सौराज सिंह का व्यंग्य - आखिर क्यों रोया?

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**** व्यंग्य **** आखिर क्यों रोया ? अगर रोने की बात आ जाए तो कुछ बुध्दिजीवी नुक्कड़ या व्यंग्य कविता के माध्यम से पत्नियों का उपहास करते मि...

**** व्यंग्य ****

आखिर क्यों रोया ?

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अगर रोने की बात आ जाए तो कुछ बुध्दिजीवी नुक्कड़ या व्यंग्य कविता के माध्यम से पत्नियों का उपहास करते मिल ही जायेंगे । लेकिन फ़िर भी मैं यहाँ ऐसा कुछ नहीं कहूँगा क्योंकि मैं शादीशुदा भी नहीं हूँ और मेरे साथ जो वाक्या हुआ वो काफ़ी संदेहास्पद है। बात उस और से है जो आजकल ट्रेंड में है ,वैसे रोने और हँसने की क्रियाओं से आप अच्छी तरह परिचित होंगे क्योंकि ये क्रियायें हर किसी के जीवन में उतार चढ़ाव के साथ अपना सामजस्य बनाये रखती है मेरे विचार से शायद ही कोई ऐसा हो जिसे जिसे इसका सामना न करना पडा हो क्योंकि आजकल कोई गृह क्लेश में तो कोई राजनीतिक के भिन्न कारणों से कुंठित है। मेरा जो विचार हो खैर माजरा कुछ और ही है।

वैसे सुबह घूमने में मेरी कोई खासी दिलचस्पी नहीं है फ़िर भी मैं सुबह निकल लेता हूँ अब चुनावी मौसम है तो सुबह सुबह शहर के नेता टाइप लोगों के चुनावी पैंतरो से भी परिचित हो लेता हूँ। खैर मुद्दे पर आते है, आज सुबह की वो घटना जो मेरे साथ हास्यास्पद अंदाज में कुछ इस प्रकार घटित हुई थी।

जब मैं आज सुबह की सैर पर निकला तो मुझे लगा कि कोई सड़क के किनारे एक बेंच पर बैठा रो रहा था। प्रेमिकाओं के धोखे देना तो आम बात हो गई है, तो मैने सोचा शायद बेचारे का कोई मर गया होगा या यह भी हो सकता है कि भूमंडलीकरण की आँधी में उसकी कई साल पुरानी नौकरी सूखे पत्ते की तरह उड़ गई हो।

आजकल जैसा समय चल रहा है, उसमें रोने के हजार कारण हो सकते हैं। फिर भी मुझसे रहा न गया क्योंकि भारतीय नागरिक होने के नाते कुछ सहानुभूति भी दिखानी बनती है , वह जिस तरह फूट-फूट कर रो रहा था, उसे देखते हुए कोई रुके भी नहीं और उसे सांत्वना भी न दे, तो यह रोते जाने का एक नया कारण बन सकता था। इसीलिए एक आदर्श नागरिक की तरह आचरण करते हुए मैं आहिस्ता-आहिस्ता उसके पास गया और उसका काँपता हुआ हाथ अपने हाथ में लेते हुए पूछा - क्यों रो रहे हो, भाई?

मैंने थोड़ी सी सहानुभूति दिखलायी।

वह चुप रहा और गहरे गहरे रुहाँसे भरे ठहाके लेने लगा।

मैं भी हठी सा बनकर उससे पूछने लगा क्योंकि किसी रोते हुए व्यक्ति से कारण पूछना वैसे ही जैसे किसी निषेध कार्य को जानते हुए भी करना।

आँसू पोंछते हुए अब वो मुझे ऐसे घूरने लगा जैसे मैंने उससे कभी कुछ ले रखा हो या यों कहें कि मैं इस भारतवर्ष का ऐसा नागरिक होऊं जो यहाँ की दशा के बारे में अनभिज्ञ हूँ।

फ़िर उसने धीरे से सिर उठाया, मुझे गौर से देखा, फिर फफक कर पूछा, रोऊँ नहीं तो क्या करूँ? ठठा कर हँसूँ? फ़िर उसने अपने पास बेंच से अखबार उठाकर थमाया और एक पृष्ठ पर अंकित खबर की और इंगित करने लगा।

मैनें अखबार लिया और देखा तो वहाँ उस पार्टी के चुनावी कार्यकारिणी के अध्यक्ष का बयान लिखा कि “हमारी पार्टी के इस सीट के प्रत्याशी का अपने गलत बयानात तथा पार्टी विरोधी गतिबिधियों में संलिप्त रहने के कारण इस सीट पर प्रत्याशी के नाम पर पुर्नविचार किया जायेगा”।

