ कहती है :

और फिर उसकी भी चाल तेज हो गई

आँखें भी चमक उठीं, मुट्ठियाँ भी तन गईं

दांतों को भी भींचा, चेहरे पे एक तेज उठा

शक्ति को जगाया और खुद संकल्प बन गई

डर कर या दब कर अब जीवन नहीं जीना है ।

पाप खतम करना है जहर नहीं पीना है

दुनिया के फंदों का, पातकी दरिंदों का

सामना ही करना है पापियों से लड़ना है ।

हिम्मत बढ़ाऊंगी तभी जीत पाऊँगी

आज अब अकेली ही आवाज़ एक उठाऊँगी

तभी मेरे जैसी उन लाखों करोड़ों का

साथ पा जाऊँगी आगे पग बढ़ाऊंगी

पापियों दरिंदों को सज़ा दिला पाऊँगी

आगे न हो ऐसा ऐसे नियम बनाऊँगी

मेरे जैसी हर एक लड़की को दुनिया में

शान और सम्मान का जीवन दिला पाऊँगी

देखी संकल्प ले कर बढ़ती हुई लड़की ....

देखी संकल्प ले कर बढ़ती हुई लड़की ....

असली स्त्री विमर्श ये है जिसमें स्त्री की जागरूकता, उसके स्वाभिमान और उसके संकल्पों को शब्द दिये गए हैं ।

मैं अभी एलिस मुनरो की बात कर रहा था । उनकी एक कहानी ‘रन अवे’ में एक औरत कार्ला है जो कहानी की नायिका है । उसका दांपत्य जीवन काफी कठिनाइयों भरा रहा है । वह अपने पति को छोड़ने का फैसला करती है जो पश्चिमी समाज में एक साधारण बात है । एक उम्रदराज और तार्किक औरत सिल्विया जेमिसन की बातों से उसे ऐसा करने का हौसला मिलता है. और जब वह बाहर निकलने के लिए कदम बढ़ाती है, वह महसूस करती है कि वह ऐसा नहीं कर सकती । एलिस मुनरो इस कहानी के बारे में कहती हैं कि “यह समझदारी भरा फैसला है” । उसके पास उस जीवन से बाहर आने के कई कारण हैं, पर वह ऐसा नहीं कर पाती । आखिर ऐसा क्यों होता है ? इसका कारण भले ही पश्चिम के पास न हों किन्तु भारत में इसका उत्तर कोई बच्चा भी दे सकता है । यह सार्वत्रिक और सर्वकालिक संस्कारशीलता है जिसे पश्चिम अब पहचान पा रहा है । भारतीय साहित्य ऐसे संस्कारित और सर्वमान्य मूल्यों से भरा पड़ा है जिसकी प्रतिच्छवियाँ प्रतिभा जी की कविताओं में सर्वत्र बिखरी पड़ी हैं । जिस फैसले को एलिस समझदारी भरा फैसला कह रही हैं उसे तथाकथित स्त्रीवादी और स्त्री विमर्श के झंडाबरदार “स्त्री की गुलामी” और “पुरुष समाज की तानाशाही”, “फासिस्ट सोच” और न जाने क्या क्या कह कर खारिज कर सकते हैं किन्तु एलिस ने परिवार को जोड़कर रखने की, एक रिश्ते को बना कर रखे जाने की हिमायत की है जो आज के विघटनकारी समय की सबसे ज़रूरी बात है । यह आयाम भारतीय दर्शन का मौलिक और सर्वाधिक सशक्त आयाम है । ऐसे भारतीय संस्कार प्रतिभा जी की रचनाओं में प्रचुरता से हैं ।  

गैब्रीयला मिस्तरल और एलिस मुनरो की चिंतन धारा से प्रतिभा तिवारी की चिंतन धारा कहीं कमतर नहीं है । कमी केवल गंभीर पठनीयता की, स्पष्ट व्याख्या की और गहन विमर्श की है । इसके कारण भारतीय कला-साहित्य के स्वर्ण-कण धूल में गुमनाम पड़े रह जाते हैं । उनका कोई मूल्यांकन नहीं हो पाता और जब किसी सहृदय की दृष्टि उन पर पड़ती है तो वे ही गुमनाम, अनदेखे विचार-रत्न पश्चिम से झाड़-पोंछ कर हमारे सामने आते हैं जिनका हम खुले दिल से स्वागत करते हैं । अभिव्यक्ति के तरीके भिन्न होने के बावजूद साहित्य के शाश्वत मूल्य सारे विश्व में एक से हैं । उन शाश्वत मूल्यों और अपनी अभिव्यक्ति को समझने और उनको उचित सम्मान दे कर ही हम हमारे साहित्य और हमारी कलाओं को वैश्विक पटल पर सम्मानजनक स्थान दिला सकेंगे ।