जब मैंने अखबार देखा तो वह आउट आफ़ डेटेड था, मैंने सोचा कि अब इसके पश्चाताप करने का कोई फ़ायदा नहीं है लेकिन उसकी हालात देखकर एकबारगी तो ऐसा लगा जैसे किसी बारात में किसी को दूल्हे की गाड़ी से उतारकर, काँन पकड के बस में बैठा दिया हो लेकिन फ़िर भी मैंने उससे कहा-

आपके प्रमोशन के बारे में सही ही तो लिखा और इसमें रोने वाली बात क्या है? मैंने अखबार रखते हुए कहा।

उसने मुझे गौर से देखा जैसे किसी बहुत बड़े मूर्ख से उसकी मुलाकात हो गई हो। फिर बोला -अरे भई तुम्हारा दिमाग तो नहीं फ़िर गया किस प्रमोशन की बात कर रहे हो यहाँ राजनीति में मेरे पद की गरिमा का सवाल और आप हैं कि ! इतना कहते हुए वह रुका फ़िर से रुहाँसा सा हो गया।

इस पार्टी का कार्यकर्ता होने के नाते मैंने सड्क के किनारे झुग्गी,झोंपडियों वालो से तक मिला और पैसा -शराब तो सभी उडाते है बस पार्टी की नीतियों और जनता से मिले प्रोत्साहन से भावनाओं में बहकर दो-चार शब्द ज्यादा निकल गये कि मुझे सब पार्टी से ही निकाल दिया वैसे मेरा किसी से कोई गलत बोलने का इरादा नही था ,इतना जरूर है कि कभी मैं इस दल का फ़ायरब्रांड नेता हुआ करता था, तब यही हाईकमान वाले कहते थे कि भाषण में अक्रामकता लाओ अगर इस पर अमल करो तो ये दिन देखने पड्ते है, लेकिन अब तो समय ही निकल गया इतना कहते हुए वह फ़फ़कने लगा ।

मैंने फिर तसल्ली देने की कोशिश की, फालतू में क्यों बात बढ़ाते हो?

आप फ़िर भी ठीक हो हम वोटरों की बात की जाए हमारी भी बहुत कैटेगरी होती हैं, कुछ मतदाता तो वोटर कार्ड निरस्त हो जाने या ये कहें कि आपके जातिगत कारणों से किसी सत्ताधारी दल द्वारा निरस्त करवा दिये जाने पर आत्महत्या करने पर उतारु हो जाते हैं और दूसरे वो जो साल भर मतदान जागरुकता का जोर -शोर से नारा देते रहते हैं, वही अंत में घर पर किसी पार्टी के कार्यकर्ता की गाडी का इन्तजार करते रहते हैं कि शाम तक कोई न कोई तो लेने आयेगा और शाम तक टी वी पर पोलिंग बूथों की जानकारी तथा क्रिकेट देखने में व्यस्त रहते हैं और तो और पिछले विधानसभा चुनाव में मतदाताओं को ई-वोटिंग की सुविधा भी दी गई थी। क्योंकि पिछले चुनाब में जब मैं अपनी मत शक्ति का हक अदा करने के लिए गया तो मुझे बताया गया कि आपका वोट तो सुबह ही पड चुका है तब मैंने सोचा खैर कुछ विकास तो हुआ जो इस सुबिधा(ई-वोटिंग) का घर बैठे आनन्द ले सकते हैं ।

मैंने उसे समझाते हुए कहा कि आप अपनी यह जिद छोडकर किसी दूसरे दल से जुड जाए आपका यह कदम राष्ट्रहित में अच्छा साबित हो सकता है,कल हो न हो दूसरे दल में सीधा प्रमोशन हो जाये लेकिन यहाँ रोने से कुछ हासिल नहीं होने वाला है।

वह बोला, हो सकता है, तुम्हारी बात ठीक हो, पर यह तो भविष्य ही बताएगा। अभी तो मुझे रोने का अधिकार है और तुम चले जाओगे तो मैं फिर रोना शुरू कर दूँगा। मैं तो मानता हूँ कि इस वक्त रोना मेरा अपना कर्तव्य भी है। मुझे अपने कर्तव्य का पालन करने दो। क्यों नहीं तुम भी मेरे साथ बैठ कर थोड़ी देर रो लेते? जिससे मेरा भी गम हल्का हो जाये।

मैंने कहा - मैं इतना बदकिस्मत हूँ कि मेरे पास रोने के लिए भी समय नहीं है। मुझे घर जाकर एक लेख भी लिखना है इसके साथ ही पोलिंग बूथ पर समय से भी पहुँचना है क्योंकि मेरे मत का हक पिछली बार की तरह अदा न हो जाए।

 

सौराज सिंह (व्यंग्यकार)

शिकोहाबाद

नाम

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