प्रतिभा तिवारी की रचना-धर्मिता एक निश्चित दिशा और सार्वकालिक व्यापक विचार धारा के साथ निरंतर विकास कर रही है । उनकी कविता अपनी शक्ति, सृजनशीलता, मन और आत्मा को पूरी शिद्दत के साथ रूपायित कर देने को बेचैन प्रतीत होती है । यही बेचैनी दैवीय चेतना के अवतरित होने, नाज़िल होने की पूर्वाशंसा है । समय का, सच्चाई का और विद्रूपों का सामना करते हुये ये कवितायें एक स्पष्ट विकास-धारा की आश्वस्ति देती हैं । इनमें जूझने का माद्दा है, संघर्ष करने की शक्ति है और जीतने का हौसला भी; इसलिए इनको किसी नारेबाजी की ज़रूरत नहीं- । इन दिनों जब रिश्तों की गर्माहट कम होती जा रही है तब रिश्तों की अहमियत समझने वाले प्रतिभा जी जैसे बिरले रचनाकारों का पूर्ण प्रतिबद्धता के साथ सक्रिय होना शुभ संकेत देता है । उनका यह पहला कविता संग्रह ज़रूर है किन्तु इसमें उनकी सुदीर्घ साधना के विविध पड़ावों का इतिहास और भूगोल है जो उनके रचनाकार की यात्रा का दस्तावेज़ है । समकालीन दौर की भीषण त्रासदियों के बीच साहित्य या किसी भी कला का हस्तक्षेप इस बात की आश्वस्ति देता है हमारा समय कितना भी कठिन और अविश्वासनीय हो किन्तु रचनाकार एक बेहतर दुनिया को बनाने की अपनी ज़िद पर अड़े हुये हैं और उसके लिए निरंतर प्रयत्नशील भी हैं । हमारे आज को समझने के लिए और भविष्य की दिशा निर्धारित करने के लिए ये रचनाएँ आम पाठकों के साथ युवा रचनाकारों को भी पढ़ना चाहिए । कुल 80 छोटी-बड़ी कविताओं का यह संग्रह प्रतिभा जी के व्यक्तित्व को भी समझने का एक बेहतरीन अवसर देने के साथ ही समाज को नए तरीके से चिंतन करने के लिए प्रेरित करेगा, ऐसी आशा की जाना चाहिए ।

पाकिस्तान की मकबूल शायरा ज़ाहरा निगाह की एक छोटी सी नज़्म मुझे इस पुस्तक को पढ़ते समय अक्सर याद आती रही । उस नज़्म के साथ प्रतिभा जी को बहुत बहुत शुभकामनायें :

मुलायम गरम समझौते की चादर

ये चादर मैंने बरसों में बुनी है ।

कहीं भी सच के गुल-बूटे नहीं हैं

किसी भी झूठ का टांका नहीं है ।

इसी से मैं भी तन ढक लूँगी अपना

इसी से तुम भी आसूदा रहोगे

न खुश होगे न पजमुर्दा रहोगे

इसी को तान कर बन जाएगा घर

बिछा लेंगे तो खिल उटठेगा आँगन

उठा लेंगे तो गिर जाएगी चिलमन

****************

कृति परिचय :

अन्तर्मन की गंगा-यमुना (कविता संग्रह)

रचनाकार : प्रतिभा तिवारी

प्रकाशक : रंग प्रकाशन, इंदौर (म.प्र.)

आवरण : सारंग क्षीरसागर

संस्करण : प्रथम (2013)

पृष्ठ : 111 मूल्य : रु. 200/-

समीक्षक : आनंदकृष्ण

4/2, अरेरा टेलीफोन एक्सचेंज परिसर,

अरेरा हिल्स, भोपाल

 

ई-मेल : aanandkrishan@gmail.com

ब्लॉग : hindi-nikash@blogspot.com

--

आनंदकृष्ण, भोपाल
ब्लॉग : http://www.hindi-nikash.blogspot.com

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर: 1
  1. -सुंदर रचना...
    आपने लिखा....
    मैंने भी पढ़ा...
    हमारा प्रयास हैं कि इसे सभी पढ़ें...
    इस लिये आप की ये खूबसूरत रचना...
    दिनांक 08/05/ 2014 की
    नयी पुरानी हलचल [हिंदी ब्लौग का एकमंच] पर कुछ पंखतियों के साथ लिंक की जा रही है...
    आप भी आना...औरों को बतलाना...हलचल में और भी बहुत कुछ है...
    हलचल में सभी का स्वागत है...

    जवाब देंहटाएं
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रचनाकार: पुस्तक समीक्षा - अन्तर्मन की गंगा यमुना
पुस्तक समीक्षा - अन्तर्मन की गंगा यमुना
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